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`तीसरी कसम’ (1966)

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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2016

`तीसरी कसम’ (1966)

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी एवं संवाद को नबेन्दु घोष की पटकथा और शैलेन्द्र तथा हसरत जयपुरी के गीतों के सहारे बासु भट्टाचार्य ने एक अमर फिल्म की रचना की। इसका निर्माण गीतकार शैलेन्द्र ने किया था। फिल्म दुर्भाग्य से पहले असफल साबित हुई और शैलेन्द्र कर्ज के दलदल में ऐसे फँसे कि टेंशन से उनकी जान चली गई। इसमें राजकपूर और वहीदा रहमान ने अद्भुत अभिनय किया है। शंकर जयकिशन का संगीत आज तक लोकप्रिय है।
बसु भट्टाचार्य बिमल रॉय स्कूल के फिल्मकार हैं और ‘तीसरी कसम’ उनकी सबसे चर्चित कृति है। एक स्तर पर इस फिल्म की तुलना बिमल रॉय की ‘दो बीघा जमीन’ (1953) और ‘परख’ (1960) से की जा सकती है। ‘दो बीघा जमीन’ की फोटोग्राफी कमल बोस की थी। कथा और संगीत सलिल चौधरी के थे। इसके गीतकार शैलेन्द्र थे और पटकथा हृषिकेश मुखर्जी ने लिखी थी जबकि संवाद पॉल महेन्द्र ने लिखा था। ‘परख’ की कहानी और पटकथा सलिल चौधरी ने लिखी थी। संगीत भी उन्हीं का था जबकि संवाद और गीत शैलेन्द्र ने लिखा था। फोटोग्राफी कमल बोस की थी।
‘तीसरी कसम’ एक अर्थ में हिन्दी सिनेमा की अनोखी रचना है। इसकी कथा, संवाद और गीत में ठेंठ हिन्दी का ठाट है। रेणु बिहार में पैदा हुए थे जबकि शैलेन्द्र मध्यप्रदेश में पैदा हुए थे। रेणु को प्रेमचंद की परंपरा का कथाकर माना जाता है। परन्तु रेणु के साहित्य में ग्रामीण जीवन एवं संस्कृति की जैसी समग्रता पायी जाती है, वह प्रेमचंद साहित्य में भी नहीं है। रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल’ और उनकी कहानी तीसरी कसम में विपन्न लोगों के जीवन की सांस्कृतिक संपन्नता है। इनमें महात्मा गांधी के ‘हिन्द स्वराज’ की छाया दिखाई देती है। रेणु के ज्यादातर पात्र दलित, अवर्ण और पिछड़े तबकों से हैं। ग्रामीण यथार्थ की सांस्कृतिक बुनावट की रेणु की कृतियों में जबरदस्त पकड़ है। इतिहास के प्रवाह, राजनीति और सांस्कृतिक अंत: संबंध को रेणु बहुत गहराई से उकेरते हैं। रेणु के पहले ग्राम कथाओं की भाषा किताबी थी। उनमें कुछ आंचलिक शब्द जरूर डाल दिए जाते थे। रेणु की भाषा में आंचलिक बोली की लय है और वह वाचिक अनुभव के साथ है। बोलियों का जो वाचिक नाट्य है, वह रेणु की भाषा में पूरी ठसक के साथ है। इस वाचिक लय में देखा हुआ जीवन है। रेणु ने हिन्दी साहित्य में पहली बार ग्रामीण यथार्थ को पूरी संपूर्णता में प्रस्तुत किया है। रेणु की निगाह बदलते ग्रामीण समाज पर भी थी। जब कोई नई चीज गाँव में आती है, तब स्थानीय संस्कृति उसे कैसे अपनाती है, इसका सजीव वर्णन रेणु ने ‘तीसरी कसम’ में किया है। रेणु ने ग्रामीण जीवन की छोटी से छोटी स्थितियों को इतनी बारीकी से बयाँ किया है कि वे मोहक बन गई हैं। रेणु के यहाँ ग्राम कथा अपने सामाजिक विश्वासों में, मिथकों में, लय में, प्रकृति में, अपने नाद और स्वर में, भाषा में नाट्य के साथ उपस्थित है। ‘तीसरी कसम’ पढ़ना या देखना ग्रामीण जीवन को जीने की तरह है।

‘तीसरी कसम अथवा मारे गए गुलफाम’ रेणु की अद्भुत कहानी है। मूलत: यह ग्रामीण संस्कृति की कहानी है, जिसके केन्द्र में प्रेम है। लेकिन इसमें प्रेम का कहीं भी जिक्र नहीं होता। 40 साल का गाड़ीवान हीरामान और खूबसूरत नर्तकी हीराबाई के बीच प्रेम के अंकुरण की यह संवेदनशील कहानी है। हीरामन इस बात से सजग नहीं है कि वह प्रेम कर रहा है। हीरामन के जीवन में प्रेम की कोई गुंजाइश नहीं है। हीराबाई ऐसे पेशे में है, जहाँ हर दिन उसे प्रेम का ढ़ोंग करना पड़ता है। दोनों का हृदय प्रेम के अनुभव के लिहाज से रेगिस्तान की तरह है। इस रेगिस्तान में जब प्रेम का सोता फूटता है तो दोनों एक-दूसरे से गहरी अंतरंगता से जुड़ते हैं, लेकिन अंतत: हीराबाई हीरामन को अपनाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती है और हीरामन को छोड़कर चली जाती है। दर्शकों को यह बात हजम नहीं होती है और फिल्म फ्लॉप हो जाती है। बी. आर. चोपड़ा ने 1958 में सुनील दत्त और वैजयंती माला को लेकर ‘साधना’ बनायी थी। उसमें एक तवायफ को मध्यवर्गीय नायक अंतत: स्वीकार लेता है। लेकिन 1966 में बनी ‘तीसरी कसम’ में हीराबाई डर कर भाग जाती है कि समाज उनके प्यार को नहीं स्वीकारेगा। शहरों का मध्यवर्गीय दर्शक ‘तीसरी कसम’ की आंचलिकता को समझ नहीं पाया। दरअसल ‘तीसरी कसम’ केवल एक प्रेम कहानी नहीं है, यह बदलते हुए ग्रामीण संस्कृति की महागाथा भी है। रेणु की ‘तीसरी कसम’ में तीन कहानियाँ हैं। तीनों का नायक हीरामन है, जबकि हीराबाई केवल तीसरी कहानी की नायिका है। हीरामन 1966 में 40 साल का है, यानी उसका जन्म 1926-27 में हुआ है। दरअसल वह ग्रामीण भारत का प्रतीक पुरुष है। वह एक गाड़ीवान है। वह गाँव से कस्बा और शहर की यात्रा करता है। इसी बहाने दर्शक ग्रामीण संस्कृति, कस्बाई संस्कृति और शहरी संस्कृति के दर्शन करते हैं। 1966 में गाँव में पश्चिमीकरण, विकास या आधुनिकता हर जगह नहीं पहुँची थी। 1951 की पहली पंचवर्षीय योजना ग्राम केन्द्रित एवं कृषि केन्द्रित थी। इसके बावजूद 1953 में सलिल चौधरी और बिमल रॉय की ‘दो बीघा जमीन’ में गाँव की बदहाली दिखलाकर नेहरूवादी नीतियों की आलोचना की गई है।
गाँव को आशाहीन जगह दिखलाया गया है। जबकि शहर को समस्याओं के बावजूद आशा का केन्द्र दिखलाया गया है। 1956 से दूसरी पंचवर्षीय योजना लागू हुई। इसका केन्द्र नगर एवं औद्योगीकरण है। 1960 में बनी ‘परख’ में एक उद्योगपति को ग्रामीण विकास के लिए पाँच लाख रुपया दान करते दिखलाया गया है। गाँव में पोस्टऑफिस, अस्पताल, स्कूल आ चुके हैं। गाँव में महाजन, जमींदार, पुरोहित के साथ डाक्टर, स्कूल मास्टर, पोस्टमास्टर अभिजात वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इसके विपरीत 1966 में बनी फिल्म ‘तीसरी कसम’ का गाँव भौतिक दृष्टि से पिछड़ा लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न गाँव है। इसमें न पक्की सड़क है, न नहर है, न स्कूल है, न अस्पताल है, जबकि महाजन है पर जमींदार नहीं है। अभिजन लोग कस्बों एवं शहरों में रहते हैं, गाँव में पक्का मकान नहीं है। यह उत्तर बिहार के गाँव की यथार्थ स्थिति पर आधारित फिल्म है। यह लेखक रेणु का अपना इलाका है। यह फिल्म एक आंचलिक कथा पर आधारित है। जो ग्रामीण शहरी बन गया उसकी निगाह से गाँव को जो साहित्य देखता है, उसको ग्रामकथा, आंचलिक कहानी या आंचलिक उपन्यास कहा गया। गाँव के लड़के शिक्षा और नौकरी के लिए बड़ी तादाद में शहरों-महानगरों में आए। वहाँ उनको नौकरी मिली शादी करके वे वहीं बीवी-बच्चों के साथ रहने लगे। यह मध्यवर्ग पैदा तो हुआ गाँव में, वहीं पला-पोसा लेकिन रहने लगा शहर में। ‘दो बीघा जमीन’ और ‘परख’ इसी तरह की आंचलिक फिल्म थी। यह शहर में रहने वाले ग्रामीण व्यक्ति की नजरों से देखा गया गाँव है। इसके विपरीत ‘तीसरी कसम’ देहाती गाड़ीवान हीरामन की नजर से गाँव, कस्बा और शहर की देखी-सुनी-भोगी गई कथा है। परन्तु हीरामन का पात्र रेणु जैसे मध्यवर्गीय लेखक की नजर से देखा-रचा गया है। रेणु शहर में बसे हुए ग्रामीण थे। उनकी दृष्टि गांधीवादी थी। दूसरी ओर सलिल चौधरी की दृष्टि ‘दो बीघा जमीन’ में नेहरूवादी और ‘परख’ में गांधीवादी थी। हीरामन जैसा ठेंठ देहाती चरित्र की रचना हिन्दी सिनेमा में दूसरा नहीं मिलता। हीरामन हिन्द स्वराज का स्वराजी चरित्र है। जिदंगी के बारे में उसकी दृष्टि सनातनी है। उसका यह चरित्र शैलेन्द्र द्वारा लिखे गीतों में अभिव्यक्त हुआ है। वह रौबर्ट रेडफिल्ड के द्वारा वर्णित ‘लिटिल ट्रेडिशन’ या ‘फोक कल्चर’ का प्रतिनिधि न होकर गांधी के ‘हिन्द स्वराज’ और प्लेटो के ‘रिपब्लिक’ का प्रतिनिधि है। एक स्तर पर ‘परख’ के पोस्टमास्टर और ‘तीसरी कसम’ के गाड़ीवान हीरामन की तुलना हो सकती है, लेकिन दोनों फिल्मों की तुलना नहीं हो सकती। ‘परख’ का गाँव भौतिक रूप से विकसित लेकिन सांस्कृतिक रूप से भ्रष्ट हो चुका है। जबकि ‘तीसरी कसम’ में भ्रष्टाचार कस्बे और शहर में तो है, गाँव में अभी तक नहीं फैला है। लेकिन 2010 तक आते आते गाँव की स्थिति भी बदल गई है। भ्रष्टाचार और आतंकवाद की बात छोड़ भी दें, तो दूषित पर्यावरण हमें किश्तों में मार रहा है। रासायनिक कीटनाशक के उपयोग से सब्जियाँ और फल हानिकारक हो चुके हैं। मौत छोटी-छोटी सी मासूम दिखने वाली किश्तों में हमें परोसी जा रही है। खाने की हर चीज में आज मिलावट है। आधुनिकता के नशे में हम सब उन्हीं गलियों में जीने निकले हैं, जिनमें हर जगह मौत बिछी है। एक भ्रष्ट और अनैतिक समाज इसी तरह मौत को आमंत्रित करता है। लेकिन ‘तीसरी कसम’ के नायक हीरामन के सामने अपने गाँव और घर लौटने का विकल्प है। उसके जीवन की समस्याएँ तीन कसम खा लेने से सुलझ जाती हैं। जबकि यह विकल्प हमारे-आपके सामने नहीं बचा है। हम इंटरनेट के ऐसे नेटवर्क समाज में जी रहे हैं, जिसमें प्रतिद्वंद्वी कंपनियाँ काफी पैसा खर्च करके एक दूसरे के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए लेटेस्ट वायरस बनवाती हैं और इस वायरस से बचने के लिए एंटी-वायरस भी साथ ही साथ बनवाया जाता है। यह विज्ञान एवं तकनीक के सैन्य उद्योग से जुड़ने के बाद उसकी तार्किक परिणति है। आधुनिकता के दौर में सैनिक और गैर-सैनिक दोनों समाजों में तकनीक की अंधी दौड़ चल रही है। आधुनिक होने के बाद आप आधुनिक बने रहने के लिए अभिशप्त हैं। इससे बाहर निकलने का पक्का रास्ता फिलहाल नहीं बचा है। जेहादी इस्लाम और माओवादी भी इसी आधुनिकता की कोख से निकले हैं। ये भी आधुनिक तकनीक पर उसी तरह हिंसक तरीके से निर्भर हैं, जैसे पूँजीवादी प्रजातंत्र के समर्थक निर्भर हैं। इससे बाहर निकलने के लिए कच्ची सड़क या पगडंडी अवश्य बची है। लेकिन इन ऊबड़-खाबड़ रास्तों का इस्तेमाल आज माओवादी सैनिकों या जेहादी आतंकवादियों की पहुँच से बाहर नहीं है। क्या यह महज संयोग है कि ‘तीसरी कसम’ बनाकर शैलेन्द्र 1966 में मर गए और 1967 में चारू मजुमदार ने नक्सलवादी में माओवादी अभियान शुरू किया और उत्तर भारत में कांग्रेस पार्टी की विधान सभाओं के चुनाव में शर्मनाक पराजय हुई? 

मेरी दृष्टि में ‘तीसरी कसम’ के तीनों कसमों का बराबर महत्व है, भले ही तीसरी कसम खाने की प्रक्रिया फिल्म में सबसे लंबी है। हीरामन बैलगाड़ी का गाड़ीवान है। वह शुरू में एक सेठ का चोरी का माल ढोता है। पुलिस के छापे के बाद वह सेठ अपने चोरी के सामान के साथ पकड़ा जाता है और हीरामन किसी तरह अपने बैलों के साथ भाग कर घर पहुँचता है और पहली कसम खाता है कि अब वह अपनी बैलगाड़ी पर चोरी का सामान नहीं ढोएगा।
फिर वह बाँस ढोने लगता है। एक दिन लंबे बाँसों के कारण सड़क पर दुर्घटना हो जाती है और हीरामन अपने घर वापस लौटते समय दूसरी कसम खाता है कि अब वह बाँस नहीं ढोएगा। फिर वह सवारियों को ढोने लगता है। इसी क्रम में वह नौटंकी कंपनी की नर्तकी हीरा बाई को शहर से कस्बा तक पहुँचाता है। इस यात्रा के क्रम में हीरामन और हीराबाई के बीच प्रेम का अंकुरण होता है। हीरामन के भोलेपन और दार्शनिक गायकी के अंदाज पर हीराबाई मोहित हो जाती है और अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचने के बाद हीरामन को कस्बा में रुक कर नौटंकी देखने के लिए कहती है। हीरामन अपने साथी गाड़वानों के साथ रुक जाता है और नौटंकी देखता है। इस क्रम में गाँव की संस्कृति और कस्बा की संस्कृति का अंतर और भी स्पष्ट होता है। फिर वह दिन आता है, जब हीराबाई हीरामन को छोड़कर शहर चली जाती है और घर लौटते समय हीरामन तीसरी कसम खाता है कि वह अब किसी नौटंकी कंपनी की बाई को अपनी बैलगाड़ी पर नहीं बैठाएगा। सुब्रत मित्रा की फोटोग्राफी लाजबाब है। गाँव, बैलगाड़ी, पगडंडी, नदी, ट्रेन, कस्बा और नौटंकी के खेल एवं नृत्य की सजीव फोटोग्राफी से सुब्रत मित्रा एक अद्भुत समाँ बाँधते हैं।
पहली कसम के क्रम में हम भ्रष्टाचार, चोरी और धर-पकड़ की पुलिसिया संरुकति से रू-ब-रू होते हैं। ‘तीसरी कसम’ को बनने में चार वर्ष लगा था (1962-1966), उस समय जवाहरलाल नेहरू जिन्दा थे। 1962 में भारत-चीन युद्ध हुआ था और रक्षा मंत्री वी. के. कृष्णामेनन की नीतियों को 1962 की हार के लिए जिम्मेदार माना गया था। जब राष्ट्रपति एस. राधाकृष्णन सरकार की राय के खिलाफ गुस्से में सैनिकों से मिलने सीमा पर पहुँचे, तब सैनिकों ने भावुक होकर उन्हें बतलाया कि रक्षा विभाग से हमें लड़ने के लिए पर्याप्त मात्रा में हथियार नहीं मिलता। हमारे पास लड़ने के लिए हिम्मत और राष्ट्रभक्ति के अलावा कुछ भी नहीं है। कहा जाता है- राष्ट्रपति राधाकृष्णन को सैनिकों की दशा देखकर नेहरू और उनकी सरकार पर बहुत गुस्सा आया। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को बर्खास्त करने का मन बना लिया था। इसकी जानकारी मिलते ही नेहरू ने राजनीतिक चाल चली और लोकप्रिय होने के बावजूद राधाकृष्णन को दूसरी बार राष्ट्रपति बनाने की जगह जाकिर हुसैन जैसे नेहरू समर्थक को राष्ट्रपति बनाया गया। 1964 में जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु हुई और लालबहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया। उनकी प्रेरणा से मनोज कुमार ने 1967 में ‘उपकार’ नामक लोकप्रिय फिल्म बनायी। 1965 में भारत-पाक युद्ध हुआ, जिसमें बुरी तरह पाकिस्तान की पराजय हुई। इस युद्ध के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच सोवियत संघ के शहर ताशकंद में एक समझौता हुआ। दुर्भाग्य से ताशकंद में ही लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु हो गई और 1966 में इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं । 1966 तक देश की पुलिस दक्ष थी। 1965 में युद्ध जीतने के कारण 1962 की हार का गम कुछ कम हो गया था। लेकिन देश में भ्रष्टाचार, चोरी, जमाखोरी और कालाबाजार का आगमन होने लगा था। अभिजात वर्ग की संपन्नता भौतिक स्तर पर चमक-दमक वाली थी, लेकिन नैतिक पतन शुरु हो गया था। इसको बी.आर.चोपड़ा निर्मित ‘वक्त’ (1965) में यश चोपड़ा ने बड़ी खूबसूरती से प्रस्तुत किया था। ‘वक्त’ एक रंगीन फिल्म थी, जबकि ‘तीसरी कसम’ श्वेत-श्याम फिल्म थी। ‘तीसरी कसम’ फिल्म के प्रारंभिक अंश में न सिर्फ चोरी का माल बेचने वाला सेठ पकड़ा जाता है, बल्कि भोला गाड़ीवान यह कसम भी खाता है कि वह अब बैलगाड़ी पर चोरी का माल नहीं ढोएगा। इन्हीं प्रारंभिक दृश्यों में वह गाना भी गाता है – ‘सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है।’ यानी समाज में कुछ लोग न सिर्फ चोरी करने लगे थे, बल्कि झूठ भी बोलने लगे थे। जबकि हीरामन जैसे लोग खुदा के पास जाने के डर से नैतिक बने रहने का फायदा भी समझते थे।

इसके बाद हीरामन बाँस ढोने लगता है। बाँस उन दिनों एक लोकप्रिय उत्पाद था। मिट्टी और खपड़ा तथा फूस के मकान बनाने में बाँस का बहुत उपयोग होता था। फर्नीचर बनाने में भी बाँस का उपयोग होता था। टोकरी और हाथ का पंखा बनाने में भी बाँस का उपयोग होता था। लेकिन बाँस की ढुलाई जोखिम का काम था। उस समय उस इलाके में ट्रैफ़िक के नियम और ट्रैफ़िक पुलिस का अस्तित्व नहीं था। फलस्वरूप बाँस ढोने में काफी दिक्कत होती थी। आए दिन दुर्घटनाएँ होती रहती थीं। 1960 का दशक शहरीकरण और औद्योगीकरण का काल था। 1957 से दूसरी पंचवर्षीय योजना शुरू हुई थी। इसके केन्द्र में शहर एवं उद्योग थे। ग्रामीण इलाकों में भी इसका प्रभाव पड़ रहा था। सड़कों पर यातायात के नियम का मानकीकरण शुरू हुआ था। दूसरी कसम के बहाने फणीश्वर नाथ रेणु और बासु भट्टाचार्य शहरीकरण की प्रक्रिया पर एक व्यंग करते हैं। इसी व्यंग के संदर्भ में हीरामन एक गाना गाता है- ‘दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई, काहे को दुनिया बनाई’। यह एक दार्शनिक गाना है। गाँव के एक सरल, भोले-भाले गाड़ीवान के हृदय से निकले इस गाने में भारतीय लोक संस्कृति की गहराई झलकती है। वह एक दुर्घटना का शिकार होता है और कसम खाता है कि अब वह बाँस नहीं ढोएगा।
इसके बाद वह सवारी ढोने लगता है। इसी क्रम में उसकी मुलाकात शहर की एक नौटंकी कंपनी की नर्तकी हीराबाई से होती है। वह हीराबाई को शहर के रेलवे स्टेशन से दूर के कस्बे में ले जाता है, जहाँ नौटंकी होने वाली है। उस कस्बे में बहुत से गाड़ीवान एक छोटे से कस्बाई होटल के सामने बैठकर लोकगीत गाते हैं। हीरामन भी अपने साथी गाड़ीवानों के साथ उस लोकगीत का हिस्सा बन जाता है। हीराबाई हीरामन के बैलगाड़ी में रात को आराम करती है। हीरामन का एक दोस्त रात को उसकी रखवाली करता है। दूसरे दिन हीराबाई नौटंकी कंपनी के टेंट में चली जाती है, लेकिन हीरामन से आग्रह करती है कि वह नौटंकी देखने के लिए कस्बे में रुक जाए। हीरामन रुक जाता है। दरअसल रास्ते में ही दोनों के बीच रागात्मक संबंध विकसित हो गया था, जो धीरे-धीरे प्रेम के रूप में ठोस शक्ल लेता है। हीराबाई के जीवन में प्रेम की ऐसी निश्छल अनुभूति अनोखी घटना थी। उसने हीरामन जैसा पुरुष कभी पहले देखा ही नहीं था। न हीरामन ने हीराबाई जैसी किसी स्त्री को देखा था। हीराबाई ने दुनिया देखी थी, दुनियादारी देखी थी, लेकिन ऐसा निश्छल प्रेम, इतना भोला इंसान, ऐसा रागात्मक संबंध नहीं देखा था। लेकिन वह जमाने के डर से डर जाती है और हीरामन को छोड़कर शहर चली जाती है। हीरामन उसे जाते देखता है। उसे रोकने की कोशिश नहीं करता है। लेकिन उसका दिल टूट जाता है और वह तीसरी कसम खाता है कि अब वह किसी कंपनी की बाई को अपनी गाड़ी पर नहीं बैठाएगा। फिल्म यहीं समाप्त हो जाती है। हीरामन अपने गाँव और अपने घर लौट जाता है। 1966 के दर्शकों को यह अंत अच्छा नहीं लगा। दर्शक चाहते थे कि हीराबाई हीरामन के साथ अपनी गृहस्थी बसाती और इस फिल्म का सफल अंत होता। यदि इस फिल्म के निर्देशक राजकपूर होते, तब नि:संदेह इसका सुखद अंत होता। ‘आग’ से ‘रामतेरी गंगा मैली’ तक अपनी सभी फिल्मों में राजकपूर की फिल्मों का अंत संखद रहा है। दरअसल वे आशावादी फिल्मकार थे। जबकि बिमल रॉय की फिल्मों के अंत निश्चित नहीं होते थे। बासु भट्टाचार्य एक प्रयोगवादी फिल्मकार थे, जिनके फिल्मों में निराशा या अवसाद का स्थायी भाव रहा है। परंतु ‘तीसरी कसम’ मूलत: शैलेन्द्र एवं रेणु की फिल्म थी, बासु भट्टाचार्य मात्र इसके निर्देशक थे। तीसरी कसम का अंत त्रासदी में रूपांतरित नहीं होता। हीरामन देवदास की तरह एक ट्रैजिक हीरो नहीं है। वह हृषिकेश मुखर्जी के नायक ‘आनंद’ (1970) से मिलता-जुलता जिंदादिल इंसान है। वह कसम खाकर अपनी जिदंगी का गुबार निकाल कर आगे बढ़ जाता है। वह अपने सनातनी जीवन दृष्टि के साथ हर स्थिति में मस्त रहता है। अपने इसी मस्त चरित्र के कारण ‘तीसरी कसम’ का नायक हीरामन एक कालजयी चरित्र बन गया है। हीरामन के रचयिता रेणु का जन्म 4 मई 1921 को हुआ था और 11 अप्रैल 1977 को उनकी मृत्यु हुई। ‘तीसरी कसम’ के निर्माता एवं गीतकार शैलेन्द्र का जन्म 30 अगस्त 1930 को हुआ था और उनकी मृत्यु 14 दिसंबर 1966 को हुई। रेणु को डर था कि औद्योगीकरण की पश्चिमी प्रक्रिया को अपनाने के क्रम में भारत अपनी पहचान खो सकता है। शैलेन्द्र को भय था कि इस परिवर्तन की प्रक्रिया में भारतीय सिनेमा को गैर-भारतीय बनाने के प्रयास होंगे। शैलेन्द्र अपने फिल्मी गीत लेखन के क्षेत्र में रेणु के साहित्यिक काम को ही विस्तार दे रहे थे। ‘तीसरी कसम’ दोनों की श्रेष्ठतम रचना है। यह घोर भारतीय रचना है। इसमें भारतीय संस्कृति के बीज तत्व हैं। 

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