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भारतीय संस्कृति में शिक्षा: परम्परा एवं चुनौतियाँ

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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2006

भारतीय संस्कृति में शिक्षा: परम्परा एवं चुनौतियाँ

शिक्षा एक बच्चे की आंतरिक क्षमता तथा उसके व्यक्तित्व को विकसित करने वाली प्रक्रिया है। यह उसे समाज में वयस्क भूमिका निभाने के लिए समाजीकरण करती है तथा एक व्यक्ति को उत्तरदायी नागरिक एवं समाज के सदस्य बनने के लिए आवश्यक ज्ञान तथा कौशल उपलब्ध कराती है। यह समाजीकरण की प्रक्रिया के एक अंग के रूप में नए सदस्यों के मन में समाज की सांस्कृतिक विरासत, मानकों एवं मूल्यों का आत्मसात कराती है। समाजीकरण एक प्राथमिक तथा अनौपचारिक प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत एक व्यक्ति दूसरों की सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप अपने व्यवहारों को ढालता है।

भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही काफी विकसित शिक्षण संस्थाएँ रही हैं। भारतीय संस्कृति गुरु-शिष्य परंपरा वाली शिक्षा के लिए विख्यात रही है। नालंदा एवं तक्षशिला जैसे महान विश्वविद्यालय प्राचीन भारत में स्थित थे। 18वीं शताब्दी के दौरान बंगाल में नवद्वीप, उत्तर प्रदेश में वाराणसी, उड़ीसा में पुरी तथा तमिलनाडु में मदुरै एवं कांची जैसे अध्ययन केन्द्र थे। पारंपरिक भारत में शिक्षा के आध्यात्मिक पक्ष पर बल दिया जाता था। शिक्षा का अर्थ व्यक्ति को परम सत्य का साक्षात्कार कराना था। इसमें निम्नलिखित क्षेत्र एवं विषय सम्मिलित थे :-
(क) आलोचनात्मक अन्वेषण – दर्शनशास्त्र, नीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र, गणित, साहित्य, व्याकरण इत्यादि।
(ख) तकनीकी तथा व्यावसायिक कुशलता एवं ज्ञान – आयुर्वेद, कृषि, वास्तुशास्त्र, काष्ठकला, कुम्भकारी इत्यादि।
(ग) आध्यात्मिक विषय – आंतरिक अनुशासन, अध्यात्म, नैतिक मूल्य, धर्म, योग, साधना इत्यादि।

भारत में पारंपरिक शिक्षा का प्रतिमान कई शताब्दियों तक रहा। ग्यारहवीं शताब्दी से जिन क्षेत्रों में मुस्लिम शासन स्थापित हुआ, वहाँ शासकों ने मकतबों (प्राथमिक विद्यालयों) एवं मदरसों (उच्च विद्यालयों) के रूप में मूलत: धार्मिक शिक्षा को प्रायोजित करना शुरू किया। मुस्लिम शासकों ने ऐसी संस्थाओं को खुले हाथ से अनुदान दिया, परन्तु अधिकांशत: उन लोगों ने हिन्दू शिक्षा व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं किया।

ब्रिटिश-पूर्व भारत में प्राथमिक शिक्षा

अंग्रेजों के भारत आने के पहले, भारत पर उनके प्रभुत्व कायम होने के पहले भारत के कोने-कोने में, गाँव-गाँव में न सिर्फ शिक्षा के पर्याप्त केन्द्र थे, बल्कि उनमें जाने वाले छात्र-छात्राओं की अच्छी खासी संख्या थी। अठारहवीं एवं उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान उपस्थित देशज शिक्षा व्यवस्था के बारे में हमारे पास एक विश्वसनीय विवरण है। उदाहरण के लिए विलियम एडम रिपोर्ट (1835) के अनुसार इस काल खण्ड में खासकर बंगाल एवं बिहार में काफी संख्या में ग्रामीण विद्यालय पाये जाते थे। उसी तरह, थॉमस मुनरो के अनुसार 1812-1813 के दौरान मद्रास प्रेसिडेंसी में और 1820 के आसपास मुंबई प्रेसिडेंसी में भी हर गाँव में कम से कम एक विद्यालय था। धर्मपाल के अनुसार सन् 1822-1825 में अंग्रेजों ने स्थानीय शैक्षिक व्यवस्था का जायजा लेने के लिए मद्रास प्रेसिडेंसी में एक व्यापक सर्वेक्षण कराया था। इस सर्वेक्षण में पाया गया कि मद्रास प्रेसिडेंसी (जिसमें आज का पूरा तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश व कर्नाटक और उड़ीसा के कुछ जिले आते थे) में ग्यारह हजार से अधिक स्कूल (जिन्हें पाठशाला, गुरुकुल और मदरसा नाम से जाना जाता था) थे और एक हजार से अधिक कॉलेज थे और उनमें क्रमश: डेढ़ लाख और साढ़े पाँच हजार छात्र-छात्राएँ पढ़ते थे। यही नहीं इन स्कूलों-कॉलेजों में लगभग सभी जातियों के बच्चे पढ़ते थे। तमिल भाषी इलाकों में सत्तर से अस्सी प्रतिशत शूद्र या तथाकथित नीची जाति के छात्र-छात्राएँ पढ़ते थे, जबकि उड़िया इलाकों में चौबीस प्रतिशत, मलयालम भाषी इलाकों के स्कूल-कॉलेजों में चौवन प्रतिशत और तेलुगु भाषी इलाकों में पैंतीस से पचास प्रतिशत तक शूद्र या तथाकथित नीची जाति के छात्र-छात्राएँ पढ़ते थे। तब के मद्रास के गवर्नर का मानना था कि इन स्कूलों में स्कूल जाने योग्य लड़कों का पच्चीस प्रतिशत पढ़ता है और खासी बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ, विशेषकर छात्राएँ, घर में शिक्षा पाती हैं। इसी तरह धर्मपाल जी लगभग पहली बार सन् 1836 और सन् 1838 में बिहार और बंगाल में शिक्षा की स्थिति पर तैयार विख्यात एडम्स रिपोर्ट को सामने लाये, जिसके अनुसार बिहार और बंगाल में 1836 और 1838 के दौरान लगभग हर गाँव में स्कूल था। इस क्षेत्र के डेढ़ लाख गाँवों में लगभग एक लाख स्कूल थे। यह उन दिनों कोई नयी बात नहीं थी। विलियम एडम से पहले टामस मुनरो ने भी कहा था कि भारत के हर गाँव में पढ़ने-लिखने और अंकगणित सीखने के स्कूल हैं और इसे वे भारतीय सभ्यता के उच्च स्तरीय होने के लक्षण के रूप में देखते थे।

भारत में चेचक के टीके शताब्दियों से लगाये जा रहे थे (जब एडवर्ड जेनर और लुई पास्चर का जन्म नहीं हुआ था) और उसके विषय में ब्रिटेन के वैज्ञानिक जर्नलों में सामग्री प्रकाशित हुआ करती थी। यहाँ के खेती के औजार यूरोप के उस समय के ऐसे ही औजारों से कहीं अधिक परिष्कृत थे। यहाँ बहुप्रचारित द्विजों को नहीं, सभी को शिक्षा का अवसर था।
यहाँ के लाखों शिक्षा-केन्द्रों में न सिर्फ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य बल्कि तथाकथित निचली जातियों के लड़के-लड़कियाँ भी बड़ी संख्या में पढ़ते थे। पढ़ाने का काम भी इन समेत सभी जातियों के शिक्षकों द्वारा किया जाता था। यहाँ की राजस्व व्यवस्था एक ऐसे अद्भुत ढंग से विकेन्द्रीकृत थी, जिसके कारण शिक्षा, पुलिस और अन्य सार्वजनिक योजनाएँ सुचारू रूप में चल सकती थी। इससे किसानों या अन्यों पर कोई अतिरिक्त बोझ भी नहीं पड़ा करता था। इस कारण उस समय भारतीय किसानों की हालत इंग्लैंड के किसानों की हालत से कहीं बेहतर थी। भारत के अनेक गाँव समुदाय के आधार पर संगठित थे, जहाँ किसानों का कुल भूमि पर हिस्सा तो रहता था, लेकिन उनकी जोत समय-समय पर बदली जाती थी। कुल जमीन में हिस्सेदार किसान अलग-अलग सालों में अलग-अलग स्थानों पर खेती करते थे, ताकि जमीन के उर्वर-वैषम्य की लाभ-हानि में सभी किसान साझा करें।

धर्मपाल जी के लेखन में भारत का अतीत न किसी अर्मूत अजूबे की तरह सामने आता है, न ही यूरोपीय सभ्यता के इतिहास की फीकी अनुकृति की तरह। इसी तरह इस लेखन में भारतीय अतीत का चित्र अत्यंत परिष्कृत, क्रियाशील और विवेकवान सभ्यता के रूप में उभरता है, जो तमाम औपनिवेशिक ध्वंस के बावजूद भारतीय जीवन की अनेकश: बुनावटों में आज भी जीवित है; उसे हम आज भी देख सकते हैं और चाहें तो आज भी व्यापक स्तर पर सक्रिय करने का प्रयत्न कर सकते हैं। शायद भारतीय सभ्यता के टूटे-फूटे धागों के इन्हीं स्पन्दनों को बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में गाँधी जी ने सुना था और इसे ही दोबारा सक्रिय करने में उन्होंने अपना समूचा जीवन लगाया था।

भारत में शिक्षा व्यवस्था का ऐसा सुन्दर और परिपक्व विस्तार रहा है (जिसे गाँधी जी ने ‘खूबसूरत वृक्ष’ कह कर पुकारा था) जहाँ तथाकथित शूद्र बड़ी संख्या में, बल्कि अनेक बार तथाकथित द्विजों से कहीं अधिक संख्या में न सिर्फ पढ़ते थे, बल्कि देश में फैले हजारों शिक्षा केन्द्रों में पढ़ाते भी थे। 18वीं और 19वीं सदी तक भारत की शिक्षा अपेक्षाकृत कमजोर हो चुकी थी, तब भी तुलनात्मक रूप से वह यूरोप की तब की शिक्षा-व्यवस्था से कहीं अधिक उन्नत और समतामूलक रही है। भारत की राजस्व व्यवस्था आधुनिक राजस्व व्यवस्था से बिल्कुल भिन्न थी और साथ ही वह अधिक सहकारपूर्ण थी, जिसके कारण उसमें तथाकथित राजसत्ता और तथाकथित समाज दोनों ही सहज साझा कर सकने की स्थिति में थे। विकेन्द्रीकृत होने के कारण राजसत्ता कभी भी अधिक ताकतवर नहीं हो पाती थी। हर्षवर्द्धन समेत भारत के कई राजाओं को हर कुछ सालों में कुम्भ मेले में अपना सारा खजाना खाली कर देना होता था, ताकि उनकी प्रभुताई एक सीमा से अधिक न बढ़ सके। भारत के अधिकांश भागों में ग्रामीण विद्यालयों का एक ताना-बाना था। इन विद्यालयों को पाठशाला एवं मदरसा कहा जाता था। जिनमें व्यावहारिक तथा सर्वांगीण शिक्षा दी जाती थी। इन विद्यालयों में पढ़ने, लिखने तथा अंकगणित की शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषाएँ थीं। इन विद्यालयों में बालकों के नैतिक चरित्र निर्माण के पक्ष पर जोर दिया जाता था। यहाँ तकनीकी एवं व्यवसायिक शिक्षा का भी प्रावधान था। ये संस्थाएँ वस्तुत: संस्कृति की संरक्षक थीं। बालिकाओं की शिक्षा के लिए कोई विद्यालय नहीं था, परन्तु धनिक वर्ग अपनी युवा बेटियों को घर पर शिक्षा दिया करते थे। उन दिनों छपी पुस्तकें नहीं होती थीं और विद्यार्थी मात्र स्थानीय स्तर पर बनाए गए स्लेट और खड़िया का प्रयोग करते थे। प्रशिक्षण की अवधि तथा कार्य-दिवस स्थानीय जरूरत के अनुसार बदले जा सकते थे। कोई नियमित नामांकन नहीं होता था। एक विद्यार्थी किसी भी समय विद्यालय में प्रवेश ले सकता था और वह अपनी इच्छानुसार विद्यालय छोड़ सकता था। ये विद्यालय शिक्षक या संरक्षक के घर पर या मंदिर या मस्जिद में संचालित होते थे। इन विद्यालयों के विद्यार्थी वंचित वर्गों सहित सभी वर्गों से आते थे। शिक्षकों का भुगतान वस्तु या नगद दोनों रूपों में हो सकता था। लचीलापन ऐसे विद्यालयों की विशेषता थी और ये विद्यालय विभिन्न आर्थिक परिस्थितियों में सदियों तक चलते रहे थे। अंग्रेजी शासन काल में शिक्षा की इस पारंपरिक व्यवस्था को चलाना कठिन हो गया एवं धीरे धीरे इनका विघटन हो गया।
प्राथमिक तथा उच्च शिक्षा दोनों में शास्त्रीय तथा आध्यात्मिक आयामों पर हमेशा जोर दिया जाता था। शिक्षा व्यवस्था साहित्यिक, दार्शनिक और धार्मिक आयामों से भी संबंधित थी। उच्च शिक्षा के लिए संस्कृत, पाली, तमिल, अरबी और फारसी जैसी शास्त्रीय भाषाओं का प्रयोग होता था। धर्मशास्त्र, व्याकरण, तर्कशास्त्र, कानून या विधि-व्यवस्था, गणित, दर्शन शास्त्र, पारंपरिक विज्ञानों एवं साहित्य जैसे विषयों की शिक्षा दी जाती थी। सामान्यत: विद्यार्थी अपने गुरु या शिक्षक के साथ ही रह कर अध्ययन करते थे। अध्ययन-अवधि कई वर्षों की होती थी तथा प्रतिदिन विद्यार्थी कई घंटों तक कठिन अभ्यास करते थे। नवद्वीप, तिरहुत, विक्रमशिला, मिथिला, काशी, पुरी, तंजौर, मदुरै, कांची एवं त्रिवेंद्रम जैसे धार्मिक स्थलों में उच्च शिक्षा के बड़े केन्द्र थे। उच्च शिक्षा मूलत: ऊँची जातियों तक सीमित थी। यह विद्वान पंडितों द्वारा संचालित की जाती थी, जिन्हें शासकों तथा अभिजात वर्ग द्वारा उदारता से संरक्षण दिया जाता था।
मुस्लिम उच्च शिक्षा के केन्द्र, जिन्हे मदरसा कहा जाता था, जयपुर, लखनऊ, पटना तथा जौनपुर में स्थित थे। इनका मूल कार्य धर्म एवं कानून के बारे में प्रशिक्षण देना था। धर्मशास्त्र एवं कानून के साथ ही साहित्य, व्याकरण, तर्कशास्त्र, छंदशास्त्र, दर्शन शास्त्र एवं अंकगणित में प्रशिक्षण दिया जाता था। हालांकि ये प्रशिक्षण केन्द्र मूलत: मुसलमानों के लिए बनाए गए थे, परन्तु हिन्दूओं के लिए भी इनमें प्रवेश संभव था। इन उच्च शिक्षा संस्थाओं का उद्देश्य विशेषज्ञ प्रशिक्षण देना था।
ब्रिटिश भारत में शिक्षा

सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन से भारतीय समाज में दूरगामी परिवर्तन शुरू हुए। भारत में अंग्रेजी शासन ने आधुनिक शिक्षा की आधारशिला रखी। आधुनिक काल के दौरान (जिसमें अंग्रेजी राज एवं स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का काल दोनों शामिल हैं) शिक्षा प्राथमिक रूप से धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक, तकनीकी एवं प्रबंध कौशल से संबंधित रही है।
हैस्टिंग्स, जोंस, विल्किंस तथा विल्सन जैसे कुछ अंग्रेज भारत की शास्त्रीय परंपराओं के बहुत बड़े प्रशंसक थे और उनके प्रभाव में ईस्ट इंडिया कंपनी प्राच्य-अध्ययन का संरक्षण करने लगी थी। इससे भारत में पारंपरिक शास्त्रीय अध्ययन को नया जीवन मिला। अंग्रेज प्रारंभ में भारतीय संस्कृति और शिक्षा के शास्त्रीय आयाम के प्रति आकर्षित थे। 1781 में अंग्रेजों ने कलकत्ता मदरसे की स्थापना की। वारेन हैस्टिंग्स ने, जो उन दिनों बंगाल के गवर्नर जनरल थे, भारतीय संस्कृति एवं संस्थाओं में शास्त्रीय अध्ययन को प्रोत्साहित किया। ख्याति प्राप्त मुस्लिम विद्वानों को इन मदरसों में मुस्लिम धर्मशास्त्र, कानून, गणित तथा व्याकरण पढ़ाने के लिए आकर्षित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने चार्ल्स विल्किंस जैसे विद्वानों को संस्कृत तथा फारसी में लिखे गए भारतीय शास्त्रीय ग्रंथों के प्रकाशन के लिए भी प्रोत्साहित किया। विलियम जोंस ने 1784 में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की स्थापना की। इस संस्था का उद्देश्य संस्कृत की दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज, संपादन तथा प्रकाशन था। ब्रिटिश शासन ने प्राच्य तथा आधुनिक यूरोपीय अध्ययन दोनों प्रकार की संस्थाओं को स्थापित किया।
अंग्रेज बुद्धिजीवियों का एक दूसरा समूह भी उस समय मौजूद था, जो प्राच्य-अध्ययन तथा भारतीय संस्कृति का समर्थन नहीं करता था। चार्ल्स ग्रांट, जेम्स मिल एवं मैकॉले के नेतृत्व में इन्होंने अंग्रेजी माध्यम से यूरोपीय शिक्षा को भारतीय संस्कृति एवं शिक्षा की तुलना में श्रेष्ठ साबित करना शुरू किया। सन् 1790 से 1835 के बीच भारतीयों और अंग्रेजों के बीच ईस्ट इंडिया कंपनी की शिक्षा नीति के बारे में गहन विवाद बना रहा। भारतीय मधयम वर्ग का एक समूह भी अंग्रेजी माध्यम का समर्थक था। राजा राममोहन राय के नेतृत्व में इस समूह ने बेंटिक तथा मैकॉले को समर्थन दिया और 1835 में नई शिक्षा नीति की घोषणा कर दी गई। इसके पहले ही 1824 से 1830 के मधय अंग्रेजी की शिक्षा कलकत्ता, दिल्ली तथा बनारस के प्राच्य विद्या संस्थानों में शुरू की जा चुकी थी। 1835 के एक निर्णय के अनुसार प्राच्य विद्या के प्रोत्साहन के स्थान पर अंग्रेजी शिक्षा के लिए एक बड़ी मात्रा में सरकारी धन का उपयोग करना तय किया गया।
सन् 1835 के बाद अंग्रेजों ने नयी शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की। कलकत्ता, बंबई, मद्रास और दिल्ली के नये विश्वविद्यालय आधुनिक अध्ययन के केन्द्र बिन्दु बने। 1893 में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अंग्रेजी राज की शिक्षा व्यवस्था की आलोचना की और बंगाली माध्यम से शिक्षा देने की वकालत की। दि बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना सन् 1906 में की गई। इसी दौरान कुछ प्रमुख भारतीयों ने दो प्रकार की शिक्षण संस्थानों की स्थापना की (क) पारंपरिक संस्थाएँ (जैसे देवबंद एवं लखनऊ शिक्षणालय, गुरुकुल कांगड़ी, काशी विद्यापीठ, गुजरात विद्यापीठ तथा जामिया मिल्लिया इस्लामियाँ) इनकी स्थापना अंग्रेजी राज के दौरान उनकी शैक्षणिक आकांक्षा को धयान में रख कर की गई (ख) आधुनिक संस्थाएँ जैसे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, विश्व भारती, शांतिनिकेतन इत्यादि।

अंग्रेजी राज के दौरान भारतीय शिक्षा की मुख्यधारा धीरे धीरे अंग्रेजों और उभरते हुए मध्यमवर्ग के हितों को ध्यान में रखते हुए बदली गई। आरंभ में इस शिक्षा के कारण भारतीय समाज में पश्चिमीकरण को प्रोत्साहन मिला, परन्तु बाद में आधुनिक राष्ट्रीय विचारों एवं गतिविधियों के प्रसार में भी इससे मदद मिली। आधुनिक शिक्षा के प्रभाव में ही विभिन्न सामाजिक-धार्मिक सुधारवादी प्रयास हुए। ब्रह्म समाज, आर्य समाज, रामकृष्ण मिशन, अलीगढ़ एवं अहमदिया आंदोलन इत्यादि को भी आधुनिक शिक्षा ने प्रभावित किया।

इस प्रकार, अंग्रेजी राज के दौरान शिक्षा की एक जटिल व्यवस्था थी। इसके अंतर्गत कई बार भिन्न-भिन्न प्रकार के अंतर्विरोधी वैचारिक धाराओं तथा संस्कृतियों को प्रतिनिधित्व मिला। एक ओर इसने पारंपरिक भारत की आर्थिक संस्थाओं और सामाजिक समरसता के संतुलन को कमजोर किया एवं दूसरी ओर आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता-पूर्व भारत में शिक्षा के बारे में वैचारिक रूप से तीन सम्प्रदाय दृष्टिगोचर होते हैं :-
1. राष्ट्रवादी तथा पुनरुत्थानवादी सम्प्रदाय जो प्राचीन भारतीय विरासत का कट्टर समर्थक था एवं इस विरासत से अलग या विदेशी मूल की शिक्षा-संस्कृति का तिरस्कार करता था।
2. दूसरा वैचारिक सम्प्रदाय विदेशी मूल के आधुनिक अध्ययन का विरोधी तो नहीं था, परन्तु वह आधुनिक शिक्षा के स्वदेशीकरण का पक्ष था। उनका मूल उद्देश्य शिक्षा को राष्ट्रीयता का वाहक एवं भारतीय परिस्थितियों की दृष्टि से प्रासंगिक बनाना था। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जैसी संस्थाएँ इसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती थी।
3. अंग्रेजों द्वारा समर्थित एक तीसरा वैचारिक सम्प्रदाय भी था, जो ब्रिटिश प्रारूप के आधार पर शिक्षा संस्थानों के विस्तार के लिए कृत-संकल्प था। इस विचारधारा की प्रतिनिधि संस्थाएँ कलकत्ता, बंबई, मद्रास एवं दिल्ली विश्वविद्यालय थे। अंग्रेजी शिक्षा मूलत: सरकारी नौकरी पाने में सहायक थी। इसने जन शिक्षा को तो प्रोत्साहित नहीं किया, परन्तु भारतीय मध्यमवर्ग को विशिष्ट क्लबों में शामिल होने में मदद की।

स्वतंत्र भारत में शिक्षा

महात्मा गाँधी अंग्रेजी शिक्षा में अन्तर्निहित अभिजात्यवाद एवं भारतीय संदर्भ में इसकी अप्रासंगिकता की आलोचना करते थे। उनका मानना था कि अंग्रेजी शिक्षा बच्चों के सर्वांगीण विकास में बाधक है तथा यह भारत में अंग्रेजी पढ़े लिखे कुछ लोग और इस शिक्षा से वंचित बहुसंख्यक लोगों की संस्कृति में दूरी पैदा करती है। वह अपने ही देश में शिक्षित लोगों को अजनबी बनाती है। अत: गाँधीजी इस शिक्षा को ‘बौद्धिक शगल’ कह कर इसकी आलोचना करते थे। गाँधीजी ने स्वतंत्र भारत के लिए ‘बुनियादी शिक्षा’ या ‘नई तालीम’ के नाम से शिक्षा का एक नया प्रारूप तैयार किया था। इसमें ज्ञान प्राप्ति के व्यवहारिक तरीकों पर ज्यादा जोर था। नई तालीम के द्वारा गाँधीजी हर गाँव, समुदाय तथा संपूर्ण देश को आत्म-निर्भर बनाना चाहते थे। नई तालीम के द्वारा वे सामाजिक एवं आर्थिक रूप से सृजनकारी कौशलों जैसे- सूत कातना, कपड़ा बुनना, बढ़ईगिरी, कुम्भकारी तथा पशुपालन आदि का प्रशिक्षण विद्यार्थियों को देने के पक्ष में थे।

गाँधीजी हस्तशिल्प को विद्यार्थियों के विचारों को व्यवहार से जोड़ने का एक साधन मानते थे, जिससे उनमें अध्ययन के प्रति जिज्ञासा और उत्साह जागृत किया जा सकता था। सात वर्षों तक नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान, प्रशिक्षण का माध्यम मातृ-भाषा, शिक्षा का शारीरिक प्रशिक्षण, शिल्प, व्यवसाय एवं उत्पाद कार्य से जुड़ा होना तथा शिक्षा व्यवस्था का स्वावलंबी होना बुनियादी शिक्षा के मुख्य उद्देश्य थे। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि गाँधीजी की योजना क्रियान्वित नहीं हो सकी।

रवीन्द्रनाथ टैगोर भी उपनिवेशवादी शिक्षा के आलोचक थे। इसके विदेशी चरित्र, दैनिक जीवन की लय से दूरी एवं प्रशिक्षण के माध्यम के रूप में अंग्रेजी भाषा का उपयोग उन्हें स्वीकार्य नहीं था। इसके विपरीत वे विद्यार्थी केन्द्रित सर्वांगीण शिक्षा का प्राचीन गुरुकुलों वाले प्रतिमान का ही समर्थन करते थे।

गाँधीजी एवं टैगोर की तुलना में, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू आधुनिक शिक्षा के पक्षघर थे। वे आधुनिक भारत में शिक्षा को औद्योगिक, तकनीकी, वैज्ञानिक तथा प्रजातांत्रिक विकास के शक्तिशाली वाहक बनाना चाहते थे। उन्होंने इस दृष्टि से शिक्षा को नियोजित करने के लिए ‘राधाकृष्णन कमीशन’ की स्थापना की। इस कमीशन (1948-49) का केन्द्रीय लक्ष्य भारतीय संविधान के मूल उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए शिक्षा के द्वारा उपाय एवं साधन प्रस्तावित करना था। इस कमीशन ने विकास के दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं तकनीकी आयामों की प्रस्तावना की। संविधान में अंतर्निहित मूल्यों की प्राप्ति के लिए इस कमीशन ने विज्ञान और तकनीक के अध्ययन पर विशेष बल दिया। ग्रामीण पुनर्निर्माण में मदद देने के लिए इसने ग्रामीण विश्वविद्यालयों की स्थापना की प्रस्तावना की। इस कमीशन ने उच्च शिक्षा पर अधिक बल दिया।
सरकार ने डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में एक दूसरे कमीशन की स्थापना की। इसे कोठारी कमीशन (1964-66) के नाम से जाना जाता है। यह शिक्षा के सभी-स्तरों से संबंधित है तथा राष्ट्रीय विकास की दृष्टि से इसने विभिन्न स्तरों पर शिक्षा की भूमिका का परीक्षण किया। आधुनिक भारत में उत्पादकता, आत्म-निर्भरता, आर्थिक विकास तथा रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए यह वैज्ञानिक शिक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करता है। कोठारी कमीशन की प्रस्तावना है कि :-
1. विज्ञान इस रूप में पढ़ाया जाना चाहिए कि विद्यार्थी इसके बुनियादी सिद्धांतों को समझ सके।
2. समस्या समाधान करने की विश्लेषण क्षमता का विकास हो तथा भौतिक वातावरण एवं सामाजिक जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए वैज्ञानिक सिद्धांतों का उपयोग हो सके।
3. यह अन्वेषण और प्रयोगात्मकता की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करे।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) ने तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना एक आवश्यकता बताया, ताकि उद्योग एवं अर्थव्यवस्था को विकसित किया जा सके। इसने कंप्यूटर शिक्षा के महत्व की चर्चा की। इस प्रकार स्वतंत्र भारत में शिक्षा प्राथमिक रूप से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की ओर उन्मुख है। समकालीन भारत में शिक्षा का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष भारतीय संस्कृति का संरक्षण, संवर्धन तथा प्रचार-प्रसार रहा है। भारतीय शिक्षा ने ऐसी मनोवृत्ति के विकास की कोशिश की है, जो पश्चिमी आधुनिकता एवं भारतीय सांस्कृतिक परंपरा दोनों के प्रति ग्रहणशील हो। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) ने घोषणा की कि देश की सांस्कृतिक परंपरा की निरंतरता एवं आधुनिक तकनीकों द्वारा प्रतिनिधित्व परिवर्तनोमुखी प्रवृत्तियों के बीच समन्वय शिक्षा के द्वारा संभव है।
भारतीय शिक्षा की सभ्यतामूलक चुनौतियाँ

भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति में रावण बुराई और बुरी शक्तियों का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक है। बुराई और बुरी शक्तियों का प्रतीक होने के बावजूद वह पश्चिमी सभ्यता के अर्थों में शैतान या शैतानी शक्ति नहीं है। पश्चिमी सभ्यता में शैतान न सिर्फ परमेश्वर का विरोधी है, बल्कि वह अपने आप में परम स्वायत्त है। पश्चिम में शैतान की अवधारणा के विपरीत भारतीय संस्कृति में रावण न सिर्फ ईश्वर की रचना है, बल्कि वह भगवान शिव का महान भक्त और शैवागम का परम विद्वान भी है। रामायण की शब्दावली में उसे राक्षस कहा गया है। भारत की लोक संस्कृति में रावण सनातनी खलनायक माना जाता है। रावण आज एक व्यक्ति न रहकर प्रतीक बन गया है। भारतीय संस्कृति में वह छल, कपट और दुष्टता का प्रतीक पुरूष माना जाता है। इसके बावजूद भारतीय संस्कृति रावण को पश्चिमी अर्थों में शैतान या ईश्वर विरोधी स्वायत्त शक्ति नहीं मानती। इसके विपरीत भारतीय संस्कृति रावण को ईश्वरीय योजना का महत्वपूर्ण अंग मानती है। भारतीय संस्कृति मानती है कि जहाँ भी जीवन है, वह अमृत के कारण है चाहे वह दशरथ पुत्र राम का जीवन हो या दशानन रावण का जीवन। यदि संसार सनातन दृष्टि से एक ‘लीला’ है, तब रावण की भूमिका भी किसी महत् उद्देश्य से ही लिखी गई होगी । सामी दृष्टि में एक साथ दो साम्राज्य स्वीकार किये गये हैं – (1) ईश्वर का साम्राज्य, (2) शैतान का साम्राज्य। सनातनी परंपरा में एक ही साम्राज्य है- ‘धर्म का साम्राज्य’ । धर्म वह है- जो धारण करता है, जीवन का आधार है, जो अस्तित्व और अमृत का आधार है। भारतीय संस्कृति मानती है कि रावण की नाभि में भी अमृत है। फलस्वरूप जब तक नाभि में तीर नहीं मारा जायेगा, तब तक ‘रावण’ नहीं मरेगा। नाभि में तीर लगते ही रावण के अंदर कैद अमृत सूख जायेगा। तब रावण अपने आप ‘मर’ जायेगा। यह एक मिथक है। भारतीय संस्कृति का यह सनातन मिथक आज भी प्रासंगिक है।

हमें भी समझना होगा कि 21वीं सदी का रावण कौन है। वह रावण अमेरिका नहीं है, न विश्व मुद्रा कोष या विश्व बैंक ही है। यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को हम रावण समझते हैं, तो यह भी हमारा भोलापन है। गाँधी रावण के असली स्वरूप को समझते थे। परमहंस रामकृष्ण, श्रीअरविन्द इत्यादि भी रावणत्व को समझते थे। बुद्ध भी इस सनातनी रावण को समझते थे, परन्तु हजार बरस की गुलामी ने हमें मानसिक रूप से वहाँ ले जा कर छोड़ा है, जहाँ हम अपने पुरखों की पूजा तो करते हैं, पर उनसे प्रेरणा नहीं ले सकते। हम उनसे अपनापन तो महसूसते हैं, पर उनके प्रयोगों का महत्व नहीं समझते।

भगवान बुद्ध, आचार्य नागार्जुन, गुरु गोरखनाथ, आचार्य रामानुज, महात्मा कबीर, गुरु नानक, संत रैदास, संत मीराबाई, समर्थ रामदास, परमहंस रामकृष्ण, एवं महात्मा गाँधी जैसे महापुरूष कलियुगी सनातनता के प्रेरणा पुंज हैं। इनके आलोक में हमें नहीं लगता कि पश्चिम से हमें ज्ञान, विज्ञान या आधुनिकता सीखने की जरूरत है। सनातन परंपरा पुरानी कब पड़ती है ? सनातन परंपरा को पुनर्नवा यूँ ही नहीं कहा गया है। इसमें सतत अंकुरन होते रहता है। हमेशा पुनर्रचना होते रहती है। यह पुनर्रचना समाज में, प्रतीकों में, शास्त्रों में और कलाओं में भी होता है। रावण की अवधारणा तो नहीं बदलती लेकिन रावण का स्वरूप एवं आवरण बदलते रहती है। रावण को समझने के लिए मिथकों की परंपरा को समझना आवश्यक है। यह याद रखना आवश्यक है कि रामायण और महाभारत प्रतीक शास्त्र हैं, ये ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं हैं। सनातन परंपरा में कालजयी शास्त्रों की ही रचना होती है। शास्त्रों की भाषा प्रतीकों की कूट भाषा होती है। इसको पढ़ने की कला और तकनीक गुरु-शिष्य परंपरा को संस्थानिक आधार देता है। इसी परंपरा और इसी आधार के संदर्भ में रावण को समझा जा सकता है। पश्चिमी शैतान की अवधारणा से तुलना करके नहीं समझा जा सकता।

हम रावण से क्यों हारते हैं? रावण कौन है? वह कैसे मरेगा? ये सनातन प्रश्न है। प्रश्न हमे याद हैं परन्तु इसके सनातन उत्तर हम भूल चुके हैं। इसका ऐतिहासिक उत्तर भी हम नहीं देते। हम मानते हैं कि रावण अब भी शुक्रनीति पढ़ता है, जबकि बृहस्पति राजधर्मसूत्र हमारे लिए पुरातात्विक महत्त्व की चीज है। हम मानते हैं कि चाणक्य के अर्थशास्त्र से हमारा काम चल जाएगा, अब भी चल जाएगा पर हम यह जानने की कोशिश नहीं करते कि रावण आजकल कौन-सा शास्त्र पढ़ता है और क्या सचमुच बृहस्पति के राजधर्मसूत्र की तुलना में चाणक्य का अर्थशास्त्र हमारे युग के ज्यादा अनुकूल है? एक तरफ हम मानते हैं कि राम ने विभीषण, हनुमान, सुग्रीव आदि के बल पर, उनकी सहायता से रावण को हराया था, दूसरी तरफ हम स्वदेशी की बात करते हैं। क्या विभीषण स्वदेशी था? स्वदेशी में ‘स्व’ प्रमुख है या ‘देश’? राष्ट्र का अर्थ क्या सचमुच ‘नेशन’ होता है या ‘सिविलाइजेशन’ होता है ? इन मूल प्रश्नों का उत्तर कैसे दिया जाता है हमारे यहाँ, और कैसे दिया जाता है रावण के यहाँ? इसको सभ्यताओं के समाजशास्त्र के तहत ही समझा जा सकता है। दुर्भाग्य से महात्मा गाँधी के बाद इस देश में सभ्यता समीक्षा की परंपरा मृतप्राय है।

कभी हमारे यहाँ गुरुकुल होता था और रावण के यहाँ केवल गुरु थे, शुक्राचार्य। आज रावण के यहाँ गुरुकुल है और हमारे यहाँ गुरु तो होते हैं, उनका वंश नहीं चलता। हमारे यहाँ केवल गृहस्थों के वंश चलते हैं, जैविक वंश चलते हैं, जबकि रावण के यहाँ गुरुकुलों में बौद्धिक और आध्यात्मिक वंश चलता है। एक युग के केंद्र में सामान्यत: एक ही गुरु या एक ही राष्ट्र-राज्य या एक ही गुरुकुल होता है। जब तक भारत में नालंदा बौद्ध गुरुकुल नहीं हुआ था, वह सनातन परंपरा का संयुक्त केंद्र था। फिर नालंदा बौद्ध गुरुकुल हो गया। दुर्भाग्य से भारत के तत्कालीन हिन्दू मानस ने बौद्ध आविष्कारों और बौद्ध पध्दत्ति के साथ अपने को उस तरह नहीं जोड़ा जिस तरह वे तक्षशिला के गुरुकुल के साथ जुड़ा महसूस करते थे। श्री गोपीनाथ कविराज ने लिखा है कि ईसाई द्वितीय शतक से लेकर द्वादश शतक तक भारत में बौद्धमत का प्रमुख स्थान रहा है। इसके बावजूद बौद्ध-दर्शन एवं धर्म का परिचय प्राय: लोगों को नहीं है।
पूर्वकाल में भी इसका ज्ञान सब लोगों को नहीं था। साधारण जनता की बात तो दूर रही, बड़े-बड़े पण्डित भी इससे वंचित थे। इसलिए प्राचीन समय में कोई-कोई आचार्य बौद्धमत के पूर्वपक्ष-स्थापना के प्रसंग में निरसनीय मत के सम्यक्ज्ञान से अभिज्ञ न थे। इसका प्रधान कारण हिन्दू समाज में बौद्ध के प्रामाणिक ग्रन्थों के पठन-पाठन का अभाव था। ग्रन्थों के उपलब्ध होने पर भी व्यक्तिगत कुसंस्कारों तथा दूसरे मत या सम्प्रदाय के प्रति उपेक्षा भाव के कारण सहृदय आलोचना का अभाव था। बौद्ध धर्म में जीवन के आदर्श के संबंध में प्राचीन काल से ही दो मत रहे हैं – प्रथम – मलिन वासना के क्षय का सिद्धांत है। इसका स्वाभाविक फल मुक्ति या निर्वाण है। दूसरा- वासना का शोधन है। इससे शुद्ध-वासना का आविर्भाव होता है और देह-शुद्धि होती है। देह-शुद्धि के द्वारा विश्व-कल्याण या लोक-कल्याण का सम्पादन किया जा सकता है। अंत में शुद्ध वासना भी नहीं रहती और पूर्णत्व या बुद्धत्व प्राप्त होता है। पहली दृष्टि स्थविरवादियों एवं दूसरी दृष्टि महायानियों का है। स्थविरवादी परंपरा जैन परंपरा एवं निर्गुण भक्ति साधना की परंपरा के ज्यादा नजदीक है, जबकि महायानी परंपरा वृहतर हिन्दू समाज की मुख्यधारा का सहधर्मी रहा है। फलस्वरूप यह आश्चर्यजनक बात लगती है कि तत्कालीन हिन्दू समाज के प्रभु वर्ग ने नालंद गुरुकुल को, तक्षशिला के नष्ट होने पर भी, अपनी आस्था और प्रेरणा का स्रोत नहीं बनाया। मौर्य साम्राज्य से लेकर शुंग वंश के शासन काल तक भारतीय संस्कृति में बौद्ध, जैन एवं हिन्दू सम्प्रदायों के बीच राज्य संस्था को एवं समाज व्यवस्था को चलाने की दृष्टि से काफी प्रतियोगिता रही है। मौर्य साम्राज्य के निर्माण से पहले तक इनके अनुयायियों में वर्गगत, समूहगत या समुदायगत विभाजन रूढ़ नहीं हुआ था। मुनि, भिक्षु या ऋषि या सन्यासी तो सम्प्रदायों में विभक्त थे किन्तु आमजन गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए स्थानीय मुनि, भिक्षु या सन्यासी, ऋषि के पास अपनी इच्छा, पसंद या आवश्यकतानुसार आया-जाया करते थे। सम्प्रदायों के बीच स्थानीय समुदाय या स्थानीय व्यवस्था को प्रभावित करने की दृष्टि से प्रतियोगिता अवश्य थी। इनमें सैद्धांतिक एकता तो आजतक बनी हुई है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इनके अनुयायियों के बीच साम्प्रदायिक विभाजन का आरंभ चन्द्रगुप्त मौर्य के समय से ही प्रारंभ हुआ। आचार्य चाणक्य की इच्छा के विरूद्ध सम्राट चन्द्रगुप्त खुद जैन मुनि हो गए। वाचिक परंपरा के अनुसार सम्राट बिन्दुसार हिन्दू परंपरा के रक्षक बने रहे, लेकिन आचार्य चाणक्य का उन्होंने तिरस्कार किया। सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म में दीक्षा लेकर मोग्गलिपुत्त तिस्स के मार्गदर्शन में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। सम्राट अशोक के उत्तराधिकारी बौद्ध बने रहे। अंतिम मौर्य सम्राट बृहद्रथ की हत्या उनके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने की। शुंग वंश के शासनकाल में हिन्दू शास्त्रों के नये संस्करण बने और बौद्धमत की साम्प्रदायिक उपेक्षा शुरू हुई। पुष्यमित्र शुंग के प्रेरणास्रोत महर्षि पतंजलि माने जाते हैं। आचार्य नागार्जुन से आचार्य शंकर तक का काल परस्पर सम्मान से लेकर परस्पर उपेक्षा के मध्य साम्प्रदायिक संगठन एवं सैद्धांतिक एकता तथा सामाजिक समरसता का काल रहा है। आचार्य वाचस्पति मिश्र के काल से भगवान बुद्ध के प्रति व्यक्तिगत सम्मान तो बना रहा, लेकिन उनके मत, उनकी पद्धति, उनके तकनीक तथा उनके नाम पर चलने वाले सम्प्रदायों के बारे में नासमझी और कुप्रचार बलवती होती गई। अंग्रेजी राज में इस नासमझी एवं कुप्रचार को अकादमिक संपोषण एवं सैद्धांतिक आधार दिया गया। 1958 में बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर द्वारा अपने अनुयायियों सहित बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने के बाद से निहित स्वार्थी समूहों ने दोनों सम्प्रदायों के बीच की खाई और चौड़ी करने की कोशिश की। आनंद कुमारस्वामी, जे. कृष्णमूर्ति, ओशो रजनीश, दलाई लामा, भरतसिंह उपाध्याय एवं सत्यनारायण गोयनका जैसे व्यक्तियों के प्रभाव में बौद्ध परंपरा एवं हिन्दू परंपरा के बीच की एकता अब पुन: मजबूत हुई है। भारतीय संस्कृति में नालंदा और तक्षशिला को समान आदर से याद किया जाता है। परंतु वाचिक परंपरा में, अब भी यह तथ्य रेखांकित किया जाता है कि सिकन्दर के भारत में आक्रमण से पूर्व एवं मौर्य साम्राज्य स्थापित होने से पहले आचार्य चाणक्य तक्षशिला गुरुकुल को मगध में स्थानांतरित या पुनर्जीवित करना चाहते थे, नालंदा गुरुकुल को मजबूत करना या अपनाना उनका उद्देश्य नहीं था। चाणक्य नें नंद साम्राज्य के बदले मौर्य साम्राज्य की नींव डाली। पर गुरुकुल स्थानांतरित नहीं हुआ। साम्राज्य बनाना आसान होता है गुरुकुल बनाना मुश्किल काम है। इतिहास लिखना आसान होता है, पुराण लिखना मुश्किल काम है। तक्षशिला गुरुकुल तो नष्ट हो गया पर वहाँ की किताबें कहाँ गई? इस प्रश्न का उत्तर खोजना काफी दिलचस्प हो सकता है।

एक मान्यता यह है कि अपने विश्व विजय के दौरान अपने बचपन के गुरु अरस्तु की प्रेरणा से प्रेरित सिकंदर पर्शिया (फारस) एवं उत्तर-पश्चिमी भारत के अपने सैनिक एवं राजनैतिक अभियान के दौरान अन्य चीजों के अलावे किताबों के संग्रह के प्रति भी काफी सचेत था। कुछ पुस्तकें तो सिकंदर के अभियान के तहत यूनान पहुँच गईं, जो बचा ली गईं उन पुस्तकों को तक्षशिला के पंडितों ने भारत के अन्य प्रदेशों में सुरक्षित रूप से संरक्षित कर लिया। परंतु संस्थागत सहयोग न मिलने के कारण उनका अपेक्षित उपयोग नहीं हो पाया। दूसरी ओर नालंदा का गुरुकुल अपने बौद्ध स्वरूप में मुस्लिम आक्रमण शुरू होने से पहले तक न सिर्फ अस्तित्व में रहा, बल्कि अपनी सीमा के अंदर काफी सक्रिय भी रहा। ‘मुस्लिम आक्रमण के बाद नालंदा का बौद्ध विहार एवं गुरुकुल तो नष्ट कर दिया गया, परन्तु इस परंपरा के सौभाग्य से नालंदा विश्वविद्यालय की ज्यादातर पुस्तकें सही समय पर तिब्बत में स्थानांतरित कर दी गईं और संस्थागत सहयोग मिलने के कारण अपने तिब्बती स्वरूप एवं संस्करण में आज भी जीवंत बनी हुई है (डी. डी. कोशांबी एवं इंग्ल-हारवर्ड ओरियंटल सीरिज)।

इतिहास चक्र की विडंबना देखिये कि एथेंस में किताबें पहुँची पर विश्व विजय का स्वप्न देखने वाला सिकंदर वापस नहीं पहुँचा। रास्ते में ही उसकी मृत्यु हो गयी। राजा मर गया, पर सेनापति (सेल्युकस) जिंदा रहा। सेनापति बदलते रहे। सेनाएँ बदलती रहीं। साम्राज्य बनते और बिगड़ते रहे। अरस्तु के बाद रावण के यहाँ गुरु का महत्त्व गौण हो गया और गुरुकुल चलता रहा। गुरुकुल रूपि संस्था का महत्त्व बढ़ गया। संस्थाएँ सनातनता का बोध कराने लगीं, गुरु क्षणभंगुर चमत्कार के वाचक हो गए और रावण जीतता रहा। हम सभी सनातन परंपरा के भग्नावशेष हारते रहे। ऐथेंस के बाद रोम, फ्लोरेंस, कैंब्रिज/ऑक्सफोर्ड – अब हार्वर्ड बिजनेस स्कूल … रावण की आत्मा – अमृत-कलश – गुरुकुल – शब्द ब्रह्म का रूपांतरण एवं स्थानांतरण होता रहा। पुनर्नवता बनी रही और वे उसी सनातन धर्म से जीतते रहे, जिससे कभी हम जीतते थे।
यह मत भूलिये वे हमारे सौतेले भाई हैं। खून का रिश्ता है हमारे बीच। एक ही पिता (कश्यप) की संतानें हैं हम सब। केवल माताएँ (दिति, दनु, अदिति) अलग हैं। विरासत में साझा अधिकार था हमारा। हमने दावा छोड़ दिया, उन्होंने नहीं छोड़ा। हमने निहत्थे, युद्ध न करने के शपथ से बंधे कृष्ण को पूजा की वस्तु बना लिया और दुर्योधन से प्रेरणा ले कर यादवी सेना (संगठन) बनाने की जुगत करते रहे। आंदोलन पर आंदोलन करते रहे। अब कृष्ण भी क्या करें? जो लोग व्याकरण भूल कर शब्दों और वाक्यों को मारने के लिए सेना और संगठन बनाते चलते हैं, उनके द्वारा पूजे जाने पर कृष्ण की क्या हालत होती होगी?

ऐसा नहीं था कि तक्षशिला के ध्वंस के बाद हमारे यहाँ गुरुकुल नहीं था। पर हमने नालंदा को बौद्ध संस्था मानकर उसे असनातन मान लिया। बुद्ध को वैष्णवों ने नौवां (नवम्) अवतार मानकर पूजना शुरू कर दिया, पर बौद्ध संस्थाएँ सामाजिक प्रेरणा के बदले सामाजिक उपहास की चीज बनी रहीं। धीरे धीरे समाज दो भागों में बंट गया। समाज के जिस हिस्से को बौद्ध संस्थाओं से प्रेरणा मिलती रही वे इस्लाम के आक्रमण तक उर्ध्ववान बनी रहीं। पर इस्लाम के आने के बाद बौद्ध संस्थाएँ दोहरे दबाव में दम तोड़ने लगीं।

मध्यकाल में भक्ति आंदोलन ने सनातन धर्म एवं संस्कृति को पुनर्जीवन दिया। वैदिक एवं श्रमण, हिन्दू एवं बौद्ध परंपराओं का द्वन्द्व समाप्त किया गया। कुछ संत तो हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए भी प्रयासरत हुए। लेकिन सनातन भारतीय सभ्यता को संरक्षित-संवर्धित करने के लिए सम्प्रदाय निरपेक्ष गुरुकुल चाहिए था। भक्ति संत भारतीय संस्कृति की रक्षा करने में तो सफल रहे, परन्तु उनकी साम्प्रदायिक उपासना पद्धति सभ्यता मूलक विमर्श चलाने में सक्षम नहीं रह पायी। सभ्यता की रक्षा केवल व्यक्तिगत प्रतिबध्दता एवं साम्प्रदायिक उपासना के बल पर नहीं की जा सकती। इसके लिए केवल लोक संस्कृति को बचाना काफी नहीं है। सभ्यता के संरक्षण-संवर्धन के लिए शास्त्र चाहिए, गुरुकुल चाहिए, प्रशिक्षित विशेषज्ञ चाहिए। सभ्यता के संरक्षण-संवर्धन के लिए सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण तीनों का संतुलन चाहिए । ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग और कर्ममार्ग तीनों का संतुलन चाहिए। एक ‘व्यवस्था’ चाहिए। ‘व्यवस्था’ और ‘गुरुकुल’ के अभाव में सभ्यताएँ कमजोर होकर मरने लगती हैं। संतुलन के अभाव में व्यक्ति ‘रावण’ बन जाता है। रावण असंतुलित व्यक्ति है। उसके अलग-अलग गुण श्लाघनीय हैं, लेकिन उसके पूरे व्यक्तित्व में असंतुलन है। रावण की दुष्टता का आधार उसका स्वभाव नही, अधूरापन और असंतुलन है। जैसा कि महात्मा गाँधी ने अपनी महान कृति हिन्द स्वराज में कहा है- ‘आधुनिक सभ्यता एक शैतानी सभ्यता है’। आधुनिकता एक रोग है, एक कमजोरी है। इस आधुनिकता ने पारंपरिक रावण को समझने की शक्ति हमसे छीन ली है। हम रावण को अपने अंदर नहीं देखकर अपने विरोधियों में ढूंढ़ने लगे हैं। यह असनातनी दृष्टि है। सनातनी दृष्टि में रावण हमारे समाज के अंदर है। वह हमारा सगा है। वह हमारी मध्यवर्गीय चेतना के अंदर है। हमें रावण ने जीता नहीं है, हमने उसे अतिथि का सम्मान दिया है। उसकी लंका की चमक-दमक ने हमें लालची बनाया है। हम भी अपने समाज को लंका बनाना चाहते हैं। हम भी लंकेश बनना चाहते हैं। यह चाहत स्वाभाविक नहीं है। यह हार्वर्ड बिजनेस स्कूल द्वारा फैलाया गया भ्रमजाल है। यही रावण की शक्ति का आधार है। यही उसकी नाभी का अमृत है। जब तक यह चाहत हममें कायम है- ‘रावण नहीं मरेगा’। ‘एनरॉन’ को मार लो या ‘केंटुकी चिकेन’ को, ‘कोकाकोला’ को मार लो या ‘पेप्सी कोला’ को या ‘मैकडोनाल्ड’ को मार लो। रावण तब तक जिन्दा रहेगा, जब तक हार्वर्ड बिजनेस स्कूल जिन्दा है। उसका भ्रमजाल जिन्दा है, इस भ्रमजाल के शिकार लोग जिन्दा हैं, हमारे बीच जिन्दा हैं। उस भ्रमजाल को मारना संभव है। उसके लिए संकल्प लेना होगा। प्रायश्चित करना होगा। अपनी खोयी विरासत को पाने के लिए नयी स्मृति, नया व्याकरण और नया गुरुकुल चलाना होगा। महात्मा गाँधी द्वारा लिखित हिन्द स्वराज का पाठ उपर्युक्त दृष्टि से सही चेतना के निर्माण और उपयुक्त प्रेरणा के विकास में हमारा सबसे स्वाभाविक संबल साबित हो सकता है।

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