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स्वधर्म: गांधीवादी दृष्टि

by Professor Amit Kumar Sharma
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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2011

स्वधर्म: गांधीवादी दृष्टि

स्वधर्म स्वाभाविक होता है, सहज होता है। जीव के जन्म के साथ उसके स्वधर्म का जन्म भी होता है। स्वधर्म किसी को खोजना नहीं पड़ता। वह सहज ही स्वाभाविक रूप से मनुष्य को प्राप्त होता है। स्वधर्म का संबंध वृत्तियों से है। हर जीव की स्वाभाविक वृत्तियाँ होती हैं। उसे खोजने कहीं जाना नहीं पड़ता। वह अपने आप जीव के पास आ जाती है।
इसी स्वधर्म के आधार पर भारतीय संस्कृति में पारंपरिक वर्ण व्यवस्था का विकास हुआ है। इसके आदर्श रूप में स्वाभाविकता और धर्म दोनों हैं। जो व्यवसाय पुरखों के समय से चला आया है, वह यदि नीति-विरूद्ध न हो तो उसी को करना, उसी उद्योग को आगे चलाना चातुर्वर्ण की एक विशेषता है। यह वर्ण-व्यवस्था आज अस्त-व्यस्त हो गयी है। उसका पालन आज बहुत कठिन हो गया है। आज शुरू के पचीस-तीस साल तो नये धन्धे सीखने में ही चले जाते हैं। काम सीख लेने पर फिर मनुष्य अपने लिए सेवा क्षेत्र, कार्य क्षेत्र खोजता है। इस तरह शुरू के पचीस साल तो वह सीखता ही रहता है। इस शिक्षा का उसके जीवन से कोई संबंध नहीं रहता। वह मानता है कि वह भावी जीवन की तैयारी कर रहा है। शिक्षा प्राप्त करते समय मानो वह जीता ही न हो। जीना बाद में है। मानो जीना और सीखना ये दोनों चीजें अलग-अलग कर दी गयी हों। जिसका जीने के साथ संबंध नहीं, उसे मरना ही तो कहेंगे। इस तरह नया काम-धन्धा सीखने में ही पचीस-तीस वर्ष व्यर्थ हो जाते हैं। इससे उमंग और महत्व के वर्ष व्यर्थ चले जाते हैं। जो उत्साह, जो उमंग जन-सेवा में खर्च करके जीवन सार्थक किया जा सकता है, वह यों ही व्यर्थ चला जाता है। जीवन कोई खेल नहीं है। परन्तु आजकल जीवन का पहला अमूल्य अंश तो जीवन का काम-धंधा खोजने में ही चला जाता है। हिन्दू धर्म ने इसीलिए वर्णाश्रम धर्म और बुनियादी शिक्षा की युक्ति निकाली है। इसका यह अर्थ नहीं है कि वर्णाश्रम धर्म में वंश परंपरा से चला आया व्यवसाय करने की ही बाध्यता है। भारतीय परंपरा में प्रयोग की भी भरपूर गुंजाइश है। गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी ने वंश परंपरा के साथ गुरु परंपरा और स्वगुण के आधार पर प्रयोग की इजाजत दी है। मूल प्रश्न यह है कि जीना और सीखना अलग-अलग नहीं होना चाहिए। हमें ऐसा व्यवसाय चुनना चाहिए जो जीवन यापन के साधन के साथ-साथ सृजनकारी और मुक्तिदायी दोनों हो। जो आत्म परिष्कार और ब्रहम उपासना दोनों का साधन हो। जब हम स्वधर्म में मग्न रहते हैं, तब रजोगुण फीका पड़ जाता है, क्योंकि तब चित्त एकाग्र होता है। चित्त स्वधर्म छोड़कर कहीं जाता ही नहीं। इससे चंचल रजोगुण का सारा जोर ही ढ़ीला पड़ जाता है। जब नदी शांत और गहरी होती है, तो कितना ही पानी उसमें बढ़ आए, तो भी वह उसे अपने पेट में समा लेती है। इसी तरह स्वधर्म रूपी नदी मनुष्य का सारा बल, सारा वेग, सारी शक्ति अपने भीतर समा लेती है। स्वधर्म में पूरी शक्ति लगाने पर रजोगुण की दौड़ धूप वाली वृत्ति समाप्त हो जाती है। रजोगुण की चंचलता को जीतने की यही सनातनी रीति है। रज-तम का तो पूर्ण उच्छेद करना आत्म परिष्कार के लिए आवश्यक है। रजोगुण और तमोगुण के चले जाने पर शुद्ध सत्वगुण रह जाता है। जब तक हमारा शरीर कायम है, तब तक हमें किसी न किसी भूमिका में रहना ही पड़ेगा। जब सत्वगुण का अभिमान हो जाता है, तब वह आत्मा को अपने शुद्ध स्वरूप से नीचे खींच लाता है। सत्वगुण पर विजय पाने का अर्थ यह है कि उसके प्रति हमारा अभिमान, हमारी आसक्ति हट जाय। सत्वगुण को निरहंकारी बना देना चाहिए। इसके लिए सत्वगुण को हम अपने अन्दर स्थिर कर लें। सातत्य से उसका अभिमान चला जाता है। सत्वगुण युक्त कर्मों को ही हम सतत करते रहें। उसे अपना स्वभाव ही बनायें। जो बात स्वाभाविक है, उसका हमें अहंकार नहीं होता। सत्वगुण को निस्तेज करने की यह एक युक्ति है। दूसरी युक्ति है, सत्वगुण की आसक्ति भी छोड़ देना। इसके लिए पहले अहंकार को जीतना चाहिए। फिर आसक्ति को जीतने की कोशिश करनी चाहिए। सातत्य से अहंकार जीत सकते है। फलासक्ति को छोड़कर सत्वगुण से प्राप्त फल को भी ईश्वरार्पण करने से आसक्ति पर विजय प्राप्त की जा सकती है। जीवन में सत्वगुण स्थिर हो जाता है, तब कभी सिद्धि के रूप में या कभी कीर्ति के रूप में फल सामने आता है। परन्तु उस फल को भी तुच्छ मानकर, उसको भी त्यागकर आप मुक्ति के अधिकारी बन सकते हैं।

इसके लिए आत्मज्ञान और भक्ति का आश्रय लेना चाहिए। इसके बिना सांसारिक माया से पार पाना कठिन है। खासकर वैश्वीकरण, उदारीकरण और उपभोक्तावाद के इस देहवादी समय में। आत्म-ज्ञान की प्राप्ति केवल निवृत्ति मार्गियों के लिए आवश्यक नहीं है। प्रवृत्ति मार्गी भी इससे उतना ही लाभ प्राप्त कर सकते हैं। प्रवृत्ति मार्गी के पुरुषार्थ में भी वही चारो पुरुषार्थ आते हैं – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। निवृत्ति मार्गी के मार्ग में भी यही चारो पुरुषार्थ आते हैं। अंतर केवल इतना है कि प्रवृत्ति मार्गी अर्थ और काम में रस लेता हैं और निवृत्ति मार्गी इन्हें मुक्ति के लिए विचलन या चुनौती मानता है। निवृत्ति मार्गी ब्रहमचर्य आश्रम से सीधे संन्यास आश्रम में जाना चाहता है। यह श्रमण परंपरा कहलाता है। वह उत्कट साधना से जल्दी मुक्त होना चाहता है। लेकिन उत्कट साधना में मूलत: वह आत्मज्ञान के आधार पर अर्थ और काम की प्रवृत्ति को ही दृढ़ता पूर्वक जीतने के लिए लगा रहता है। उसकी साधना कठोर और अस्वभाविक जिद पर आधारित होती है। यह रास्ता सबके लिए नहीं है। यह जैन मुनियों और बौद्ध भिक्षुओं तथा नाथपंथी नागा संन्यासियों का मार्ग है। दूसरी ओर वैदिक परंपरा को मानने वाले आम नर-नारी वर्णाश्रम व्यवस्था के क्रमिक मुक्ति का स्वाभाविक एवं सहज प्रवृत्ति मार्ग चुनते हैं। इसमें चार आश्रमों में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष पाने का पुरुषार्थ प्रवृत्तियों को संतृप्त करके प्राप्त करने की कोशिश की जाती है।
इस मार्ग के लिए भी आत्मज्ञान जरूरी है। आत्मज्ञान की प्राप्ति के बिना स्वधर्म का ज्ञान नहीं होता। वर्ण-आश्रम का धर्म भी नहीं निभ पाता। व्यक्ति को अर्जुन की तरह स्वधर्म के बारे में दुविधा घेरे रहती है। लेकिन हर व्यक्ति के आसपास कृष्ण जैसा गुरु उपलब्ध नहीं होता, जो दुविधाओं का निराकरण कर सके। अत: सामाजिक रीतियों से और साम्प्रदायिक आचार्यों से यथा संभव मदद मिलती है। प्राचीन काल में मूलत: चार प्रकार के व्यवसाय थे और तीन तरह के स्वगुण थे। सतोगुणी व्यक्ति के लिए ब्राह्मण वर्ण के व्यवसाय उत्तम माने गए। सतोगुण और रजोगुण के मिश्रण वाले व्यक्तियों के लिए क्षत्रिय वर्ण के व्यवसाय उत्तम माने गए। रजोगुण और तमोगुण के मिश्रण वाले व्यक्तियों के लिए वैश्य वर्ण के व्यवसाय उत्तम माने गये। तमोगुण वाले व्यक्तियों के लिए शूद्र वर्ण के व्यवसाय सेवा देने वाले सर्विस सेक्टर के व्यवसाय होते थे। शूद्र वर्ण के व्यवसाय तकनीकी व्यवसाय होते थे, जिससे उत्पादन और उपभोग के साधनों का सृजन एवं संवर्धन होता था। वैश्य वर्ण का व्यवसाय मूलत: उद्यम एवं व्यापार था, जिससे वस्तुओं का बड़े स्तर पर उत्पादन तथा वितरण होता था। क्षत्रिय वर्ण का व्यवसाय शासन, प्रबंधन, न्याय एवं सुरक्षा से संबंधित व्यवसाय था। ब्राह्मण वर्ण के अंतर्गत शिक्षण, शोध, प्रशिक्षण, पौरोहित्य, ज्योतिष, चिकित्सा, धार्मिक परामर्श, कल्याणकारी यज्ञ एवं सामाजिक मंगलदायक व्यवसाय आता था। खेती मनु के अनुसार वैश्य कर्म है, लेकिन अन्य आचार्य इसे चारों वर्णों के लिए खुला व्यवसाय मानते हैं। वर्ण व्यवस्था में पंचम वर्ण की कोई अवधारणा नहीं रही है। पंचम के तहत वर्ण व्यवस्था से बाहर का समुदाय रहा है, जिन्हें आप बाहरी एवं विधर्मी लोग कह सकते हैं। ऐसे लोग जो वर्ण व्यवस्था को नहीं मानते या जिन्हें वर्ण व्यवस्था से किसी कारण बस निकाल दिया गया हो। वर्ण व्यवस्था के तहत कार्यात्मक विभाजन एक पक्ष है। वर्णाश्रम धर्म या वर्णों का इथिक या नैतिक दायित्व इसका दूसरा पक्ष है। अधिकार के साथ कर्तव्य का निरूपण करना वर्णाश्रम धर्म की मूल विशेषता रही है। इसकी दूसरी विशेषता इसका लचीलापन रहा है। परशुराम और द्रोणाचार्य ब्राह्मण वर्ण में उत्पन्न होकर भी क्षत्रिय थे। बुद्ध, महावीर एवं विश्वामित्र क्षत्रिय वर्ण में उत्पन्न हाकर भी ब्राह्मण माने गए। ब्राह्मण ऋषि (ब्रह्मर्षि) कहलाते थे। लेकिन कालक्रम में वर्ण व्यवस्था में रूढ़ियाँ और कुरीतियाँ आ गयी। विदेशी दासता के युग में इसमें अंतर्विरोध भी आया। आधुनिक काल में बहुत सारे नए व्यवसाय आए, जिन्हें किस वर्ण में रखा जाए यह समस्या रहती है। इसके बावजूद स्वधर्म के निर्धारण में वर्ण व्यवस्था की अवधारणा आज भी एक उपयोगी संदर्भ प्रारूप बन सकता है। कम से कम महात्मा गांधी और विनोबा भावे जैसे उनके प्रमुख अनुयायी ऐसा मानते रहे हैं।

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