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हरियाणा में गोत्र विवाद

by amitjnusociology@gmail.com
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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2009

हरियाणा में गोत्र विवाद

यह परंपरा और आधुनिकता के बीच संक्रमण का मामला है। यूरोप इस दुखद स्थिति से गुजर चुका है। भारत में इस वक्त चार तरह के लोग हैं 1. असहिष्णु आधुनिक तबका (इंडियन्स), 2. जाहिल भारतीय तबका, 3. सुसंस्कृत भारतीय, 4. सहिष्णु एवं मध्यमार्गी आधुनिक तबका (मोडरेट इंडियन्स। पहले और दूसरे वर्ग में संवादहीनता की स्थिति है। तीसरे-चौथे वर्ग के बीच संवाद एवं सहकार है। यह भारतीय समाज संक्रमण काल से गुजर रहा है। विश्वग्राम में भारत एक उभरती हुई शक्ति है। लेकिन संस्कृति और धर्म के मुद्दे पर भारत में सांस्कृतिक नवजागरण की आवश्यकता है। नई पीढ़ी को संस्कारित करने का उपाय करना होगा। भारत हो या इंडिया चलाना तो नई पीढ़ी को ही है। वह अपनी हद में आस्थाहीन या संस्कारहीन नहीं है। लेकिन संस्कृति की बारीकी समझने का उसे मौका नहीं मिला है। यह समाज, समुदाय और राज्य की जिम्मेदारी है कि वह नई पीढ़ी को संस्कारित करे। विवाह एक सामाजिक संस्था के रूप में केवल दो व्यक्तियों के बीच प्यार का मामला नहीं है। यह एक जटिल सांस्कृतिक अस्मिता का मामला है। यह बहुआयामी संस्था है। गोत्र विवाद नासमझी और संवादहीनता से उपजा विवाद है। दो पीढ़ी आमने-सामने हैं। दोनों में संवाद और आपसी सौहार्द का अभाव है।

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि पारंपरिक हिन्दू विवाह में जाति के अंदर लेकिन सपिण्ड एवं सगोत्र के बाहर विवाह करने का नियम है। लेकिन यह भी सच है कि हिन्दुओं में 8 प्रकार के विवाह की मान्यता है, जिसमें गंधर्व विवाह भी एक है। गंधर्व विवाह प्रेम विवाह का एक रूप है। गंधर्व विवाह में नियमों की छूट है। परन्तु यह हिन्दू समाज की मुख्यधारा में आदर्श विवाह नहीं माना जाता। यदि आप जाति या पंचायत के नियमों को नहीं मानते तो जाति बहिष्कृत किया जा सकता है। कुछ स्थिति में पंचायत से भी बहिष्कृत किया जा सकता है, लेकिन मारा-पीटा नहीं जा सकता। जान नहीं ली जा सकती। आज के संदर्भ में गाँव से बाहर भी नहीं किया जा सकता। भारतीय संविधान इसकी इजाज़त नहीं देता। राज्य का यह कर्तव्य है कि वह अपने सभी नागरिकों के जान-माल की सुरक्षा करे। जातियों, पंचायतों, समुदायों को अपने पर्सनल लॉ या सामुदायिक कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन उस कानून को मानना या नहीं मानना व्यक्ति या परिवार के विवेक पर निर्भर करता है। वह अगर नियम नहीं मानता है, तो उसका हुक्का-पानी तो बंद हो सकता है, लेकिन उसको प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। पंचायतों के अधिकार की हद है। वे भारतीय संविधान के दायरे में ही निर्णय ले सकते हैं।

भारतीय संविधान में पर्सनल लॉ (सामुदायिक कानून) और आम भारतीयों के मौलिक अधिकारों की हदें तय है। एक नागरिक अगर चाहे तो जाति पंचायतों के पर्सनल लॉ विषयक निर्णयों के विरुद्ध कोर्ट की शरण में जा सकता है। जाति पंचायतों के पास केवल अधिकार ही नहीं होते, कर्तव्य भी होते हैं। दुर्भाग्य से जाति पंचायतें अपने कर्तव्य को निभाने के प्रति उतने उत्साहित नहीं, जितना अपने अधिकार के तहत जाति सदस्यों को दंडित करने में उत्साहित होते हैं। भारतीय संविधान में प्रेम विवाह और पारंपरिक सामाजिक विवाह दोनों को मान्यता है। अगर प्रेम विवाह पारंपरिक तरीके से नहीं करके कोर्ट में किया जाता है, तो स्थिति बदल जाती है। उसको हिन्दू विवाह की जगह आधुनिक विवाह मानना पड़ेगा और फिर उस पर पर्सनल लॉ नहीं लागू होगा। अत: यह समुदायों और जाति पंचायतों, ग्राम पंचायतों की जिम्मेदारी बनती है कि अपने सदस्यों को संस्कारित करें।

झज्जर जिला (हरियाणा) के ढराण गाँव में पिछले कई दिनों से गोत्र विवाद चल रहा है। गाँव के रिसाल सिंह के पोते रवीन्द्र और पानीपत के सिवाह गाँव की शिल्पा की शादी को कादियान गोत्र की बारह खाप पंचायत किसी भी हालत में वैध मानने को तैयार नहीं हैं। ग्रामीणों के मुताबिक शिल्पा का गोत्र कादियान से सम्बद्ध है, इसलिए यह शादी ढराणा के कादियान गोत्र की खाप को मंजूर नहीं है। रिसाल सिंह का गोत्र गहलोत है, कादियान नहीं। ढ़राणा गाँव में दो गोत्र के लोग रहते हैं। कादियान गोत्र के लोग बहुसंख्यक हैं। शिल्पा ने लाइव इंडिया टीवी में 23 जुलाई को साढ़े तीन बजे के प्रोग्राम में बताया कि रवीन्द्र को उसकी बुआ ने बचपन में ही गोद ले लिया था। अत: रवीन्द्र तो तकनीकी रूप से ढराणा गाँव का निवासी भी नहीं है। परन्तु उसके पिता का परिवार ढ़राणा गाँव में ही रहते हैं। कादियान गोत्र का बारह खाप उसके ससुराल वालों को बेवजह परेशान कर रहा है। हिंसक संघर्ष में तीन दर्जन से ज्यादा लोग घायल हो चुके हैं। मंगलवार शाम (21 जुलाई 09) को जातीय पंचायत के फैसले के आगे झुकते हुए रिसाल सिंह गहलोत का परिवार गाँव छोड़कर चला गया और अपना मकान, सामान और पशुओं के अलावा अन्य संपत्ति रिश्तेदारों के हवाले कर गए। इसी बीच शिल्पा ने राष्ट्रीय महिला आयोग की हरियाणा सदस्य यास्मीन अबरार से मुलाकात कर मामले की जानकारी दी। अबरार ने कहा कि कादियान खाप पंचायत का फैसला पूर्ण रूप से गैरकानूनी है। दूसरी ओर रिसाल सिंह के परिवार के गाँव छोड़ने के बाद कादियान खाप का धरना समाप्त कर दिया गया है। शादी 24 अप्रैल 2009 को हुई थी। 18 जून को जब रवीन्द्र अपनी पत्नी के साथ ढ़राणा गाँव पहुँचा तो कादियान खाप उबल पड़ा और या तो बहु छोड़ना या गाँव छोड़ने का फैसला सुनाया। गहलोत खाप बीच का रास्ता निकालने में जुटा रहा।

शिल्पा का गोत्र कादियान है। कादियान खाप का कहना है कि शिल्पा तो कादियान गोत्र की बेटी है, अगर वह रिश्ता तोड़ती है तो कादियान गोत्र के लोग उसका कन्यादान करेंगे। दूसरी ओर गहलोत खाप ने बीच का रास्ता निकाला है। गहलोत खाप ने रविन्द्र और शिल्पा को ताउम्र गाँव से बाहर रहने और एक साल के लिए रविन्द्र के पिता रोहताश को गाँव से बाहर चले जाने का फैसला सुनाया है। रोहताश तीन भाई है। नसीब, वेद प्रकाश तथा रोहताश तीनों रिसाल सिंह के बेटे हैं। यानी रिसाल सिंह और उनके दो अन्य बेटों का परिवार गाँव में रह सकता है। कादियान खाप को यह मंजूर नहीं है। कादियान खाप की बैठक दूबलधन गाँव की पंचायत में हुई। दूबलधन गाँव में कादियान गोत्र बहुसंख्यक है। कादियान खाप के फैसले को तामील कराने के लिए दूबलधन गाँव के कादियान दल-बल के साथ ढराणा गाँव रवाना हुए।
इस बीच रास्ते में मौजूद पुलिस बल ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की, तो गुस्साए ग्रामीणों ने उन पर भारी पथराव किया। गाँव में घुसने की कोशिश करते दूबलधन गाँव के लोगों पर ढराणा के गहलोत लोगों ने भी पथराव किया। दोनों ओर से जारी पथराव की चपेट में कई पुलिसकर्मी घायल हुए। अन्य 36 लोग भी घायल हुए। यह घटना 19 जुलाई 2009 को हुई।
हरियाणा के दो गाँव के बीच गोत्र विवाद अब हाईकोर्ट पहुँच गया है। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट इस पर फैसला सुनाएगा परंतु इस बीच यह मामला मीडिया में सनसनीखेज मसाला बन गया है। आधुनिकता के रंग में रंगे लोग पूछ रहे हैं कि इस समय जब एक कोर्ट ने विवाह को कानूनी मान्यता दे दी है तो दूसरी ओर हरियाणा का गोत्र विवाद सामने आया है। क्या प्यार करने से पहले लोग एक-दूसरे का गोत्र पूछते हैं? क्या होमोसेक्शुअल विवाहों पर भी गोत्र लागू होगा? गोत्र कातिल बन गया है।
इसी बीच 23 जुलाई को हरियाणा के कैथल जिले में एक दूसरी घटना घट गई। परिवार की सहमति के बिना घर से भागकर अपने ही गोत्र की लड़की से प्रेम-विवाह करने वाले युवक को उसके गाँव वालों ने पीट-पीट कर मार डाला। कैथल जिले के मटौर गाँव निवासी वेदपाल (21वर्ष) ने जींद जिले के सिंधवाल गाँव की सोनिया से इस साल (2009 के मार्च) कोर्ट में विवाह किया था। इस पर सिंधवाल पंचायत ने फरमान जारी कर कहा था कि एक ही गोत्र के होने के कारण दोनों भाई-बहन हैं। करीब 20 दिन पहले मायके आई सोनिया को जब उसके परिजनों ने वापस नहीं भेजा तो वेदपाल ने हाईकोर्ट की शरण ली। बुधवार 22 जुलाई 2009 को देर शाम वेदपाल हाईकोर्ट के वारंट ऑफिसर सूरजभान को लेकर सोनिया को लेने सिंघवाल पहुँच तो गाँव वालों ने उसे पीट पीट कर जान से मार दिया।

ये तीनों तीन अलग प्रकार के मामले हैं। झज्जर जिले का मामला तकनीकी रूप से गोत्र विवाह का मामला न होकर विलेज एक्सोगैमी का मामला है। भारत के कुछ गाँव में विलेज या गाँव के भीतर रहने वाले सभी लोग एक पिण्ड के माने जाते हैं और उनके बीच विवाह वर्जित होता है। लेकिन यहाँ लड़का-लड़की न एक गोत्र के हैं और न एक गाँव के हैं। यह या तो नासमझी का मामला है या आपसी रंजिश का मामला है, जिसके तहत पारंपरिक नियम या प्रथा की गलत व्याख्या करके एक परिवार को प्रताड़ित किया जा रहा है। यह पंचायत और कादियान खाप का अपराध है।

दूसरा मामला प्रेस का है। आधुनिकवादियों ने दो दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं की आड़ में गोत्र एवं विवाह की पारंपरिक हिन्दू संस्था को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह आधुनिक असहिष्णुता का बहुत ही नाजायज और तर्कहीन उदाहरण है। पूरे भारत में हिन्दू समाज के भीतर जाति के भीतर एवं गोत्र के बाहर विवाह करने की प्रथा है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार एक गोत्र के स्त्री-पुरूष आपस में भाई-बहन माने जाते हैं, चूँकि इनके पूर्वज एक माने जाते हैं। ऐसे विवाह को परंपरा आनुवंशिक विवाह मानती है, जिसमें पैदा हुए बच्चों के भीतर शारीरिक एवं मानसिक दोष पैदा होता है। दुनिया के हर समाज में भाई-बहनों के बीच या रक्त संबंधियों के बीच विवाह का निषेध पाया जाता है, जिसे इनसेस्ट टैबू कहा जाता है। भारतीय संविधान के अनुसार भी हिन्दू पर्सनल लॉ के तहत उपर्युक्त नियमों की मान्यता है। अत: यह कहना युक्तिसंगत नहीं है कि जब होमोसेक्शुअल विवाह हो सकता है, तो गोत्र के भीतर विवाह कैसे नहीं हो सकता। हर समुदाय को अपनी सांस्कृतिक पहचान कायम रखने का अधिकार है। जो लोग गोत्र की अवधारणा में विश्वास ही नहीं रखते, वे कानूनी भाषा में पारंपरिक हिन्दू नहीं है। ये लोग आधुनिक भारतीय नागरिक हैं। इनमें जे ज़्यादातर लोग धर्मनिरपेक्ष हैं। ये लोग विवाह को एक धार्मिक संस्कार न मानकर एक कानूनी समझौता मानते हैं। इनके लिए विवाह का एकमात्र अर्थ कानून सम्मत यौन संबंध है। ऐसे लोग ही होमोसेक्शुअल विवाह को जायज मानते हैं। ऐसी मान्यता वाले जजों ने ही इसे कानूनी दर्जा दिया है। परन्तु इसका सभी धर्मों के आचार्यों ने विरोध किया है। हिन्दू धर्म में तो विवाह एक धार्मिक संस्कार है, जो एक स्त्री-पुरूष जोड़े को सात जन्मों तक एक-दूसरे का साथी बने रहने का आशीर्वाद देता है। भारत के बहुसंख्यक हिन्दुओं के लिए विवाह संस्कार गोत्र के भीतर नहीं किया जाता। कोई भी प्रशिक्षित पुरोहित ऐसे विवाह नहीं करवाता। कोई समुदाय ऐसे विवाह को मान्यता नहीं देता। प्यार हो जाने पर भी भाई-बहन को विवाह की अनुमति नहीं दी जा सकती। हर समुदाय को भाई-बहन की सांस्कृतिक परिभाषा गढ़ने और मानने का अधिकार है।

तीसरा मामला एक गोत्र के भीतर विवाह का है, लेकिन विवाह पारंपरिक तरीके से किसी पुरोहित द्वारा या मंदिर में नहीं किया गया है। यह विवाह कोर्ट में किया गया है। इसीलिए हाईकोर्ट ने इसे मान्यता दी है। इस विवाह को खारिज करने का अधिकार पंचायत को नहीं है, परंतु पंचायत को यह अधिकार है कि लड़का- लड़की को जाति बहिष्कृत करके हुक्का-पानी बंद कर दे। परंतु पंचायत या गाँव वालों को या लड़की के परिवार को लड़के को जान से मारने का अधिकार नहीं है। यह हत्या का अपराध है और कातिलों को भारतीय संविधान के अनुसार सजा मिलनी हीं चाहिए। उपर्युक्त घटनाएँ हिन्दू समाज के भीतर संक्रमण काल की प्रसव पीड़ा का दर्शाता है। सांस्कृतिक पुनर्जागरण, पौरोहित्य प्रशिक्षण एवं धार्मिक शिक्षा दिए बिना काम नहीं चलेगा। नई पीढ़ी को संस्कारित करना जरूरी है। बिना संस्कारित किए उनसे धार्मिक कर्तव्य के पालन की कैसे उम्मीद की जा सकती है।

गोत्र विवाद और जातिगत पंचायतों के फैसलों का काला इतिहास भौगोलिक रूप से पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा समेत राजस्थान के कुछ इलाकों तक फैला हुआ है। इसके दायरे में केवल जाट समाज ही नहीं आता। इस क्षेत्र में बसने वाली अधिकांश जातियाँ आती हैं। परंपरा के भदेस और विकृत रूप ही इसके मुख्य घटक हैं। यह मसला तो प्रमुख रूप से आधुनिकीकरण की प्रक्रिया और हरित क्रांति से जुड़ा हुआ है। खेती के कामयाब पूँजीवादी हरित क्रांति और ग्रामीण जीवन के निरंतर कस्बाईकरण से बेहद अरूचिकर सामाजिक परिणाम निकल रहे हैं। ये विकृतियाँ परंपरा की नहीं, बल्कि आधुनिकता के अनिच्छित और अवांछित रूपों की देन हैं। लेकिन यह भी सच है कि ऐसी घटनाओं से पंजाब का इलाका तुलनात्मक रूप से अछूता है। इसका प्रमुख कारण पंजाब में सिख धर्म का प्रभाव माना जा सकता है।
हरित क्रांति के अन्य इलाकों में हिन्दू समाज के भीतर आर्यसमाज का ज्यादा प्रभाव है। दुर्भाग्य से आर्यसमाज की विचारधारा उपर्युक्त विकृतियों को रोकने में समर्थ नहीं हो पायी हैं। इस समस्या का समाधान कानून बनाकर नहीं किया जा सकता। इसका उपाय तो सांस्कृतिक आंदोलन से ही निकलेगा। हिन्दू समाज ऐसे सांस्कृतिक नवजागरण के लिए छटपटा रहा है। हमें परंपरा और आधुनिकता के बीच पुल बनाना पड़ेगा। पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच संवाद कायम करना पड़ेगा। तभी सांस्कृतिक अस्मिता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच समन्वय हो पायेगा। सांस्कृतिक संहिताओं, इज्जत, पितृसत्ता और आधुनिक हिंसा के मिलेजुले घटकों से उपजे सामाजिक गतिरोध और विस्फोट का निराकरण हो पायेगा। इस इलाके में बढ़ते गोत्र विवाद का मूल कारण कन्या भ्रूण हत्या है। लड़कियों की दिन-प्रतिदिन घटती संख्या से विवाह में परेशानी आ रही है, ऐसे में गोत्र की परंपरा तोड़कर शादी कर ली जाती है, जिसपर विवाद हो जाता है। बढ़ते विवादों से चिंतित खाप-पंचायतें कन्या भ्रूण हत्या को मूल जड़ मान इसे रोकने के लिए अभियान छेड़ने की तैयारी में हैं। वर्तमान में हरियाणा प्रदेश में पुरुष और महिलाओं का अनुपात 1000:861 है। तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद इसमें सुधार नहीं हो रहा। पंच-पटेल भी मानते है कि लड़के का विवाह समस्या बनता जा रहा है। कई जगह तो संपन्न परिवारों को लड़की मिलना मुश्किल हो रहा है, मध्यम व गरीब परिवारों के हालात ज्यादा बदतर है। कभी पंडित-पुजारी शादी का माध्यम बनते थे, अब मुनाफाखोर दलालों ने रिश्ते कराने को धंधा बना लिया है। दूसरे प्रदेशों से भी लड़कियाँ खरीद कर लाई जा रही हैं। पंच-पटेलों का मानना है कि ये हालात गोत्र विवाद से कहीं बड़े है।
हर जाति समूह में तीन या चार गोत्रों में विवाह करने पर रोक होती है। अपने गोत्र में, अपनी माँ के गोत्र में, पिता की माँ के गोत्र में और माँ की माँ के गोत्र में विवाह करना उचित नहीं समझा जाता। जाट जाति में ऐसे किसी गाँव से रिश्ता करने पर भी पाबंदी है, जिसकी सीमा भी पैदाइश वाले गाँव से छूती हो। आजकल इन धारणाओं पर जोर देने के आर्थिक आयाम भी जुड़ गए हैं। जिन समुदायों को इन सांस्कृतिक नियमों पर बल देने से जितना फायदा होता है, वे उतनी ही कड़ाई से उसके अनुपालन की जिद करते हैं। उत्तराधिकार में बेटी को मिलने वाली संपत्ति भी हिंसक प्रतिक्रियाओं का कारण बनती है। दामाद अगर गाँव या आसपास का ही होगा तो जमीन बटने की नौबत आ जाती है। कई बार भाइयों के बीच जमीन बंटने के डर से भी सांस्कृतिक नियमों के तहत उनके विवाह को परंपरा विरुद्ध ठहरा कर मार दिया जाता है या गाँव से बहिष्कृत कर दिया जाता है। जाति के बाहर विवाह करने पर अनुलोम और प्रतिलोम का पारंपरिक नियम रहा है। इसके अनुसार लड़की की जाति लड़के की जाति से ऊँची नहीं होनी चाहिए। प्रेम विवाह भी अगर उपर्युक्त नियम के खिलाफ हुआ तो ज्यादा विरोध किया जाता है। परंतु अगर उपर्युक्त नियम अनुसार हुआ तो विरोध का स्वर धीमा या कम हिंसक होता है। अनुलोम-प्रतिलोम का नियम शुरू में गोत्रों के ऊँच-नीच से जुड़ा हुआ था। जब प्रेम विवाह के तहत अंतर्जातीय विवाह होने लगे तो इसे जातियों के ऊँच-नीच से जोड़ दिया गया। अब तो इसे वर्ग के ऊँच-नीच से भी जोड़ा जाने लगा है। इस तरह हम देखते हैं कि विवाह या गोत्र का मामला केवल बहाना है, विवाद का असली कारण परंपरा से आधुनिकता की ओर संक्रमण की दुखद प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। पंचायतें इसकी तह में जाये बिना फैसला देने लगी हैं। मीडिया भी इसकी तह में गए बिना पंचायतों को तालिबान कहने लगी हैं। यह एक तरफ पंचायतों का जाहिलपन प्रदर्शित करता है तो दूसरी तरफ मीडिया में कार्यरत आधुनिकता वादियों की असहिष्णुता। इससे बात बनती नहीं बिगड़ती है। संवादहीनता बढ़ती है। मामला और जटिल होता है। एक बार विवाह हो जाने के बाद उस विवाह को निरस्त करने का अधिकार पंचायतों को नहीं है। पारंपरिक हिन्दू विवाह एक संस्कार है और यह एक अटूट बंधन है। इसमें तलाक की कोई सुविधा नहीं है। तलाक आधुनिक हिन्दू विवाह में होता है, कोर्ट में किए गए विवाह में होता है, पारंपरिक हिन्दू विवाह में नहीं। ऐसे विवाह यदि गलत प्रक्रिया से हुए हैं, तो प्रायश्चित का विधान है। या इन्हें जाति-बहिष्कृत किया जा सकता है। पंचायतें अपनी हद से बाहर हो रही हैं। वे भारतीय परंपरा और भारतीय संविधान दोनों का अतिक्रमण कर रही हैं। मीडिया अपनी नासमझी और असहिष्णुता में पंचायतों को कटघरे में खड़ा करने के बजाय परंपरा, हिन्दू विवाह, गोत्र और सांस्कृतिक अस्मिता पर ही प्रश्न खड़ा कर रहा है।
विवाह और परिवार आपस में जुड़ी हुई संस्थाएँ हैं। यह किसी भी समाज की मूल इकाई है। समकालीन भारत में परिवार और विवाह दोनों बदल रही हैं। पारिवारिक विघटन और तलाक की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इसका सबसे खराब प्रभाव बच्चों पर पड़ता है। विघटित परिवार का बोझ बच्चों पर ही पड़ता है। दरअसल परिवारों के विघटन के प्रभाव जितनी गहराई से पिछले दशकों में पड़ते थे, अब उनकी धार कम हो गई है। कारण, विपरीत परिस्थितियों से जूझने के लिए युवा पीढ़ी आज पहले से ज्यादा तैयार है। वे जीवन को निहायत ही अनौपचारिक ढंग से लेते हैं और रिश्तों के टूटने को जीवन का सहज हिस्सा मानते हैं। अब इन मामलों में पहले वाली अति भावुकता और नाटकीयता नहीं रही। दर्द की अभिव्यक्ति और उसके प्रति दृष्टिकोण बदल गया है।
भावना विहीन मनुष्य की अवधारणा पर साहित्य में तीन महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं। प्रेमचंद की ‘कफन’, कामू की ‘आउट साइडर’ और समरेस बसु की ‘विविर’।

कफन की भावना विहीनता गरीबी के कारण है। कामू और बसु के पात्रों की भावना विहीनता के अन्य कारण हैं। आज के युवा की अनौपचारिकता को समझना आसान नहीं है। विगत दशकों में इस तरह की सोच को विद्रोह मानकर युवा को नायक माना जाता था। आज उसी तरह की बेलाग बेतकल्लुफी बरतने वाले को खलनायक समझा जाता है। नई पीढ़ी शोषण के लिए तैयार नहीं है। पुरानी पीढ़ी की तरह वह आसानी से ठगी नहीं जा सकती। पूर्वजों का सदियों का शोषण का शिकार होना नई पीढ़ी के लिए बीता हुआ इतिहास है। वे लोग पुराने शोषण की साए से भी मुक्त हैं। मनुष्य फार्मूला नहीं है, व्यवहार टाइप नहीं है, चरित्र स्टॉक नहीं है। नई पीढ़ी के युवा अपने तरह के मनुष्य हैं, उनका अपना व्यवहार है, उनका अपना चरित्र है। पुरानी पीढ़ी को नई पीढ़ी के साथ हर हालत में संवाद बनाए रखना चाहिए। उनके विचारों, आकांक्षाओं, मंजिलों और अध्यात्मिकता को समझने की कोशिश करनी चाहिए।

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