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भारतीय संस्कृति में विवाह

by amitjnusociology@gmail.com
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विवाह मानव समाज की सबसे मौलिक एवं प्राचीन सामाजिक संस्थाओं में से एक है। प्राचीन काल से यह समाज में व्यवस्था एवं अनुशासन बनाये रखने का प्रमुख माध्यम रहा है। इसके बिना समाज मुक्त यौन-संबंधों की अराजकता में भटक गया होता। इसका स्वरूप, प्रकृति तथा प्रक्रियाएँ अलग-अलग समाजों में एक जैसी नहीं होतीं। इसके बावजूद इस संस्था के कई सार्वभौमिक सामान्य एवं प्रकार्य हैं। एडवर्ड वैस्टरमार्क के अनुसार ”विवाह एक या अधिक पुरुष का एक या अधिक स्त्री के साथ संबंध है, जिसे प्रथा या कानून की मान्यता प्राप्त होती है और जिसमें शामिल लोगों तथा इस संबंध से पैदा हुए बच्चों को कुछ अधिकार तथा कर्तव्य प्राप्त होते हैं। ”सार रूप में, विवाह का तात्पर्य नियमों तथा रीतियों के समुच्चय से है, जो यह र्निधारित करता है कि किस व्यक्ति का विवाह किससे होगा, विवाह किस विधि से होगा तथा किस परिस्थिति में विवाह होगा। विवाह के पश्चात् विवाह संबंध में बंधने वाले व्यक्तियों के अधिकार और कर्तव्य क्या होंगे, तथा आवश्यकता पड़ने पर संबंध विच्छेद कैसे होगा। 

विवाह के द्वारा पति-पत्नी के शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक लक्ष्यों और जरूरतों की पूर्ति होती है। विवाह सामाजिक रूप से स्वीकृत तथा मूल्यों की दृष्टि से वांछनीय संबंध है, जिसमें एक पक्ष स्त्री एवं दूसरा पक्ष पुरुष होता है। यह वैवाहिक संबंध में बंधे दोनों पक्षों के यौन, आर्थिक एवं अन्य अधिकारों तथा कर्तव्यों को परिभाषित तथा स्थापित करता है। विवाह पुरुष तथा स्त्री के पति-पत्नी के रूप में यौन-अधिकारों को सामाजिक तथा कानूनी मान्यता देता है तथा उनके यौन-संबंधों का नियमन भी करता है। वैवाहिक संबंधों से उत्पन्न संतान को समाज में वैध संतान की मान्यता प्राप्त होती है ।

भारत में विभिन्न सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक समूहों में विवाह से अलग-अलग पारंपरिक अवधारणाएँ, मूल्य, रीति-रिवाज तथा प्रथाएँ प्रचलित हैं। इसमें से कुछ महत्त्वपूर्ण वैवाहिक रूप निम्नलिखित हैं :

भारत में हिन्दू विवाह

हिन्दू विवाह की सही व्याख्या समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से की जा सकती है। हिन्दू समुदाय में विवाह की विशिष्ट पहचान है। हिन्दू विवाह स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक मान्यता प्राप्त संबंध मात्र नहीं है, बल्कि इसका धार्मिक एवं आध्यात्मिक पक्ष भी है। यह मूलत: एक पवित्र बंधन है एवं एक धार्मिक संस्कार है। इसका उद्देश्य व्यक्तियों के लिए शारीरिक सुख मात्र न होकर उनका आध्यात्मिक विकास भी है। के. एम. कपाड़िया का कहना है कि ”हिन्दू विवाह एक स्त्री और पुरूष के बीच सामाजिक मान्यता प्राप्त बंधन है, जिसका उद्देश्य धर्म, प्रजा, रति तथा कुछ दायित्वों का निर्वहन है।” पी. एच. प्रभु के अनुसार विवाह का प्राथमिक उद्देश्य पारिवारिक जीवन की निरंतरता है। विवाह पति-पत्नी को एक अटूट बंधन में बांधता है, जो जन्म-जन्मान्तर तक बना रहता है। समाजशास्त्रिायों ने भारत में वैवाहिक जीवन की तुलनात्मक स्थिरता को रेखांकित किया है।

हिन्दू विवाह के उद्देश्य

समाजशास्त्रियों एवं भारतविदों ने हिन्दू विवाह के निम्नलिखित उद्देश्यों की विवेचना की है :-

(क) एक संस्कार के रूप में हिंदू विवाह का पहला उद्देश्य कुछ धार्मिक कर्तव्यों को पूर्ण करना है। विवाह के अंतर्गत पति-पत्नी के साथ रहने और धार्मिक दायित्वों को पूरा करने के लिए संकल्पबध्द होते हैं। एक पारंपरिक हिन्दू का जीवन चार अवस्थाओं या आश्रमों में विभाजित है, इन्हें क्रमश: ब्रह्मचर्य (विद्यार्थी जीवन), गृहस्थ (पारिवारिक जीवन), वानप्रस्थ (अवकाश प्राप्त जीवन) एवं संन्यास (वीतरागी जीवन) कहते हैं । प्रत्येक आश्रम का प्रारंभ एक संस्कार से होता है, जिसके दौरान वह एक विशेष संकल्प लेता है। संस्कारों का उद्देश्य मनुष्य के शरीर तथा मानस की शुध्दि है। विवाह संस्कार को गृहस्थ आश्रम का द्वार माना जाता है।

(ख) धर्म, प्रजा (प्रजनन) एवं रति (यौन सुख) जैसे धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करने के लिए एक हिन्दू का विवाहित होना आवश्यक है। हिन्दू विवाह का सर्वप्रमुख उद्देश्य वर्ण, जाति एवं कुल के अनुरूप धर्म का पालन करना है।

(ग) विभिन्न संस्कारों में विवाह एक संस्कार है, जिसका उद्देश्य शरीर का शुध्दिकरण है। स्त्री के लिए इसका विशिष्ठ महत्त्व है, क्योंकि स्त्री के लिए यही सबसे प्रमुख संस्कार हैं। 

(घ) हिंदू गृहस्थ से यह अपेक्षा की जाती है कि वह देवयज्ञ, भूतयज्ञ, नृयज्ञ एवं पितृयज्ञ जैसे पंचयज्ञों को संपन्न करें। इसके लिए वैदिक मंत्रों का जाप करने, अग्नि में घी का हवन करने, विभिन्न जीवों को भोजन कराना तथा अतिथि सत्कार एवं पूर्वजों को पिण्डदान या श्राध्द करना आवश्यक है। यह सभी धार्मिक कृत्य पत्नी के साथ संपन्न किए जाने चाहिए।

(ड़) हिन्दुओं में तीन धार्मिक कर्तव्यों या ऋणों की मान्यता है। इन्हें पितृ-ऋण, देव-ऋण तथा गुरु-ऋण कहा जाता है। विवाह पितृ-ऋण से मुक्त होने के लिए आवश्यक माना गया है। पुत्र का जन्म पिता को पितृ-ऋण से मुक्त कराता है। गृहस्थ धर्म की पूर्णता और धार्मिक अनुष्ठानों के निर्वहन के लिए पत्नी की भूमिका अनिवार्य है। इसलिए हिन्दुओं में पत्नी को अर्धांगिनी एवं पति को अर्धांग कहा जाता है।

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