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डा. भीम राव अम्बेडकर – वंचित समूहों के प्रमुख सिद्धांतकार

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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2011

डा. भीम राव अम्बेडकर – वंचित समूहों के प्रमुख सिद्धांतकार

वंचित समूहों के सबसे प्रमुख सिद्धांतकार के रूप में बाबा साहब 1990 के दशक में ही स्थापित हो पाये। भारतीय समाजशास्त्र में उन्हें एक सिद्धांतकार का दर्जा 1990 के उत्तरार्ध्द में मिलना शुरू हुआ। इससे पहले उन्हें केवल दलित नेता या दलित विचारक माना जाता था। उनको महाराष्ट्र के संदर्भ में दलित उध्दार से जोड़ा जाता था, संविधान निर्माण के लिए बनी प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में, भारतीय संविधान के निर्माता के रूप में आदर दिया जाता था तथा अनुसूचित जाति जनजातियों के आरक्षण के संदर्भ में याद किया जाता था। उनके वंचित समूहों के दृष्टिकोण के सबसे प्रमुख सिद्धांतकार के रूप में उभरने में 1977 के बाद की भारतीय समाज की ऐतिहासिक-सामाजिक घटनाओं की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। रणजीत गुहा एवं उनके सहयोगियों ने सपनों में भी नहीं सोचा था कि उनके सहयोगी प्रयासों से भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन की जो प्रक्रिया शुरू होगी, उससे नव-मार्क्सवादी दृष्टिकोण के बदले बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर महिमामंडित होंगे। प्रारंभ में तो यही लगा था कि वंचित समूहों में जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया या चारूमजूमदार लोकप्रिय होंगे या बिरसा मुंडा जैसे स्थानीय महानायक की पुनर्प्रतिष्ठा होगी और भारतीय समाज के ऐतिहासिक विकास में राज्य और बाजार के मुकाबले ज्यादा मानवीय, पयार्वरण को संपुष्ट करने वाली विकेंन्द्रित समाजवादी मूल्यों की प्रतिष्ठा होगी। इसमें अम्बेडकर के दलित विमर्श या एन.जी.ओ., ईसाई मिशन केंद्रित जनजाति एवं नारीवादी विमर्श को महत्व मिलेगा, लेकिन केंद्रियता तो नव-मार्क्सवाद प्रेरित समाजवादी विमर्श को ही मिलेगी। दूसरे शब्दों में रणजीत गुहा और उनके सहयोगियों ने वंचित समूहों के स्थानीय प्रतिरोधी आंदोलनों को नव-मार्क्सवादी भाष्य देकर मिश्रित व्यवस्था केंद्रित नेहरूवादी समाजवाद को रूपांतरित करने का उपक्रम किया। समाजवाद के भीतर से पूँजीवादी रूझान की नीतियों को रूपांतरित करके भारतीय समाज को पूरी तरह साम्यवादी या समाजवादी विकास के मार्ग पर जोड़ने की हसरत 1967 से 1969 के बीच पश्चिमी विश्वविद्यालयों में पढ़े-लिखे भारतीय मार्क्सवादियों में फलने-फूलने लगी थी। यह सोवियत संघ के नेतृत्व वाले समाजवादी देशों और अमेरिका के नेतृत्व वाले पूँजीवादी देशों के बीच ‘शीत युद्ध’ (वैचारिक युद्ध) का चरमकाल था। इसी काल खण्ड में फ्रांस में छात्र आंदोलन एवं उत्तर-आधुनिकतावादी आंदोलन का सूत्रपात हुआ। इसी काल में महाबली अमेरिका वियतनाम जैसे छोटे से देश को हराने में नाकाम रहा। उन दिनों अमेरिका समेत पश्चिम के अधिकांश देशों में हिप्पी आंदोलन, बीट्लस एवं उत्तर-आधुनिक जीवन मूल्यों को अपनाने का फैशन चरम पर था। 1970 के दशक में पर्यावरणवादी आंदोलनों को भी पश्चिमी समाज के युवक आशाभरी निगाह से देख रहे थे। पश्चिमी युवाओं के एक बड़े वर्ग ने गिरिजाघरों में जाना बंद कर दिया था और इन में से एक बड़े वर्ग का पूर्व के देशों में प्रचलित आध्यात्मिक संप्रदायों, आश्रमों एवं धर्म गुरूओं में आकर्षण पैदा हो गया था। दलाईलामा, ओशो रजनीश, इस्कॉन आंदोलन के प्रभुपाद, महर्षि महेशयोगी, पंडित रविशंकर, जुबिन मेहता, आनंदमूर्ति प्रभातरंजन सरकार के अनुयायियों की संख्या पश्चिमी युवाओं में अचानक बहुत बढ़ गई। मीडिया में इनके प्रचार से भारतीय मध्यवर्ग में भी इनके प्रति आकर्षण बढ़ा। 1980 के दशक में भारतीय मूल के पेशेवर मध्यवर्ग (इंडियन डायसपोरा) का अमेरिका में प्रभाव एवं संख्याबल काफी बढ़ा। इसमें दलित डायसपोरा भी अच्छी संख्या में थे।

1980 में इंग्लैंड में मार्गरेट थैचर और अमेरिका में रोनाल्ड रीगन के नेतृत्त्व में पूँजीवादी नव-उदारवाद ने नये जोश के साथ पूँजीवादी व्यवस्था को मजबूत करना शुरू किया। 1977 से 1979 तक आते-आते जनता पार्टी की सरकार अपने अंतर्विरोधों से बिखरने लगी। मोरारजी के नेतृत्त्व में चरण सिंह और राजनारायन जैसे समाजवादी रूझानों वाले पिछड़े वर्ग के हिमायती नेताओं ने असहजता महसूस किया। मोरारजी के स्थान पर जनता पार्टी के नेता बाबू जगजीवनराम निवार्चित हुए। वे बाबा साहब अम्बेडकर के बाद अनुसूचित जनजातियों (दलितों) के सबसे प्रतिष्ठित नेता रहे हैं। बाबा साहब अम्बेडकर के कांग्रेस छोड़ने के बाद भी 1980 के दशक के पूर्वार्ध तक देशों के अधिकांश दलित कांग्रेस पार्टी के साथ बने रहे थे। इसको दो महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। पहला, महात्मा गांधी द्वारा अछूतों की भलाई के लिए किया गया कार्य और दूसरा बाबू जगजीवनराम जैसे जमीन से जुड़े नेताओं का कांग्रेस पार्टी से जुड़ा होना। लेकिन जब 1980 में पिछड़े वर्ग के दबंग जातियों के नेताओं (चौधरी चरण सिंह, नीलम संजीव रेड्डी आदि) ने विधि सम्मत तरीके से जनता पार्टी में मोरारजी देशाई के स्थान पर चुने गये नेता बाबू जगजीवनराम को प्रधानमंत्री बनने नहीं दिया और बिना संसद में एक भी दिन का बहुमत पाये चौधरी चरण सिंह को तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने कांग्रेस के जबानी आश्वासन पर प्रधानमंत्री की शपथ दिला दी, तो अनुसूचित जनजातियों का कांग्रेस और सवर्ण नेताओं पर से भरोसा उठना शुरू हुआ। इसका लाभ मान्यवर कांशीराम ने उठाया। कांशीराम और मायावती 1977 के आस-पास एक-दूसरे से मिले। तब तक कांशीराम अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के फलस्वरूप नौकरी कर रहे अधिकारियों एवं कर्मचारियों को संगठित करने के क्रम में महाराष्ट्र के अम्बेडकरवादी नेताओं की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय तथा प्रभावी संगठक साबित हो चुके थे। जल्द ही उन्हें मायावती जैसी चमत्कारी नेता का सहयोग मिला। 1980 के चुनाव में इंदिरा गांधी की वापसी हुई। चुनाव जीतने के कुछ माह बाद ही उनके बदनाम पुत्र संजय गांधी की मृत्यु हो गई। संजय गांधी ने युवा कांग्रेस को 1970 के दशक में अनुशासनविहीन सत्तालोलुप युवाओं एवं बाहुबलियों का अखाड़ा बना दिया था। इमरजेंसी के दिनों में युवा कांग्रेस के हुल्लड़ ब्रिगेड की तूती बोलती थी। जबकि विश्वविद्यालयों के पढ़ाकू युवाओं में माओ, चेग्वेरा, हो ची मिन्ह, ज्याँ पॉल सार्त्र एवं चारू मजूमदार जैसे लोकप्रिय मार्क्सवादी नायकों के साथ-साथ उत्तर-आधुनिक विचारधारा एवं प्रवृत्तियों का आकर्षण फल-फूल रहा था।
1980 की जीत और संजय गांधी की मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी काफी हद तक बदल चुकी थी। 1982 के एशियाई खेल की तैयारी की जिम्मेदारी राजीव गांधी और उनके दून स्कूल में पढ़े मित्रों की मंडली के जिम्मे दी गई। उन्हें इंदिरा गांधी के उत्तराधिकारी के रूप में कांग्रेस पार्टी ने स्वीकार कर लिया। 1982 में भारत में टेलीविजन क्रांति शुरू हुई। धारावाहिक सीरियलों का प्रसारण शुरू हुआ। ‘हमलोग’, ‘बुनियाद’, ‘रामायण’, ‘महाभारत’, ‘चाणक्य’, ‘दी सोर्ड ऑफ टीपू सुल्तान’, ‘द ग्रेट मराठा’, ‘भारत एक खोज’ जैसे सीरियलों ने भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति भारतीय मध्यवर्ग और विदेश में बसे भारतीय एवं भारतीय मूल के विदेशियों के बीच जबरदस्त आकर्षण पैदा किया। 1980 का दशक भारतीय समाज में संक्रमण का महान दशक साबित हुआ। एक ओर आतंकवाद एवं उग्रवाद तथा माफिया सरगनाओं की काली छाया करीब-करीब पूरे दशक पर मंडराती रही, तो दूसरी ओर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रचंड बहुमत मिला। 1980 से 1984 के बीच ही अपना उत्सव तथा एशियाई खेलों के क्रम में भारत का पूँजीवादी देशों से सहयोग बढ़ने लगा था; जबकि थैचर, रीगन और जर्मनी के हेलमुट कोल के नेतृत्व में सूचना एवं संचार क्रांति का पूँजीवादी देशों ने रणनीतिक सदुपयोग करके साम्यवादी देशों के युवाओं के मन में मध्यवर्गीय जीवन शैली के प्रति अपेक्षित आकर्षण जगाने की व्यवस्था कर ली॥

माओ की मृत्यु के कुछ वर्षो बाद ही चाऊ एन लाई के घनिष्ट सहयोगी देंग शियाओ पिंग का चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और चीनी सरकार पर वर्चस्व कायम हो गया। वे मार्क्स और माओ के बदले कन्फ्यूशियस और लाओत्से के विचारों से ज्यादा प्रेरित थे। उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के संगठन को कायम रखते हुए कन्फ्यूशियस की सांस्कृतिक विचारधारा और पूँजीवादी बाजार के लिए चीनी उत्पादन प्रणाली और सरकारी नीतियों को बदलकर औद्योगिक विकास का एक नया कीर्तिमान कायम किया। इसी बीच 1980 में ईरान ने रजाशाह पहलवी की पश्चिमी परस्त राजशाही को अपदस्थ करके इस्लामी क्रांति कर दी। जल्द ही अयातुल्लाह खुमैनी मुसलमानों के सबसे प्रतिष्ठित नेता हो गए। उन्होंने जेहाद के द्वारा इस्लामी मूल्यों के प्रचार के नाम पर इस्लामी आतंकवाद को सहयोग एवं संरक्षण देना शुरू किया। शुरू-शुरू में इराक के सद्दाम हुसैन के खिलाफ शिया उग्रवादियों को संरक्षण दिया गया। इसी बीच अफगानी जहीरशाह का तख्त सोवियत संघ के सहयोग से अफगानी साम्यवादियों ने पलट दिया। सोवियत समर्थक अफगानी सरकार के खिलाफ अमेरिका ने अफगानी मुजाहिदीनों की मदद शुरू की। जिससे आगे चलकर अलकायदा और बिन लादेन का आतंकवादी नेटवर्क फैला। इसी बीच पोलैंड में जन्मे पोप जॉन पॉल ने पोलैंड समेत पूर्वी यूरोप में ईसाई मत का प्रचार एवं साम्यवाद के विरोध को सहयोग, समर्थन एवं संरक्षण देना शुरू किया। 1989 तक आते-आते पूर्वी जर्मनी ने साम्यवादी नीति छोड़कर पूँजीवादी पश्चिमी जर्मनी में अपना विलय कर लिया। जल्द ही गोर्वाचोव की नीतियों और येल्तसिन के प्रयासों से सोवियत संघ बिखर गया। एशिया के इस्लामी बहुल नए राज्यों को ईरान जैसे इस्लामिक केन्द्रों का सहयोग मिलने लगा। कुल मिलाकर 1991 में जब नरसिंह राव के सरकार ने भारत को उदारीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया से जोड़ा, तो अल्पमत में होने के बावजुद उनको किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा का विरोध नहीं सहना पड़ा। 1989 तक आते आते भारतीय जनता पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की आर्थिक नीतियों में ज्यादा फर्क नहीं रह गया था। 1989 में राजीव गांधी बोफोर्स दलाली के मुद्दे पर चुनाव हार चुके थे। 1980 से 1989 तक के कांग्रेसी शासन में पिछड़ी जाति के दबंग नेताओं का भारत की राजनीति में दबदबा कायम हो चुका था। 1989 से 1996 के बीच पिछड़ी जाति के लोगों ने अनुसूचित जातियों की तरह अपने लिए भी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण की मांग को नये वोट बैंक की राजनीति के तहत स्वीकृत करवाया। इसके विरोध में ‘राम जन्मभूमि आंदोलन’, ‘दलित आंदोलन’ और वैश्वीकरण के तहत ‘पूँजीवादी विकास’ का संगठित प्रयोग चला। 1995 में पहली बार मायावती भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी। 2007 के मई महीने में मायावती के नेतृत्त्व में बहुजन समाज पार्टी को अकेले पूर्ण बहुमत मिल गया। मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं। पहले तीन बार मुख्यमंत्री बनने का मौका भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से मिला था। चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्होंने उत्तर प्रदेश के दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम गठजोड़ का प्रयास किया। कभी इसी तरह के गठजोड़ से कांग्रेस पार्टी पूरे देश पर शासन करती थी।

1985 में ‘रामजन्म भूमि का आंदोलन’ शुरू हुआ था। 1985 में ही शाहबानो प्रकरण पर कांग्रेस की सरकार पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगा था। 1985 से कांग्रेस का वोट बैंक धीरे-धीरे भारतीय जनता पार्टी की ओर खिसकना शुरू हुआ। दलित वोट बहुजन समाज पार्टी की ओर जाना शुरू हुआ। मुस्लिम वोट हमेशा भाजपा विरोधी सबसे महत्त्पूर्ण उम्मीदवार को मिलता रहा। इसका लाभ बिहार में लालू प्रसाद यादव को और यू.पी. में मुलायम सिंह यादव की पार्टी को मिलता रहा। 1990 के दशक में बहुजन समाज पार्टी ने भी मुस्लिम वोटों का कुछ प्रतिशत पाना शुरू किया। रामजन्मभूमि के चरमकाल (1990-1998) में पिछड़ी जाति और मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण सामने आया, जिसके परिणामस्वरूप दलितों और सवर्णों खासकर ब्राह्मणों-बनियों के बीच रणनीतिक सहयोग चाहे-अनचाहे बढ़ता गया। इस दौरान राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने भी बाबा साहब अम्बेडकर को सामाजिक समरसता के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित करना शुरू किया। इसी बीच एडमंड वेबर जैसे जर्मन समाजशास्त्री ने बाबा साहब अम्बेडकर का एक नया समाजशास्त्रीय मूल्यांकन रखा। एडमंड वेबर ने यह स्थापित किया कि बौद्ध धर्म में धर्मांन्तरित होकर बाबा साहेब ने ईसाई मिशन की योजनाओं पर पानी फेर दिया। यदि बाबा साहब अपने अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म में धर्मांतरित नहीं हुए होते तो उनके अधिकांश अनुयायी ईसाई धर्म में धर्मांतरित हो चुके होते। इस निष्कर्ष में यूँ तो चौंकाने वाली कोई बात न थी, क्योंकि खुद बाबा साहब ने इसे कई बार कहा है कि उनके हिन्दू जाति व्यवस्था और छुआछूत की प्रथा के लगातार विरोध करने के कारण उनको ईसाई और मुसलमान बनाने का कई बार प्रयास किया गया था; लेकिन ईसा मसीह के पश्चिमी अनुयायियों और भारतीय अनुयायियों में कई महत्वपूर्ण अंतर देखने में आया। एक तो यह कि अछूत जाति के जिन लोगों ने ईसाई धर्म स्वीकारा उनको ईसाई धर्म के अभिजात वर्ग ने बराबरी का दर्जा नहीं दिया, बल्कि धर्म परिवर्तन के बाद भी उनको अछूत जाति के अभिशाप से मुक्ति नहीं मिली। दूसरे, वे बचपन से महात्मा कबीर और गौतम बुद्ध की शिक्षाओं से प्रभावित थे। ज्योतिबा फूले के व्यक्तित्व एवं शिक्षाओं का भी उन पर प्रभाव था। वे जाति पर आधारित असमानता को हिन्दू धर्म से मिटाने की स्थिति में नहीं थे, परंतु वे भारतीय संस्कृति और परंपरा को भी छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने लंबे समय तक महाराष्ट्र के दलित समुदाय को हिन्दू मंदिरों में प्रवेश दिलाने के लिए संघर्ष का नेतृत्त्व किया था और वे जानते थे कि उनके अनुयायी इतनी जलालत और अपमान सहने के बावजुद भी मध्यकाल के मुस्लिम शासन के दौरान अपनी जातीय पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता कायम रखने का जद्दोजहद करते रहे। अंग्रेजी शासन काल में भी वे सवर्ण हिन्दूओं की तरह मंदिर में प्रवेश और छुआछूत के अपमान से मुक्ति चाहते थे। उन्होंने यह भी लिखा है कि ईसाई मिशन के लोग भोले-भाले लोगों को बहला-फुसलाकर धर्मांतरित करते हैं, जो यूरोप की महान ईसाई परंपरा में भी गलत माना जाता है। इस्लाम के बारे में उनकी धारणा कुछ और नकारात्मक थी। वे पाकिस्तान की अवधारणा के खिलाफ थे। शुरू में उन्होंने मुस्लमानों के पृथक निर्वाचन मंडल का विरोध किया था। उनका कहना था कि ”अल्पसंख्यक विस्फोटक तत्त्व होते हैं, अगर वे किसी दिन फट पड़े तो सरकार की धज्जियाँ उड़ा सकते हैं।” परंतु जब कांग्रेस पार्टी ने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की बात मान लिया तब उन्होंने भी 1932 में अन्य अल्पसंख्यकों के साथ दलित वर्ग के लिए भी सांप्रदायिक पंचाट (कम्युनल एवार्ड) के तहत पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की। उन्होंने कहा ”हमने पृथक निर्वाचन मंडल की मांग करके, हिन्दू समाज का अहित नहीं सोचा है। हमने ये रास्ता इसलिए अपनाया है ताकि अपना भाग्य निर्धारित करने में हमें सवर्ण हिन्दुओं की कृपा पर निर्भर न रहना पड़े।” महात्मा गांधी इस मांग से तिलमिला उठे। उन्होंने आमरण अनशन कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें अछूत जातियों (जिन्हे वे हरिजन और अम्बेडकर दलित कहते थे) के लिए अलग निर्वाचन मंडल कतई स्वीकार नहीं है। उनके मरने के बाद ही यह स्वीकृत हो सकता है। हरिजन समुदाय के लोग सदियों से हिन्दू समाज के अंग हैं और समाज से कट कर उनका कोई भला नहीं होगा। देश को स्वाधीनता मिले या न मिले लेकिन अछूतों के लिए अन्य सम्प्रदाय के रूप में अलग निर्वाचन मंडल उन्हें किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। गांधी के जिद के आगे अम्बेडकर को झुकना पड़ा और पूना संधि (1932) के बाद अम्बेडकर ने अपनी मांग छोड़ दी। इस तरह, एडमंड वेबर की बात ने पुरानी बातों को मात्र एक नई प्रासंगिकता दी। लेकिन अपने लेखों में उन्होंने नई बात यह कहा कि अम्बेडकर जानते थे कि हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म में मौलिक एकता है। जन्मना वर्ण व्यवस्था को नहीं मानने के अलावे महात्मा बुद्ध ने सनातन हिन्दू धर्म की अधिकांश मान्यताओं को मान लिया था और साथ ही साथ काल बाह्य हो गई कुछ मान्यताओं का भी युगानुकुल किया था। एडमंड वेबर ने सन् 2000 में ‘अम्बेडकर स्मृति व्याख्यान’, जवहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में दिया। उन्होंने अपने उपर्युक्त निष्कर्षो को तुलनात्मक उद्धरण देकर साबित करना चाहा। इससे प्रारंभ में विवाद उत्पन्न हुआ। पहली बार बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म का तुलनात्मक अध्ययन समाज विज्ञानियों में गहरी अन्वेषण की चीज़ नजर आई। अभी तक यह मिथक फैला हुआ था कि बौद्ध धर्म, जैन धर्म, सिख धर्म आदि हिन्दू धर्म के खिलाफ एक प्रकार के क्रांतिकारी आंदोलन थे, जिसमें हिन्दू धर्म की मूल स्थापनाओं को पूरी तरह नकारने की कोशिश हुई थी। स्वतंत्रतापूर्व बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म का विवाद उपनिवेशवादी शासकों और मिशनरी विद्वानों ने बढ़ाया था। मार्क्सवादी विद्वानों ने भी भ्रम फैलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

कलागुरु आनंद केंटिश कुमारस्वामी के अनुयायियों ने दलाईलामा द्वारा सारनाथ में स्थापित ‘तिब्बतन हायर रिसर्च इन्सटीच्युट’ के सहयोग से तिब्बतीमूल में उपलब्ध्द सामग्री के भारत में अनुवाद, प्रकाशन, संपादन के कार्यों में सहयोग शुरू किया। जापानी विद्वानों ने भी अपनी ओर से हिन्दू-बौद्ध-चीनी परंपराओं का मूल दस्तावेजों के आधार पर अध्ययन शुरू किया। सुजुकी और हाजिमे नाकामुरा के प्रभाव में कुमारस्वामी के युगांतकारी कार्य को और बल मिला। भरत सिंह उपाध्याय ने भी अपनी गवेषना में इस कार्य को आगे बढ़ाया। रामस्वरूप और उनके सहयोगियों ने भी हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म के बारे में प्रचलित कई गलत धारणाओं का निराकरण किया। इसी बीच महाबोधि सोसाइटी और अन्य बौद्ध संगठनों के सम्मिलित प्रभाव में बौद्ध धर्म आकर्षक विकल्प के रूप में विश्वग्राम में प्रस्तुत किया, जिससे प्रारंभ में तीन प्रतीक पुरूषों पर लोगों लोगों का ध्यान केन्द्रित हुआ – ओशो रजनीश, दलाई लामा और बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर। बहुजन समाज पार्टी के उत्थान और मार्क्सवाद के पतन के बाद, पश्चिमी लोकतंत्र और आधुनिक औद्योगिक विकास को स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व की फ्रांसीसी क्रांति के समय से प्रचलित नारे को बुद्ध, कबीर और फुले के विचार से जोड़ने वाले दलित मूल के बौद्ध सिद्धांतकार के रूप में, बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की अहमियत ओशो रजनीश और दलाई लामा की तुलना में लगातार बढ़ती गई। अंतत: उन्हें महात्मा गांधी के बाद भारत का सबसे प्रमुख सामाजिक विचारक मान लिया गया। वे आज समाजशास्त्र में वंचित समूहों के दृष्टिकोण के सबसे समर्थ और सबसे ज्यादा स्वीकृत सिद्धांतकार माने जाते हैं।

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