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डा. बी. आर. अंबेडकर का बौद्ध धर्म के विकास में सैद्धांतिक योगदान

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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2011

डा. बी. आर. अंबेडकर का बौद्ध धर्म के विकास में सैद्धांतिक योगदान

डा. अंबेडकर के धार्मिक विचारों को समझने की दृष्टि से उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं – ‘रिडल्स इन हिंदूइज्म’ एवं ‘द बुद्ध एंड हिज़ धम्म’। प्रथम पुस्तक में उन्होंने हिंदू समाज व्यवस्था के सामाजिक एवं धार्मिक अंतर्विरोधों की चर्चा की है। जबकि दूसरी पुस्तक में गौतम बुद्ध के द्वारा प्रतिपादित बौद्ध धर्म की व्याख्या की है। उन्होंने गौतम बुद्ध की पालि भाषा में दिए उपदेशों का युगानुकुल भाष्य करने के क्रम में इसे धर्म की जगह धम्म कहने पर जोर दिया है।

भगवान बुद्ध के उपदेश में ”अपना दीपक खुद बनने” (“अप्प दीपो भव”) पर जोर है। भगवान बुद्ध की धम्म में दूसरे की कही, देखी और लिखी बातों पर आस्था या विश्वास की जगह ”आत्मानुभूति और आत्मसाक्षात्कार” पर जोर है। जब आत्मानुभूति और आत्मसाक्षात्कार होता है, तब करुणा, शील और प्रज्ञा की उत्पत्ति होती है। पारंपरिक बौद्ध धर्म आगे चलकर दो महत्वपूर्ण संप्रदायों में विभाजित हो गया था। थेरवाद संप्रदाय (जिसके अनुयायी श्रीलंका, बर्मा और थाइलैंड जैसे देशों में ज्यादा हैं) का आग्रह आत्मसाक्षात्कार (अपने दीपक खुद बनने की प्रक्रिया) के बाद व्यक्तिगत निर्वाण (या मुक्ति) पाने पर ज्यादा जोर रहा है। यह बौद्ध धम्म का पारंपरिक और ज्यादा लोकप्रिय संप्रदाय रहा है। दूसरी ओर महायान संप्रदाय के लोग (जिसके अनुयायी तिब्बत और जापान तथा पश्चिम के कुछ देशों में पाए जाते हैं) आत्मसाक्षात्कार के बाद व्यक्तिगत निर्वाण प्राप्त करने की बजाय सामूहिक निर्वाण प्राप्त करने की करुणावश सुकर्म करने पर ज्यादा जोर देते हैं। महायान संप्रदाय के संस्थापक आचार्य नागार्जुन एवं असंग माने जाते हैं, जबकि थेरवाद संप्रदाय के सबसे प्रमुख आचार्य महात्मा बुद्ध, भिक्षु आनंद, महाकश्यप और मोग्गलिपुत्त तिस्स माने जाते हैं।

आधुनिक भारत में बौद्ध धर्म के विकास में महाबोधी सोसाइटी ऑफ श्रीलंका के संस्थापक अनागरिक धर्मपाल की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में वे थेरवाद संप्रदाय के सबसे प्रमुख संगठक और नेता साबित हुए। उनके प्रयासों से पहले लद्दाख, सिक्किम और हिमालय की तराई में बौद्ध धर्म के अनुयायी रहते थे, लेकिन बिहार, नेपाल, पूर्वी उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के बौद्ध मंदिरों, विहारों, स्तुपों के प्रति स्थानीय समुदाय का उदासीन भाव था। फलस्वरूप, अन्य देशों के बौद्ध पर्यटकों को कई प्रकार की असुविधा होती थी। 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में श्रीलंकाई पिता और अंग्रेज मां के बेटे आनंद केंटिश कुमारस्वामी ने बौद्ध एवं हिंदू कला के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से हिंदू धर्म एवं बौद्ध धर्म के बीच सभ्यतामूलक एकता को रेखांकित किया। 1956 में अपनी मृत्यु से पूर्व डा. अंबेडकर अपने अनुयायियों के साथ सामूहिक रूप से बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए, तब उनके धर्मोपदेशक आचार्य थेरवाद संप्रदाय एवं बर्माई मूल के एक भंते थे। अत: वे महाबोधी सोसाइटी ऑफ श्रीलंका से जुड़ गए। अपने लंबे सामाजिक जीवन में वे लगातार महात्मा बुद्ध और संत कबीर की रचनाओं का हिंदू धर्म की समालोचना करने में इस्तेमाल करते रहे थे। संत कबीरदास चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी के बीच भारत में निर्गुण भक्ति के सबसे प्रमुख आचार्य हुए हैं, जिनका मराठी ज्ञानोदय की संत परंपरा में तुकाराम और नामदेव पर निर्णायक प्रभाव माना जाता है। पंजाब के महान गुरु नानक पर भी कबीरदास का महत्वपूर्ण प्रभाव था। कबीरदास पर बौद्ध तंत्रागम से प्रभावित सिद्धों एवं नाथों के महान आचार्य गुरु गोरखनाथ का प्रभाव था। बाद में वे उत्तर भारत के महान वैष्णव आचार्य रामानंद से भी प्रभावित हुए। 15वीं शताब्दी से कबीरपंथ एक स्वतंत्र संप्रदाय के रूप में विकसित हुआ। डा. अंबेडकर का परिवार एक कबीरपंथी परिवार था। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम का जन्म एक नानकपंथी सिख परिवार में हुआ था। डा. अंबेडकर के ज्यादातर उत्तर भारतीय अनुयायियों का परिवार ज्यादातर महान भक्त संतो के पंथ, मठ या आश्रम से संबंधित रहा है। कबीर, तुकाराम, नामदेव, नानक, रविदास (रैदास), दादू, ताना आदि गैर-ब्राह्मण संतो के सवर्ण अनुयायियों की संख्या भी कम नहीं रही है। भारत में भक्ति संप्रदाय का जन्म पहले दक्षिण भारत में हुआ। लेकिन दक्षिण भारत के भक्तों का सीधे-सीधे उत्तर भारत पर प्रभाव नहीं हो गया। ईसा-पूर्व छठी शताब्दी से 12वीं शताब्दी तक उत्तर भारत में बौद्ध धर्म का नियंत्रण नालंदा के महान गुरुकुल और बौद्ध विहार से होता था। 13वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी ने नालंदा के गुरुकुल (बौद्ध विश्वविद्यालय) और बौद्ध विहार को नष्ट कर दिया। कुछ बौद्ध भिक्षु तिब्बत और अन्य स्थानों पर चले गए। अन्य लोग देश के विभिन्न भागों में सिद्ध और नाथ योगी के रूप में बिखर गए। 14वीं शताब्दी में उत्तर भारत के भक्ति संप्रदाय के विकास में इन सिद्धों और नाथ योगियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन एक स्वतंत्र धर्म के रूप में बौद्ध धर्म की सांस्कृतिक अस्मिता और राजनैतिक संगठन 19वीं शताब्दी के अंत में अनागरिक धर्मपाल के भारत आने और महाबोधी सोसाइटी के निर्माण (1891) के बाद ही हो पाया।
डा. अंबेडकर और उनके अनुयायियों के धर्म परिवर्तन (1956) के बाद भारत में बौद्ध धर्म का नवोदय शुरू होता है। डा. अंबेडकर ने भारत में बौद्ध धर्म को दलितों के संस्कृतिकरण के वैकल्पिक मॉडेल के रूप में तो विकसित किया ही, इसे गृहस्थ धर्म के रूप में युगानुकूलित भी किया। भगवान बुद्ध ने खुद भिक्षुओं के लिए और गृहस्थों के लिए अलग-अलग धर्मों का उपदेश किया था। अनागरिक धर्मपाल ने थेरवाद परंपरा के भिक्षुओं को संगठित करने के क्रम में भिक्षु धर्म को ही बौद्ध धर्म के रूप में प्रतिष्ठित किया था। यूरोप के प्राच्यविदों के प्रभाव में ज्यादातर जापानी एवं अन्य बौद्ध विद्वानों ने भी बौद्ध धर्म के टेक्स्टुअल (धार्मिक साहित्य एवं पाठों) स्त्रोतों के आधार पर जो बौद्ध विमर्श प्रस्तुत किया; उसमें भी भिक्षु धर्म की आध्यात्मिक साधना और आत्मसाक्षात्कार एवं निर्वाण प्राप्ति की यौगिक एवं तांत्रिक क्रियाओं पर ही ज्यादा जोर था। कुल मिलाकर 1956 तक के बौद्ध विमर्श में शास्त्र पक्ष एवं भिक्षु धर्म पर जोर था। कुमारस्वामी ने बौद्ध कला को दुनिया के सामने रखा। लेकिन बौद्ध धर्म के लोकपक्ष एवं गृहस्थ धर्म को दुनिया के सामने समकालीन परिप्रेक्ष्य में रखने वाले डा. अंबेडकर पहले व्यक्ति हुए। इसी प्रक्रिया में उन्होंने थेरवाद परम्परा के लोकपक्ष को महायान बौद्ध धर्म के सामूहिक निर्वाण वाले आध्यात्मिक पक्ष के साथ जोड़कर, व्यक्तिगत निर्वाण के थेरवाद भिक्षु धर्म को अपने बौद्ध विमर्श में गौण स्थान दिया। बौद्ध तत्व मीमांसा के इतिहास में यह एक महान धर्मसुधार आंदोलन का सूत्रपात था। जिसकी तुलना काल्विन द्वारा शुरू किए गए ईसाई धर्म के प्रोटेस्टैंट ईसाई नैतिकता (इथिक) से की जा सकती है जिसने पूँजीवादी कार्य संस्कृति के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी; उसी तरह डा. अंबेडकर के बौद्ध नैतिकता वाले लोक धर्म ने भारत के दलित समुदाय के बीच राजनीतिक कार्य संस्कृति विकसित कर गैर-उपनिवेशवादी प्रजातंत्रीय व्यवस्था को संपुष्ट करने में निर्णायक भूमिका निभाई।

डा. अंबेडकर के विचार में स्वविवेक एवं बहुजन के हित और बहुजन के सुख को बढ़ाने वाला सामाजिक कर्म बौद्ध धर्म की सबसे प्रमुख नीति है। बौद्ध धर्म की नैतिक व्यवस्था के केन्द्र में आत्म-प्रकाश से भरा हुआ स्वतंत्र व्यक्ति है, जो समाज के सभी सदस्यों को समान समझता है तथा उनके प्रति भ्रातृत्व या बंधुत्व की भावना रखता हो। इस धर्म में जन्म पर आधारित जाति या छुआछूत के लिए कोई स्थान नहीं है। जो धर्म मनुष्य-मनुष्य में भेद करे और दूसरे समुदाय के लोगों को चाहे किसी भी आधार पर तुच्छ समझे, वह धर्म हो ही नहीं सकता। डा. अंबेडकर के अनुसार बौद्ध धर्म सम्पूर्ण मानवता का धर्म है। ‘धम्म’ के अनुसार सभी मनुष्य समान हैं। सत्य, अहिंसा, करुणा और दया बौद्ध धर्म की पारिभाषिक विशेषता हैं। बौद्ध धर्म भारत देश की परंपरा और संस्कृति का अभिन्न अंग है, लेकिन हिंदू धर्म की भाँति इसमें असमानता एवं छुआछूत जैसी भावना या शोषण और उत्पीड़न को धार्मिक मान्यता नहीं है।

डा. अंबेडकर एक ऐसे धर्म की खोज में थे, जो किसी वर्ग-विशेष का नहीं बल्कि सारी मानवता का धर्म हो सके। साम्यवादी दृष्टिकोण को डा. अंबेडकर एक खतरा मानते थे। उनकी दृष्टि में सामाजिक व्यवस्था के संतुलन के लिए धर्म एक सामाजिक आवश्यकता है। साम्यवादी व्यवस्था की भौतिकता के प्रति अति आग्रह और वर्ग संघर्ष में हिंसा की वकालत उन्हें मानवता के लिए अभिशाप लगती थी। उनके अनुसार बौद्ध धर्म ही एक ऐसा धर्म है, जो साम्यवाद का विकल्प हो सकता है। अगर कोई दर्शन कार्ल मार्क्स का सम्पूर्ण उत्तर दे सकता है, तब वह बौद्ध धर्म ही है। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि बौद्ध धर्म, ईसाई मत वालों के लिए मान्य हो सकता है। क्योंकि ईसाई मत की 90 प्रतिशत मान्यताएँ बौद्ध-मान्यताओं के अनुरूप है। जेलियट जैसे विद्वानों ने तो साफ कहा है कि ”अंबेडकर की नव धर्म दीक्षा, मार्क्सवाद के विरूद्ध की गई मोर्चा बंदी है।” जबकि एडमंड वेबर के अनुसार यह ईसाई धर्म परिर्वतन की संभावना को अछूतों के बीच नहीं पनपने देने की डा. अंबेडकर की दूरदर्शी नीति थी।

जो भी हो, आज डा. अंबेडकर वंचित समूह के सबसे प्रमुख सिद्धांतकार बन चुके हैं। आज महात्मा गांधी और डा. अंबेडकर भारतीय सभ्यतामूलक विमर्श के समकालीन सिद्धांतकार हैं। महात्मा गांधी का विमर्श भारतीय समाज के बहुसंख्यक हिंदूओं के दृष्टिकोण की सभ्यतामूलक अभिव्यक्ति है तथा डा. अंबेडकर का विमर्श भारतीय समाज के अल्पसंख्यक बौद्ध की दृष्टिकोण की सभ्यतामूलक अभिव्यक्ति है। वे एक अन्य अर्थ में दलित समुदाय के सबल्टर्न दृष्टिकोण के भी प्रवक्ता रहे हैं। वे पश्चिमी लिब्रल डेमोक्रेसी और गैर साम्यवादी व्यवस्था के नेहरू युग में गिने-चुने प्रवक्ताओं के रूप में भी तत्कालीन विकास चर्चा में गौण धारा (सबल्टर्न का एक अर्थ वंचित समूह है तो दूसरा अर्थ गौण धारा भी है) के प्रतिनिधि थे।

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