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भारतीय परंपरा के समकालीन प्रवक्ता

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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल-2011

भारतीय परंपरा के समकालीन प्रवक्ता

हिन्द स्वराज में महात्मा गांधी ने समकालीन भारत की सनातन परंपरा को अभिव्यक्त किया है। सनातन परंपरा का विस्तृत परिचय माधवाचार्य की पुस्तक सर्वदर्शन संग्रह: या भरतसिंह उपाध्याय की पुस्तक बौद्धदर्शन तथा अन्य भारतीय दर्शन पढ़ने से हो सकता है। इस अध्याय को पढ़ते-पढ़ते भी इसकी कुछ झलक मिल जायेगी।

पारंपरिक (सनातन) जीवन दृष्टि के अनुसार इस सृष्टि में उपलब्ध हर अस्तित्ववान पदार्थ एक ही ब्रह्म का विस्तार है। पूरा का पूरा जगत् एवं संसार ब्रह्म के शरीर का विस्तार ही है। ब्रह्म की तरह यह जगत् और संसार भी शाश्वत है। सनातन है। पूरब और पश्चिम की सभ्यता उसी शाश्वत संसार की अभिव्यक्ति है। जगत् प्रकृति अथवा ‘नेचर’ है, संसार संस्कृति अथवा ‘कल्चर’ है। इस दृष्टि से ईसा, मूसा और मुहम्मद उसी ब्रह्म की अभिव्यक्ति थे, जैसे- राम, कृष्ण और बुद्ध अभिव्यक्ति थे। सांप्रदायिक भेद तो इन सबों में है या था, परंतु तात्विक भेद तो नहीं है। सनातनी दृष्टि से पश्चिम को असत्य या अशिव तो नहीं कहा जा सकता है, केवल अधूरा कहा जा सकता है। समकालीन पश्चिमी समाज ईसाई, आधुनिक एवं उत्तर-आधुनिक के साथ-साथ पैगन के रूप में कई संप्रदायों में बँटा है और उसके पास सबों को समाहित करने वाली बहु-सांस्कृतिक सभ्यतामूलक दृष्टि नहीं है। साथ ही, पश्चिम खुद को पूरब के घोर विरोधी / दूसरे ध्रुव के रूप में परिभाषित करता रहा है, न कि पूरक इकाई के रूप में। इस पारंपरिक दृष्टि से देखने पर गांधी और कुमारस्वामी अधूरे सनातनी तो कहे जा सकते हैं, चूँकि वे केवल ईसाई परंपरा को भारतीय, इस्लामिक या ग्रीक परंपरा के साथ समाहित कर पाते हैं, परंतु इन्हें ईसाई कहना या अभारतीय कहना तो गलत होगा। भारतीय संदर्भ में देखें तो, अधिकांश ईसाई या मुसलमान भी सामान्यत: सनातनी जीवन जीते हैं, भले हीं सनातनी जीवन दृष्टि नहीं रखते। जबकि भारत के अन्य संप्रदाय अब भी सनातनी जीवन के साथ सनातनी दृष्टि भी रखते हैं। कुमारस्वामी एवं गांधी इस अर्थ में सनातनी दृष्टि वाले हैं कि उन्हें लगता है कि एक ही सत्य की अभिव्यक्ति कई परंपराओं में हुई है। परंतु इनकी सीमा यह है कि ये लोग आधुनिक यूरोप को शैतान की रचना मानकर विरोध करते हैं, ये पारंपरिक और आधुनिक दृष्टि के बीच समन्वय नहीं कर पाते। यह एक प्रकार की ईसाई दृष्टि कही जा सकती है। यह दृष्टि एक प्रकार की असहिष्णुता का उदाहरण है कि सत्य केवल ईश्वर द्वारा चुने हुए आस्तिक (ईसाई) समुदाय के पास है। ‘अधर्म’ की अवधारणा और ‘शैतान की रचना’ दोनों अलग-अलग प्रकार की अवधारणायें हैं। अधर्म व्यक्ति करता है। सभ्यता अधार्मिक हो ही नहीं सकती। संसार शैतान का साम्राज्य हो ही नहीं सकता। परंतु रावण की लंका भी सेमेटिक अर्थों में शैतानी साम्राज्य नहीं था। राम की अयोध्या और जनक की मिथिला और रावण की लंका में संप्रदाय भेद तो है, परंतु तत्व भेद नहीं है। यु्द्ध अपने आप में अधार्मिक नहीं होते। कुछ यु्द्ध अधार्मिक कारणों से लड़े जा सकते हैं, परंतु यु्द्ध अपने आप में ईश्वरीय लीला का ही अंग है। यु्द्ध भी संवाद का, समन्वय का एक ऐतिहासिक रूप रहा है। प्रारब्ध और कर्म के सिध्दान्त से यु्द्ध के आध्यात्मिक या दैवीय रूप को भी समझा जा सकता है।

अत: आधुनिक पश्चिम के सुप्त दैवीय उद्देश्यों/स्वरूप को नहीं समझ पाना गांधी और कुमारस्वामी की सीमा तो है, परंतु मात्र इसी कारण उन्हें अभारतीय तो नहीं कहा जा सकता। उसी तरह, ईसाई यूरोप को या बौद्ध श्रीलंका को सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाना विवेकानन्द की सीमा तो हो सकती है, परंतु इसी आधार पर उन्हें आधुनिक यूरोप से जोड़कर अभारतीय तो नहीं कहा जा सकता। परंपरा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को सम्पूर्णता में समझने का एक पैराडाइम (दृष्टि) है। भारतीय परंपरा सनातन धर्म के पैगन संस्करण का ही एक जीवंत रूप है। गांधी में पैगनिज्म का सुपरिचित उदाहरण देखा जा सकता है। रामकृष्ण में इसका ज्यादा सरल एवं पारंपरिक उदाहरण देखा जा सकता है। गांधी में निवृत्तिमार्ग है, व्यक्तिगत विमुक्ति के लिए एकल साधाना है। रामकृष्ण में कुल मिलाकर प्रवृत्तिमार्ग है। सामूहिक विमुक्ति का मूलमंत्र है।

विवेकानन्द का दर्शन उपरि तौर पर आधुनिक/उत्तर आधुनिक किस्म का दर्शन है, जिसका आधार यह मान्यता है कि पुनर्जागरण एवं ज्ञानोदय के बाद यूरोप या पश्चिमी सभ्यता का मूलाधार मूलत: प्राचीन रोम एवं प्राचीन यूनान का पैगन धर्म है, न कि मध्यकालीन यूरोप की ईसाई परंपरा। विवेकानंदजी का दर्शन मूलत: आधुनिक विज्ञान, तकनीक एवं बाजार प्रेरित परिवर्तनों को स्वीकार करने का, इसको दैवीय योजना के अनुसार उत्पन्न उत्पाद के रूप में स्वीकार करने का नैतिक निर्णय है। यह इस विश्वास पर आधारित है कि ”अन्तत: जो हो रहा है, वह ईश्वर की इच्छा से ही हो रहा है।” शैतान (डेविल) इतना शक्तिशाली नहीं हो सकता कि ईश्वर की इच्छा या डिजाइन या लीला को दैवीय उद्देश्यों से भटका दे। एक तो सामी (सेमेटिक) अर्थों वाला शैतान भारतीय दृष्टि में होता नहीं। भारत में अगर शैतान होता भी है तो, वह ईश्वर की योजना का ही अंग होता है। सहायक होता है। शिव पुराण में भूत-प्रेत-राक्षस ईश्वर के विरोधी नहीं, भक्त हैं। वे भी दैवीय शक्ति के ही रक्षक हैं। भूत-प्रेत-राक्षस भी दैवीय शक्ति से ही उत्पन्न होते है। वे भी ईश्वर की रचना हैं। उनके ही भक्त हैं। उनकी लीला के ही पात्र हैं। उनकी भूमिका भी इस लीला में सहयोग करने वाली है। जबकि पश्चिमी मान्यता के अनुसार ईश्वर और शैतान दोनों का दो अलग-अलग स्वायत्त साम्राज्य होता है।

यहाँ हमें दो प्रकार के विमर्शों में अंतर करना आवश्यक होगा। एक है सत्तामूलक विमर्श एवं दूसरा है सभ्यतामूलक विमर्श। विष्णु सत्ता के प्रतीक पुरूष हैं। विष्णु पुराण राज्य केन्द्रित विमर्श है। शिव पुराण सभ्यतामूलक विमर्श है। महात्मा गांधी द्वारा रचित हिन्द स्वराज तो सभ्यतामूलक विमर्श है, लेकिन अपने अन्तिम अर्थों में स्वतंत्रता आन्दोलन के नायक के रूप में महात्मा गांधी का विमर्श राज्यकेन्द्रित विमर्श है। यह विमर्श भारत में अंग्रेजी राज और इससे जुड़ी प्रक्रियाओं को सम्बोधित था। यह राज्य के स्वरूप को रूपांतरित करने का प्रयास था। बहुत कुछ वैसा ही, जैसा विश्वामित्र ने वैदिक युग में किया था। जिससे इन्द्र का सिंहासन डोलता था। इन्द्र राज्य के प्रतीक पुरुष हैं। इन्द्र वैदिक देवता हैं। वे कृत युग में देवताओं के राजा हैं। विष्णु मूलत: त्रेता + द्वापर के देवता हैं। वे राजा हैं। राज्य के प्रतीक पुरुष हैं, वे सत्ता के प्रतीक पुरुष हैं। कलियुग में वैष्णव धर्म का रूपान्तरण होता है। विष्णु एवं इनके अवतारों को प्रजातांत्रिक भक्ति का, लोक या सिविल सोसाइटी का, प्रजा का प्रतीक पुरुष बनाया जाता है। विष्णु अवतार मूलत: राज्यमूलक होते हैं। महाभारत के कृष्ण (गीता के कृष्ण) राज्यमूलक विमर्श के प्रतीक पुरुष हैं। परंतु श्रीमद्भागवत के कृष्ण लोकमूलक हैं।

महात्मा गांधी ने गीता को अपनी प्रिय पुस्तक के रूप में अकारण वरण नहीं किया था। गीता भी मूलत: एक राज्यमूलक विमर्श ही है। जबकि बाइबिल में वर्णित ‘सर्मन ऑन द माउण्ट’ लोकमूलक है। यह राज्यमूलक नहीं है। परंतु पोप द्वारा मान्यता प्राप्त आधिकारिक ‘बाइबिल’ या ‘न्यू टेस्टामेंट’ राज्य मूलक विमर्श बन गया है। लूथर का प्रोटेस्टैंट धर्म भी अन्तत: राज्यमूलक था। काल्विन का प्रोटेस्टैंट धर्म अवश्य लोक-मूलक रहा है। काल्विन को इस अर्थ में आधुनिकता का मुख्य पुरोहित कह सकते हैं। विलियम जेम्स जैसे आधुनिकतावादी तो बहुत बाद में आते हैं। इसके विपरीत हीगल का दर्शन राज्यमूलक था। दार्शनिक के रूप में डेकार्ट, लॉक या कान्ट राज्यमूलक नहीं, सभ्यतामूलक थे या लोकमूलक थे। उत्कृष्ट साधाना केवल लोकमूलक नहीं होती, राज्यमूलक भी हो सकती है। मार्क्सवादी भी गांधी की तरह राज्यकेन्द्रित विमर्श करते रहे हैं।
राज्य = सत्ता = सत्ता केन्द्रित।
मार्क्स के चिन्तन के केन्द्र में सत्ता है। गांधी के चिन्तन के केन्द्र में भी सत्ता = स्वराज है। राज और राज्य में संरचनात्मक अन्तर होने के बाद भी तात्विक रूप दोनो सत्ताकामी ही होते हैं। हिन्द स्वराज के गांधीवादी विमर्श में ब्रिटिश राज की तुलना में आम भारतीयों के स्व (आत्मा) के राज का विमर्श है। नागरिकता का विमर्श राज्य केन्द्रित भी हो सकता है और लोक केन्द्रित भी। सत्ता के केन्द्र का विकेन्द्रीकरण करने वाला विमर्श विकसित करना हिन्द स्वराज का लक्ष्य था।

महात्मा गांधी के व्यक्तित्व में सत्तामूलक एवं सभ्यतामूलक दोनों प्रकार के विमर्शों का समन्वय देखा जा सकता है। गांधीजी में एक लोक या सभ्यतामूलक पक्ष था, उसके प्रतिनिधि विनोबा थे। गांधी में एक राज्य या सत्ता पक्ष भी था, उसके प्रतिनिधि नेहरू और लोहिया थे। समकालीन संदर्भ में महात्मा गांधी एवं स्वामी विवेकानंद के अनुयायियों के बीच आधुनिक पश्चिमी सभ्यता, खगोलीकरण एवं ईसाइयत के साथ हिन्दू समाज एवं संस्कृति के पारस्परिक संबंध के बारे में बौद्धिक विमर्श के दौरान दुर्भाग्य से कटुता एवं असहजता लगातार बढ़ती जा रही है। इससे भारत के आम आदमी को काफी दुविधा झेलनी पड़ती है। उदाहरण के लिए, पश्चिमी विश्वविद्यालयों में प्रशिक्षित कुछ भारतीय मूल के गांधीवादी विद्वान अमेरिका एवं बहुराष्ट्रीय निगमों को शैतानी शक्ति मानते हैं एवं पारंपरिक ईसाइयत को दैवीय शक्ति मानते हैं। मार्क्स एवं इजरायल को भी ये लोग शैतानी शक्ति मानते हैं। उनकी नजर में पूरी आधुनिक पश्चिमी सभ्यता शैतानी शक्ति की उपज है। वे मानते हैं कि कालाधन और भ्रष्टाचार कोई महत्वपूर्ण समस्या नहीं है और न इसको साधारणत: दूर ही किया जा सकता है। यह तो दूरगामी रूपांतरण के बाद ही दूर किया जा सकता है, चूँकि यह सब पश्चिमी सभ्यता की नैसर्गिक उपज हैं। वे ईसाइयत को अच्छी शक्ति मानते हैं और आधुनिक पश्चिम को बुराई की शैतानी शक्ति मानते हैं। वे स्वामी विवेकानन्द को एवं भारतीय अभिजात्य वर्ग तथा आधुनिक भारतीय संस्कृति को पसन्द नहीं करते।

पश्चिमी विश्वविद्यालयों में एवं पश्चिमी समाज में ईसाई समूह काफी लंबे समय से क्रियाशील रहे हैं। भले ही आज कल पश्चिमी समाज में संगठित ईसाई धर्म कोई मजबूत शक्ति नही रह गया है, परंतु वे पश्चिमी विश्वविद्यालयों की परिधि में अब भी काफी प्रभावशाली हैं। गांधीजी पर भी मत-आरोपण (ब्रेन वाशिंग) की कई कोशिशें हुई थी, इसे स्वयं गांधीजी ने अपनी आत्मकथा एवं अन्य जगहों पर स्वीकारा है। परंतु उपर्युक्त गांधीवादी विद्वान संभव है, अपने विचारों एवं विश्वासों के ईसाई स्रोत के बारे में संभवत: बहुत सचेत नहीं हों।

18वीं और 19वीं सदी तक आते-आते विश्वास और धर्मविधि से संबंधित व्यवहार दोनों के स्तर पर, यूरोप का ईसाई धर्म, यूरोपीय लोगों की नजर में, इतना पतित हो चुका था कि कैथोलिक लोग इसको बौद्धिक रूप से तर्कसंगत साबित करने की स्थिति में नही रह गए थे। इसकी तुलना में कला के स्तर पर अनुकूल अभियान चलाया जा सकता था। फलस्वरूप कला को कैथोलिक ईसाई विद्वानों ने विशिष्ट प्रतीक कहना शुरू किया और प्रोटेस्टेन्ट लोगों ने विश्वास को केन्द्रीय मूलभाव (सेन्ट्रल मोटिफ) कहना शुरू किया। यहूदी मूल के विद्वानों ने धर्मविधि (रिचुअल) को केन्द्रीय कहना शुरू किया।

हर चीज के बावजूद कला कलाकार की व्यक्तिगत रचना होती है। कलाकार समाज का एक विशिष्ट भाग होता है और काफी हद तक समाज से कटा होता है। वह चेतन संरचना और धर्म आधारित संस्तरण को तर्कसंगत साबित करने के लिए बाध्य नहीं होता। वह सामाजिक अवधारणा, अपने युग के व्याकरण और भाषा की सीमा से अपेक्षाकृत स्वतंत्र होता है। बहुत कुछ स्वप्न की तरह। फलस्वरूप ईसाई मूल के विद्वानों को कला की दुनिया सुरक्षित स्वर्ग लगा, चूँकि तब तक फ्रायड, जुंग और लकान की कला संबंधी समालोचना लोकप्रिय नहीं हुई थी। यह आकस्मिक नही है कि गांधी के गुरु रस्किन तथा कुमारस्वामी के गुरू मॉरिस दोनों कला इतिहास के विद्यार्थी थे। यह भी आकस्मिक नही है कि धीरे-धीरे कुमारस्वामी कला इतिहास को छोड़कर सैद्धान्तिकी (मेटाफिज्क्सि) पर सकेन्द्रित होने लगे थे। धीरे-धीरे गांधी ने भी अपने को पुन: ढूँढ़ना शुरू कर दिया था। जैसे-जैसे कुमारस्वामी और गांधी को सनातन हिन्दू धर्म की गहराई समझने का अवसर मिला, वे लोग धीरे-धीरे यूरोपीय कला आंदोलन के प्रभाव से दूर होते गये।

यूरोप के प्रोटेस्टेन्ट लोगों ने तो सोलहवीं शताब्दी से ही विश्वास के स्तर पर कैथोलिकों से लड़ाई लड़ कर अपनी नई पहचान खोजना शुरू कर दिया था। उन्नीसवीं शताब्दी आते-आते यहूदी पृष्ठभूमि के विद्वान लोग अपने अध्ययनों में कैथोलिक ईसाई धर्मविधि की खिल्ली उड़ाने लगे। यहूदी मूल के दुर्खीम ने जनजातीय और यहूदी धर्मविधि को अप्रत्यक्ष बौद्धिक समर्थन देने के लिए ‘दि एलीमेंटरी फॉर्म्स ऑफ रिलिजियस लाइफ’ लिखा। यह अन्तत: ईसाई धर्म के खिलाफ जाता है। आत्महत्या विषय पर लिखी उनकी दूसरी किताब भी, अंतत: ईसाई धर्म के विश्वास के खिलाफ जाता है। यहूदी पृष्ठभूमि के एक दूसरे विद्वान कार्ल मार्क्स, धार्मिक विश्वास को झूठी चेतना कह कर ईसाई पुनरुत्थान (प्रोटेस्टेन्ट) की हँसी उड़ाते हैं। इसी क्रम में, फ्रायड जैसे मनोविश्लेषणवादी रस्किन एवं मॉरिस जैसे ईसाई कला समीक्षकों के प्रभाव को अपने अध्ययनों के द्वारा खोखला कर देते हैं। चार्ल्स डार्विन अपने उद्विकास वाले सिद्धांत के जरिये ईसाइयों के बीच लोकप्रिय जेनेसिस की बाईबिल वाली कहानी को काफी हद तक अप्रासंगिक बना देते हैं।

पश्चिमी आधुनिकता और इसकी उत्कट अभिव्यक्तियों (अमेरिकी सभ्यता एवं बहुराष्ट्रीय निगम) के बारे में यूरोप के कैथोलिक ईसाईयों की दृष्टि आज भी ज्यादा नहीं बदली है। पश्चिमी आधुनिकता को आज भी ये लोग शैतानी शक्तियों की रचना मानते हैं। इस दृष्टि के लोग आज भी अमेरिका को एक सभ्यता नहीं मानकर एक ‘सेटलमेंट’ कहते हैं। ‘सेटलमेंट’ (रिहायसी स्थान) कहने के पीछे तीन भाव अंतर्निहित होता है। पहला भाव यह है कि वे अमेरिका की पारंपरिक (पैगन) सभ्यता को सभ्यता नहीं मानकर बर्बरता मानते हैं। दूसरा भाव यह है कि वे कोलंबस द्वारा अमेरिका खोजे जाने के बाद पोप की प्रेरणा, सहमति एवं आज्ञा से स्पेन और पुर्तगाल के नेतृत्व में चलाये गये बर्बर साम्राज्यवादी अभियान को ‘सभ्यता’ फैलाने वाला अभियान मानते हैं और अमेरिकी भूमि को इस अभियान को चलाने वाले कैथोलिक ईसाईयों का रिहायसी स्थान मानते हैं। तीसरा भाव यह है कि यूरोप के कैथोलिक ईसाइयों के ‘महान उद्देश्य’ से किए गए भीषण एवं रक्तरंजित अभियानों के बावजूद, अमेरिका को आज भी मध्यकालीन यूरोपीय मानदंडों पर सभ्यता नहीं बनाया जा सका है। यूरोप के विश्वविद्यालयों में अमेरिका को इसी तर्क के आधार पर सभ्यता नहीं मानने की प्रवृत्ति हावी रही है। देखा-देखी अन्य लोग भी इस कुतर्क को बिना सोचे-समझे मानने लगे हैं। भारत की शैक्षणिक संस्थाओं में भी मुख्य रूप से बाईबल का कैथोलिक दृष्टि से प्रभावित अनुवाद ही पढ़ा-पढ़ाया जाता है। विभिन्न प्रकार के प्रोटेस्टेन्ट संप्रदायों एवं इस्लाम और यहूदी दृष्टि वाला अनुवाद नहीं पढ़ा-पढ़ाया जाता। इस्लाम तथा यहूदी मत में बुराई की या नरकदूत (शैतान) की अवधारणा कैथोलिक अवधारणा से बहुत मामलों में समान होने पर भी कई विशिष्ट अर्थों में अलग रही है। इनके बीच सांप्रदायिक गतिरोध एवं संघर्ष के कई कारणों में एक प्रमुख कारण यह अन्तर और इसका फलितार्थ भी रहा है।

स्वामी विवेकानंद से लेकर रामस्वरूप तक अधिकांश समकालीन हिन्दू चिंतक पुनर्जागरण (रेनेसाँ) एवं ज्ञानोदय (एनलाइटनमेंट) के बाद की आधुनिक यूरोप की सभ्यता से अपनापन महसूस करते हैं। इन लोगों को लगता है कि आधुनिक यूरोपीय सभ्यता का आधार मध्यकालीन यूरोप की ईसाई परंपराएँ नहीं हैं, बल्कि प्राचीन यूनान एवं प्राचीन रोम की पैगन परंपराएँ हैं। भारत की सनातन परंपराओं एवं यूनान, रोम, मिस्र, चीन, बेबिलोन, पर्शिया (फारस) आदि की पैगन परंपराओं में समानता एवं सहधार्मिता का तथ्य अब सामान्य रूप से पूरब एवं पश्चिम दोनों जगह के विद्वान स्वीकारने लगे हैं। इन विद्वानों की दृष्टि में पुनर्जागरण एवं ज्ञानोदय के बाद आधुनिक यूरोप की ईसाई एवं गैर-ईसाई दोनों परंपराओं में लगातार रूपांतरण होता रहा है। इस रूपांतरण की अभिव्यक्ति धर्म सुधार आंदोलनों, औद्योगिक क्रांतियों एवं राजनैतिक क्रांतियों के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, नैतिक, वैज्ञानिक एवं तकनीकी स्तरों पर होता रहा है। परंतु इसके संपूर्ण फलितार्थों को उत्तर-आधुनिक (1968 के बाद) युग से पहले पश्चिम के विद्वान स्वीकारने से बचते रहे हैं।
इसके विपरीत, स्वामी विवेकानंद के समय से हिन्दू चिंतकों ने आधुनिक सभ्यता के पैगन आधार एवं इससे उपजी बहुआयामी, विविध, बहुकेंद्रित एवं विकेंद्रित प्रवृत्तियों एवं जटिलताओं को काफी हद तक समझ लिया था। फलस्वरूप आधुनिक यूरोप के विज्ञान, तकनीक तथा आर्थिक एवं राजनैतिक संस्थाओं को वे सनातन भारतीय परंपराओं, दर्शनों, आस्थाओं एवं संस्कृतियों के विकास के लिए अनुकूल मानते रहे हैं। विवेकानंदवादी आधुनिक संस्कृति की रचना को शैतानों का कार्य नहीं मानते। कुछ विवेकानंदवादी कहते हैं कि ”टिकती वही चीज है, जिसके पीछे साधाना होती है। उदाहरण के लिए रामकृष्ण मिशन को देखिये। अरबिन्दो आश्रम को देखिये। इस्कॉन को देखिये। योगदा सत्संग को देखिये। दूसरी ओर वर्धा और साबरमती के आश्रमों को देखिये। गांधी और विनोबा के मरते ही उनकी संस्थाओं का क्या हस्र हुआ! गांधीवादी आश्रमों की तुलना में सनातन हिन्दू साधना से जुड़ी संस्थाएँ लगातार बढ़ रही है। नई पीढ़ी को भी आकर्षित कर रही हैं।” वे यह भी कहते हैं कि ”यूरोपीय लोगों ने संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए जो किया है, उसमें केवल निहित स्वार्थ भर नहीं था, श्रध्दा का भाव भी था, वर्ना इतना स्तरीय काम इतने वर्षों तक कायम नहीं रह पाता। वे भी साधक लोग थे और हैं।”

भारतीय परंपरा के सनातन मूल्यों की जो बात विवेकानंदवादी करते हैं, वह तो प्रासंगिक है। भारतीय परंपरा की जो सनातन दृष्टि है, वह आज भी प्रासंगिक है। परंतु गांधीजी और उनके अनुयायियों की दृष्टि भी उतना ही भारतीय, उतना ही सनातनी और प्रासंगिक है। भारतीय परंपरा के स्वरूप एवं सनातनी ‘मूल्य और दृष्टि’ की पहचान को लेकर ही तो सारा झगड़ा है। आज ‘मूल्य और दृष्टि’ का प्रश्न और जटिल हो गया है। आज नयी सामग्री ढूँढ़ना उतना महत्वपूर्ण शोधकार्य नहीं है। जानी पहचानी स्थितियों, तथ्यों एवं उपलब्ध स्रोतों का भारतीय मानदंडों पर आधारित स्वतंत्र, विवेकजन्य समीक्षा एवं संशोधन करना संभवत: आज ज्यादा आवश्यक है। उदाहरण के लिए गांधी, नेहरू के महत्व को स्वीकार करते हुए भी तिलक, टैगोर एवं रामचन्द्र शुक्ल जैसों की पृष्ठभूमि, कार्य एवं विचार-सरिणी की समीक्षा काफी महत्व का संशोधन कार्य हो सकता है। तभी हम लोग समकालीन भारतीय समाज के भीतर पारंपरिक स्वदेशी एवं आधुनिक वैश्वीकरण के समर्थकों के बीच बहुआयामी स्पर्धा एवं संघर्ष को सम्पूर्णता में समझ सकते हैं। पारंपरिक स्वदेशी के सबसे बड़े प्रवक्ता महात्मा गांधी माने जाते हैं तथा आधुनिक वैश्वीकरण के सबसे समर्थ सिद्धांतकार स्वामी विवेकानंद माने जाते हैं। उनके विचार में महत्वपूर्ण अंतर होते हुए भी काफी कुछ साझा है। दरअसल दोनों के व्यक्तित्व पर समकालीन भारत की परिस्थितियों का प्रभाव था। वे अपने समकालीनों के साथ संवाद बनाने में भी लगे हुए थे। उस समय अपने युग के सनातन सत्य एवं भारतीय परंपरा को अभिव्यक्त करने का सांस्कृतिक अभियान चल रहा था। भारतीय दृष्टि से आधुनिकता और परंपरा पर विचार करते हुए गांधीजी और विवेकानंदजी के विचारों की पूरकता स्पष्ट हो सकती है।

आधुनिकता की सबसे बड़ी विशेषता इसका खुलापन, इसकी तरलता है। आधुनिकता की खास बात इसका संस्थागत रूप से एक स्वतंत्र बाजार की तरह खुला होना और सार्वजनिक क्षेत्र में भी, आत्म सजग रूप से, सर्वसमावेशी होना है। तुलनात्मक रूप से, परंपराएँ इतनी खुली नहीं होती। एक पारंपरिक व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन में खुला हो सकता है, परंतु संस्थाओं के खुलेपन की अपनी सीमा होती है। खासकर समालोचना को पचाने के मामले में और बाहरी प्रभाव से निपटने के मामले में यह सीमा बहुत स्पष्ट दिखती है। यह सीमांकन केवल जाति के रूप में ही प्रभावी नहीं होता, बल्कि संप्रदाय और घराना के रूप में भी प्रभावी होता है। आयुर्वेद जैसे विज्ञान के क्षेत्र में भी यह प्रभावी होता है। सूचनाओं का स्वतंत्र आदान-प्रदान परंपरा में सामान्यतया नहीं होता, परंतु हो सकता है इससे सैद्धान्तिक रूप से इनकार नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, आधुनिकता में भी सैद्धान्तिक खुलापन चाहे जितना हो, व्यावहारिक सुलभता नहीं होती है। सब कुछ मुफ्त में उपलब्ध नहीं होता। पेटेंट नियम होते हैं। कॉपीराइट होते हैं। भाषा की सीमा होती है। एक खास भाषा में एक खास तरह से ही आधुनिकता अपनी सूचनाएँ बाँटा करती है।

परंपरा में भी यही होता है। परंपरा में भी पात्रता का सवाल न्यूनतम जरूरी योग्यता से ही होता है। फिर भी परंपरा में समुदायों को जैसी स्वायत्ता मिलती है, उसकी रक्षा के लिए समुदाय के सदस्यों को वैसी स्वतंत्रता नहीं दी जाती, जैसी आधुनिकता में व्यक्तियों को दी जाती है। दूसरी ओर, आधुनिकता में केवल राज्य को स्वायत्ता प्राप्त होती है, समुदायों को नहीं। उत्तर आधुनिकता में व्यक्ति एवं बाजार की स्वायत्ता सर्वोपरि होती है, जबकि तुलनात्मक रूप से राज्य की स्वायत्ता खोखली हो जाती है।

भारतीय परंपरा में व्यक्ति को सांसारिक दृष्टि से उतनी स्वायत्ता प्राप्त नहीं है, जितना आधुनिक व्यवस्थाओं में होती है। परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से व्यक्तिगत मुक्ति की बात बहुत सहजता से की जाती है। उदाहरण के लिए, रमण महर्षि आदि का मॉडेल व्यक्तिगत मुक्ति वाला आध्यात्मिक मॉडेल है। यह सामाजिक मुक्ति का व्यवस्थित मॉडेल नहीं है। हिन्दुओं ने अब तक आत्म सजग रूप से व्यावहारिक स्तर पर क्रियाशील व्यवस्थागत विकल्प का मॉडेल एक विस्तृत ब्लू प्रिंट के रूप में विकसित ही नहीं किया। अधिकांश आधुनिक हिन्दू चिन्तकों में इस मोर्चे पर एक आत्मचेतस रणनीतिक ढुलमुलपन (एम्बिग्यूटी) दिखाई देता है। महात्मा गांधी का हिन्द स्वराज शायद एकमात्र अपवाद है। अधिकांश आधुनिक हिन्दुओं में जो आत्मचेतस ढुलमुलपन दिखलायी देता है, वह काफी हद तक लंबी गुलामी के दौरान अपनी सांस्कृतिक पहचान कायम रखने एवं विपरीत परिस्थिति में अपने स्व की रक्षा करने की रणनीतिक व्यावहारिकता (प्रैगमेटिज्म) के तहत धीरे-धीरे विकसित होता गया। इस प्रवृत्ति को व्यक्तिगत रूप से बहुत लोग स्वीकारते हैं, परंतु इस पर व्यवस्थित विचार करने का सार्वजनिक प्रयास प्रचलित नहीं है। इस प्रवृत्ति को समझे बिना हिन्द स्वराज का महत्व समझा ही नहीं जा सकता।

राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का निर्माता माना जाता है, परंतु उनका जोर भारतीय समाज को यूरोपीय मानदंडों पर आधुनिक बनाने का ज्यादा था। फलस्वरूप, भारतीय परंपरा के प्रतिनिधि वे नहीं माने जाते। दूसरी ओर, स्वामी दयानंद सरस्वती और उनके अनुयायियों ने समकालीन भारतीय परंपरा के आधिकारिक प्रवक्ता होने का दावा किया था। परंतु स्वामी दयानन्द के अनुयायियों ने भारतीय परंपरा का कुछ इस तरह अनुवाद एवं भाष्य किया है कि आधुनिकता की विशेषताएँ व्यावहारिक स्तर पर पारंपरिक ग्रंथों पर आरोपित हो गयी हैं। उदाहरण के लिए, एक बड़े आर्यसमाजी लेखक ने ऋग्वेद का हिन्दी में अनुवाद किया है। उन्हें लगता है कि पश्चिम की जो अच्छी-अच्छी चीजें हैं, वह सब तो हमारी परंपरा में थी ही। यह प्रवृत्ति आर्य समाज के बाहर वाले आधुनिक हिन्दू चिन्तकों में भी स्थायी भाव ग्रहण करती जा रही है। इसकी प्रेरणा विलियम जोंस जैसे यूरोपीय विद्वानों के प्रभाव से फैला है।

करीब चौथी शताब्दी से यूरोपीय विद्वानों में ज्ञान का प्रामाणिक स्रोत किताब (टेक्स्ट) रहा है। आधुनिक युग में भी रेने डेकार्ट एवं इमैनुएल कैंट के प्रभाव में ज्यादातर यूरोपीय विद्वान यही मानते हैं कि किसी चीज के बारे में प्रामाणिक ज्ञान किताबी सिद्धांत एवं बौद्धिक अवधारणाओं के आधार पर ही प्राप्त हो सकता है। विलियम जोंस के प्रभाव में जब भारत को समझने के लिए आधुनिक प्रयास इंडोलॉजी (भारतविद्या) के तहत विकसित हुए तो यूरोपीय मानदंड पर भारत का प्रामाणिक ग्रंथ या किताब (टेक्स्ट) खोजा जाने लगा। भारतीय ग्रंथों का अनुवाद, संशोधन, संपादन एवं मूल्यांकन का साम्राज्यवादी उपक्रम चलाया गया। इस उपक्रम के सिद्धांत, मॉडेल एवं मानदंड यूरोपीय परंपरा के आधार पर तय किया गया। भारतीय विद्वानों का काम बौद्धिक सहायकों जैसा था। वे लोग यूरोपीय विद्वानों के स्वामीभक्त अनुचर की तरह ‘तथ्य संकलन’, ‘शाब्दिक अनुवाद’ एवं यूरोपीय मानदंडों पर भारतीय शास्त्रों में ”प्रक्षेपित अंश” (अप्रमाणिक घुसपैठ) खोजते रहे और मूल्यांकन करने का काम यूरोपीय विद्वान करते रहे। बाद में इस तरह के ”आधिकारिक मूल्यांकन” के प्रचार, प्रसार एवं अनुकरण करने के लिए भारतीय विद्वानों को प्रायोजित अनुबंध दिया जाता रहा। अब तो इसी प्रकार के शोध को मौलिक एवं श्रेष्ठ माना जाता है। इसी प्रभाव के कारण आधुनिक हिन्दू चिंतकों में साधारण जनता और उसके जीने के ढ़ंग का ख्याल नहीं रहा, अंग्रेजों द्वारा चुने हुए ‘टेक्स्ट’ का ख्याल रहा।

एक स्वतंत्र ग्रंथ के रूप में भगवद्गीता भी अंग्रेजों के आने से पहले नहीं पढ़ी जाती थी। इसको इतना अधिक प्रतिष्ठित यूरोपीय विद्वानों ने ही किया है, पहले इसे या तो महाभारत के रूप में पढ़ा-सुना जाता था या दार्शनिक रूप से ब्रह्मसूत्र और उपनिषदों के साथ प्रस्थान त्रयी के रूप में पढ़ा जाता था। आम हिन्दुओं के बीच भगवद्गीता साधारण लोगों द्वारा पढ़ने की चीज नहीं मानी जाती। साधारण लोग रामायण, महाभारत, पुराण एवं भागवत इत्यादि पढ़ते हैं। समाज में अभी भी कुछ ही लोग पारंपरिक शास्त्र, शिल्प या भारतीय गणित पढ़ते हैं, ज्यादातर लोग वाचिक परंपरा की दुनिया में ही रहते हैं। उनकी दुनिया गणित एवं व्याकरण से न तो बनती है और न चलती है। उनकी दुनिया में स्मृति, पुराण, लोककथा, महाकाव्य, मुहावरा, कहावत, लोकगीत एवं लोकसंगीत का प्रभाव गणित एवं व्याकरण से ज्यादा होता है। परंतु आधुनिक विद्वान भारत को आम लोगों की नजर से देखना समझना नहीं चाहते। वे लोग अपनी कृत्रिम दुनिया में रहते हैं। उनको इससे बहुत फर्क नहीं पड़ता कि भारत के आम नर-नारियों का दूसरे मनुष्यों से, सृष्टि से या दूसरे जीवों से क्या रिश्ता है। उनके लिए पश्चिमी मानदंडों पर खरा उतरना अधिक आवश्यक है।

वास्तव में आम आदमी के जीवन में जाने-अनजाने कितना पश्चिमीकरण हुआ है, हुआ भी है या नहीं, ऐसे सवालों पर सार्वजनिक जीवन में चर्चा सामान्यत: नहीं होती। जो लोग भी सार्वजनिक जीवन में हैं, उनको आम लोगों की वास्तविक स्थिति के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। जिन्हें जानकारी है, वे सार्वजनिक जीवन के विमर्श में भाग नहीं लेते और आम लोगों के पक्ष का प्रतिनिधित्व करने नहीं आते। आधुनिक भारत के पढ़े-लिखे लोगों को लगता है कि हमारे देश के साधारण लोग तो आलसी हैं। अंग्रेजो ने जो-जो कहा और दोहराया कि ”तुम्हारे ग्रन्थों में ऐसा लिखा है,” यह पढ़े-लिखे भारतीय लोगों के मन में बस गया है। जैसे अंग्रेजों ने जानबूझकर यह मिथक गढ़ा कि हजारों बरस से हमारे यहाँ दरिद्रता है; कि हमारे यहाँ बरसों से छुआछूत कायम है। ऐसी मान्यताओं का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है। ऐसे मिथक अंग्रेजों के द्वारा अपने राज को वैधता देने के लिए शोध के नाम पर गढ़े गये। परंतु मानसिक रूप से गुलाम भारतीयों ने इसको बिना परीक्षा किए स्वीकार लिया। कोई नहीं पूछता कि बतलाओ तो सही कि इन तथाकथित ऐतिहासिक तथ्यों का आधार कहाँ है? पूछने पर कुछ कुतर्की कहते है कि मनुस्मृति में या कहीं और है। असल में मनुस्मृति में क्या है, यह नहीं कहते, यह भी नहीं कहते कि मनुस्मृति कब लिखी गई थी? मनुस्मृति के अलावे औैर कितनी स्मृतियाँ हैं? इन स्मृतियों का आपस में क्या संबंध है? इन स्मृतियों का अपने युग के समाज से कैसा संबंध था? क्या भारतीय समाज में व्यक्ति एवं समुदाय का जीवन स्मृतियों से उसी तरह नियंत्रित होता था, जिस तरह सेमेटिक जाति के धार्मिक समुदायों में पवित्र ग्रंथों के आधार पर होता है? ऐसे प्रश्नों को दरकिनार करना आजकल भारत में बौद्धिक फैशन बन गया है। लेकिन इस बौद्धिक फैशन के निर्माण में साम्राज्यवादियों ने बहुत मेहनत की थी।

राबर्ट क्लाइव के जमाने से भारतीयों के स्वभाव के बारे में अंग्रेजों ने बहुत जानकारी एकत्र किया। धीरे-धीरे वे समझ गये कि भारतीयों को कुछ भी तय करने में बहुत देर लगती है। भारतीय लोग स्वभाव से योजनाबध्द नहीं होते। विरोधियों द्वारा कुछ भी अचानक कर देने पर भारतीय लोग सामान्यतया लड़खड़ा जाते हैं। हिन्दुस्तानी लोग हवा का रुख देखकर अपनी रणनीति बदल लेते हैं। अगर परिस्थिति बदली तो भारत के पढ़े-लिखे लोग बड़ी आसानी से बदल जाते हैं। मधयकाल में यहाँ का पढ़ा-लिखा समाज बड़ी आसानी से अरबी फारसी में सूफियों की भाषा एवं इस्लाम की प्रगतिशीलता के गीत गाने लगा था। फलस्वरूप, अंग्रेजी राज में भी ब्रिटिश राज की बरकत, ईसाई धर्म की प्रगतिशीलता, पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान एवं पश्चिमी विद्वानों द्वारा भारतीय समाज के बारे में तैयार उपनिवेशवादी विमर्श की प्रासंगिकता के गीत गाने वाले भारतीयों की कमी नहीं रही। भारतीय समाज एवं संस्कृति की अंग्रेजों की देखा-देखी कठोर आलोचना करना अधिकांश पढ़े-लिखे भारतीयों के बीच लोकप्रिय शगल बन गया। फलस्वरूप जब महात्मा गांधी ने हिन्द-स्वराज लिखा, तो भारत के पढ़े-लिखे लोगों में से अधिाकांश लोगों को यह पुस्तक और अंग्रेजी राज तथा आधुनिक सभ्यता की महात्मा गांधी द्वारा की गई आलोचना अच्छी नहीं लगी।

ठीक इसी प्रकार, जब अपने ऐतिहासिक शोध के आधार पर धर्मपाल ने अंग्रेजों के आने से पहले भारत की आर्थिक खुशहाली, तकनीकी श्रेष्ठता एवं शैक्षणिक प्रगति के बारे में तुलनात्मक आंकड़ा प्रस्तुत किया तो सहसा पढ़े-लिखे लोगों को विश्वास नही हुआ। जब यह बतलाया गया कि यह सब एडम्स रिपोर्ट में भी वर्णित है, तब भी लोगों ने इस पर बहुत ध्यान नहीं दिया। चूंकि हम ‘टेक्स्ट’ के चक्कर में पड़ गये। एडम्स रिपोर्ट, महात्मा गांधी या धर्मपाल अपने क्षेत्रीय सर्वेक्षण, सामाजिक अनुभूति या संग्रहालय के आंकड़ों के आधार पर जो कहते हैं, उसको पढ़े-लिखे लोग वह महत्व नहीं देना चाहते, जो पश्चिमी विद्वानों द्वारा स्थापित मानदंडों पर भारत को समझने के लिए औपनिवेशिक विद्वानों द्वारा संपादित एवं संशोधित मनुस्मृति या गीता के शंकर भाष्य या ऋगवेद के पुरुष सूक्त जैसे ‘टेक्स्टस’ (आकर ग्रंथों) को देते हैं। फलस्वरूप, व्यावहारिक स्तर पर सदियों से प्रचलित परंपराओं एवं रीति-रिवाजों को आधुनिक विद्वान प्रमाण नहीं मानते। उदाहरण के लिए, भारत में विवाह एवं तलाक के बारे में इंडोलॉजी से प्रभावित अधययनों में तलाक की चर्चा कबीलाई या इस्लामी संस्था के रूप में की जाती है, जबकि हिन्दू समाज की विभिन्न जातियों में बड़ी संख्या में तलाक आदि हजारों वर्ष से प्रचलन में है। जो लोग उन समूहों में रहते हैं, उन्हें यह सब मालूम है। लेकिन यह किसी ‘टेक्स्ट बुक’ में नहीं है। अगर इसे ‘टेक्स्ट बुक’ के सहारे हम समझने की कोशिश करें तो मुश्किल होगा। अपने व्यावहारिक रूप में भारतीय समाज कैसे चलता है, इससे हमारे ख्याति प्राप्त विद्वानों का अब तक ठीक से परिचय नहीं हुआ है।

उदाहरण के लिए, अधिकांश आधुनिक विद्वानों ने हिन्दू महापुरुषों के आदर्श एवं व्यवहार में असंगति की ओर इशारा किया है। महात्मा गांधी ने तो साफ-साफ कहा है- “अलग-अलग समय में एक हीं विषय पर उनके विचार बदलते रहे हैं, चूँकि उनका लगातार उद्विकास होता रहा है, उनकी अनुभूतियाँ विस्तृत एवं गहरी होती रहीं हैं। फलस्वरूप वे अपील करते हैं कि जब भी किसी पाठक को एक हीं विषय पर उनके दो विचार देखने को मिलें, तो उनके बाद वाले विचार को ज्यादा तरजीह दी जाये”। महात्मा गांधी के उपर्युक्त मत की सांस्कृतिक गहराई समझने की बहुत कम कोशिश हुई है। महात्मा गांधी ने सांकेतिक रूप से इसमें सनातन हिन्दू धर्म की एक प्रमुख प्रवृत्ति से खुद को जोड़ा है। जो लोग सनातन धर्म के गहरे जानकार हैं, उनके लिए इसका महत्तव स्वयं सिद्ध है। परंतु अधिकांश आधुनिक विद्वानों को गांधीजी का यह आग्रह अटपटा लगता है। गांधीजी को ठीक से समझने के लिए सनातन धर्म की इस प्रवृत्ति को समझना आवश्यक है।

राम और कृष्ण के जमाने से हिन्दू लोग सिद्धांत, नीति या मतवाद के नाम पर बेवजह अड़ियल-अव्यावहारिक रूख अपनाने से बचते रहे हैं। उदाहरण के लिए- भगवान राम ने खुद बाली को मारने, समुद्र को पार करने एवं मेघनाद की लक्ष्मण द्वारा हत्या करवाने जैसे प्रकरणों में, एक प्रकार की सांसारिक युक्ति का सहारा लिया था। उसी तरह भगवान कृष्ण ने जरासंध द्वारा मथुरा पर आक्रमण करने के बाद, उससे लोहा लेने की तुलना में रणछोरजी कहलाना ज्यादा उचित समझा एवं भीष्म पितामह, गुरू द्रोणाचार्य, जयद्रथ, कर्ण, जरासंध एवं दुर्योधन की पाण्डवों द्वारा हत्या करवाने में शुष्क नीति या सिद्धांत पर अड़ने की तुलना में व्यावहारिक लचीलापन एवं युक्ति अपनायी।
महात्मा गांधी भी इसके अपवाद नहीं थे। उन्होंने कई बार (साउथ अफ्रीका में भी और भारत में भी) सांसारिक युक्ति को अपने नीति-सिद्धांत के ऊपर वरीयता दी। साथ हीं अपनी सनातनी आस्थाओं एवं सिद्धांत को बौद्धिक रूप से आकर्षक एवं युगानुकूल ठहराने के लिए एवं आधुनिक पश्चिम के मानदंडों पर वैधता प्राप्त करने के लिए उन्होंने रस्किन, थोरो, टाल्सटाय एवं कारपेंटर जैसे विद्वानों को अपना गुरु तथा प्रेरणास्रोत बताया। लेकिन पश्चिम के इन परंपरावादी ईसाई तत्वचिन्तकों जैसी सुसंगत वैचारिक प्रतिबद्धता एवं मतवाद गांधीजी में खोजने से भी नहीं मिलता। वे अपने व्यवहारों को सिद्धांत या मत के आधार पर नियंत्रित नहीं करते थे। उनके व्यवहारों को समझने का सूत्र उनकी तात्कालिक प्रेरणा/मनोवेग (मोटिव) और लक्ष्य की पूर्ति के लिए सबसे उपयुक्त युक्ति के बारे में उनकी तात्कालिक समझ एवं उनकी सनातनी आस्थाओं में खोजा जा सकता है। परंतु उन्हें अवसरवादी या समझौता परस्त नहीं कहा जा सकता। अवसरवादी या समझौता परस्त लोग कहीं न कहीं अपने प्रतिद्वंद्वी से या विपरीत परिस्थितियों से डर कर एक प्रकार के दबाव में समझौता या गठबंधन करते हैं। दूसरी ओर, सनातनी व्यावहारिकतावादी अभय (निर्भय) अवस्था में स्वेच्छा से अपने स्वविवेक के आधार पर बदलती हुई परिस्थितियों का सतत मूल्यांकन करते रहते हैं। इसी बदलते हुए स्वैछिक मूल्यांकन के आधार पर वे स्वविवेक से सांसारिक युक्ति का उपयोग करते हैं। यह सनातन संस्कृति की पारिभाषिक विशेषता है। इसमें नियति के आगे समर्पण और कर्म के सिद्धांत को मानने का भाव भी अंतर्निहित है।

परंतु 1814 के आस-पास राजा राममोहन राय के नेतृत्व में एक प्रकार की अवसरवादी या समझौतापरस्त व्यावहारिकता की वकालत भी भारत में की जाने लगी। अंग्रेजों के मिथक, मानदंड एवं प्रारूप के आधार पर भारतीय समाज एवं संस्कृति को समझने, सुधारने एवं विकसित करने का ”महान कर्म” पढ़े-लिखे भारतीयों का सामाजिक पुरूषार्थ बनने लगा तथा एक नये प्रकार का वैचारिक एवं तात्विक ढुलमुलपन पढ़े-लिखे भारतीयों में लोकप्रिय होने लगा। इस नयी प्रवृति का विकास आधुनिक यूरोप के ज्ञानोदय (एनलाइटनमेंट) एवं ब्रिटिश साम्राज्य की भारतीय नीतियों से प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होने के बावजूद तत्कालीन भारत के वैचारिक संघर्षों से भी कहीं न कहीं जुड़ा हुआ था।

मध्यकालीन भारत के सांस्कृतिक इतिहास में हिन्दू समाज के सामने तुलसीदास ने पारंपरिक दृष्टिकोण का एक पक्ष प्रस्तुत किया। उनसे पहले कबीरदास एक दूसरा पक्ष प्रस्तुत कर चुके थे। तुलसीदास के बाद समर्थ रामदास ने एक तीसरा पक्ष प्रस्तुत किया। तीनों पक्षों को विस्तार से समझने के लिए कई स्रोतों से तथ्य संग्रह करना पड़ेगा और भारतीय विश्वविद्यालयों में आजकल प्रचलित मानदंडों का अतिक्रमण करना पड़ेगा। संक्षेप में, कबीरदास निर्गुण भक्ति एवं निवृत्ति मार्ग के प्रवक्ता थे। तुलसीदास सगुण भक्ति एवं प्रवृत्तिमार्ग के प्रवक्ता थे। समर्थ रामदास ने दोनों प्रकार की भक्ति एवं दोनों प्रकार के मार्ग का समन्वय करने का प्रयास किया था। तुलसीदास की परंपरा के सबसे प्रमुख व्याख्याकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल माने जाते हैं। कबीर की परंपरा से महात्मा गांधी और बाबा साहब अम्बेडकर दोनों ने प्रेरणा ग्रहण किया। समर्थ रामदास की परंपरा शिवाजी महाराज से शुरू होकर राणाडे, सावरकर, मुँजे और मालवीय तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह कहीं न कहीं बंगाल नवजागरण के अधिकांश हिन्दू चिंतकों को भी प्रेरित करती रही थी। उदाहरण के लिए- कांग्रेस के सुरेन्द्रनाथ बनर्जी जैसे कुछ मशहूर नरमपंथी नेता अंग्रेजी राज के बरकत के गीत गाते-गाते स्वदेशी आंदोलन के दौरान मैनचेस्टर के कपड़े और लिवरपूल के नमक का बहिष्कार करने का आग्रह करने लगे। उन्होंने कुछ अधिक संकोच के साथ ही सही, राष्ट्रीय शिक्षा के आंदोलन में भी भाग लिया। आम हिन्दुओं को आकृष्ट करने के उद्देश्य से विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार आंदोलन को धार्मिक रंग देने के प्रयत्नों को भी नरमपंथी नेताओं का समर्थन मिला। बाद में मगरा के मंदिर के प्रांगण में भाषण देते हुए सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने तो यहाँ तक दावा किया कि स्वदेशी धार्मिक प्रतिज्ञा की पूरी कल्पना उन्हीं की देन थी। कुछ बड़े से बड़े नरमपंथी नेताओं ने युवा आतंकवादियों के प्रथम दल को चोरी-छिपे आर्थिक सहायता और अपना आर्शीवाद भी दिया था।

समकालीन हिन्दुओं में पाया जाने वाला रणनीतिक व्यावहारिकता का पहला सैद्धान्तिक आधार संभवत: समर्थ रामदास ने विकसित किया था। समर्थ रामदास ने एक ओर तो दासबोध नामक अपने ग्रंथ में बार-बार मूर्तिपूजा का निषेध किया है, वह भी काफी कठोर शब्दों में; दूसरी ओर भक्ति मार्ग के तहत मूर्तिपूजा से ईश्वर साक्षात्कार करके द्वैत से अद्वैतानुभव की मुक्ति भी बतलाई। एक ओर वे ब्रह्म को सत्य एवं जगत् को मिथ्या कहते हैं, तो दूसरी ओर वे यह कहते हैं कि चरम सत्य विश्व में भी व्याप्त है। वे राम से रहित विश्व को असत्य तथा राम से युक्त विश्व को सत्य मानते हैं। वे साधक को यह छूट देते हैं कि वह अपनी रुचि तथा प्रवृत्ति के अनुसार साधना मार्ग का चयन करे। वे बहुत दृढ़ता से कहते हैं कि परमात्मा को प्राप्त करने का मार्ग साधक के हाथ में हीं है। यदि साधक की साधना में गहराई है, तो भव सागर को लांघने के लिए माया नौका बन जाती है। मनुष्य मात्र का उद्धार माया की सहायता लिए बिना हो ही नहीं सकता। ज्ञान मुक्ति का प्रमुख साधान है, किंतु स्वयं ज्ञान विद्यामाया का ही एक उत्कट आविष्कार है। पाँच भौतिक तत्वों का जो विकास विश्व में दिखाई देता है, वह वस्तुत: माया का ही विकास है। अध्यात्म का अर्थ ही है- माया तथा ब्रह्म के स्वरूप का ज्ञान। बिना साधना के सामान्यत: ब्रह्म ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता और सद्गुरु की कृपा से अगर वह प्राप्त हो भी गया, तो भी उसे बनाये रखने की दृष्टि से साधना आवश्यक है। साधना में परिपूर्णता लाने के लिए भक्ति की आवश्यकता है। समर्थ रामदास खुद मूर्तिपूजक थे और उन्होंने दूसरों को भी मूर्ति-पूजा करना सिखाया। एक विकट एवं विपरीत समय में उन्होंने नवीन देवालयों के निर्माण एवं मूर्ति-स्थापना को उत्सव के रूप में शुरू की। उन्होंने देवालयों के गर्भगृह में राम, सीता व लक्ष्मण की मूर्तियों को स्थापित किया, परंतु हनुमान की मूर्ति गर्भगृह में स्थापित न करके मंदिरों के बाहर कहीं भी स्थापित करने की एक नई परंपरा शुरू की और इस प्रकार उन्होंने गर्भगृह में देवता के स्थान की अवधारणा हीं बदल दी। उन्होंने यह भी स्थापित किया कि राम की भक्ति करना या राम के दास की भक्ति करना दोनों का फल ब्रह्म-साक्षात्कार जैसा है। उन्होंने ग्यारह मारूति की स्थापना का उत्सव शुरू किया। उन्होंने ग्यारह सौ मठों में प्रशिक्षित महंतों को स्थापित किया और उन्हें व्यक्तिगत मोक्ष के बदले सामाजिक मुक्ति का पुरुषार्थ करना सिखलाया। इन्हीं मठों और महंतों ने उनके शिष्य शिवाजी महाराज के राजनैतिक अभियानों को संबल दिया। उनकी मान्यता थी कि जबतक स्वराज व तदंतर सुराज्य स्थापित नहीं हो जाता, तब तक नैतिक और परमार्थिक शिक्षा देना सुगम नहीं होगा। मध्यकालीन दुर्दशा के लिए वे विदेशी आक्रांताओं की तुलना में इस देश के निवासियों खासकर क्षत्रियों के तेज नष्ट होने एवं ब्राह्मणों के अशास्त्रीय ढ़ोंग के बढ़ने की स्थिति को जिम्मेदार मानते थे। शत्रु से लड़ने के लिए गुप्त रीति से तैयारी करने एवं शत्रु की कमजोरी से फायदा उठाते हुए गुरिल्ला यु्द्ध जारी रखने के वे कुशल रणनीतिकार थे। वे शास्त्र और शस्त्र के अधिकारी आचार्य थे। उन्होंने एक तो सनातनी परंपरा में रूढ़ हो चुके ”गर्भगृह” की अवधारणा में गुणात्मक रूपांतरण किया और दूसरे अपनी महान कृति दासबोध में भक्ति, पुरुषार्थ, नियति और कर्म जैसी सनातनी अवधारणाओं को युगानुकूल स्वरूप प्रदान किया। वे निम्नलिखित क्षेत्रों में समन्वय का प्रयास कर रहे थे – 1. गार्हस्थ्य और परमार्थ, 2. सगुण और निर्गुण, 3. कर्म, भक्ति और ज्ञान, 4. धर्म और राजनीति, 5. विविध धार्मिक संप्रदायों की सनातनी धारायें, 6. जगत् की सत्यता और असत्यता, 7. भाग्य और पुरुषार्थ, 8. वैयक्तिक उन्नति और सामाजिक उन्नति, 9. विवेक और वैराग्य, 10. उक्ति और कृति, 11. ग्रंथिक ज्ञान और प्रत्यक्ष अनुभव, 12. प्रादेशिक भाषाएँ, देवनागरी भाषा और संस्कृत, 13. द्वैत और अद्वैत, 14. विभिन्न काव्यशैलियों में अभिव्यक्त सनातनी परंपराएँ। इसका पहला राजनैतिक उपयोग शिवाजी महाराज ने किया था। परंतु उसके बाद यह आधुनिक हिन्दू चिन्तकों के सामान्य लक्षण के रूप में फैलता चला गया।

धीरे-धीरे यह भाव हिन्दू मान्यता में विकसित हुआ कि मनुष्य के बनाये सिद्धांत पर अड़ना अथवा लकीर का फकीर होना एक प्रकार का अहंकार है, जबकि नियति की इच्छा के आगे झुकना या लचीला रूख अपनाना सांसारिक युक्ति है। सोच-समझ कर या राय-मशविरा कर के बनाये गये सामाजिक सिद्धांत एवं सांस्कृतिक आदर्शों का सामान्य स्थिति में महत्व एक हद तक तो स्वीकारा जाता है, लेकिन विशेष, विषम एवं विकट परिस्थितियों में हर व्यक्ति अपनी अंतरात्मा की आवाज या ईश्वरीय प्रेरणा के आधार पर निर्णय लेता है अथवा बलिदान देता है। बिना अंतरात्मा की स्वीकृति पाए या ईश्वर द्वारा बिना व्यक्तिगत निर्देश पाए, केवल सामाजिक आदर्शों एवं सिद्धांत पर टिके रहने का उदाहरण हिन्दुओं में कम ही पाया जाता है। किसी राजा या महापुरुष के बदल जाने के बावजूद, उनकी प्रजा या उनके अनुयायी हिन्दू समाज में सामान्यतया नहीं बदलते। वे अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों पर, अपनी व्यक्तिगत आस्था पर एवं व्यक्तिगत सूझ-बूझ पर बने रहते हैं। पश्चिमी समाज एवं सेमेटिक धर्मों में राजा, धर्मगुरु, महापुरुष एवं शास्त्रीय धर्मग्रंथों पर जैसी आस्था, विश्वास बलिदान करने की तत्परता, उत्साह एवं सामूहिकता ऐतिहासिक रूप से देखने को मिलती है, वह हिन्दू समाज में सामान्यतया नहीं मिलती।

भारत के किसी धर्मगुरु, महापुरुष या राजा को कभी यह उम्मीद नहीं रहती कि उनकी समझ, साधना या दावे को बिना व्यक्तिगत रूप से परीक्षा किए या बिना व्यक्तिगत रूप से अंतरात्मा की साक्षी पाए, आम जन, प्रजा या अनुयायी सामूहिक अभियान का आधार बनाएँगे। फलस्वरूप समाजसुधार, धर्मसुधार, धर्म परिवर्तन या सांस्कृतिक पुनर्निमाण की प्रक्रिया भारत में सिद्धांत, विचारधाराओं या दर्शनप्रणालियों के आधार पर नहीं चलती। किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसकी विचारधारा या सिद्धांत के आधार पर सामान्यतया नहीं किया जाता। एक सीमा से ज्यादा सिद्धांत का महत्व नहीं माना जाता। व्यावहारिक आदर्श के पालन में एक प्रकार का लचीलापन पाया जाता है, जिसका आधार हर व्यक्ति की अपनी समझ, आत्मानुभूति एवं ब्रह्मानुभूति तथा समय-समय पर मिलने वाली अंतरात्मा की आवाज होती है।

यह लचीलापन विश्वामित्र, राम, कृष्ण एवं बुद्ध जैसे महापुरूषों में भी देखा जा सकता है। दूसरी ओर हरिश्चन्द्र एवं भीष्म पितामह की सिद्धांतवादिता एवं कठोर प्रतिज्ञा पर विपरीत परिस्थिति में भी कायम रहना एक प्रकार का अपवाद माना जा सकता है। सामान्यतया यह माना जाता है कि भाग्य का संबंध तो कर्मफल से है एवं अकर्म का फल नहीं होता। जबकि नियति का संबंध ईश्वर की इच्छा से है। फलस्वरूप विपरीत परिस्थिति एवं असहज विश्व व्यवस्था में भी सांस्कृतिक पहचान एवं सनातनी रीति-रिवाजों को कायम रखते हुए पुरुषार्थ करने की रणनीतिक चतुराई हिन्दू समाज में पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित की जाती रही है।

उपर्युक्त संदर्भ में, आधुनिक भारत के सिद्धांतकार स्वामी विवेकानंदजी माने जा सकते हैं, जबकि पारंपरिक भारत के समकालीन सिध्दान्तकार हिन्द स्वराज के सम्पादकजी (गांधीजी) माने जा सकते हैं। दोनों में अंतर्विरोध नहीं विविधता है। स्वामी विवेकानंद ‘शास्त्र’ से ‘लोक’ की यात्रा करते हैं और हिन्द स्वराज के सम्पादकजी ‘लोक’ से ‘शास्त्र’ की यात्रा करते हैं। स्वामी विवेकानंद का प्रशिक्षण मूलत: ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के विद्यालय, प्रेसिडेंसी कॉलेज एवं साधारण ब्रह्म समाज में हुआ था और इसी पश्चिमी दृष्टि एवं पृष्ठभूमि से गुजरते हुए स्वामी रामकृष्ण परमहंस के सान्निध्य में उनका रूपांतरण हुआ। रूपांतरण के बाद वे पश्चिम की यात्रा पर गये। उन्होंने पश्चिम के एक वर्ग को प्रभावित भी किया और पश्चिम की उपलब्धियों को उन्होंने स्वीकारा भी तथा कुछ हद तक पश्चिम से वे प्रभावित भी हुए। समकालीन समृद्धि से चमकते भारतवासियों को, एक अर्थ में, स्वामी विवेकानंद का मानस पुत्र कहना ज्यादा सही है, भले ही उनको मैकाले पुत्र कहने का चलन करीब-करीब रूढ़ हो चुका है।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस एक ऐसे पुल हैं- जिससे स्वामी विवेकानंद का आधुनिक भारत और महात्मा गांधी का पारंपरिक भारत स्वाभाविक रूप से जुड़ जाता है। स्वामी विवेकानंद ने पारंपरिक भारत की लोक परंपरा को समझने की गंभीर कोशिश नहीं की थी। महात्मा गांधी ने पारंपरिक भारत की शास्त्रीय परंपरा को समझने की कोशिश नहीं की थी। फलस्वरूप दोनों एक-दूसरे के पूरक कहे जा सकते हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस की दृष्टि में सभी धर्म सत्य हैं और प्रत्येक धर्म के द्वारा ईश्वर के निकट पहुँचा जा सकता है। यानी जितने मत, उतने पथ। सभी धर्म सत्य हैं और भिन्न भिन्न धर्मों का सहारा लेकर कोई भी आस्थावान व्यक्ति ईश्वर के पास पहुँच जाता है। ठीक उसी तरह जिस तरह नदियाँ भिन्न-भिन्न दिशाओं से आती हैं, परंतु सभी समुद्र में जा गिरती हैं। वहाँ पर सभी एक हैं।

श्रीरामकृष्ण की पहली मान्यता यह है कि सबसे पहले ईश्वर का दर्शन करना आवश्यक है। निराकार या साकार दोनों प्रकार के ईश्वर का दर्शन फलप्रद है। जो ईश्वर मन-वाणी से परे हैं, वे ही भक्त की सुविधा एवं कल्याण के लिए देहधारण करके दर्शन देते हैं और बात करते हैं। ईश्वर दर्शन के बाद, उनका निर्देश लेकर ही लोकहित के कार्य करने चाहिए। ईश्वर का निर्देश पाने के लिए पहले चित्त को शुद्ध करना चाहिए। मन एवं चित्त शुद्ध होने पर भगवान पवित्र आसन पर आकर बैठते हैं। रामकृष्ण कहते हैं कि पहले ईश्वर तत्व में डुबकी लगाओ। बिना डुबकी लगाये और ईश्वर का आर्शीवाद पाए, लोगों को समझाना कठिन काम है। भगवान के दर्शन के बाद यदि किसी को उनका आदेश प्राप्त हो, तो वह लोक-शिक्षा दे सकता है। भगवान के निर्देश के बिना लोकशिक्षा नहीं होती। वे सरलता से पूछते हैं कि शास्त्र कितना पढ़ोगे? केवल विचार करने से क्या होगा? पहले ईश्वर की कृपा प्राप्त करने की चेष्टा करो। पुस्तकें पढ़कर क्या जानोगे? पढ़ने तथा अनुभव करने में बहुत अंतर है। ईश्वर-दर्शन के बाद शास्त्र, विज्ञान आदि सब कूड़ा-कर्कट जैसे लगते हैं। बिना साधना एवं पुरुषार्थ के ईश्वर के साथ परिचय नहीं होता। ईश्वर प्राप्ति के लिए निर्जन में उन्हें पुकारो। कुछ दिन सब कुछ छोड़कर उन्हें अकेले में पुकारो। धर्म का उद्देश्य है- ईश्वर को प्राप्त करना, उनका दर्शन करना। श्री रामकृष्ण यह भी कहते हैं कि आस्थावान हिन्दू शब्दों और सिद्धांत के जाल में समय बिताना नहीं चाहता। वह यथाशीघ्र ईश्वर का साक्षात्कार कर लेना चाहता है। कारण, ईश्वर के केवल प्रत्यक्ष दर्शन से ही समस्त शंकाएँ दूर हो सकती हैं। अत: हिन्दू ऋषि आत्मा के विषय में, ईश्वर के विषय में अक्सर यही प्रमाण देते हैं कि ”मैंने आत्मा का दर्शन किया है, मैंने ईश्वर का दर्शन किया है।” हिन्दुओं की सारी साधाना-प्रणाली का लक्ष्य केवल एक ही है और वह है सतत अध्यवसाय द्वारा पूर्ण बन जाना, देवता बन जाना, ईश्वर के निकट पहुँचकर उनका दर्शन करना। और इस प्रकार ईश्वर-सान्निध्य को प्राप्त कर उनका दर्शन कर लेना, ईश्वर के समान पूर्ण हो जाना – यही असल में हिन्दू धर्म है।

रामकृष्ण कहते हैं कि धर्म केवल सिद्धांत या मतवादों में नहीं है। सभी धर्मों का चरम लक्ष्य है- आत्मा में परमात्मा की अनुभूति करना। यही एक सार्वभौमिक धर्म है। समस्त धर्मों में यदि कोई सार्वभौमिक सत्य है, तो वह है- ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन करना। परमात्मा और उनकी प्राप्ति के साधनों के संबंध में विभिन्न धर्मों की धारणाएँ भिन्न भिन्न भले ही हो, पर उन सब में वही एक केंद्रीय भाव है। सहस्र त्रिज्याएँ भले ही हों, पर वे सब एक ही केंद्र में मिलती है, और यह केंद्र है ईश्वर का साक्षात्कार। इस इन्द्रिय-ग्राह्य जगत् के पीछे, इस निरन्तर खाने-पीने और थोथी बकवास के पीछे, इन उड़ते छाया-स्वप्नों और स्वार्थ से भरे इस संसार के पीछे वर्तमान किसी सत्ता की अनुभूति। समस्त ग्रन्थों और धर्ममतों के अतीत, इस जगत् की असारता से परे वह विद्यमान है, जिसकी अपने भीतर ईश्वर के रूप में प्रत्यक्ष-अनुभूति होती है। कोई व्यक्ति संसार के समस्त गिरजाघरों में आस्था भले ही रखता हो, अपने सिर में समस्त धर्मग्रन्थों का बोझ लिये भले ही घूमता हो, इस पृथ्वी की समस्त नदियों में उसने भले ही बपतिस्मा लिया हो, फिर भी यदि उसे ईश्वर-दर्शन न हुआ हो तो, उसे रामकृष्ण घोर नास्तिक ही मानते हैं।
स्वामी विवेकानंद ने भी अपने राजयोग नामक ग्रन्थ में लिखा है कि सभी धार्माचार्यों ने ईश्वर को देखा था। उन सभी ने आत्मदर्शन किया था; अपने अनन्त स्वरूप का सभी को ज्ञान हुआ था, अपनी भविष्य अवस्था देखी थी और जो कुछ उन्होंने देखा था, उसी का वे प्रचार कर गये हैं। भेद इतना ही है कि प्राय: सभी धर्मों में, विशेषत: आजकल के, एक अद्भुत दावा हमारे सामने उपस्थित होता है; वह यह है कि इस समय ये अनुभूतियाँ असंभव है; जो धर्म के प्रथम संस्थापक हैं, बाद में जिनके नाम से उस धर्म का प्रवर्तन और प्रचलन हुआ है, केवल उन थोड़े आदमियों को ही ऐसा प्रत्यक्षानुभव संभव हुआ था; अब ऐसे अनुभव के लिए रास्ता नहीं रहा, फलत: अब धर्मों पर केवल विश्वास भर कर लेना होगा। विवेकानंद कहते हैं कि इसको पूरी शक्ति से अस्वीकृत करता हूँ। यदि संसार में किसी प्रकार के विज्ञान के द्वारा किसी भी विषय की किसी व्यक्ति ने कभी प्रत्यक्ष अनुभूति या उपलब्धि प्राप्त की है, तो इससे इस सार्वभौमिक सिद्धांत पर पहुँचा जा सकता है कि पहले भी कोटि-कोटि बार उसकी उपलब्धि की संभावना थी, बाद को भी अनन्त काल तक उसकी उपलब्धि की सम्भावना रहेगी। समवर्तन ही प्रकृति का सार्वभौमिक नियम है। एक बार जो घटित हुआ है, वह फिर घटित हो सकता है।

बन जाने के बाद साधारण ब्रह्म-समाज नामक एक अलग समूह विकसित हुआ, जिसके अनुयायियों में ब्रह्मबांधाव उपाध्याय और नरेन्द्रनाथ दत्त आदि शामिल थे। नरेन्द्रनाथ दत्त केशवचंद्र सेन के मित्र स्वामी रामकृष्ण परमहंस के प्रभाव में आते चले गये और बाद में स्वामी विवेकानंद कहलाये। स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि संसार के अन्य धर्मों की तुलना में हिन्दू धर्म में एक भाव विशेष रूप से पाया जाता है। वह भाव यह है कि मनुष्य को इसी जीवन में ईश्वर की प्राप्ति करनी होगी। इस प्रकार, द्वैतवादियों के मतानुसार ब्रह्म की उपलब्धिा करना, ईश्वर का साक्षात्कार करना, या अद्वैतवादियों के कहने के अनुसार ब्रह्म को जानना – यही वेदों के समस्त उपदेशों का एकमात्र लक्ष्य है।

रामकृष्ण परमहंस ने भी पुराणों के आधार पर इसी को दूसरे तरीके से कहा है। एक पुराण के मत में श्रीकृष्ण चिदात्मा हैं और श्रीराधा चित्शक्ति। एक दूसरे पुराण में श्रीकृष्ण को ही काली और आद्याशक्ति कहा गया है। देवी पुराण के मत से काली ने ही कृष्ण का स्वरूप धारण किया है। वास्तव में ईश्वर अनंत हैं और उन तक पहुँचने के मार्ग भी अनंत हैं। जिसने यह रहस्य समझ लिया है, उस पर ईश्वर की दया है। ईश्वर की कृपा हुए बिना कभी संशय दूर नहीं होता। असल बात यह है कि किसी तरह उन पर भक्ति होनी चाहिए, प्यार होना चाहिए। अनेक खबरों से क्या काम है? एक रास्ते से चलते-चलते अगर उन पर प्यार हो जाये तो काम बन गया। प्यार के होने से ही उन्हें आदमी पाता है। इसके बाद अगर जरूरत होगी तो वे समझा देंगे – सब रास्तों की खबर बतला देंगे। ईश्वर पर प्यार होने से हीं काम हुआ- तरह-तरह के विचारों की क्या आवश्यकता है? आम खाने के लिए आए हो आम खाओ, कितनी डालियाँ हैं, कितने पत्ते हैं, इन सब के हिसाब से क्या मतलब? हनुमान का भाव चाहिए- ”मै वार, तिथि, नक्षत्र, यह सब कुछ नहीं जानता, मैं तो बस श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया करता हूँ”।

इस तरह हम देखते हैं कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं और स्वामी विवेकानंद के आध्यात्मिक व्यावहारिकतावाद संबंधी विचारों में गहरा संबंध है। स्वामी विवेकानंद अंग्रेजी राज को बिना नाराज किये अंग्रेजी राज द्वारा इस देश में स्थापित एवं प्रायोजित आधुनिक परिस्थितियों का सनातनी भारत के युगानुकूलन एवं विकास के लिए सदुपयोग करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने एक खास प्रकार की रणनीति अपनाई- जिसमें भगवान बुद्ध की तरह, अप्रिय एवं विवादास्पद हो सकने वाले प्रसंगों पर, मौन रहना या बिना विस्तार में गये सांकेतिक बात करना शामिल था। उनकी इस रणनीति को समझे बिना विवककानंद साहित्य को सेमेटिक धर्मग्रंथों की तरफ पाठ करने के पिछले 100 वर्षों में खतरनाक अर्थ निकाले गये हैं और विवेकानंदजी की बातों के अर्थ का अनर्थ तक किया गया है।

कुछ विवेकानंदवादी लोग भारत की गुलामी और गुलामी के दौरान भारतीय लोगों की बदहाली और भारतीय संस्कृति को पोषित करने वाली संस्थाओं एवं विशेषज्ञों के क्षरण तथा विरूपीकरण में आधुनिक पश्चिमी सभ्यता की प्रतिनिधि अंग्रेजी राज के कारनामों को बहुत सफाई से नजरंदाज कर, अंतत: वर्गहितों की अप्रत्यक्ष वकालत करते नजर आते हैं। ये लोग खगोलीकरण को समर्थन देने के लिए अंग्रेजी राज के पापों को भी जाने-अनजाने आध्यात्मिक तर्कबोध से नजरअंदाज कर देना चाहते हैं। ऐसा करके उनका उद्देश्य अंग्रेजी राज के दौरान भारतीय इतिहास को बदलना और स्वतंत्रता आंदोलन एवं महात्मा गांधी के योगदान को कम करना होता है। इसके विपरीत, महात्मा गांधी की चिन्ता सनातन भावबोध एवं सनातन राजनैतिक अर्थशास्त्र का समन्वय करके एक ऐसी सभ्यता के विकास को संभव बनाना था, जिसमें पूरब और पश्चिम दोनों जगह के आम जनों का सर्वांगीण विकास हो, परंतु वह किसी दूसरे व्यक्ति, समाज, राष्ट्र या सभ्यता के साथ शोषण, लोभ, छल, हिंसा या असत्य पर आधारित नहीं हो।

गांधी जैसे राम भक्त वैष्णव ने गीता की केन्द्रीयता अकारण नहीं स्वीकारी थी। आदि शंकराचार्य के समय से विद्वान (ज्ञानी) कहलाने या स्वीकारे जाने के लिए प्रस्थान त्रयी (ब्रह्मसूत्र, उपनिषद् एवं गीता) पर भाष्य करना आवश्यक माना जाता रहा है। अंग्रेजी राज के दौरान बंगाल के एशियाटिक सोसाइटी में विलियम जोन्स, कोलब्रुक, विलकिंस जैसे भारतविद्या (इंडोलॉजी) के झंडाबरदारों ने प्रस्थान त्रयी में से सबसे पहले ब्रह्मसूत्र को महत्वहीन घोषित किया। फिर 9 उपनिषदों को वैकल्पिक घोषित किया और अंत में ईसाइयों के बाइबिल और मुसलमानों के कुरान की तर्ज पर हिन्दुओं के गीता को एक पवित्र ग्रंथ के रूप में स्थापित किया। इसी काम को ईस्ट इंडिया कम्पनी की महत्वाकांक्षी प्रकाशन योजना ‘द सेक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट’ (पूर्वी सभ्यताओं के पवित्र ग्रंथ) ने तार्किक परिणति प्रदान की। कम्पनी ने इस श्रृंखला का संपादक ऐसे व्यक्ति (मैक्समूलर) को बनाया, जो न तो संस्कृत का मान्यता प्राप्त विद्वान था और न भारतीय संस्कृति का व्यवस्थित जानकार। जबकि उस वक्त यूरोप में ऐसे सैकड़ों लोग उपलब्ध थे, जिन्हें संस्कृत भाषा, भारतीय दर्शन एवं सनातन परंपरा के बारे में मैक्समूलर की तुलना में ज्यादा व्यवस्थित और ज्यादा गहरी जानकारी थी। फलस्वरूप जाने-अनजाने मैक्समूलर जैसे विद्वानों ने वेदों को वैदिक जनजातियों (गड़ेरिया आदि) का ऐसा गीत मान लिया, जिसका केवल ऐतिहासिक विकास की प्रारंभिक, अज्ञानपूर्ण अवस्था को समझने में भाषा विज्ञान एवं इतिहास की दृष्टि से सीमित महत्व था।

राममोहन राय से लेकर, ईश्वरचंद्र विद्यासागर तक, राणाडे से लेकर रवीन्द्रनाथ टैगोर तक अधिकांश पढ़े लिखे लोगों ने वेद एवं वैदिक वाङमय को नकार दिया। धर्म की पारंपरिक व्याख्या, इसके पारंपरिक स्वरूप और इसके पारंपरिक स्रोतों का स्थान आधुनिक यूरोप के भारतविद्याविदों के विमर्श ने ले लिया। यह मान लिया गया कि भारत के पास गर्व करने लायक केवल एक ही चीज है- इसका मोक्ष प्राप्ति एवं संसारिक सुख-दुख, सफलता-असफलता, लाभ-हानि, गुलामी-स्वतंत्रता आदि को ”माया” मानने वाला असंसारिक अध्यात्म, जबकि आधुनिक पश्चिम के पास है- एक ऐसा विज्ञान, तकनीक, दर्शन, समाजविज्ञान एवं मानविकी जिसके आधार पर कोई भी समाज विकसित, समृध्द एवं बलशाली बन सकता है। भारतीय अध्यात्म को स्थापित करने एवं समझने-समझाने के लिए शंकराचार्य को भारतीय दर्शन का इमैनुएल कैंट कहा गया है और उनके द्वारा लिखित गीता भाष्य को बाइबिल जैसा केन्द्रीय ग्रंथ घोषित कर दिया गया। फलस्वरूप अंग्रेजी ढंग और माधयम से पढ़े-लिखे भारतीय लोग अपनी परंपरा से विचलित होकर एक कृत्रिम बौद्धिक विमर्श में उलझने लगे। इस स्थिति से उबरने के लिए दो-तीन रास्तों की चर्चा होने लगी। इस आधार पर तीन वर्ग विकसित हुए:

(1) पहला वर्ग ऐसे भारतीयों का रहा है, जिन्हें लगता है कि भारत में ऐसा कुछ भी नहीं है जो काम लायक, सुखदायक या संतोषप्रद है। जो भी अच्छा है, वह या तो मधयकाल में तुर्कों, मंगोलों, अफगानों, पारसियों के संपर्क से आया है या अंग्रेजों, फ्रांसिसियों, पुर्तगालियों, जर्मनों, डचों एवं अमेरिकी प्रभाव से आया है। अत: भविष्य बनाने के लिए हमें हर हाल में पश्चिम की नकल करना पड़ेगा। कोई और रास्ता नहीं है। इस वर्ग के नायक राजा राममोहन राय, डेविड हेयर और हेनरी विवियन डिरोजियो एवं इनके अनुयायी रहे हैं। राममोहन राय के अनुयायी ब्रह्म-समाज नामक संगठन में एवं डिरोजियो की शिष्य मंडली ”तरुण बंगाल” नामक मंच तले सक्रिय रहे हैं। 1833 में राममोहन राय की मृत्यु के कुछ समय बाद ब्रह्म-समाज द्वारकानाथ टैगोर के परिवार (बेटे देवेन्द्रनाथ टैगोर और पोते रवीन्द्रनाथ टैगोर) एवं केशवचंद्र सेन के अनुयायियों में बँट गया। केशवचंद्र सेन के ईसाई बन जाने के बाद साधारण ब्रह्म समाज नामक एक अलग समूह विकसित हुआ, जिसके अनुयायियों में ब्रह्मबांधव उपाध्याय और नरेन्द्रनाथ दत्ता आदि शामिल थे। नरेन्द्रनाथ दत्त, केशवचंद्र सेन के मित्र स्वामी रामकृष्ण परमहंस के प्रभाव में आते चले गए और बाद में स्वामी विवेकानंद कहलाए।

ब्रह्मबांधव उपाध्याय केशवचंद्र सेन की तरह ईसाई बन गये। डिरोजियो के अधिकांश अनुयायी ईसाई धर्म स्वीकार कर प्राचीन परंपराओं की खिल्ली उड़ाने लगे एवं सामाजिक तथा धार्मिक रीतियों की उपेक्षा करते हुए नारी शिक्षा, मद्यपान एवं गो-मांस भक्षण की वकालत करने लगे। राममोहन राय के अन्य अनुयायियों में विजयकृष्ण गोस्वामी प्रमुख थे। आरंभ में वह भी ब्रह्म-समाजी थे, लेकिन बाद में वैष्णव संत बन गये। स्वदेशी आंदोलन के चार प्रमुख कर्णधार-विपिनचंद्र पाल, अश्विनीकुमार दत्त, सतीशचंद्र मुखर्जी और मनोरंजन गुहा ठाकुर चारो विजय कृष्ण गोस्वामी के ही शिष्य थे।

ईश्वरचंद्र विद्यासागर पर भी राममोहन राय का महत्वपूर्ण प्रभाव था। भारत के मार्क्सवादियों में से अधिकांश खुद को राममोहन राय और उनके ब्रह्म समाज आंदोलन से किसी न किसी रूप में प्रभावित मानते रहे हैं। इस वर्ग के समकालीन अनुयायियों में से अधिकांश आजकल भारत में रहना अपनी लाचारी मानते हैं और जब भी मौका मिलता है, भारत और भारतीयों को हीन एवं हीनतर कहने, लिखने एवं साबित करने में जुटे रहते हैं।

राजा राममोहन राय ने अपने दृष्टिकोण में पूर्व तथा पश्चिम के सर्वोतम विचारों का समन्वय स्थापित करना चाहा था। उन्होंने अपनी युवावस्था में वाराणसी में परंपरागत संस्कृत साहित्य तथा सभ्यता का अधययन किया। पटना में उन्होंने फारसी और अरबी विद्या का गंभीरता से अवगाहन किया। दूरवर्ती, समतल मैदानी तथा पर्वतीय भूभागों की यात्रा करके, उन्होंने विभिन्न प्रांतीय संस्कृतियों, तिब्बती बौद्ध-धर्म तथा जैन-धर्म का भी ज्ञानोपार्जन किया। आगे चलकर, उन्होंने अपने जीवन में अंग्रेजी विचारों तथा पाश्चात्य सभ्यता पर भी यथेष्ट अधिकार प्राप्त किया। ईसाई धार्मिक साहित्य का उन्हें पूर्ण ज्ञान था। जीवन के चौथे दशक में, उन्होंने फारसी में लिखित ”तुहफ़त-उल-मुवाहिदीन” (एकेश्वरवादियों को उपहार) नामक पुस्तक में यह तर्क दिया कि सभी धर्मों की स्वभाविक प्रवृत्ति एकेश्वरवाद की ओर है, किंतु दुर्भाग्यवश लोगों ने सदा अपने विशिष्ट संप्रदाय, पूजन-विधि तथा आचरण पर अधिक बल दिया है, जिसके कारण एक धर्म दूसरे से पृथक बन जाता है। 1815 और 1817 ई. के बीच उन्होंने ”वेदांत” का बंगला अनुवाद तथा उसका एक संक्षिप्त संस्करण प्रकाशित किया। उन्होंने बताया कि विवेकहीन मूर्तिपूजा के फलस्वरूप जनसाधारण का चारित्रिक पतन हुआ है। इसलिए वे अपना कर्तव्य समझे हैं कि उसे उसके भार तथा तद्जन्य दासता से मुक्ति दिलाएँ एवं उनकी सुख-समृध्दि में वृध्दि लाएँ। उनके विचार से कोई भी विशेष धर्मग्रंथ त्रुटियों से रहित नहीं और यह मानव का जन्मजात अधिाकार है कि वह परंपराओं से हटकर चले, विशेषकर यदि परंपराएँ ”सीधे अनैतिकता की ओर ले जाती हों और सामाजिक सुखों के मार्ग में बाधाक बनती हों।” 1820 में उन्होंने ”यीशु के वचन” (प्रीसेप्ट्स ऑफ़ जीसस) का प्रकाशन किया। इसमें उन्होंने विशिष्ट ईसाई सिद्धांत तथा ईसाई महापुरूषों के चमत्कारिक कृत्यों की कहानियों के प्रति आस्था से यीशु के नैतिक संदेशों को पृथक किया। उनके विचार से लोगों पर ईसाई धर्म की नैतिक शिक्षा का उनके आध्यात्मिक धर्मशास्त्र की अपेक्षा अधिक प्रभाव पड़ता है। शुरू-शुरू में ईसाई धर्म प्रचारकों को राममोहन राय काफी अनुकूल लगते थे और इस अनुकूलता के बदले उन्हें सहयोग भी दिया गया। परंतु धीरे-धीरे राममोहन राय से उनका मोह भंग होने लगा। फलस्वरूप, ईसाई धर्म प्रचारकों ने साहसी धर्म विरोधियों से संघर्ष प्रारंभ कर दिया था। 1820 और 1823 के बीच राममोहन राय ने अपनी स्थिति के पक्ष में ”ईसाई जनता के प्रति तीन अपीलें” (अपील्स टू द क्रिश्चियन पब्लिक) प्रकाशित कीं। 1821 और 1823 के बीच ”ब्रह्म समाज” नामक पत्रिका (ब्रह्मैनिकल मैग़जीन) में उन्होंने भारत की विशिष्ट परंपराओं के प्रति गहरी आस्था व्यक्त की और अपने देशवासियों की ओर से- ऐसे ईसाई धर्म प्रचारकों का विरोध किया जो निर्धन, भीरू एवं विनीत भारतवासियों का बलात् धर्म परिवर्तन करते थे तथा अपने धर्म के पक्ष में कोई विवेकपूर्ण तर्क प्रस्तुत न करके, देशी धर्मों की खिल्ली उड़ाते थे। ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले व्यक्तियों को सांसारिक प्रलोभन दिये जाने का भी राममोहन राय ने बाद के दिनों में विरोध किया। परंतु अंत तक राममोहन राय ईसाई धर्म के उत्तम स्वरूप के विरोधी न थे। वे उसे अपने देशवासियों पर अच्छा प्रभाव मानते थे। उन्होंने बांग्ला भाषा में बाइबिल के गॉस्पेल (सुसमाचार) का अनुवाद करने में सिरामपुर के कुछ पादरियों की कुछ सहायता भी की थी। 1830 में उन्होंने स्कॉटिस धर्म प्रचारक डफ को नास्तिक शिक्षा के विरुद्ध जेहाद में भी अत्यधिक सहायता की। धीरे-धीरे वह एक ऐसे विश्व धर्म की ओर अग्रसर हो रहे थे, जो हिन्दू और ईसाई परंपराओं के एकेश्वरवादी बुद्धिवाद एवं विवेकवाद पर आधारित मानववादी धर्म होता। परंतु 1933 में उनकी आकस्मिक मृत्यु हो गई और वे ब्रिटेन के एक ईसाई कब्रिस्तान (यूनियनिस्ट चर्च) में ही दफनाये गये जहाँ आज भी यूनियनिस्ट चर्च और ब्रह्मसमाज की सम्मिलित सभाएँ होती हैं। धीरे-धीरे ब्रह्म समाज आंदोलन विपरीत दिशाओं में विभाजित होकर बिखरने लगा।
ऐतिहासिक रूप से राममोहन राय पहले भारतीय माने जाते हैं, जो भारत पर समृद्ध पश्चिमी प्रभाव के प्रतीक बने। राममोहन राय हमेशा दिखावटी धर्म और संस्कृति की सीमाओं को तोड़ने की कोशिश करते रहे। यहाँ तक कि इस बात पर भी संदेह किया जा सकता है कि यूरोपीय अर्थों में धार्मिक न होकर एग्नॉस्टिक थे और विश्व धर्म की उनकी योजना अकबर के ‘दीन-ए-इलाही’ की तरह का एक रणनीतिक प्रोजेक्ट था, न कि आस्थावान अभियान। यदि वह किसी धर्म में विश्वास करते भी थे तो, उनके विश्वास के धर्म का अर्थ उस अर्थ से पूर्णतया भिन्न था, जो हम सामान्यता धर्म से लेते हैं। हालांकि राममोहन राय के एकेश्वरवादियों से घनिष्ठ संबंध थे, लेकिन उनके विचारों में उनकी पूर्ण आस्था नहीं थी। उनके ”यथार्थवाद” ने उन्हें बताया कि भारतीय समाज बीमार है। राममोहन ने अपने देशवासियों की बीमारी का निदान विश्व संस्कृति के व्यापक संदर्भ में खोजा। उनके कार्य को ब्रह्म समाज के बाहर डिरोजियो के अनुयाइयों और ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने आगे बढ़ाया। राममोहन की परंपरा में अंतिम महान व्यक्ति रवींद्रनाथ टैगोर थे। 1920-21 के राष्ट्रवादी जोश में जब भारत आंदोलित था, तो महात्मा गांधी ने राममोहन राय को ”उपनिषदों के अनजान लेखकों की तुलना में बौना” कहा था। इरफान हबीब, तपन रायचौधारी एवं धर्मपाल जैसे इतिहासकारों ने अंग्रेजी राज से पहले के भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था, विज्ञान एवं तकनीक तथा शिक्षा के बारे में प्रामाणिक दस्तावेज एवं सूचनाएँ प्रकाशित की हैं, जिसके आधार पर भारतीय समाज बीमार नहीं, बल्कि काफी समृद्ध एवं खुशहाल नजर आता है। दादा भाई नौरोजी एवं रमेश चंद्र दत्त जैसे विद्वानों ने अपने लेखन से यह साबित कर दिया था कि भारत में गरीबी, भुखमरी एवं शोषण का जैसा अत्याचार अंग्रेजी राज में अंग्रेजों की गलत नीतियों के कारण हुआ, वह पहले के भारतीय इतिहास में नहीं पाया गया। समकालीन इतिहासकार भी यही मानते हैं कि राममोहन राय की विचारधारा भारतीय इतिहास के यथार्थ से प्रभावित नहीं होकर, अंग्रेजी राज की विचारधारा और कुप्रचार से प्रभावित थी।

(2) दूसरे वर्ग के नायक स्वामी दयानंद सरस्वती माने जाते हैं। स्वामी दयानंद ने कहा कि हमें पश्चिम से विज्ञान-तकनीक सीखने की आवश्यकता नहीं है। उनके अनुसार हमारी वैदिक परंपरा में – वेदों में – विज्ञान एवं तकनीक भरा पड़ा है। फलस्वरूप वे और उनके अनुयायी वैदिक साहित्य में आधुनिक किस्म के विज्ञान एवं तकनीक खोजने लगे। आगे चलकर दयानंदजी के अनुयायी दो समूहों में, दो रास्तों पर चलने लगे (क) गुरुकुल कांगड़ी से जुड़े अनुयायी (पंडित गुरुदत्त, लाला मुंशीराम, पंडित लेखराम आदि) पारंपरिक विज्ञान एवं तकनीक के अध्ययन, अध्यापन एवं प्रयोग में लग गये (ख) दयानंद ऐंग्लो वैदिक विद्यालय एवं महाविद्यालय चलाने के लिए कटिबद्ध लोग (लाला हंसराज, राय मथुरादास, लाला लाजपत राय आदि) वैदिक परंपरा एवं अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के बीच, कुछ स्वप्रेरणा से तो कुछ थियोसोफिकल सोसाइटी के प्रभाव में, समन्वय की कोशिश करने लगे। परंतु दोनों समूहों के आर्य-समाजी दो अन्य बातों पर सहमत थे कि (क) हिन्दू समाज इसलिए गुलामी में जीने को अभिशप्त है, चूँकि यह सामाजिक कुरीतियों एवं अंधविश्वास के कारण भीतर से कमजोर और दिशाहीन हो गया है; (ख) इससे निजात पाने का एकमात्र उपाय यूरोपीय ढंग़ के सुधार (धर्म एवं समाज सुधार) आंदोलन से निकलेगा। स्वामी दयानंद सरस्वती की पुस्तक ‘सत्यार्थ प्रकाश’ एवं ‘ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका’ का आर्यसमाजियों के लिए वही महत्व हो गया, जो बंगाल के सुधारवादियों के लिए गीता एंव उपनिषदों के शंकर भाष्य का था।

स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 1824 में एवं मृत्यु 30 अक्टुबर 1883 में हुई। 1857 की क्रांति के दौरान ये मेरठ के आसपास सक्रिय थे। मंगल पांडे पर इनका प्रभाव माना जाता है। स्वामी दयानंद 1860 से 1863 तक स्वामी विरजानंद के सान्निध्य में रहे और यहीं से इनकी जीवन धारा बदल गई। अब इनके जीवन का लक्ष्य हिन्दू धर्म की असंगतियों को दूर करना तथा वैदिक धर्म को पुन: स्थापित करना हो गया। 1872 ई. में दयानंदजी कलकत्ता गये, जहाँ इनकी मुलाकात देवेन्द्रनाथ टैगोर आदि से हुई। 1875 ई. में आर्य समाज, बंबई की स्थापना हुई तथा ”सत्यार्थ प्रकाश” का प्रकाशन हुआ। 27 फरवरी 1886 को डी. ए. वी. ट्रस्ट एवं सोसाइटी की पहली बैठक शुरू हुई एवं 1 जून 1886 को लाहौर में डी. ए. वी. स्कूल शुरू हो गया। 1886 के बाद आर्य समाज दो भागों में विभाजित होकर काम करने लगा।

सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानंद ने हिन्दू धर्म और समाज के पुनर्गठन के लिए वैदिक धर्म को आधार बनाया है। इस पुस्तक में उन्होंने अपने समय में फैली धार्मिक कुरीतियों, जड़ता, पाखंड और भ्रष्टाचार की कड़ी आलोचना की है। भारत के नवजागरण में दयानंद की खास पहचान सत्यार्थ प्रकाश के प्रकाशन के बाद बनी। उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए आवाज उठायी, किन्तु राष्ट्रीय एकता की उनकी अवधारणा सभी भारतवासियों द्वारा वेदों की सत्ता और हिन्दू धर्म को स्वीकार करने पर आधारित थी। उन्होंने प्रार्थना समाज और ब्रह्म समाज के सामाजिक सुधारकों की निंदा की, क्योंकि ”इन समाजों के लोगों में देशभक्ति का अत्यधिक अभाव है और अनेक बातों में उन्होंने ईसाइयों का अनुकरण किया है।” ब्रह्म समाज का विरोध करने का एक कारण यह था कि ”ब्रह्म समाज की पवित्र पुस्तक में संतों की सूची में ईसा, मूसा, मोहम्मद, नानक और चैतन्य तक के नाम दिये गये हैं, किन्तु अतीत के ऋषियों में से एक का नाम भी नहीं है। इससे कोई भी सहज ही समझ सकता है कि इन लोगों की मान्यताएँ वे ही हैं, जो इनकी पवित्र पुस्तक में गिनायी विभूतियों की शिक्षाओं से उद्भूत हैं।”

आर्य समाज ने जनता में देशभक्ति की भावनाएँ इस पुनरुत्थानवादी नारे के आधार पर जगाने की कोशिश की- ‘वेदों की ओर लौटो!’ वे वेदों को ईश्वर का वाक्य मानते थे, अत: उनमें किसी प्रकार की त्रुटि की सम्भावना नहीं थी। दयानंद के अनुसार वेद न केवल अतीत के संबंध में, वरन भविष्य के बारे में भी, ज्ञान के मूर्त रूप थे। ”वेदों को स्वीकार करने से सम्पूर्ण सत्य स्वीकार कर लिया जाता है।” राजा राममोहन राय एवं राणाडे वैदिक अवधारणाओं और तर्क में टकराव होने पर जहाँ तर्क का पक्ष लेना श्रेयष्कर समझते थे, वहाँ दयानंद का यह दृढ़ मत था कि वेद ही किसी समस्या का अंतिम समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं। उन्होंने अपनी विचारधारा को निम्न रूप में अभिव्यक्त किया है: ”मैं मानता हूँ कि चारों वेद- जो ज्ञान और धर्म संबंधी सत्यों के निधान हैं – स्वंय ईश्वर के वचन हैं। उनमें केवल संहिता मंत्रों का संकलन है। वे त्रुटियों से पूर्णत: मुक्त हैं और स्वयमेव सबसे बड़ी सत्ता है। दूसरे शब्दों में, उनकी सत्ता की प्रामाणिकता के लिए किसी अन्य ग्रंथ की आवश्यकता नहीं है। जिस प्रकार सूर्य अथवा दीपक अपने प्रकाश से स्वयं अपने स्वरूप तथा ब्रह्माण्ड की अन्य वस्तुओं, जैसे पृथ्वी आदि, को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार वेद प्रकाशित हैं।”

‘सत्यार्थ प्रकाश’ 19वीं सदी में हिन्दू नवजागरण का महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना 1874 में की गई थी और पहली बार यह 1875 में स्टार प्रेस, बनारस से छपा। आर्यसमाजी इसे आधार ग्रंथ के रूप में लेते हैं। सत्यार्थ प्रकाश से समाज का जो हिस्सा प्रभावित हुआ, उसमें खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पंजाब के खत्री, अरोड़े, बनिए, कायस्थ और जाट जैसी मंझोली और ऊँची जातियों का अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त वर्ग था, जिसने ऊँची सरकारी नौकरियों और व्यापार से अपनी आर्थिक हालत अच्छी बना ली थी और पौराणिक धर्म की अतार्किक खर्चीली प्रथाओं से मुक्त होकर अपनी शिक्षा के अनुरूप एक नई प्रभावशाली धामिर्क-सांस्कृतिक पहचान बनाना चाहता था। यही वर्ग आर्यसमाज आंदोलन का सामाजिक आधार बना। लेकिन खुद दयानंद अंग्रेजी शिक्षा और यूरोपीय आधुनिकता के सम्पर्क में कभी नहीं आए। रामकृष्ण परमहंस और दयानंद, दोनों को अंग्रेजी शिक्षा नहीं मिली थी, फिर भी इन दोनों सन्यासियों ने अपने समय के अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त युवकों को सबसे ज्यादा आकर्षित किया।

दयानंद का नवजागरण, अंग्रेजी शिक्षा और पश्चिमी मूल्यों से प्रेरित न होकर, हिन्दू धर्म के पतन के खिलाफ एक प्रतिक्रिया के रूप में उभरा था। हिन्दू धर्म और समाज की बुराइयों के खिलाफ उन्होंने विद्रोह किया। इस विद्रोह की जड़े लोकतंत्र और बुध्दि-विवेकशीलता की आधुनिक यूरोपीय धारणाओं में न होकर, भारत की शास्त्रीय परंपरा में थी। परंतु उस वक्त तक इस देश में अंग्रेजी राज और पश्चिमी प्रभाव इतना हावी हो चुका था कि स्वामी दयानंद को अपने देश की संस्कृति और शास्त्रों की सनातनता खतरे में लगने लगी। उनकी प्रतिक्रिया में शत्रु की सबलता और अपनी संस्कृति की निर्बलता का काफी गहरा अहसास देखा जा सकता है। शत्रु से लड़ने के लिए उन्होंने शत्रुओं के शास्त्रीय मानदंड एवं तर्क प्रणाली का हथियार के रूप में इस्तेमाल शुरू किया। फलस्वरूप, उनके तर्क इस्लाम, ईसाइयत और ब्रह्म समाजियों के साथ-साथ सनातनी संप्रदायों के खिलाफ इस्तेमाल होते रहे। कुल मिलाकर आर्य समाज भारत के हिन्दुओं का एक गैर सनातनी संप्रदाय बन कर उभरा जो यूरोपीय मानदंडों पर धर्म एवं समाज के सुधार के लिए प्रतिबद्ध था।

दयानंद जिस धार्मिकता को कायम करना चाहते थे, उसकी बुनियाद में दो सबसे खास बातें थीं- तर्क और नैतिकता। उन्होंने बहुदेववाद को अस्वीकार किया, निराकार ईश्वर की आराधना का समर्थन किया, परंपरागत ब्रह्मण पुरोहितों की अंध-कट्टरता की आलोचना की, मूर्ति पूजा और बाल विवाह का विरोध किया तथा शिक्षा के प्रसार द्वारा नीची जाति के हिन्दुओं और स्त्रियों के स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयत्न किया। इन सभी कार्रवाइयों के पीछे उनका उद्देश्य ”हिन्दू धर्म” को सुदृढ़ बनाना था।

जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था मानने का विरोध करते हुए दयानंद ने तर्क दिया कि ”जो कोई वर्णाश्रम व्यवस्था माने और गुण कर्मो के योग से न माने तो, उससे पूछना चाहिए कि, जो कोई वर्ण अपने को छोड़ नीच, अन्त्यज अथवा क्रिश्चियन, मुसलमान हो गया हो तो, उसको भी ब्राह्मण क्यों नहीं मानते? यहाँ यही कहोगे कि उसने ब्राह्मण के कर्म छोड़ दिए इसलिए वह ब्राह्मण नहीं है।” दयानंद कहते हैं कि वैदिक साहित्य (वेदों और मनुस्मृति) में वर्ण जन्म पर आधारित न होकर गुण-कर्म पर आधारित है: ”जिस-जिस पुरुष में जिस-जिस वर्ण के गुण-कर्म हो, उस-उस वर्ण का अधिकार देना।” स्वामी दयानंद के अनुसार ऐसी हीं वर्ण व्यवस्था से समाज की तरक्की होगी। इससे ऊपरवाले वर्णों को डर रहेगा कि अगर हमारे गुण-कर्म ठीक नहीं रहे तो, हमें निचला वर्ण में जाना पड़ेगा। साथ हीं नीचे के वर्ण वालों को हौसला मिलेगा कि अच्छे गुण-कर्म करके ऊपर के वर्ण में पहुँचा जा सकता है। दयानंद के तर्कशील विचारधारा के असर से 19वीं सदी के कारोबारी लोगों और शिक्षित शहरी मधयवर्ग ने धर्म और समाज के प्रति एक विवेकशील रवैया अपनाया था। तर्क और नैतिकता पर धार्मिकता को खड़ा करने के लिए ही ज्ञान पर जोर दिया। इसने शिक्षित मधयवर्ग के अंदर स्वदेशीपन और आत्मगौरव का भाव जगाया। धर्म को सामाजिक दृष्टि से उपयोगी और मनुष्य के लिए प्रेरणादायक बनाने वाले दयानंद ने विदेशी विज्ञान और तकनीक को भी मान्यता दी। लेकिन विदेशी संस्कृति और धर्म का विरोध किया।

(3) तीसरे वर्ग के नायक स्वामी रामकृष्ण के शिष्य स्वामी विवकोनंद माने जाते हैं। स्वामी विवेकानंद ने यह स्वीकार लिया कि भारत का भविष्य भारतीय वेदान्त (उपनिषद् एवं गीता के शंकर भाष्य पर आधारित अद्वैत वेदांत) एवं पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान, दर्शन एवं नैतिकता के समन्वय पर ही निर्भर करता है। वेदान्त के तत्व ज्ञान से आत्मा को खुराक मिलेगी, परंतु शरीर एवं मस्तिष्क के पालन पोषण के लिए पश्चिम की मदद, पश्चिम की प्रेरणा आवश्यक है। आधुनिक पश्चिम की सभ्यता को स्वामी विवेकानंद मध्यकालीन यूरोप की ईसाई परंपरा की तुलना में सनातन हिन्दू परंपरा के ज्यादा अनुकूल, एक तरह से पूरक तत्व मानते थे। फलस्वरूप भारतीय समाज की आंतरिक कमजोरी तथा सामूहिकता की भावना की कमी को उन्होंने हमारी करीब 1000 वर्षों की गुलामी एवं सांस्कृतिक पतन का परिणाम माना एवं इसको दूर करने के लिए आधुनिक यूरोपीय धर्म एवं समाज सुधार के तर्ज पर सुधार आंदोलन की वकालत किया। आधुनिक भारत में सुधार आंदोलन चलाने के लिए स्वामी विवेकानंद ने किसी सैद्धांतिक विचारधारा के सुसंबद्ध आग्रह के स्थान पर हिन्दू चिंतकों में लोकप्रिय प्रैगमैटिज्म या रणनीतिक व्यावहारिकता एवं सांसारिक युक्ति को ज्यादा महत्व दिया।
इस दृष्टि से सजग या असजग रूप से वे समर्थ रामदास की परंपरा से साम्य रखते थे। इसी के तहत उनके भाषणों में एक प्रकार का पैगन विविधता एवं जटिल समायोजन की कलात्मक-सभ्यतामूलक युक्ति दिखती है। इसी के तहत वे कभी ‘इस्लामिक बॉडी एण्ड वेदान्तिक माइन्ड’ (मुसलमानी सामूहिकता एवं वेदान्तिक तत्व ज्ञान) के समन्वय की बात करने लगे, कभी भारतीय अध्यात्म एवं पश्चिमी विज्ञान-तकनीक की वकालत करने लगे। कभी उन्होंने कहा कि अपने दीन-हीन, अभागे भाई-बहनों की हमें भी उसी तरह दान एवं सेवा करनी चाहिए, जिस तरह ईसाई लोग ‘चैरिटी’ (दान) एवं मुसलमान लोग ‘जक़ात’ (दान) करते हैं। कभी उनको लगता कि हमारे यहाँ के कमजोर वर्गों की उन्नति तभी होगी, जब वे संस्कृत सीखेंगे और अपने भीतर की कुरीतियों एवं कुसंस्कारों को दूर करेंगे।

स्वामीजी के चिन्तन में उपर्युक्त चीजें प्रत्यक्ष रूप से ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के विद्यालय में पढ़ने के दौरान आईं, या साधारण ब्रह्म समाज की संगति के दौरान, या कॉलेज के दिनों में ‘एशियाटिक सोसाइटी’ के भारतविदों के प्रभाव में, यह ठीक से नहीं कहा जा सकता। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के चिन्तन में भी, इसका असजग उद्गम या प्रेरणा खोजा जा सकता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस पर जितना प्रभाव तोता पुरी महाराज के माधयम से श्रृंगेरी मठ का था, उससे कहीं अधिक भैरवी ब्राह्मणी के माधयम से तंत्र का था। परंतु उनकी अपनी अनुभूति माँ काली की अनन्य भक्ति और अपरोक्ष साक्षात्कार से विशिष्ट बनी थी। स्वामी विवेकानंद ने कई बार स्वीकारा है कि स्वामी रामकृष्ण के जीवन में वे उनको ठीक से समझ नहीं पाये और सम्पूर्ण समर्पण नहीं कर पाये। स्वामी रामकृष्ण भक्तिमार्गी थे, जबकि स्वामी विवेकानंद कर्ममार्गी थे। इस तरह स्वामी रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में थोड़ा अंतर तो अवश्य है। यह अंतर एक हद तक भारतीय परंपरा एवं भारतीय आधुनिकता के बीच का अंतर कहा जा सकता है। कुछ हद तक स्वामी विवेकानंद यूरोपीय दृष्टि वाली समाजिक सुधार एवं धर्म सुधार से प्रभावित थे। एक हद तक यह आधुनिक दृष्टि महात्मा गांधी में भी थी; परंतु स्वामी रामकृष्ण परमहंस में नहीं थी।

स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी दोनों एक अर्थ में भारत और पश्चिम के बीच समन्वय करना चाहते थे। परंतु दोनों की दृष्टि भिन्न थी। कुछ विद्वानों का कहना है कि स्वामी विवेकानंद पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान, तकनीक एवं मैनेजमेंट (व्यवस्था प्रबंध) का भारतीय वेदान्त की जीवन दृष्टि से समन्वय करना चाहते थे, जबकि आइ. जी. पटेल, श्रीअरबिंदो और कुछ अन्य लोगों का कहना रहा है कि महात्मा गांधी भारतीय तकनीक, व्यवस्था प्रबंध एवं पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान का ईसाई समाजवादी जीवन दृष्टि एवं नैतिकता से प्रेरणा ग्रहण कर, युगानुकूलन एवं समन्वय करना चाहते थे। स्वामी विवेकानंद भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति उदासीन थे, जबकि महात्मा गांधी अपने समय में भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के जननायक थे। फलस्वरूप, स्वामी विवेकानंद अपने जीवन काल में उतने प्रभावी नहीं थे, जितने प्रभावी महात्मा गांधी अपने जीवन काल में थे। परंतु धीरे-धीरे स्वामी विवेकानंद का प्रभाव बढ़ता गया, जबकि मृत्यु के बाद भारत में महात्मा गांधी का प्रभाव घटता गया। यदि दोनों के अनुयायियों की सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का समाजशास्त्रीय अधययन करें, तो यह देखने में आता है कि स्वामी विवेकानंद भारतीय मध्यवर्ग एवं भारतीय मूल के संपन्न तबकों में ज्यादा लोकप्रिय एवं ज्यादा प्रभावी हैं। जबकि महात्मा गांधी भारत से ज्यादा विदेशों में लोकप्रिय एवं प्रभावी हैं।

भारत की आम जनता में महात्मा गांधी के प्रति पूजा का भाव है, परंतु भारत का शिक्षित एवं संपन्न मध्यम वर्ग महात्मा गांधी के आर्थिक- सामाजिक एवं सभ्यतामूलक विचारों के प्रति उदासीन रहता है। स्वामी विवेकानंद और महात्मा गांधी दोनों के विचार बहुआयामी हैं और उनका प्रभाव भी बहुआयामी है। अत: दोनों को एक-दूसरे का वैचारिक प्रतिद्वंद्वी नहीं माना जा सकता। दोनों में एक प्रकार की सभ्यतामूलक पूरकता है और दोनों में समान रूप से भारतीय संस्कृति की समन्वयवादी दृष्टि का भाव है। परंतु दोनों की तर्क प्रणाली अलग-अलग है और दोनों के विचारों से प्रभाव ग्रहण करने वाले सामाजिक समूहों एवं समुदायों में विश्लेषण एवं अधययन की दृष्टि से अंतर करना संभव है।

उपर्युक्त संदर्भ में 1906 में महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के खिलाफ सुविचारित आंदोलन शुरू किया। 1905-1906 में ही भारत में बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ, जिसने कांग्रेस पार्टी को अखिल भारतीय स्तर पर गरमपंथी और नरमपंथी दो समूहों में विभक्त कर दिया। गरमपंथी समूह के महानायक लोकमान्य बालगंगाधार तिलक थे और उनके प्रमुख सहयोगियों में बिपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय एवं श्रीअरबिन्दो घोष आदि थे। तिलक महाराज ने ”स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है”, जैसा नारा लगाया और गणेश महोत्सव जैसे जनभागीदारी वाले लोक त्योहार को सांस्कृतिक-राजनैतिक आंदोलन के लिए माध्यम बनाया। नरमपंथी समूह के नायकों में दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले और फिरोजशाह मेहता जैसे विद्वान एवं सुधारवादी लोग थे। ये लोग अंग्रेजी राज के खिलाफ नहीं थे, परंतु अंग्रेजी राज के अंतर्गत ही भारतीय लोगों के लिए ज्यादा संवैधानिक अधिकार चाहते थे। इसके लिए ये लोग आंदोलन के बदले अंग्रेजों की नैतिकता पर भरोसा करके, उनके हृदय परिवर्तन के लिए उन्हें अंग्रेजी राज के कारिंदों एवं नीतियों की त्रुटियों एवं अनैतिकता आदि के बारे में आवेदन करते रहते थे। ऐसी परिस्थिति में 1909 में हिन्द स्वराज की रचना हुई।

‘हिन्द स्वराज’ में गांधीजी ने भारत के आम आदमी, लोक संस्कृति एवं सनातनी हिन्दुओं के प्रतिनिधि के रूप में आत्म-सजग होकर एक सैद्धांतिक पक्ष प्रस्तुत किया है। ‘हिन्द स्वराज’ लिखते वक्त भारत में बहुत कुछ वैसी ही स्थिति रही होगी, जिसकी चर्चा श्रीमद्भागवत गीता के पहले अध्याय में है, जब धृतराष्ट्र संजय से कुरुक्षेत्र में आमने-सामने यु्द्ध क़े लिए खड़ी कौरवों-पांडवों की सेना के बारे में पूछते हैं। जिस तरह गीता के पहले अध्याय के अंतर्गत श्रीकृष्ण-अर्जुन के संवाद को महाभारत के व्यापक संर्दभ से जोड़ा गया है, उसी तरह ‘हिन्द स्वराज’ में संपादक-पाठक संवाद को कांग्रेस पार्टी के अंतर्गत चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के वैचारिक महाभारत से जोड़ा गया है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय परंपरा में वेदव्यासजी वेद, पुराण, उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र और गीता के संपादक ही माने गए हैं। यह माना जाता है कि वैदिक परंपरा गुरु-शिष्य परंपरा में गुरु-मुखी विद्या के रूप में हस्तांतरित होती रही है और व्यासजी ने इनका एक पुस्तक के रूप में मात्र संकलन-संपादन किया है।

यदि ‘हिन्द स्वराज’ के बारे में गांधीजी के विभिन्न अवसरों पर व्यक्त विचारों का सूक्ष्म अध्ययन किया जाये और ‘हिन्द स्वराज’ की आंतरिक संरचना पर ध्यान दिया जाए, तो कोई शंका नहीं रह जाती कि गांधीवादियों के लिए हिन्द स्वराज महात्मा गांधी का लोक वेद भी है और लोक गीता भी। यह उनका लोकशास्त्र भी है और स्वराज शास्त्र भी। यह प्रवृत्ति मार्ग की वकालत है। परंतु इसका ज्यादा संबंधा ‘स्व’ से है, राज्य और उसके तंत्र से नहीं है। यह व्यक्ति के ‘स्व’ (आत्मा), समाज की संस्कृति एवं सभ्यता की नियति का लोक में व्याप्त एवं प्रिय शास्त्र का संकलन, संपादन का प्रतिफल है। एक पारंपरिक दस्तावेज के युगानुकूल अभिव्यक्ति का कलात्मक रूपांतरण है। भारत में पारंपरिक संप्रेषण के क्रम में मिथकों के रूपांतरण के लिए महाकाव्यों या नाटकों का उपयोग किया जाता रहा है। साथ ही लोक में पारंपरिक आख्यानों का उपयोग सामाजिक विमर्शों में नैतिक बल प्राप्त करने के लिए एवं अपने पक्ष को सत्य, न्याय एवं धर्म पर आधारित साबित करने के लिए किया जाता रहा है।

महात्मा गांधी ने भी गीता के पाठ (टेक्सट) एवं राम नाम का उपयोग नैतिक बल प्राप्त करने एवं अपने प्रयासों को सनातन धर्म के अनुकूल साबित करने के लिए किया। बिना कोई घोषणा किए उन्होंने वैष्णवों के दोनो संप्रदायों रामनामियों एवं कृष्णाश्रयियों में उसी काल खण्ड में, समन्वय का मार्ग लोकप्रिय बनाया। तिलक महाराज शैव परंपरा को संबल दे रहे थे और रामचन्द्र शुक्ल राम उपासकों की दृष्टि रखते हुए, कृष्ण भक्ति के प्रति अपनी आलोचना में कटाक्ष कर रहे थे। श्रीअरबिंदो वासुदेव कृष्ण के योगी और तांत्रिक रूप से गहरे प्रेरित थे। डा0 भीमराव अंबेडकर भक्ति आन्दोलन और बौद्ध परंपरा की वकालत कर रहे थे। केवल रामकृष्ण और महात्मा गांधी के पास संप्रदायनिरपेक्ष सभ्यतामूलक विमर्श निर्मित करने की आत्मसजग चेतना बार-बार दिखती है। व्यक्तिगत आस्था क्रमश: माँ काली (रामकृष्ण) एवं निर्गुण राम (महात्मा गांधी) में होने के बावजूद भाषा, तत्व-चिन्तन एवं आख्यानों के चुनाव के संदर्भ में सनातन धर्म की सभ्यतामूलक विशालता, सहिष्णुता, समन्वय दृष्टि एवं सम्पूर्ण सत्य के प्रति तादात्म्यता एवं आचार-विचार में महाकरुणा एवं अहिंसा का जैसा दर्शन इन दोनों में होता है, वैसा अन्यत्र नहीं होता।

‘हिन्द स्वराज’ को बिना घोषणा किए, गांधीजी सनातन भारत की सबसे महत्वपूर्ण गाथा महाभारत से जोड़ते हैं। अपने समय (1909) के भारत के वैचारिक संघर्ष को महाभारत के सनातनी कैनवास में प्रस्तुत करते हुए पश्चिमी सभ्यता की कठोर आलोचना प्रस्तुत करते हैं। भारत के सांस्कृतिक इतिहास से परिचित हुए बिना, हिन्द स्वराज के संरचनात्मक शिल्प को समझना संभव नहीं है। यह शोध का विषय है कि ‘हिन्द स्वराज’ की प्रस्तुति का शिल्प महात्मा गांधी ने रस्किन के कला सिद्धांत से लिया या टाल्सटाय के महाकाव्यात्मक उपन्यासों से या फिर तुलसीदास से जिन्होंने वाल्मीकि रामायण के संरचनात्मक शिल्प और कथात्मक संतुलन को बिना घोषणा किये अपने रामचरित मानस में बदल दिया था और उत्तर भारत की जनता ने भी बिना घोषणा किए ही इसका लोकवेद के रूप में परायण शुरू कर दिया। जो भी हो महाभारत की कथा और गीता की संरचना से जोड़े बिना ‘हिन्द स्वराज’ को समझने की हर कोशिश एक पैरोडी बन कर रह गई है और यह स्वाभाविक परिणति है।

महाभारत की कथा के अनुसार पुत्रमोह में अंधे राजा धृतराष्ट्र जन्मान्ध भी थे। संजय उनके सारथी बने हैं। राजा धृतराष्ट्र कुरुक्षेत्र में होने वाले यु्द्ध का हाल जानने के लिए उतावले हो रहे हैं। संजय उन्हें कुरुक्षेत्र में होने जा रहे महाभारत की तैयारी का हाल, गीता के प्रथम अध्याय में बतलाते हैं। पाण्डवों की सेना के महानायक अर्जुन के सारथी श्रीकृष्ण हैं। शत्रु सेना में अपने बंधु-बान्धवों, गुरुजनों एवं पूज्यजनों को देखकर अर्जुन मोह में फँसकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। श्रीकृष्ण गीता के उपदेश द्वारा अर्जुन को (मोह पाश-काट कर अपने सगे संबंधियों के विरूद्ध हस्तिनापुर राज्य पर पाण्डव कुल के अधिकार की पुर्नप्राप्ति के लिए) युद्ध करने के लिए तैयार करते हैं।

तिलक महाराज ने गीता रहस्य में कर्मवाद को स्थापित किया था। वे ‘आर्कटिक होम इन द वेदाज’ एवं ‘ओरियन’ जैसी दुरूह ज्ञानमार्गी कृतियों की भी रचना कर चुके थे। इनके विपरीत ‘हिन्द स्वराज’ में महात्मा गांधी भक्ति-मार्ग एवं प्रेम-साधना को पुरुषार्थ के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इसके सारे अध्याय अर्थवत्ता की दृष्टि से एक-दूसरे पर निर्भर हैं। पूरी पुस्तिका एक बार पढ़ लेने के बाद ही अलग-अलग अध्यायों का अर्थ खुल पाता है। परंतु वह भी तब, जब इसे हम सनातन भारतीय दृष्टि का एक पाठ मानें, वर्ना राजमोहन गांधी जैसे लोग तो इसे अपने समय की कृति (यानि आज के समय के लिए अप्रासंगिक कृति) साबित करने में लगे हुए हैं ही। हमारे कुछ मित्रों को भी ऐसा लगता है कि ‘हिन्द स्वराज’ की श्रीमद्भागवत गीता से तुलना करना और महात्मा गांधी के विचारों की भगवान श्रीकृष्ण के गीता में वर्णित विचारों से तुलना करना एक प्रकार की अतिरंजना है, जिससे बचना चाहिए। महात्मा गांधी के जीवन में और उनके शरीर छोड़ने के बाद भी जिस तरह बड़े-बड़े लोगों ने उनपर अभारतीय एवं अहिन्दू होने तथा बाहरी विचारों एवं निष्ठाओं से प्रभावित होने का मिथक गढ़ा, उसको ध्यान में रखकर उपर्युक्त तथ्यों को सामने लाना समयानुकूल है। 

तिलक महाराज जब ‘गीता रहस्य’ रच रहे थे तब अंग्रेजी राज के विकल्प की प्रेरणा उन्हें शिवाजी महाराज और पेशवाओं की शासन व्यवस्था से मिली थी। गीता रहस्य में कौरव एक तरफ औरंगजेब का प्रतीक है, तो दूसरी तरफ अंग्रेजी राज का। श्रीकृष्ण का युगानुकूलन समर्थ रामदास में खोजा जा सकता है और अर्जुन का शिवाजी महाराज में। लेकिन अंग्रेजों से लड़ने की प्रेरणा तिलक महाराज ‘दासबोध’, ‘ज्ञानेश्वरी’ या गीता के ‘शंकर भाष्य’ से नहीं लेते, उनकी प्रेरणा अंतत: अंतरात्मा से आती है। गीता रहस्य और गणपति महोत्सव एक ही रणनीति के दो पहलू हैं। तिलक महाराज को परंपरा की सीमा पता है, इसके बावजूद वे राणाडे एवं गोखले की तरह सुधारवादी नहीं हैं। दूसरी ओर, कहीं न कहीं रामचन्द्र शुक्ल एवं सुधारवादियों में वैचारिक समता अवश्य है। युगपरिवर्तन को नहीं स्वीकारना और जोड़-तोड़ करके पुरानी संरचना को कायम रखना पुनरुत्थानवादी रूझान है, जो सनातनी दृष्टि से अभारतीय है। हर उत्सव में हम भारतीय लोग पुनर्रचना करते हैं और उत्सव की समाप्ति पर विसर्जन कर देते हैं। केवल ब्रह्मा और विष्णु ही नहीं, शिव भी सनातन देवता हैं। भारतीय परंपरा में केवल सगुण और निर्गुण पक्ष ही नहीं है, बल्कि आस्तिक और नास्तिक पक्ष भी हैं। लोकायत भी एक वैध भारतीय दर्शन है। नौ रसों में एक वैध रस वीभत्स भी है। स्मृतिकारों ने केवल ‘ब्रह्म’ और ‘प्रजापत्य विवाह’ को ही नहीं स्वीकारा है, बल्कि ‘गंधर्व’, ‘राक्षस’ एवं ‘पैशाच विवाह’ को भी एक सीमा तक वैध माना है।
भारतीय परंपरा केवल त्याग, अध्यात्म और योग की ही नहीं है, बल्कि भोग, प्रकृतिवादी भौतिकता तथा रोग एवं चिकित्सा की भी है। भारतीय परंपरा नियम एवं सिद्धान्तों पर आधारित संसार और जगत् की चर्चा करती है; वह नैतिक आग्रहों और अनैतिक व्यवहारों में सामंजस्य बिठाने की चर्चा नहीं करती।
‘तंत्र’ एवं ‘आगम’ की परंपरा भी उतनी ही भारतीय है, जितनी ‘वेद’ और ‘वेदांत’ की है। तुलसी के ‘मानस’ में सबको स्वीकारने का साहस है, परंतु शुक्लजी की मौलिकता की अपनी सीमाएँ हैं। यह सीमा कभी कबीर के मूल्यांकन में सामने आती है, कभी गांधी के मूल्यांकन को असंतुलित करती है और कभी निराला की संवेदना के साथ न्याय करने में बाधा बनती है।
भारतीय परंपरा सर्वग्राही एवं कॉस्मिक रियलिस्ट (एकात्मक यथार्थवादी) रही है। महात्मा गांधी का ‘हिन्द स्वराज’ इसी भारतीय परंपरा की वकालत करता है। इसमें वे तिलक महाराज, विवेकानंद, रामकृष्ण, समर्थ रामदास, तुलसीदास और कबीर से भी पीछे जाकर गीता और महाभारत की वाचिक परंपरा के लोक पक्ष के वारिस हैं तथा इस परंपरा के समकालीन सिद्धांतकार भी हैं।

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