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स्वतंत्र भारत में युवा एवं हिन्दी सिनेमा

by amitjnusociology@gmail.com
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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल-2016

स्वतंत्र भारत में युवा एवं हिन्दी सिनेमा

युवा की परिभाषा और पहचान अलग-अलग संस्कृतियों में अलग रही है। पश्चिमी परंपरा में 13 से 19 वर्ष के व्यक्ति को अल्पयुवा (टीनएजर्स) माना जाता है। 20-21 वर्ष से 40 वर्ष के व्यक्ति युवा माना जाता है। 40 वर्ष से 60 वर्ष के व्यक्ति को अधेड़ माना जाता है और 60 वर्ष के बाद व्यक्ति को बुजुर्ग माना जाता है। पश्चिम के अलग-अलग देशों में और अलग-अलग काल-खंडों में उपर्युक्त वर्गीकरण में कुछ भिन्नता रही है। उपर्युक्त वर्गीकरण सांस्कृतिक मनोविज्ञान पर एक औसत परिभाषा कही जा सकती है। 13 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना जाता है।

इसके विपरीत भारतीय परंपरा में आश्रमों का वर्गीकरण 25 वर्ष तक ब्रहमचर्य आश्रम, 25 से 50 वर्षों तक गृहस्थ आश्रम, 50 से 75 वर्ष तक वानप्रस्थ आश्रम और 75 वर्ष से 100 वर्षों तक संन्यास आश्रम मानता है। भारतीय संविधान के अनुसार 18 वर्ष की उम्र में व्यक्ति को वोट देने का अधिकार होता है। पहले यह अधिकार 21 वर्ष में मिलता था। यानि 18 से 25 वर्ष की उम्र तक भारत में व्यक्ति बच्चा माना जाता है। 40 से 50 वर्ष की उम्र तक व्यक्ति जवान माना जाता है। 40 से 60-65 तक व्यक्ति अधेड़ माना जाता है अैर उसके बाद बुजुर्ग माना जाता है। अवकाश प्राप्त करने की सरकारी उम्र पहले 58 वर्ष थी अब 60 से 65 वर्ष हो गई है। जबकि आश्रम व्यवस्था में यह उम्र 75 वर्ष थी। यानि युवा की परिभाषा समाज में औसत आयु के घटने-बढ़ने के साथ बदलती रही है। कुछ विद्वानों के अनुसार 30 वर्ष की उम्र तक एक व्यक्ति का व्यक्तित्व अस्थिर होता है। वह कई तरह के दबाबों, संकटों, संभावनाओं, आकांक्षाओं और प्रेरणाओं के बीच से गुजरता हुआ अपने चित्त में स्थिर होने की कोशिश करता है। 30 से 60 वर्षों के बीच उसका सबसे रचनात्मक काल होता है। 60 वर्ष में व्यक्ति भारत में षष्ठीपूर्ति मनाता है। यह व्यक्ति के दूसरे जन्म का सांस्कृतिक उत्सव माना जाता है।

इस दृष्टि से 1947 में भारत के युवा शक्ति की प्रेरणा महात्मा गांधी थे। 1948 में उनकी मृत्यु के बाद भी 1957 तक भारतीय युवा के बीच गांधी और उनके सपनों की प्रेरणा सबसे महत्वपूर्ण थी। भारत सरकार की पंचवर्षीय योजना गाँव केन्द्रित थी। नए भारत के निर्माण का एक जुनून था। भारतीय विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवादी विद्वानों की तूती थी। भारतीय फिल्मउद्योग में गांधी-नेहरू की विचारधारा को पटकथाओं में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। लता मंगेश्कर, नर्गिस, दिलीप कुमार, राजकपूर, देवआनंद और अशोक कुमार युवा दिलों पर राज करते थे। टैगोर, शरतचन्द्र, बंकिम, प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी ”निराला”, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और मैथिली शरण गुप्त की रचनाओं से युवा पाठक अपने जीवन के आदर्श प्राप्त करते थे। शिक्षा और नौकरी के लिए युवा लोग गाँवों से शहरों की ओर जाते थे, लेकिन गाँव से उनका रिश्ता बना रहता था। युवा वर्ग आशाओं से लबालब भरा था। ऐसा लगता था मानों नये भारत का निर्माण 10 वर्षों में ही कर लिया जाएगा।

लेकिन 1957 आते-आते गांधीवादी आदर्श से नेहरू जी का मोह भंग होने लगा। दूसरी पंचवर्षीय योजना का लक्ष्य नगरीकरण और औद्योगीकरण को प्रोत्साहित करने का हो गया। नेहरू भारत के युवा दिलों की आज भी धड़कन थे। लेकिन नेहरू की आस्था गांधी जी के ग्रामस्वराज में नहीं रह गई थी। इसी समय भारतीय सिनेमा में नए प्रेरणा पुरुषों का जन्म हुआ। लता मंगेश्कर का महत्व बना रहा। नर्गिस विवाह करके फिल्मों से दूर हो गई। शम्मी कपूर, किशोर कुमार, सुनील दत्त और राजेन्द्र कुमार के रूप में नई पीढ़ी के नायकों का जन्म हुआ। शम्मी कपूर पूर्णत: पश्चिमी शैली के फैशनेबुल युवक थे। वहीदा रहमान, सायरा बानो, आशा पारेख, शर्मिला टैगोर और हेलेन के रूप में पाश्चात्य शैली की नायिकाओं का जन्म हुआ। इनकी पोशाकें बदलने लगी। इनका चाल-चरित्र- चेहरा बदलने लगा। गाँवों और कस्बों को छोड़कर लोग शहरों में शिक्षा और रोजगार के लिए बसने के लिए जाने लगे। यदि 1947 से 1957 के बीच ‘दो बीघा जमीन’, ‘दो आँखें बारह हाथ’, ‘श्री 420’, ‘मदर इ्रंडिया’ और ‘बाजी’ के बीच ‘तुमसा नहीं देखा’, ‘हाबड़ा ब्रिज’, ‘वक्त’, ‘गाईड’, ‘काश्मीर की कली’, ‘जंगली’, ‘चलती का नाम गाड़ी’, ‘मुगले आजम’, ‘हकीकत’, ‘मुसाफिर’ जैसी फिल्मों का निर्माण हुआ। इन फिल्मों में 1964 आते-आते निराशा बढ़ने लगी थी। नेहरूवादी सपनों में युवा वर्ग की आस्था घटने लगी थी। लेकिन भारत का युवा वर्ग अब भी निराश नहीं था। लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मुहम्मद रफी, मुकेश और मन्ना डे के गीतों में आशा और निराशा, हकीकत और अफसाना, हँसी और व्यंग का संगम था। 1962 में चीन के आक्रमण और 1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद 1964 से 1966 के बीच लालबहादुर शास्त्री ने देश को नायकत्व दिया। उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया। मनोज कुमार की फिल्में ‘शहीद’, ‘उपकार’, ‘हिमालय की गोद में’, ‘हरियाली और रास्ता’, ‘शोर’, ‘पूरब और पश्चिम’ की पटकथा, संवाद और गीतों में शास्त्री जी के नारे की गूँज है। शास्त्री जी के नारे में गांधीवादी ग्राम-स्वराज की स्पष्ट अनुगूँज थी। इंदिरा युग के आरंभिक वर्षों (1966-1973) में मनोज कुमार, धर्मेन्द्र, शशी कपूर, जितेन्द्र, फिरोज खान और राजेश खन्ना की धूम रही। हेमामालनी, रेखा और राखी का जन्म हुआ। 1960 के दशक में हॉकी भारत का सबसे महत्वपूर्ण खेल था। 1970 के दशक के आते-आते सुनील गावस्कर, बिशन सिंह बेदी, चन्द्रशेखर, प्रसन्ना, वेंकट राघवन और किरमानी जैसे क्रिकेटर मेजर ध्यानचंद जैसे हॉकी के जादूगर से ज्यादा लोकप्रिय सितारे बन गए। 1971 में इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को हराकर बांग्लादेश को स्वतंत्र देश बनवाया। बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और प्रचंड बहुमत से चुनाव जीता। 1964 से 1971 के बीच राममनोहर लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय, विनोबा भावे, चारू मजुमदार और इंदिरा गांधी के बीच दर्शक दिग्भ्रमित हो गया। फलस्वरूप 1969 में राजनेताओं से ज्यादा आकर्षक व्यक्तित्व राजेश खन्ना बन गए। उन्हें भारत का पहला सुपर सितारा माना जाता है। 1969 में ही नक्सलवादी आंदोलन शुरू हुआ और भारतीय विश्वविद्यालयों में मार्क्सवादी विचारधारा को प्रमुखता मिली। लेकिन इसी दौरान भारतीय सिनेमा में इप्टा और प्रगतिशील लेखन संघ से जुड़ा आंदोलन करीब-करीब समाप्त हो गया। भारत के क्षेत्रीय सिनेमा का राजनीति रूझान तो बना रहा लेकिन हिन्दी की मुख्यधारा वाली फिल्मों से राजनीति और सामाजिक सरोकार धीरे-धीरे कम होता गया। हॉलीवुड की फिल्मों और तकनीक का प्रभाव बढ़ता गया और हिन्दी का राष्ट्रीय सिनेमा चार प्रमुख धाराओं में विभक्त हो गया। एक तो मनमोहन देसाई कॉमेडी फिल्मों की धारा, दूसरी – हृषिकेश मुखर्जी, बासुचटर्जी, गुलजार और ताराचंद बड़जात्या की छोटे बजट की साफ-सुथरी फिल्मों की धारा, तीसरी – रमेश सिप्पी, प्रकाश मेहरा, यश चोपड़ा, फिरोज खान की बड़े बजट की सितारों से भरी तड़क-भड़क वाली हॉलीवुड-प्रेरित फिल्में और चौथी – मृणाल सेन, श्याम बेनेगल, सई परांजपे, सईद मिर्जा, कुमार शाहनी और मणि कौल जैसे लोगों की समानांतर सिनेमा की धारा। अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, अमोल पालेकर, फारूख शेख और नसीरूद्दीन शाह, शबाना आजमी, स्मिता पाटिल, हेमा, रेखा, राखी, जीनत अमान और परवीन बॉबी के अलावे मनोज कुमार 1970 के दशक के प्रमुख प्रेरणा स्रोत थे। सत्तर के दशक में युवा वर्ग दिग्भ्रमित नहीं था। वह वर्गीकृत हो चुका था। कुछ लोग अपराध और हिंसा को जायज मानने लगे थे। समाज में संगठित अपराध बढ़ रहा था। 1974 से 1977 के बीच भ्रष्टाचार और तानाशाही के विरूद्ध जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। बहुत से युवा जे. पी. आंदोलन से जुड़ गए। बहुत लोगों को लगा कि जे. पी. वह कर लेंगे जो गांधी, नेहरू और विनोबा नहीं कर पाए थे। 1977 के आमचुनाव में कांग्रेस पहली बार लोकसभा का चुनाव हारी। ऐसा लगा मानों नए भारत के निर्माण में युवा वर्ग की ऊर्जा का यथोचित इस्तेमाल होगा। लेकिन 1980 में इंदिरा गांधी की पुन: चुनावी विजय हुई। जे. पी. के अनुयायियों में कुछ तो क्षेत्रीय राजनीति के महाबली क्षत्रप बन कर खुद भ्रष्टाचार और तानाशाही के नमूने बन गए, परंतु अधिकांश युवाओं के सपनों को रौंद दिया गया। अमिताभ बच्च्न सुपर सितारे बन गए।

1982 में भारत में रंगीन टी.वी और सीरियल कार्यक्रमों का युग शुरू हुआ। 1983 में कपिल देब के नेतृत्व में भारत ने एकदिवसीय क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता। 1980 के दशक में दाउद इब्राहिम का महत्व अमिताभ बच्चन से कम नहीं रहा। उसने हिन्दी सिनेमा के व्यवसाय को बुरी तरह प्रभावित किया। दाउद इब्राहिम और रंगीन टी.वी के साथ वीडियो पार्लर की बाढ़ में सिनेमा उद्योग का रचनात्मक पक्ष लगातार कमजोर पड़ता गया। फिल्म संगीत की तुलना में युवा वर्ग गजल, भजन और पुरानी फिल्मों के कैसेट्स सुनने लगा। गुलशन कुमार के टी-सीरिज ने गैर फिल्मी संगीत अैर पुरानी फिल्मों के संगीत को सस्ता और सर्व सुलभ बनाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 1980 के दशक में हिन्दी तथा देसी भाषाओं का महत्व निर्णायक रूप से घटा। कई प्रतिष्ठित प्रकाशन बंद हुए। साहित्य की बिक्री घटी और अंग्रेजी की प्रतिष्ठा बढ़ी। क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों का स्तर गिरता गया और समाज विज्ञानों की तुलना में मैनेजमेंट, कम्प्यूटर और तकनीकी पेशों के प्रति युवा वर्ग का आकर्षण बढ़ता गया। सिनेमा हॉल की तुलना में टी.वी. और वीडियो या कम्प्यूटर का महत्व बढ़ता गया। क्रिकेट का आकर्षण महानगरों की तरह कस्बों और गाँवों में फैलने लगा। 1989 आते-आते राष्ट्रीय दलों की तुलना में क्षेत्रीय दलों का राष्ट्रीय महत्व बढ़ने लगा। संविद सरकारों के दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारत में प्रभाव जमाना आसान होता गया। 1991 से भारत में उदारीकरण का दौर शुरू हुआ और भारत के युवा उपभोक्तावाद की गिरफ्त में आते चले गए।

1990 के दशक में इस देश के मध्यवर्ग का तेजी से विस्तार हुआ। देसी भाषाओं का महत्व बढ़ता गया। हिन्दी के चैनल, हिन्दी के अखबार और हिन्दी में लघु पत्रिकाओं के साथ हिन्दी सिनेमा का बाजार अंग्रेजी के बाजार की तुलना में बढ़ने लगा। लेकिन उच्च शिक्षा और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कामकाज में अंग्रेजी का महत्व यथावत बना रहा। हिन्दी समेत देसी भाषाएँ वाचिक परंपरा का हिस्सा मानी जाती रहीं और अंग्रेजी साहित्य और बौध्दिक विमर्श की भाषा बनी रही। भारतीय समाज में स्पष्ट विभाजन हो गया। हिन्दी की मुख्यधारा की फिल्में भारतीय मध्यमवर्ग और विदेशों में बसे भारतीयों एवं विदेशी दर्शकों के लिए बनायी जाने लगीं। जबकि गाँव और कस्बों तथा छोटे शहरों में क्षेत्रीय सिनेमा का विस्तार हुआ। क्रिकेट के क्षेत्र में और राजनीति में उच्च मध्यम वर्ग तथा महानगरों के युवाओं का वर्चस्व लगातार घटता जा रहा है। क्षेत्रीय सिनेमा और टी.वी. के कार्यक्रमों में भी गैर महानगरीय पृष्ठभूमि के युवा सफल हो रहे हैं, लेकिन गाँवों में कोई रहना नहीं चाहता। नगरीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण के इस दौर में भारत का युवा वर्ग दो भागों में बँटा हुआ है। निम्न वर्ग एवं निम्न मध्यम वर्ग के युवा में निराशा, हताशा, हिंसा और महत्वाकांक्षा का घालमेल है। उच्चमध्यम वर्ग और उच्चवर्ग के युवा में महत्वाकांक्षा, उपभोक्तावाद और सुपरपावर बनने का जज्बा है। हर प्रकार के युवा में धार्मिकता और कर्मकाण्ड, सेक्स, हिंसा और थ्रिल (मजा) के प्रति अतिशय आकर्षण है। एम.एस. धोनी, अक्षय कुमार, शाहरूख खान, आमिर खान, हृतिक रोशन, ऐश्वर्या राय, सानिया मिर्जा युवा पीढ़ी के समकालीन आदर्श हैं। युवा पीढ़ी जल्दी से जल्दी किसी भी कीमत पर सफलता पाने की होड़ में है। इसके लिए वे रात-दिन काम करने को तैयार रहते हैं। सौभाग्य से उन्हें पिछले डेढ़ दशक में मौका भी लगातार मिला है।

भारतीय समाज की तरह भारतीय युवा भी संक्रमण काल से गुजर रहा है। एक अर्थ में वह उपनिवेशवादी प्रभाव से पूरी तरह स्वतंत्र है। दूसरे अर्थों में वह स्वतंत्रता आंदोलन की राषट्रीय चेतना से भी कटा हुआ है। लेकिन वह परम्परा और विरासत के प्रति उत्सुक भी बना हुआ है। यही कारण है कि ‘रंग दे बसंती’ और ‘जोधा-अकबर’ जैसी फिल्में तथा रामायण, महाभारत एवं हनुमान या गणेश जैसे सीरियलों या एनिमेटेड फिल्मों की युवा पीढ़ी में आज भी लोकप्रियता है। वह आज भी खर्च की तुलना में बचत के प्रति ज्यादा सर्तक हैं। परिवार एवं विवाह जैसी संस्थाओं के प्रति उसकी आस्था आज भी यथावत बनी हुई है। राजनीति के बाहर जाति, छुआछूत और साम्प्रदायिकता का महत्व भारतीय युवा वर्ग में करीब-करीब नगण्य है। मंदिरों एवं तीर्थ स्थानों में युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा दिखती है। योग, प्राकृतिक चिकित्सा, ज्योतिष, धर्म के साथ-साथ उत्तर-आधुनिक जीवन शैली और पहनावा को एक साथ साधने की कोशिश में उन्हें कई बार दुविधा होती है, कई बार निराशा होती है, कई बार भ्रम होता है, लेकिन कुल मिलाकर हर स्थिति में समन्वय और अनेकता में एकता की वैश्विक दृष्टि भारतीय युवा की पारिभाषिक विशेषता बनी हुई है।

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