लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल-2016
छोटे बजट बनाम बड़े बजट की फिल्में: भविष्य एवं सामाजिक संदर्भ
भारत में हमेशा ही छोटे और बड़े बजट, दोनों प्रकार की फिल्में बनती रही हैं। 1970 के दशक में राजश्री पिक्चर्स, एन.सी.सिप्पी एवं श्याम बेनेगल छोटे बजट की फिल्में बनाते थे। रामसे ब्रदर्श भी छोटे बजट की फिल्में बनाते थे, जबकि अमिताभ बच्चन को लेकर या अन्य बड़े सितारों को लेकर बड़े बजट की फिल्में भी बनती थी। पचास और साठ के दशक में भी ट्रेंड कुल मिलाकर कुछ ऐसा ही था।
कॉरपोरेट कंपनियाँ पहले भी थीं। बी.एन. सरकार का न्यू थियेटर्स और हिमांशु राय का बाम्बे टॉकिज के साथ वाडिया ब्रदर्श का नाम लिया जा सकता है। लेकिन उदारीकरण की प्रक्रिया के चलने के बाद मल्टीप्लेक्स थियेटरों का उदय हुआ और ओवरसीज टेरीटरी कर विकास हुआ। अनिवासी भारतीय विदेशों में अपनी सांस्कृतिक अस्मिता की अभिव्यक्ति भारतीय हिन्दी फिल्मों को संरक्षण देकर करने लगा। इसके साथ ही एकलठठिया सिनेमा या सिंगल स्क्रीन थियेटर एवं हिन्दी प्रदेशों के दर्शकों को महत्व कम होने लगा। इससे भारतीय सिनेमा में महत्वपूर्ण परिवर्तन की शुरुआत हुई। इसके परिणाम स्वरूप हिन्दी एवं भोजपुरी में छोटे बजट की फिल्मों की बाढ़ आने लगी। इसके कारण के रूप में सैटेलाइट सिनेमा अधिकार और ओवरसीज टेरीटरी का बढ़ता प्रभाव तथा कस्बाई एकल ठठिया दर्शकों की अभिरुचि के घटते महत्व की चर्चा की जा सकती है। इससे फिल्म की कहानी बदल रही है और अतिरिक्त आय भी हो रहा है। इसका दूसरा कारण निर्माण एवं वितरण क्षेत्र में कॉरपोरेट का उदय माना जा सकता है। हिमांशु राय की ‘बांबे टॉकीज’ और बी.एन. सरकार की ‘न्यू थियेटर्स’ तथा वाडिया ब्रदर्स के जमाने में भी कॉरपोरेट का उद्देश्य सामाजिक प्रतिबद्धता वाली साहित्य आधारित फिल्मों का निर्माण था। समकालीन कॉरपोरेट संस्कृति का उद्देश्य सांस्कृतिक उद्योग में पैसा निवेश कर ज्यादा पैसा कमाना और ग्लैमर से जुड़ना अधिक है। परन्तु ‘रंग दे बसंती’, ‘तारे जमीन पर’ और ‘मुन्नाभाई” शृंखला की फिल्में भी कॉरपोरेट कृतियाँ हैं, यह सुखद स्थिति है।
कस्बाई सिनेमा अब भी कहानी को पकड़े हुए है, जबकि मल्टीप्लेक्स सिनेमा तकनीक को कथा से ऊपर रखता है। अब इंटरनेट एवं डीवीडी मार्केट के लिए भी छोटे बजट की फिल्में बन रही है। ऐसी फिल्मों का प्रचार एक दर्शक दूसरे दर्शक से बातचीत के दौरान और माउथ टू माउथ करता है। सिनेमा सोसाइटी मूवमेंट 1970 के दशक में काफी शक्तिशाली माध्यम था। अब उसकी जगह इंटरनेट ने लिया है।
मल्टीप्लैक्स ने भारतीय सिनेमा को अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। ‘ए वेडनेश डे’ और ‘भेजा फ्राई ‘ जैसी फिल्मों की सफलता की लहर मल्टीप्लैक्स से ही चलकर कस्बों और एकल ठठिया तक पहुँची है। मल्टीप्लैक्स के द्वारा ही दर्शक ने अच्छे बिंब और संपूर्ण ध्वनि के आनंद को समझा है। मल्टी संकुल में जाकर दर्शक बिना वीजा और पासपोर्ट के पश्चिम के वैभव की झलक तीन घंटे के लिए देख पाता है। सारे मल्टीप्लैक्सों को टिकट बिक्री की तुलना में खाद्य-पदार्थ, शीतल पेय, पार्किंग और अन्य सेवाओं में अधिक लाभांश प्राप्त होता है।
संदर्भ के लिए यह जानना आवश्यक है कि वर्ष 1947 में केवल 280 फिल्में प्रदर्शित हुई थी। उनमें से हिन्दी में बनी फिल्मों की संख्या बहुत थी। अब मुंबई में बनी हिन्दी फिल्मों की संख्या प्रतिवर्ष 150 होती है और चार दक्षिण भारतीय भाषाओं में बनी फिल्मों का योग लगभग 600 होता है। कुछ जमा 10,000 सिनेमाघरों में अधिकतम सिनेमाघर दक्षिण भारत में हैं। चेन्नई भारतीय सिनेमा उद्योग का मुबंई से ज्यादा महत्वपूर्ण केन्द्र है। रजनीकांत को भारतीय सितारों में सबसे ज्यादा पारिश्रमिक मिलता है। परन्तु भारतीय सिनेमा में दर्शकों के हिसाब से हिन्दी सिनेमा का महत्व सबसे ज्यादा है।
हर युग का अपना संघर्ष, अपना सुख-दुख होता है और विद्रोह के तेवर भी अलग होते हैं। दर्द से भिड़ने के तौर-तरीके बदल जाते हैं। वर्तमान युग में सफलता को नैतिकता से ऊपर माना जाता है। अब सफलता एकल प्रयास नहीं है। आज सफलता की फैक्टरियाँ हैं, जो ‘आर्डर’ आने पर मनचाहा ‘माल’ गढ़ देने का दावा करती हैं। उसके बाद भी महेन्द्र सिंह धोनी, सचिन तेंदुलकर, ए. आर. रहमान, अमिताभ बच्चन एवं लता मंगेश्कर एकल प्रयास से ही सफल होते रहे हैं। ये फैक्टरियों के उत्पाद नहीं हैं।
राजनीति, फिल्म निमार्ण एवं क्रिकेट के खेल में टीम वर्क की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसमें एकल प्रयास का सीमित महत्व है। सिनेमा में भी अखिल भारतीय सफलता अक्सर नहीं मिल रही है। इस दृष्टि से क्रिकेट के क्षेत्र में अपवाद की स्थिति है। बड़े बजट की फिल्में उत्तर-भारतीय थाली की तरह का मनोरंजक व्यंजन परोसती हैं। इसमें अंतर्विरोधी स्वाद के व्यंजन होते हैं। हर व्यंजन अलग-अलग दर्शक समूह को ध्यान में रखकर परोसा जाता है। लेकिन हर व्यंजन को कलात्मक कुशलता से एक नाजुक संतुलन बैठाना होता है। थोड़ी सी चूक होते ही बड़े बजट की फिल्म धड़ाम से गिरती है। अत: ऐसी फिल्मों की पटकथा लिखना या निर्देशन करना जोखिम का काम होता है। इसके लिए जिंदगी और समाज की अंर्तधारा को समझने का विराट अनुभव चाहिए, जो भारतीय सिनेमा की परंपरा में गुरु-शिष्य शृंखला से प्राप्त होता रहा है। आजकल गुरु-शिष्य शृंखला कमजोर हुई है और नये निर्देशकों के हाथ में बड़ी बजट की फिल्मों का निर्देशन दिया जाने लगा है।
छोटे बजट की फिल्मों में प्रयोग की ज्यादा गुंजायश होती है। आर्थिक जोखिम कम होता है। परन्तु छोटे बजट की फिल्मों की सफलता भी कलात्मक मनोरंजन की क्षमता पर ही निर्भर करता है। फीचर फिल्म और डॉक्यूमेंट्री फिल्म का अंतर हमेशा कायम रहता है। यथार्थवादी फिल्मों की अखिल भारतीय सफलता भारत में हमेशा संदिग्ध होती है, चाहे उसका बजट छोटा हो या बड़ा। फीचर फिल्म मूलत: मनोरंजक कथा का माध्यम है। इसमें अप्रत्यक्ष शिक्षा की हमेशा गुंजायश होती है। हिडेन एजेंडा की भी हमेशा गुंजायश होती है। लेकिन प्रत्यक्ष रूप से उसका सरस एवं मनोरंजक होना आवश्यक है। छोटे बजट की फिल्मों के प्रोमोशन पर भी उसी तरह ध्यान दिया जाना जरूरी होता है, जिस तरह बड़े बजट की फिल्मों के प्रोमोशन पर ध्यान दिया जाता है। लेकिन इनका बजट अलग-अलग प्रकार का होता है। इनके माध्यम अलग-अलग प्रकार के होते हैं। छोटे बजट की फिल्मों को पहले ‘फिल्म सोसायटी मूवमेंट’ तथा फिल्म क्लबों का सबसे बड़ा सहारा होता था। तमिलनाडु एवं बंगाल तथा केरल में छोटे बजट की राजनीतिक फिल्मों का बोलबाला रहा है। इनको क्रमश: डी.एम.के फिल्मस एवं इप्टा फिल्मस कहा जाता है। इन संगठनों के कार्यकर्ता फिल्मों के प्रोमोशन में भूमिका निभाते थे। अच्छी और सार्थक या कलात्मक फिल्मों को दर्शकों द्वारा भी प्रमोट किया जाता रहा है, इसे माउथ-टू-माउथ पब्लिसिटी कहा जाता है। अखबारों एवं पत्रिकाओं के फिल्म समीक्षक भी फिल्मों को प्रमोट करते रहे हैं। आजकल इंटरनेट के द्वारा भी फिल्मों को प्रमोट किया जाता है। टी. वी. फिल्म प्रोमोशन का सबसे महंगा एवं सबसे सशक्त माध्यम बन गया है। बड़े बजट की फिल्में मूलत: टी.वी. द्वारा ही अपनी फिल्मों को प्रमोट करती हैं। फिल्मों के प्रोमोशन का एक अन्य माध्यम फिल्म पोस्टर रहे हैं। यह सबसे पुराना माध्यम रहा है। इसका महत्व आज भी कायम है।
यह बात ध्यान देने लायक है कि जिस तरह रिलीज के समय फिल्मों को प्रमोट किया जाता है, करीब-करीब उसी तरह चुनाव से पहले राजनीतिक दलों को भी प्रमोट किया जाता है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे प्रचार या प्रोपगैंडा कहा जाता है। मीडिया की भाषा में इसे विज्ञापन कहा जाता है। पोस्टर, अखबार, टी.वी. कार्यकर्ता राजनीतिक दलों का उसी तरह प्रचार करते हैं, जिस तरह फिल्मों का किया जाता है। इन्टरनेट का इस्तेमाल भी चुनाव प्रचार के लिए किया जाता है। इसके अलावे राजनीतिक दल चुनावी सभा करते हैं। आजकल सभा में श्रोताओं को बुलाने के लिए लोकप्रिय फिल्मी सितारों को भी बुलाया जाता है। इससे फिल्मी सितारों की चल रही फिल्मों को भी लाभ मिलता है। चुनावी सभाओं की तरह फिल्म अभिनेताओं के फैन क्लब भी सभाएँ करते हैं। खासकर दक्षिण भारत में फैन्स क्लबों का संगठन ज्यादा व्यवस्थित तरीके से काम करता है। तमिलनाडु एवं आंध्रप्रदेश की राजनीति में फिल्मी सितारों की निर्णयकारी भूमिका रही है। इसका एक बड़ा कारण मद्रास प्रेसिडेंसी में द्रविड आंदोलन की बौद्धिक जड़ो में है। द्रविड विचारक अपने को ब्राहमणवादी हिन्दू धर्म एवं संस्कृति से अलग दिखलाने की कोशिश करते रहे हैं। जिसके फलस्वरूप द्रविड कार्यकर्त्ता हिन्दू मंदिरों में जाने में हिचक अनुभव करते थे। इस हिचक की अभिव्यक्ति फिल्मी सितारों के दैवीकरण की प्रक्रिया के द्वारा होने लगा। फिल्मी सितारों को मात्र अभिनेता न मानकर दैवीय गुणों से संपन्न महामानव या देवी के रूप में होने लगा। अभिनेताओं के फैन्स क्लब बनने लगे और अभिनेत्रियों का तो बकायदा मंदिर तक बन गया। उसमें उनकी पूजा तक हुई। शिवाजी गणेशन, एम.जी. रामचन्द्रण, रजीनीकांत एवं जयललिता आदि का तमिलनाडु कल्ट विकसित हुआ। एन.टी. रामाराव एवं चिरंजीवी का आंध्रप्रदेश में कल्ट विकसित हुआ। राजकुमार का कर्नाटक में कल्ट विकसित हुआ। केरल में मोहनलाल एवं मम्मुटी के प्रशंसकों के बीच भी कल्ट जैसी ही स्थिति रही। इसके विपरीत उत्तर भारत में धर्म एवं मंदिर का महत्व काफी हद तक कायम रहा।
भक्ति संप्रदायों के मध्यकालीन स्वरूप में रूपांतरण तो हुआ है, लेकिन अब भी धर्म का महत्व सिनेमा से ज्यादा है। परन्तु मंदिरों के गर्भगृह और सिनेमा हॉल के पर्दे के बीच सहधर्मिता भी रही है। फलस्वरूप उत्तर भारत के अभिनेता-अभिनेत्रियों के प्रशंसकों की कमी नहीं रही है, परन्तु प्रशंसक समूह फैनक्लबों में उस तरह संगठित नहीं रहे हैं, जिस तरह दक्षिण भारत में संगठित रहे हैं। 1969 में शुरू हुए सिनेमा आंदोलन के केन्द्र में पटकथा एवं निर्देशक होते थे। अभिनेताओं एवं अभिनेत्रियों की भूमिका गौण थी। ज्यादातर सिनेमा सोसाइटी वामपंथी या कांग्रेसी विचारधारा से जुड़े हुए थे। कुछ सोसाइटी सूफी विचारधारा से जुड़े हुए थे। नए संदर्भ में वैश्विक पूँजीवाद या उदारीकरण का प्रभुत्व बढ़ा है। विचारधारा का महत्व राजनीति में भी सीमित हुआ है। राजनीति में अवसरवाद का बोलबाला है। ऐसे में फिल्म निर्माण की प्रक्रिया से भी संगठित विचारधारा का महत्व घटा है और व्यक्तिगत चेतना एवं रूझान के आधार पर प्रयोगधर्मी पटकथाओं का उत्थान हो रहा है। पश्चिमी समाजविज्ञान की भाषा में इसे उत्तर-आधुनिकता कहते हैं। पश्चिमी समाज में यह 1968 के आसपास शुरू हुआ। लेकिन भारतीय सिनेमा में यह 1990 के दशक के उत्तरार्ध में आया। पश्चिमी समाज में उत्तर-आधुनिक चेतना 1990 के दशक तक आते-आते प्रौढ़ हो चुकी थी। इसका विकास ‘हैरी पॉटर’, ‘दा विंची कोड’, ‘ईटी’, ‘ग्लैडिएटर’, ‘ट्रॉय’, ‘एलेक्जांडर’, ‘स्टार वॉर्स’ जैसी फिल्मों की पटकथा में सामने आयी। ये छोटी बजट की फिल्में नहीं हैं, परंतु इनकी पटकथा पश्चिमी आधुनिकता के ग्रैंड़ नैरेटिव (प्रमुख कथा विन्यास) से नहीं निकल कर, पूर्व की परंपरा की उत्तर आधुनिक विश्लेषण से निकली है। इसके विपरीत हिन्दी सिनेमा में उत्तर आधुनिकता अभी शैशवावस्था में है। यह 1940-50 के दशक में स्थापित फिल्मी कैनन (कथात्मक संरचना की रूढ़ियाँ) को तोड़ अवश्य रही हैं, लेकिन इसमें गुस्सा, छटपटाहट एवं तड़प का असहाय भाव ज्यादा है; सुनिश्चित एवं व्यवस्थित विकल्प प्रस्तुत करने का भाव कम है। उदाहरण के लिए ‘मुंबई मेरी जान’, ‘समर 2007’, ‘आमिर’, ‘लव आजकल’, ‘देव डी’, ‘रेस’, ‘गुलाल’, ‘जाने तू या जाने ना’, ‘गजनी’, ‘जन्नत’, ‘न्यूयार्क’, ‘रब ने बना दी जोड़ी’, ‘कमीने’ या ‘ए वेडनेश डे’। इसके विपरीत ‘विवाह’, ‘खोसला का घोसला’, ‘चक दे इंडिया’, ‘जब वी मेट’, ‘रॉक ऑन’, ‘किस्मत कनेक्शन’ ‘भूल भुलैया’ आदि सरल कथाओं पर आधारित, साफ-सुथरी, छोटी फिल्में हैं। इनमें तकनीकी तड़क-भड़क कम है। कथा में एक प्रवाह है, लेकिन इनकी सफलता एक समान नहीं है। इनकी कथा एक जैसी नहीं है। इनको प्रमोट करने का तरीका एक जैसा नहीं था।
फिल्म निर्माण, राजनीति और क्रिकेट एक टीम गेम है। इनको केवल बजट के आधार पर नहीं समझा जा सकता। परंतु बजट की बढ़ती भूमिका से इंकार भी नहीं किया जा सकता। भारतीय समाज में गरीबों की संख्या ज्यादा है। मल्टीप्लेक्स में टिकट दर इतना ज्यादा है कि गरीब आदमी इनमें बार-बार नहीं जा सकता। छोटे बजट की फिल्में मल्टीप्लेक्स में आसानी से दर्शक नहीं बटोर पातीं। छोटे बजट की फिल्मों का भविष्य सिंगल स्क्रीन थियेटर या एकल ठठिया सिनेमा हॉल में आज भी ज्यादा है। इनका भविष्य डी.वी.डी मार्केट और इन्टरनेट पर और भी ज्यादा है। बड़े बजट की फिल्मों को मल्टीप्लेक्स में तीन दिन हाउसफुल चल जाने पर पैसा वसूल नहीं होता। बिना स्टार की फिल्में मल्टीप्लेक्स में सामान्यत: हाउसफुल नहीं चल पातीं। छोटे सिनेमा घरों में अगर टिकट रेट कम हो तो छोटे बजट की फिल्मों का ज्यादा अच्छा भविष्य होगा। कम टिकट रेट वाले एकल ठठिया सिनेमा हॉल में सीटों की संख्या इतनी ज्यादा होती है कि छोटे बजट की फिल्में हाउसफुल नहीं हो पातीं। इसका एक उपाय मध्यम बजट की फिल्मों का निर्माण हो सकता है। ऋषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी, गुलजार जैसे बिमल रॉय के अनुयायी ऐसी फिल्में बनाया करते थे। रमेश सिप्पी, मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और यश चोपड़ा बड़े बजट की फिल्में बनाया करते थे। राजश्री वाले, श्याम बेनेगल आदि छोटे बजट की फिल्मों के स्थापित ब्रांड थे। राम से ब्रदर्स की डरावनी फिल्में भी छोटे बजट में बनती थीं। 1970 के दशक का यह विभाजन आज भी उपयोगी है। 1940 से 1960 के दशक तक श्वेत-श्याम फिल्मों का स्वर्णयुग था। 1970 का दशक रंगीन फिल्मों का स्वर्ण युग था। 1980 का दशक रंगीन टी.वी. का युग था। 1990 के दशक से सिनेमा की वापसी हुई। 2000 ईस्वी में फिल्म निर्माण को इंडस्ट्री का दर्जा मिला। अचानक कॉरपोरेट हाउसों के आने से सितारों के पारिश्रमिक आसमान छूने लगे। फिल्म निर्माण में फिजूलखर्ची आई। बिकाऊ सितारे सीमित थे। निर्माताओं में उन्हें साइन करने की होड़ मच गई। पटकथा एवं निर्देशन का महत्व बड़े बजट की फिल्मों में सितारों को करीब-करीब अचानक मिल गया। जिससे बड़े बजट की असफल फिल्मों की बाढ़ आ गई। इससे कॉरपोरेट हाउसों ने भी छोटे बजट की फिल्मों में धन लगाना शुरू किया। यह शुभारंभ है। लेकिन आज भी स्तरीय पटकथा लेखन करने वालों की भयानक कमी है। स्तरीय गीतकारों एवं संगीतकारों की कमी है।
समाज में टैलेन्ट की कमी नहीं है, लेकिन उनको खोजने का व्यवस्थित साधन आज उपलब्ध नहीं है। कॉरपोरेट हाउसों के पास रचनात्मक मैनेजरों एवं पारखी सलाहकारों की भयानक कमी है। इसके लिए फिल्म निर्माताओं को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। पटकथा लेखन सिखाने वाले स्तरीय संस्थान चाहिए। सिनेमा सोसाइटी आंदोलन को फिर से गतिशील करना चाहिए। इप्टा की तरह युगानुकुल कलाकारों का संगठन चाहिए। सिनेमा और समाज के जटिल रिश्ते पर शोध एवं डाक्युमेंटेशन को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। तभी भारत हॉलीवुड से प्रतियोगिता करने में सक्षम होगा।
केवल गुणवत्ता ही वह कवच है, जो मंदी के इस दौर में हिन्दी सिनेमा की रक्षा कर सकता है। मंदी का मौजूदा दौर हवा में उड़ने वालों को सबक सिखा रखा है और यथार्थ के कठोर धरातल पर ले आया है। ऐसा दौर अहंकार के मदमस्त हाथी को वश में करता है। जिन आम दर्शकों की सहायता से सिनेमा ने लगभग पौन सदी (1913 से 1993) तक का सफर तय किया, उस वर्ग को मल्टीप्लैक्स ने हाशिये पर डाल दिया। ताली बजाने वाले इन दर्शकों के उन्माद के बिना सिनेमा का जादू अपना पूरा रहस्य उजागर नहीं करता। सिनेमा के जादू में यकीन करने वाले आम दर्शक ही इस खेल के असली सितारे हैं। यह दर्शक वर्ग साहसी है और अपने शौक की खातिर जोखिम उठा सकता है। मंदी के दौर में मल्टीप्लैक्सों के दाम घटाने पर पच्चीस शो को जुबली मानने वाले असली पच्चीस सप्ताह वाली जुबली देखेंगे और मंदी के दौर में कम फिल्मों के बनने के संकट का भी सार्थक हल होगा, वर्ना मल्टीप्लैक्सों को खाली रहना पड़ेगा।
सिनेमा में बहुत लंबे समय तक ऐसी फिल्में बनती रहीं, जिसमें आम आदमी विपरीत परिस्थिति में किसी प्रेरणा से इतना शक्तिशाली हो जाता है कि वह अपने सभी शत्रुओं को हराता है। अमेरिका के पास अपनी मायथोलॉजी नहीं है। सुपर नायक की किंवदंती सामाजिक संरचना में आवश्यक होती है। सुपर नायक के पास दैवीय शक्तियाँ होती हैं और इस मायने में वह हमारी अवतारवाद की धारणा के नजदीक आता है। हॉलीवुड के प्रभाव में सुपर नायक फिल्में प्रारंभ हुई।
सिनेमा माध्यम में दीए और तूफान की लड़ाई हमेशा लोकप्रिय रही है और सिनेमा आम आदमी को नायक की तरह प्रस्तुत करता रहा है। इसमें प्रेम और करुणा जैसी रसों की उत्पत्ति होती है। जबकि सुपर नायक वाली फिल्में आपको फंतासी की दुनिया में ले जाती हैं और आप उम्मीद करने लगते हैं कि ऐसा कोई नायक हमारी जिंदगी की जंग लड़ेगा।
कर्ज पर टिके उत्पादन, निर्माण, खरीद और भव्यता के साथ भोग की संस्कृति अस्वाभाविक है। यह लंबे समय तक स्थिर और संतुलित रह ही नहीं सकता। इस सभ्यता के दिन जल्दी बहुरने वाले नहीं हैं। जिस तरह 1947 से यूरोप का लगातार पतन और अमेरिका का लगातार उत्थान होता रहा ठीक उसी तरह, अब अमेरिकी सभ्यता का लगातार पतन और गैर यूरोपीय, गैर पश्चिमी सभ्यता का धीरे-धीरे ही सही, लेकिन लगातार उत्थान संभावित है। इस उत्थान में भारतीय सिनेमा की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। एक स्तर पर सिनेमा जादू या सम्मोहन है। फिल्मकार अपनी प्रस्तुति से सम्मोहन का जाल या नदी के तेजधार जैसी प्रवाह पैदा करता है, ताकि दर्शक ढाई से तीन घंटे तक कथा की गहराई में डूब जाए। अगर दर्शक उब गया तो फिल्मकार डूब जाता है।
भारत में सिनेमा का प्रारंभ ही धार्मिक आख्यानों से हुआ है। पहले दर्शक की सारी फिल्में आख्यान और किंवदंतियों पर आधारित थीं। फिल्मकारों को माध्यम की सतही जानकारी थी। इसलिए उन्होंने ऐसी कहानियाँ चुनीं जिन्हें दर्शक पहले ही जानते थे, ताकि प्रस्तुतिकरण में छूटे हुए रिक्त स्थान दर्शक अपनी जानकारी से भर दें।
महात्मा गांधी ने भी अपनी सभाओं का आरंभ भजन और कीर्तन से ही किया। भारत में भीड़ जुटाने के लिए यह आवश्यक रहा है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति धर्म रहा है और सबसे बड़ी कमजोरी अंधविश्वास, कुरीतियाँ और पाखंड रहा है। अपनी अर्कमण्यता और आलस्य को धर्म का आवरण पहनाना पाखण्ड है।
