लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2006
हिन्दू वैदिक धारा और बौद्ध श्रमण धारा
वैदिक धारा और श्रमण धारा में अपनी-अपनी कुछ अलग विशेषताएँ हैं, पर साथ ही दोनों में कुछ परस्पर समावेशक तत्व हैं। इस सम्बन्ध में दो बातें पुन: विचारणीय हैं। एक तो यह कि यदि वर्णों का संघर्ष होता, तो क्या इतनी अधिक संख्या में बौद्ध दर्शन के आचार्य ब्राह्मण होते? और यदि भाषा का संघर्ष होता, तब संस्कृत में बौद्ध धर्म दर्शन का इतना विपुल वाङ्मय क्यों होता?
वैदिक विचारधारा में चतुर्थ आश्रम संगठित नहीं था। बौद्ध और जैन श्रमण संगठन संगठित हुए और इन संगठनों का प्रभाव संन्यासी संगठनों पर भी पड़ा। संन्यासियों के भी संगठन, मठ और पीठ बने। श्रमण व्यवस्थाएँ जाति विरोधी थीं, यह इतिहास से प्रमाणित नहीं है। इन व्यवस्थाओं के बावजूद इनके भीतर रहने वाले लोगों में भी वर्णभेद बने रहे और सामाजिक व्यवस्था भी बनी रही। कालान्तर में जैन धर्म में अवश्य संस्कार पद्धति विकसित हुई, पर प्राचीनकाल में न जैनों ने और न ही बौद्ध ने स्वतंत्र गृह्यसूत्र जैसे ग्रन्थ रचे। इसका कारण यह था कि परिवार केन्द्रित भारतीय समाज की व्यवस्था बड़ी सुदृढ़ थी और सारा जगत इस परिवार-धारणा का ही विस्तार था। वह धारणा परस्पर सहिष्णुता, आदर, प्रेम और सहयोग के लिए भूमि तैयार करती रही। इसको अस्वीकार कर इससे अलग रहकर कोई व्यवस्था भारतवर्ष में चल नहीं सकती थी। जब-जब इस व्यवस्था को तोड़ने का प्रयत्न हुआ, तब-तब तोड़ने वाले ही अधिक टूटे।
धर्म परिचालक है, नीति उसके द्वारा परिचालित व्यवस्था है। धर्म के व्यापक अर्थ में मोक्ष भी धर्म ही है और चारों पुरुषार्थ एक दूसरे की विरोधी नहीं एक ही विराट धर्म के सोपान हैं। मोक्ष को पहले के तीनों सोपानों से अलग करके एक अलग मार्ग बनाने से कर्म का अनुशासन शिथिल हुआ।
भगवद् गीता ने समन्वय का एक मार्ग दिया। मध्ययुग के भक्तों ने उसके आगे का एक दूसरा मार्ग दिया। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, तिलक, गाँधी और श्रीअरविन्द ने आधुनिक युग में फिर एक नया मार्ग दिया। इससे वैदिक धर्म और श्रमण परंपरा के बीच एकता एवं तादात्म्य के तत्व विकसित हुए। गृहस्थ धर्म और संन्यास धर्म के बीच की दूरी कम हुई।
भारतीय समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार है और व्यक्ति परिवार के सम्बन्धों का वितान लेकर ही अस्तित्ववान होता है और अंत में उसका विलयन सर्वभूत में हो जाता है। काल की अनुभूति अर्थात अपने द्वारा कर्मों की क्रियमाणता की अनुभूति व्यक्ति को होती है। साथ ही ध्यानयोग के बल पर इस स्थिति के अतिक्रमण की भी अनुभूति होती है और यह अनुभूति ही व्यक्ति का संस्कार है। हिन्दू, बौद्ध एवं जैनों में ध्यान-योग की परंपरा एक जैसी है, पर काल की अनुभूति की पहचान के विषय में भेद है। बौद्ध-साधना में ‘क्षणिकता सत्ता’ का स्वभाव है। एक सत्ता से दूसरी सत्ता में निमीलन, एक सत्ता के नए रूप धारण करने की क्रमिकता की पहचान का विषय बनाती है; जबकि वैदिक दर्शनों में शाश्वत एकसूत्रता सत्ता की एकता की पहचान कराती है।
