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बौद्धधर्म तथा हिन्दूधर्म का परस्पर सम्बन्ध

by Professor Amit Kumar Sharma
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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2006

बौद्धधर्म तथा हिन्दूधर्म का परस्पर सम्बन्ध

रामस्वरूप के अनुसार भगवान बुद्ध हिन्दू धर्म की अध्यात्म-चेतना के अभिन्न अंग हैं। भगवान बुद्ध का जन्म हिन्दू कुल में हुआ था। चाहे हम बौद्धधर्म के उदय, उत्थान तथा पराकाष्ठा पर दृष्टिपात करें; चाहे बौद्धधर्म के शिल्प, स्थापत्य, अथवा उसकी मूर्तिकला, भाषा, श्रद्धा, मनीषा, शब्दावली, नामानुक्रमणिका, विनय-प्रणाली तथा अध्यात्म-साधना को लक्ष्य करें; हिन्दुत्व की भावना उसके उदय तथा उत्कर्ष में सर्वत्र व्याप्त है। बौद्ध धर्म भले ही दीर्घकाल से सुदूर विदेशों में वास करता रहा हो, किन्तु उसकी अध्यात्म-साधना की अभिव्यक्ति तथा उसका ऊर्ध्वस्थ अध्यात्म-साक्षात्कार अभी भी हिन्दुत्व का परिचय देता है। हिन्दू धर्म का सर्वस्व बौद्धधर्म में परिभुक्त नहीं है। किन्तु बौद्धधर्म का सर्वस्व अवश्य ही उस तंत्र के अन्तर्गत है, जिसका तात्त्विक बोध हिन्दू धर्म के नाम से होता है।

भगवान बुद्ध ने सत्य का साक्षात्कार करने के लिए वर्गीकरण, समतुलन, निर्णयन, निष्कर्षण तथा प्रयोगीकरण इत्यादि प्रणालियों का आश्रय ही नहीं लिया। जो बुद्धवाद का सर्वस्व हैं। भगवान बुद्ध तो शील-शुद्धि, ध्यान, समाधि, समर्पण, अक्षुण्ण दृष्टभाव और अविरत अभीप्सा की बात कहते थे। इन्हीं साधनाओं के पथ पर आगे बढ़ने से साधक अपने साधारण चित्त का अतिक्रमण करता है और परम सत्य का प्रकाश हठात् अथवा उत्तरोत्तर उदय होता है।

कुछ यूरोपीय विद्वान बौद्धधर्म को केवल शील की एक संहिता बनाकर प्रस्तुत करते है। भगवान बुद्ध ने स्वयं इस सिद्धान्त का प्रत्याख्यान स्पष्ट शब्दों में किया है। उन्होंने आग्रह किया है कि शील के विषय में उनके शिक्षापद ”मुख्य” नहीं वरन ”गौण” है। उन्होंने स्वयं प्रज्ञापित किया है कि ”समाधि” तथा ”प्रज्ञा” के विषय में दिए गए उनके उपदेश ही सारभूत हैं। उनके मत में जो लोग शील-सम्बन्धी शिक्षापदों को लेकर उनकी सराहना करते थे, वे ”अज्ञ” और साधारण बुद्धि वाले अथवा ”पृथग्जन” थे। भगवान बुद्ध के तर्क तथा शील का एक ऊर्ध्वस्थ आधार था। भगवान बुद्ध की करुणा केवल लौकिक अथवा मानवता प्रवण नहीं थी। वस्तुत: वह सम्यकसंबुद्ध की अगाध और अम्लान करुणा थी। जिस शांति की वे शिक्षा देते थे उसे व्यक्तियों अथवा राष्ट्रों के बीच की गई सन्धि नहीं समझना चाहिए।

कुछ लोगों ने भगवान बुद्ध के उस मौन का जो उन्होंने ब्रह्म, आत्मा, परमात्मा इत्यादि प्रश्नों के प्रसंग में धारण किया था, मनमाना अर्थ करते हैं। संदर्भ रहित व्याख्या से अर्थ का अनर्थ हुआ है। भगवान बुद्ध का मौन सकारण था। उसका एक सभ्यतामूलक संदर्भ था। उन्होंने उन समस्त प्रश्नों का उत्तर देना अस्वीकार कर दिया, जिनका सम्बन्ध व्यक्ति के आध्यात्मिक कल्याण के साथ क्रियात्मक रूप में सिद्ध नहीं होता था। अध्यात्म स्वभावत: ही क्रियापरक होता है। भगवान बुद्ध के युग में तब यह मौन अत्यंत आवश्यक भी था। उस समय तत्त्वशास्त्र के बासठ सिद्धान्त (अठारह सिद्धान्त सृष्टि के विषय में, और चालीस सिद्धान्त प्रलय के विषय में) परस्पर विवाद कर रहे थे। आहार को लेकर तपस्या करने की बाईस प्रणालियाँ थी, वस्त्र को लेकर तेरह प्रणालियाँ। मरण के उपरान्त आत्मा की स्थिति को लेकर अनवरत वाद-विवाद होता रहता था। 

इन विवाद करने वालों में अक्रियावादी थे, दैववादी थे, जड़वादी थे, अकृतवादी थे, अनिश्चितत्त्ववादी थे और अन्य प्रकार के वादी-प्रतिवादी तथा वितण्डावादी थे। 

इस प्रकार का वातावरण किसी भी अध्यात्म-साधक के मन में सत्यश: विरक्ति उपजाता है। वह बुद्धि के बुलबुले उठाने की अपेक्षा सम्यक साधना को ही अधिक उपादेय मानता है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि भगवान बुद्ध ने इन प्रश्नों का उत्तर देना अस्वीकार कर दिया। प्रवीण पंडित उनके पास आकर इन्हीं प्रश्नों को अनेक प्रकार से पूछते थे। भगवान बुद्ध ने मौन रहकर ही इन समस्त प्रश्नों का प्रत्युत्तर दिया, क्योंकि उनकी साधना सर्वथा क्रिया परक थी। 

एक और कारण से भगवान बुद्ध ने तात्त्विक प्रश्नों की विवेचना करना अस्वीकार किया था। ये प्रश्न केवल निरर्थक ही नहीं थे, अपितु इनके उत्तर किसी बुदधिगम्य भाषा में देना भी असम्भव था। केनोपनिषद में कहा गया है : ”वहाँ न तो चक्षु-इन्द्रिय पहुँच सकती है, न वाक्-इन्द्रिय पहुँच सकती है, न मनस ही जिस प्रकार से इसको बतलाया जाए कि यह ऐसा है, वह प्रकार न तो हम स्वयं अपनी बुद्धि से जानते हैं, न दूसरों से सुनकर ही जानते हैं।” भगवान बुद्ध ने भी अपने-आप को ऐसी ही असमर्थता की स्थिति में पाया। अध्यात्म-सम्बन्धी समस्त साहित्य के अनुसार जो बातें बुद्धि के परे हैं, उनको बुद्धिगम्य सिद्धान्त के रूप में व्यक्त नहीं किया जा सकता। अतएव इन प्रश्नों का जो भी उत्तर दिया जाए, वही ”अव्याकृत” है। भगवान बुद्ध बार-बार इस बात को दोहराते थे।

किसी भी समस्या के समाधान की दो प्रणालियाँ होती हैं – क्रियात्मक तथा सैद्धान्तिक, मनोवैज्ञानिक तथा तात्त्विक। उदाहरणार्थ, सांख्यदर्शन सिद्धान्त तथा तत्त्वों की विवेचना करता है। इसी प्रकार वेदान्त दर्शन सिद्धान्त की तथा परमतत्त्व के स्वरूप की विवेचना करता है। ठीक उसी प्रकार बौद्ध धर्म उस साधना, शील तथा समाधिमार्ग की विवेचना करता हैं, जिसके द्वारा इन्द्रियातीत साक्षात्कार सम्भव होता है।

इसके लिए भगवान बुद्ध प्रज्ञा तथा चार आर्यसत्यों की व्याख्या करते हैं। किन्तु यह व्याख्या भी प्रमुखत: साधना की दृष्टि से ही प्रस्तुत की गई है। उद्देश्य यह है कि साधक का चित्त व्याख्या पर निविष्ट होकर वैराग्य को प्राप्त हो और वह नाम-रूप के संसार से विमुख हो जाय। उस व्याख्या का पारमार्थिक और तात्त्विक अर्थ साधना के समापन पर ही विदित हो पाता है। जिस स्थिति में वह अर्थ विदित हो जाता है, उसी को बौद्ध धर्म में बुद्धत्व, सम्बोधि, निर्वाण इत्यादि की संज्ञा दी जाती है। इस परमोपलब्धि की विवेचना करना भगवान बुद्ध ने अस्वीकार कर दिया।

भगवान बुद्ध की अध्यात्म-अनुभूति अकारण या अकस्मात नहीं थी। वह अनुभूति अप्रत्याशित एवं व्यक्तिगत भी नहीं थी। इसके विपरीत, वह अनुभूति सर्वथा प्रत्याशित एवं सर्वजनीन थी। भगवान बुद्ध ने स्वयं भी इससे अधिक आग्रह नहीं किया था कि उन्होंने वह ”पुरातन मार्ग पा लिया है, जिस पर पूर्व काल के सम्यक संबुद्ध चले थे।”

सनातन धर्म के अनुरूप ही बौद्धधर्म में भी परम अनुभूति होने से पूर्व अहंकार का अतिक्रमण विधेय है। साधक को शून्य के समान प्रतीत होने वाले तत्त्व की सम्पूर्णता का बोध हो उसके पूर्व सम्पूर्ण के समान प्रतीत होने वाले संसार की शून्यता का बोध हो जाना चाहिए। तृष्णा का क्षय हो जाना चाहिए। साधक की बुद्धि समस्त तर्क-विर्तक, संकल्प-विकल्प तथा चंचलता से मुक्त हो जानी चाहिए। 

व्यावहारिक सत्ता के प्रत्याख्यान द्वारा ही नहीं, अपितु पारमार्थिक तत्त्व के प्रतिपादन द्वारा भी भगवान बुद्ध उपनिषदों का ही अनुसरण करते हैं। जिस शून्यवादी व्याख्या के लिए बौद्ध धर्म आज विख्यात है, वह नागार्जुन इत्यादि भगवान बुद्ध के परवर्ती अनुयायियों की ही कृति है। भगवान बुद्ध के अपने शिक्षापदों में तो शून्यवाद का समर्थन करने वाला कोई सिध्दांत नहीं मिलता। सम्बोधि प्राप्त करने के उपरान्त भगवान बुद्ध ने स्वयं कहा था: ”मैंने अमृत, अनुत्तर योगक्षेम निर्वाण को पा लिया।” उन्होंने निर्वाण की स्थिति उसको कहा था ”जिसमें न जन्म रहता है, न जरा, न व्याधि, न मरण, न शोक, न संक्लेश।” उदान (सुत्तापिटक) में इस स्थिति को ”अजात, अभूत, अकृत, असंकृत” कहा गया है। उस स्थिति में जिसको भगवान बुद्ध निर्वाण कहते हैं और जिसको सनातन धर्म ब्रह्मस्थिति बतलाता है, क्षय तथा वृद्धि का पूर्ण अवसान हो जाता है। यहाँ पर निर्वाण की अनुभूति का वर्णन ”शून्यता” अथवा ”अभाव” की भाषा में व्यक्त नहीं किया गया, प्रत्युत उस अनुभूति को ”समाधि, आनंद, विमुक्ति तथा सम्बोधि” की संज्ञा दी गई है। यह वही भाषा है जिसका व्यवहार उपनिषदों में हुआ है। अध्यात्म की परंपरा में इस स्थिति को ”शून्य” भी कहा गया है, तथा ”पूर्ण” भी। भगवान बुद्ध के शिक्षापदों में जिस दु:ख का इतना उल्लेख है उस दु:ख की स्थिति मानसिक नहीं, पारमार्थिक है। 

दु:ख तथा आनंद के विषय में हिन्दूधर्म तथा बौद्धधर्म की धारणाएँ पूरक ही हैं, परस्पर विरोधी नहीं हैं। नीचे की ओर से देखने पर (द्वंद्व तथा अनेकत्व के दृष्टिकोण से) भगवान से विलग होकर, यह जगत बौद्धधर्म की धारणा के अनुरूप ही दु:ख, दौर्मनस्य, अनित्यत्व तथा वेदना का आगार है। किन्तु ऊपर की ओर से देखने पर (सर्वतोमुखी दृष्टिकोण से) यह सब-कुछ आनंद में सराबोर है। भगवान बुद्ध, उनकी अध्यात्म-अनुभूति तथा उनके शिक्षापद हिन्दू-परंपरा के ही अन्तर्गत थे। वे उपनिषद की परंपरा के उत्ताराधिकारी थे। उनको किसी अन्य अर्थ में समझा ही नहीं जा सकता। भगवान बुद्ध ने स्वयं किसी अभिनव आविष्कार का दावा नहीं किया। उन्होंने तो यही दावा किया था कि उन्होंने एक ”पुरातन पथ को देख लिया” और वे एक ”पुरातन पथ” पर चल रहे हैं। हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म परस्पर सहोदर हैं।

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