लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2010
भारतीय सभ्यता का भविष्य
भारत की सभ्यता दुनिया की प्राचीनतम सभ्यता है। ईस्वी सन् 1192 तक इस सभ्यता में काल का प्रवाह बिना अवरोध के निरंतर चला। 1192 से 1947 तक यह सभ्यता निरंतर विदेशियों से संघर्षशील रही। 1947 से इस सभ्यता के राज्य व्यवस्था और समाज व्यवस्था में लगातार संघर्ष चल रहा है। करीब हजार वर्षों तक निरंतर संघर्षशील रहने के बावजूद भारतीय सभ्यता आज तक कायम है। यह एक प्रकार की अद्वितीय घटना है। विपरीत परिस्थिति में पीढ़ी-दर-पीढ़ी रहने और इतना सब कुछ झेलने के बावजूद भारत के सामान्य लोग अपने जीवन में एक संतुलन कायम करने के लिए उनसे जो कुछ बन पड़ता है और जो कानून व उसके रखवाले उन्हें करने देते हैं, या जो कानूनवालों से छिपा करके किया जा सकता है, करते ही हैं। एक तरह से यह सब जहाँ भी जो हो सकता है, पहल को अपने हाथों में लौटाने के उनके तरीके हैं और अगर उन्हें एक क्षेत्र में पहल का अवसर मिलता है, तब वह दूसरे क्षेत्रों में भी मिल ही जायेगा, ऐसी उनकी सोच है। नैतिक सत्ता या किसी तरह की अध्यात्म-शक्ति तो हमारे पास है नहीं। हमारे सन्यासियों व धर्मगुरुओं के पास तक ऐसी नैतिक व अध्यात्मिक शक्तियों का ह्रास हुआ है।
हमारे समाज पर आक्रामकों का प्रभाव तो पड़ा, पर इतना नहीं, कि हम पूर्णतः रूपांतरित होकर उनके औजार हो जाएँ। हाँ, हमारे अभिजात वर्ग या राज्यकर्ता एवं शक्तिशाली वर्ग में अवश्य पिछले 800-1000 बरस में गठबंधन की प्रवृत्ति प्रबल रही। समाज से वे अधिकाधिक कटते गये। पर अभी भी भारतीय समाज की अपनी परम्परा प्रवाहित है। हमारा समाज इनकी अभिव्यक्ति विविध रूपों में करने का प्रयास भी करता रहता है।
जब यूरोपीय समाजों ने फैलना शुरू किया, तब उनके पास विशेष साधन नहीं थे। न शिक्षा, न विज्ञान, न प्रौद्योगिकी, न कृषि, न शिल्प, दूसरों की तुलना में उनके पास उपर्युक्त कोई भी चीज विशेष रूप में नहीं था। उत्पादन और पूँजी भी अन्य समाजों से अधिक नहीं थी। किन्तु उन्होंने संकल्प बल और इच्छा-शक्ति के साथ संगठित ढंग से फैलना शुरू किया। भारत लौटने के बाद गांधी जी ने भी आत्मबल एवं इच्छा-शक्ति से भारतीय समाज को संगठित करना प्रारंभ किया तथा समाज के आत्मबल और इच्छा को जगाया। विश्व के सभी समाज जय-पराजय के अलग-अलग क्रमों से उतार-चढ़ाव से गुजरते रहे हैं।
भारतीय समाज अपने राज्यकर्तावर्ग को सदा ही अपने नियंत्रण और मर्यादा में रखता रहा है। किन्तु दूसरी ओर, सैन्य आक्रमण की स्थिति में, प्रतिकार का सीधा भार जिस सेना पर आ पड़ता है, उस सैन्य-शक्ति के बारे में भारतीय समाज एक विशेष कालखंड में पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाया। इसका प्रमुख कारण यही था कि विश्व में ऐसे समूहों, समाजों और संस्थाओं तथा आदर्शों के उदय और विस्तार के बारे में भारतीय मनीषा बहुत कुछ अनजान रही, जो दूसरे मनुष्यों और समाजों का विध्वंस या कि पूर्णतः अधीन बनाकर उनका अपने अनुरूप रूपान्तरण करना अपना परम पुरुषार्थ या परम कर्तव्य मानते हैं और इसी में जीवन का वैभव देखते हैं। भारतीय मनीषा में अपनी विश्व दृष्टि के कारण स्वयं को ही परिष्कृत-सुसंस्कृत बनाये रहने की साधना करते रहने का स्वधर्म-भाव प्रबल रहा। फलस्वरूप, बाहरी विश्व एवं बाहरी धर्मों का पर्याप्त ज्ञान आवश्यक नहीं समझा गया। दूसरी ओर, अपने सैन्य-बल से विश्वविजय एंव विश्व-विध्वंस के लिए तत्पर और सक्रिय समाजों एवं समुदायों का विकास एवं उत्थान होता रहा। इससे बेखबर अंतर्मुखी भारतीय समाज इनका सामना करने योग्य आवश्यक सैन्य-शक्ति का संग्रह और संगठन करने की ओर भारतीय समाज ध्यान नहीं दे पाया। मूलत: भारतीय मनीषा की यह एक प्रमुख ऐतिहासिक विफलता रही है।
अपनी उपर्युक्त स्थिति के कारण ही भारतीय समाज आक्रमणकारियों को परास्त कर उन्हें लौटने को विवश कर देना अथवा समाज के एक अंग के रूप में घुलमिलकर रहने देना तो जानता रहा है। किन्तु यदि स्थायी शत्रु लम्बे समय तक देश के भीतर जमा-टिका रहे और युद्धरतद रहे तथा अधिकांश भारतीय समाज को विनष्ट करने और अवशिष्ट समाज को अपने अनुरूप रूपांतरित करने की दीर्घकालीन वैर-नीति पर चल रहा हो, तब ऐसे आक्रमणकारी का सामना करने की क्या-क्या नीतियाँ, उपाय-व्यवस्थाएँ हो सकती हैं, इस पर भारतीय मनीषा ने अभी तक पर्याप्त विमर्श नहीं किया है।
हमारे समाज को धर्म और स्वधर्म का बोध हमेशा रहा है, परन्तु पर-धर्म का ठीक-ठीक ज्ञान और उसके रूपों एवं अभिव्यक्तियों की पर्याप्त जानकारी नहीं रही है। हमारी गुलामी का कारण आक्रामकों की तुलना में अपने समाज में विषमता की अधिकता, या शिक्षा की कमी या विज्ञान- प्रौद्योगिकी का अभाव या सामाजिकता का अभाव अथवा मानवीय गुणों की विशेष कमी नहीं थी, अपितु एक विशिष्ट राजनैतिक बुद्धि का और आवश्यक बौद्धिक – राजनैतिक निर्णयों का अभाव था। दूसरी ओर, अंग्रेजो को सामाजिक विध्वंस तथा बलात् सामाजिक रूपान्तरण का, जन-गण को दास बनाने का बहुत लम्बा अनुभव था और इसमें दक्षता थी। यूरोप में शताब्दियों से ऐसा ही होता रहा था।
भारतीय समाज में उपर्युक्त सृजनात्मक अक्षमता हमारे शक्तिशाली वर्ग या अभिजात वर्ग में ब्रिटिश काल में ही आई दिखती हो, ऐसा नहीं है। सुप्रसिध्द आचार्य विद्यारण्य से प्रेरणा पा रहे विजय नगर राज्य में भी और स्वदेशी राज्य हेतु प्रेरणा देने वाले समर्थ गुरू रामदास से प्रेरित मराठों द्वारा 17 वी शती ईस्वी के हिन्दवी स्वराज की स्थापना के प्रयास में भी राज्य-कर्त्ता वर्ग ने बहुत सृजनात्मक सामर्थ्य नहीं दिखाया। आचार्य विद्यारण्य की कृति पंचदशी और समर्थ रामदास की कृति दासबोध इसका उदाहरण है। अपने समाज और राजनीति तंत्र (पॉलिटी) को ऐक्यबध्द करने साथ-साथ चलने, संवाद और विमर्श करने तथा कार्य करने की एकता उत्पन्न करने में ये दोनों ही राज्य कुछ अधिक सफल नहीं रहे।
परन्तु 1991 से विश्व में भारत की स्थिति बदल रही है। शीघ्र ही वह समय आने वाला है, जब भारत का राज्यतंत्र और राजनीति तंत्र हमारे समाज की आकांक्षाओं एवं आवश्यकताओं को प्रतिबिम्बित करने लगेगा और समाज के अपने व्यवहारपथों, व्यवहार-विधियों एवं अभिव्यक्ति-विधियों को भी प्रतिबिम्बित करने लगेगा तथा उन्हें सम्यक् प्रतिष्ठा देगा। ऐसा गांधी जी के रास्ते पर चलने से होगा। गांधी जी ने भारतीय परम्परा की पुनर्प्रतिष्ठा की तथा परम्परा को नयी अभिव्यक्ति दिया। भारतीय समाज के विश्वास को फिर से प्रतिष्ठा दी, शक्ति दी, प्रत्यावर्तन किया। परम्परागत मॉडल की पुनर्रचना की। लेकिन इस मॉडल के तहत नये प्रयोगों की भरपूर गुंजाइश है।
महात्मा गांधी का मॉडल मूलत: उनकी 1909 में प्रकाशित पुस्तक हिन्द स्वराज में वर्णित है। हिन्द स्वराज, पंचदशी (आचार्य विद्यारण्य) और दासबोध (समर्थ रामदास) का तुलनात्मक अध्ययन करने से इतना स्पष्ट है कि महात्मा गांधी की चिन्ता स्व-धर्म और पर-धर्म का तुलनात्मक विवेचना करके बदली हुई परिस्थिति में आम भारतीयों के बीच संकल्प शक्ति और इच्छा शक्ति के साथ नैतिक बल बढ़ाना था। वे गुलामी की परम्परा का अतिक्रमण करके स्वायत्ता एवं स्वावलंबी भारत में भारतीय लोग अपने स्वधर्म का पालन करते हुए आत्म-साक्षात्कार और ब्रह्म-साक्षात्कार कर सकते हैं। महात्मा गांधी की दृष्टि में- “सभ्यता वह आचरण है, जिससे आदमी अपना फर्ज अदा करता है”। फर्ज अदा करने का अर्थ है- नीति का पालन करना। ऐसा करते हुए हम अपने को पहचानते हैं (आत्म-साक्षात्कार)। यही सभ्यता है। इससे जो उलटा है, वह बिगाड़ अथवा अनर्थ करने वाला है। किसी भी देश में किसी भी सभ्यता के मातहत सभी लोग सम्पूर्णता (ब्रह्म-साक्षात्कार) तक नहीं पहुँच पाते। हिन्दुस्तान की सभ्यता का झुकाव नीति को मजबूत करने की ओर है, पश्चिम की सभ्यता का झुकाव अनीति को मजबूत करने की ओर है। जहाँ तक चाण्डाल सभ्यता की पहुँच नहीं है, वहाँ तक हिन्दुस्तान आज भी वैसा ही है।
गांधी जी पश्चिम की आधुनिक सभ्यता को चाण्डाल और शैतानी सभ्यता मानते थे। महात्मा गांधी के विरोधी हिन्दस्वराज को समकालीन समय के लिए अनुपयोगी सिध्द करने के लिए, इसे तकनीक विरोधी या नगर विरोधी साबित करते हैं। जबकि महात्मा गांधी ने मात्र आधुनिक तकनीक एवं आधुनिक नगरों के नीति विरोधी चाण्डाल प्रवृत्ति का लक्ष्य असभ्यता माना है। इस असभ्यता में मनुष्य के जीवन एवं कार्यों का कोई उदात्त लक्ष्य नहीं है। वह हर तकनीक एवं वह हर व्यवस्था जिसमें आत्म-साक्षात्कार एवं ब्रह्म-साक्षात्कार के लिए अनुकूल अवसर हो, महात्मा गांधी के स्वराजी मॉडल में मान्य है। वे एक सनातनी वैष्णव थे। आचार्य रामानुज के वैष्णव विशिष्टाद्वैत में उनका विश्वास था। विशिष्टाद्वैत संसार को भगवान विष्णु का शरीर अथवा उनके शरीर का विस्तार मानता है। फलस्वरूप प्रकृति को निर्जीव नहीं माना जा सकता। यही कारण है कि वे ऐसे तकनीकों का विरोध करते हैं, जो सत्य एवं अहिंसा पर आधारित नहीं हैं। आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक एक प्रकार के झूठ को बढ़ावा देता है। उसके अनुसार प्रकृति निर्जीव है तथा मनुष्यों के हित में इसका शोषण किया जा सकता है। मनुष्य को संसार एवं सृष्टि का केन्द्र मानने वाली आधुनिक मानववाद का भी गांधी जी इसी कारण विरोध करते हैं। उनकी विश्वदृष्टि के केन्द्र में मनुष्य, प्रकृति, मनुष्येतर जीव एवं ईश्वर सभी आते हैं। सभी सत्य के ही रूप हैं। अत: वे अहिंसक तकनीक के हिमायती हैं। वे शक्तिशाली लोगों के द्वारा शक्तिहीन मनुष्य, जीव या प्रकृति के शोषण के खिलाफ हैं। वे सर्वोदय के समर्थक हैं। आज के विश्वग्राम में बहुसांस्कृतिकता की बात की जाने लगी है, पर्यावरण असंतुलन की बात समझी जाने लगी है, आतंकवादी हिंसा के खिलाफ माहौल बनने लगा है। नीति और न्याय की बातें की जाने लगी हैं। भूखमरी और कुपोषण घटनाओं पर चिन्ता बढ़ रही है। ऐसे माहौल में महात्मा गांधी की दृष्टि पर आधारित भारतीय सभ्यता का उज्जवल भविष्य है, परंतु भारतीय राजनीति एवं नेहरूवादी कांग्रेसी संस्कृति में पश्चिम की आधुनिकता का सर्वोपरि स्थान है। यह कांग्रेसी संस्कृति अंग्रेजों के खिलाफ, लेकिन अंग्रेजियत के पक्ष में रही है। इस अंग्रेजी आधुनिकता का मूल वाक्य ‘वीर भोग्या वसुन्धरा’ या ‘सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ है। फलस्वरूप कांग्रेसी शासन में 1947 से ही आम आदमी की आर्थिक एवं सामाजिक हालत लगातार बद से बदतर होती रही है, जबकि धनी एवं अभिजात वर्ग लगातार समृद्ध से समृद्धतम होता रहा है। कांग्रेसी शासन में महंगाई, कालाबाजारी एवं भ्रष्टाचार खूब फलता-फूलता रहा है। फलस्वरूप नगरीय जीवन एवं मध्यवर्ग का लगातार विस्तार होता रहा है। गाँवों की हालत बद से बदतर होते जा रही है। 2006 के ‘नेशनल सैम्पुल सर्वे और्गनाइजेशन’ के अनुसार भारत के 40 प्रतिशत किसान खेती नहीं करके, दूसरे व्यवसाय करना चाहते हैं। करीब 80 हजार ग्रामीण किसान एवं मजदूर प्रतिवर्ष शहरों में बसने के लिए गाँव छोड़ रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार 2020 ईस्वी तक तमिलनाडु के 70 प्रतिशत, पंजाब के 65 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश के 55 प्रतिशत किसान शहरों में रहने लगेंगे। 1960 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का शेयर यानि हिस्सा 46 प्रतिशत था, जबकि 2008-09 में यह मात्र 20 प्रतिशत रह गया है। अभी भी भारतीय जनसंख्या के करीब 70 प्रतिशत लोग खेती के काम में लगे हुए हैं। इन 70 प्रतिशत लोगों की हालत महात्मा गांधी के बताए रास्ते से ही सुधारी जा सकती है जवाहरलाल नेहरू और मनमोहन सिंह के रास्ते नहीं सुधारी जा सकती।
आधुनिक सभ्यता में ‘स्वाइन फ्लु, बर्ड बलू, बाढ़, सूखा, सुनामी, कैटरीना’ – ये सभी कुपित प्रकृति के हथियार हैं, जिससे जनसंख्या नियंत्रित होता है। मल्थस ने काफी पहले कहा था कि जब मनुष्य जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं करता तो प्रकृति हस्तक्षेप करती है और जनसंख्या नियंत्रित कर देती है। सबसे संतुलित खाना भारत का शाकाहारी खाना है। भारतीय सभ्यता ने प्रकृति और संस्कृति के बीच एक संतुलन बना कर रखा है, जिससे प्रकृति का कोप कम सहना पड़ता है। प्रकृति के सहयोग से ही महान सभ्यताएँ बनती हैं। एक हद से ज्यादा हस्तक्षेप करने की कोशिश में आधुनिक तकनीक का उपयोग प्रकृति के संयम को तोड़ देता है और कुपित प्रकृति मनुष्य को दंडित करने लगती है। जल, जमीन और जंगल प्रकृति की आत्मा के अवयव हैं और इनसे मनुष्य का आत्मिक संबंध सदियों से रहा है। हिन्द स्वराज में गांधी जी सभ्यता की परिभाषा में इसीलिए नीति एवं फर्ज की बात करते हैं। इस संसार में मनुष्य के अधिकार की एक सीमा या हद है। उसे यह अधिकार अपने कर्तव्य या फर्ज निभाने के लिए ही मिलता है। सनातन धर्म में इस फर्ज को ऋण कहा जाता है। ऋण चार प्रकार के होते हैं- ‘पितृऋण’, ‘ऋषिऋण’, ‘देवऋण’ एवं ‘भूतऋण’। इन ऋणों की पूर्ति के क्रम में प्रकृति का संतुलन कायम रहता है। संस्कृति और प्रकृति के बीच आदान-प्रदान होता है। अधिकार एवं कर्तव्य के बीच समन्वय होता है। ओशो का कहना सही है कि भोग और त्याग एक ही सिक्के (”संसार”) के दो पहलू हैं। इन्हे त्यागने की नहीं, इनको अतिक्रमण करने की जरूरत है। जिस देश में महान नास्तिक नहीं होते, वहाँ महान आस्तिक होने की भी गुंजायश नहीं होती। बुध्द का मध्यमार्ग यही है। इसी समन्वयवादी दृष्टि के कारण भारतीय सभ्यता का भविष्य बहुत अच्छा है, लेकिन भारत के आम आदमी का भविष्य भी अच्छा हो सके, इसके लिए ऐसी राजनीति एवं राजनैतिक तत्रं का विकास होना अभी भी बाकी है। भारतीय शासक वर्ग में विजन या विश्वदृष्टि का अभाव है। भारतीय मध्यवर्ग पूरी तरह आत्मकेन्द्रित एवं सुविधाभोगी है। इन्हें आम आदमी के सुख-दुख से सरोकार नहीं है। भारतीय राज्य का सर्व प्रथम कर्तव्य पानी, सफाई, भोजन, वस्त्र, वैकल्पिक ऊर्जा, बुनियादी शिक्षा, जनसंख्या नियंत्रण तथा स्वास्थ्य की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि आम आदमी की जिन्दगी में खुशहाली आ सके। दुर्भाग्य से भारतीय राज्य 1947 से अब तक उपर्युक्त बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का कर्तव्य नहीं निभा पाया है। शासक दल तथा प्रमुख राजनीतिक दलों की दिलचस्पी आम आदमी की खुशहाली में न होकर, अपने लिए वेतन, भत्ते और विदेश यात्राओं में ज्यादा रहती है। भारतीय संसद का कीमती समय व्यर्थ के मुद्दों पर चर्चा करने में निकल जाता है और बुनियादी मुद्दों पर खानापूर्ती और शोशेबाज़ी की जाती है। इसके बावजूद आम आदमी अपने जीवन में सनातन धर्म को पूरा करने में यथा संभव लगा रहता है। भारतीय सभ्यता का इसीलिए अच्छा भविष्य है।
