लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2006
श्री भगवती तत्व, भगवती और सृष्टि, गणपति-तत्व
श्री भगवती तत्व
तन्त्रों के अनुसार प्रकाश ही शिव और विमर्श ही शक्ति है। संहार में शिव का प्राधान्य रहता है, सृष्टि में शक्ति का प्राधान्य रहता है। प्रकृति में ही सूक्ष्म रूप से सब वस्तु स्थित हैं। परमशिव और शक्ति दोनों ही श्लिष्ट होकर रहते हैं। अर्थात ज्ञान और अर्थ दोनों ही अविकल्पित होकर एक में रहते हैं, तब साम्यावस्था समझी जाती है।
प्रकृति की सत्ता
ज्ञानस्वरूप पुरुष की सत्ता पारमार्थिक है, अर्थरूप प्रकृति की सत्ता अवास्तविक है। अर्थ के न रहने पर भी संस्कृति की निवृत्ति नहीं होती। माया के कारण कोई वस्तु न होने पर भी प्रतीत होती है। शक्ति शब्द से जैसे अचित् प्रकृति के अतिरिक्त, जीव आदि का भी ग्रहण होता है, वैसे ही भगवती शब्द से शुद्ध-निर्गुण चित्-शक्ति का भी बोध होता है। सच्चिदानन्दात्मिका भगवती ही उपास्य होती है।
अनन्तकोटि ब्रह्माण्डात्मक प्रपंच की अधिष्ठान भूता सच्चिदानन्द रूपा भगवती ही सम्पूर्ण विश्व को सत्ता, स्फूर्ति तथा सरसता प्रदान करती हैं। विश्व प्रपंच उन्हीं में उत्पन्न, स्थित एवं लीन होता है। सदानन्द स्वरूप महाचिति भगवती में सम्पूर्ण विश्व भासित होता है।
महाशक्ति का आश्रयण करके वही त्रिपुरसुन्दरी, भुवनेश्वरी, विष्णु, शिव, कृष्ण, राम, गणपति, सूर्य आदि रूप में भी प्रकट होती है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण, त्रिशरीर रूप त्रिपुर के भीतर रहने वाली सर्व-साक्षिणी चिति ही त्रिपुरसुन्दरी है। महालक्ष्मी, महासरस्वती, महागौरी आदि उसी के अवतार हैं। यद्यपि श्रीभगवती नित्य ही है, तथापि देवताओं के कार्य के लिए वह समय-समय पर अनेक रूपों में प्रकट होती है।
मायारूपिणी भगवती-माया को ही विश्व की प्रकृति समझना चाहिए और मायाविशिष्ट ब्रह्म को ही परमेश्वर समझना चाहिए। ईश्वर अपनी प्रकृति का ही सहारा लेकर अवतीर्ण होते हैं। ईश्वर की अध्यक्षता में प्रकृति ही चराचर प्रपंच का निर्माण करती है। भगवान् स्वयं कहते हैं कि प्रकृति मेरी योनि है, उसी में मैं गर्भाधान करके विश्व का निर्माण करता हूँ। सम्पूर्ण प्राणियों में जो मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन सबकी प्रकृति ही जननी है और मैं बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ। गुणमयी प्रकृति का अतिक्रमण बहुत ही कठिन है। अधिष्ठान ब्रह्म के साक्षात्कार से ही उसका अतिक्रमण हो सकता है, अन्यथा नहीं-
अविद्या को क्षर और विद्या को अमृत कहते हैं। सृष्टि में जो परमा है, वही प्रकृति है। माया स्थूल, सूक्ष्म, कारण और समाधि इन चार रूपों में प्रकट होती है, जो ज्ञान को ढाँकने वाली है, जीव, ईश्वर दोनों ही उससे संबंध रखते हैं।
माया अविद्या और अ-ज्ञान है। यहाँ ज्ञान का अभाव नहीं है, किन्तु ज्ञाननिवर्त्यरूप अनिर्वचनीय पदार्थ की ओर संकेत है। तभी उसमें आवरणहेतुता बन सकती है। अज्ञान ब्रह्म स्वरूप ज्ञान का आवरण है। माया भी आवरण है।
योगनिद्रा, जड़शक्ति, अचित्, अज्ञान, अविद्या, माया, प्रकृति इत्यादि सभी शब्द एक ही अर्थ के बोधक हैं। इस शक्ति के अंतरंग रूप से भगवद्लोक और बहिरंग शक्ति से जगत का निर्माण होता है।
भगवती और सृष्टि
प्राणियों के परिपक्व कर्मों का भोग द्वारा क्षय हो जाने पर प्रलय होता है। उस समय सब प्रपंच माया के ही उदर में लीन रहता है। माया भी स्व प्रतिष्ठ निर्गुण ब्रह्म में लीन रहती है। माया भी अर्थ अव्यक्त भी है। गुणसाम्य बीजावस्था है, वही शुध्द माया है। बीज का अंकुरित होना कार्यावस्था है। स्पष्ट ईक्षण और अहंकार आदि ही महत तत्व, अहंतत्व आदि है। तदन्तर स्थूल कार्यादि सम्पत्ति होती है। अन्तर्मुख अव्यक्त की तुरीय अवस्था है। बहिर्मुख अव्यक्त की कारणदेह अवस्था है। बहिर्मुख अव्यक्त से सूक्ष्म-स्थूल देह की उत्पत्ति होती है, इसी में सम्पूर्ण विश्व आ जाता है।
समष्टि-व्यष्टि, स्थूल-देह और ज्ञानेन्द्रिय तथा अन्त:करण के अधिपति सरस्वती सहित ब्रहमा हैं। क्रियाशक्त्यामक लिंग-देह के अधिपति लक्ष्मी सहित विष्णु हैं। कारण-देह के अधिपति गौरी सहित रूद्र हैं। तुरीय-देह की अभिमानिनी भुवनेश्वरी और महालक्ष्मी हैं।
गणपति-तत्व
सर्वजगत्-नियन्ता पूर्ण परमतत्व ही गणपति तत्व हैं। ‘गण’ शब्द समूह का वाचक होता है। समूहों का पालन करने वाले परमात्मा को गणपति कहते हैं। गणपति ब्रह्म ही हैं। उन्हीं से जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय होती है। एक ही परम तत्व भिन्न-भिन्न उपासकों की भिन्न-भिन्न अभिलषित सिद्धियों के लिए अपनी अचिन्त्य लीला-शक्ति से भिन्न-भिन्न गुणों से सम्पन्न होकर नाम-रूपवान होकर अभिव्यक्त होता है। इसीलिए भिन्न-भिन्न पुराणों में शिव, विष्णु, सूर्य, शक्ति और गणपति आदि सभी ब्रह्मरूप से विवक्षित हैं। शास्त्र गणपति को पूर्ण परब्रह्म बतलाते हैं।
गणपति के स्वरूप में नर तथा गज इन दोनों का ही सामंजस्य पाया जाता है। शास्त्रों में ‘नर’ पद से प्रणवात्मक सोपाधिक ब्रह्म कहा गया है। समाधि से योगी लोग जिस परम तत्व को प्राप्त करते हैं, वह ‘ग’ है और जैसे बिम्ब से प्रतिबिम्ब उत्पन्न होता है, वैसे ही कार्य-कारण-स्वरूप प्रणवात्मक प्रपंच जिससे उत्पन्न होता है, उसे ‘ज’ कहते हैं। अत: ‘गज’ पद का भी आध्यात्मिक अर्थ है।
भारतीय संस्कृति में गणपति का लोकप्रिय नाम श्री गणेश है। देवी-देवताओं में श्री गणेश का स्थान सर्वोपरि है। हिन्दू धर्म का कोई भी कार्य हो, उसका प्रारंभ श्री गणेश पूजन से ही होता है, इसको ‘श्री गणेशाय नम:’ भी कहते हैं। हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवी-देवता हैं, परन्तु प्रत्येक देवता की पूजा में अग्रस्थान श्री गणेश का ही है। श्री गणेश तो देवताओं को भी वरदान देने वाले स्वयं ऊॅंकार स्वरूप हैं। यजुर्वेद में इन्हें गणपति, प्रियपति एवं निधिपति के रूप में आहूत किया गया है। ये प्रथम पूज्य हैं, गणेश हैं, विघ्नेश हैं साथ ही विद्या-वारिधि और बुद्धि-विधाता भी हैं। स्वस्तिक-चिह्न श्री गणपति का स्वरूप है और दो-दो रेखाएँ श्री गणपति की भार्या स्वरूप सिद्धि-बुद्धि एवं पुत्र स्वरूप लाभ और क्षेम हैं। श्री गणपति का बीजमंत्र है अनुस्वारयुक्त ग अर्थात ‘गं’ इस ‘ग’ बीजमंत्र की चार संख्या को मिलाकर एक कर देने से स्वस्तिक चिह्न बन जाता है। इस चिह्न में चार बीजमंत्रों का संयुक्त होना श्री गणपति की जन्मतिथि चतुर्थी का द्योतक है। श्री गणपति बुद्धि-प्रदाता हैं। इनका पूजन सिद्धि-बुद्धि, लाभ और क्षेम प्रदान करता है। यही भाव स्वस्तिक के आसपास दो-दो बड़ी रेखाओं का है। इनको विनायक, गणेश्वर, गजानन, एकदन्त, लम्बोदर, सूर्पकर्ण, विघ्नराज, सुमुख, गणाधिप, हेरम्ब, विकट, धूम्रकेतु, विघ्नेश, परशुपाणि, गजास्य (गजास्य का अर्थ है “हाथी के मुख वाला”), शूर्पकर्ण तथा मूषकध्वज आदि अनेक नामों से संबोधित किया गया है।
गणपति की उपासना प्राचीन आर्यजगत् की पंचदेवोपासना में एक मुख्य उपासना है। जिस प्रकार प्रत्येक मंत्र के आरंभ में ओंकार का उच्चारण आवश्यक है, उसी प्रकार शुभ अवसर पर गणपति की पूजा अनिवार्य है। कृतयुग में गणेश जी का वाहन सिंह है, वे दसभुज वाले, तेज स्वरूप और विशालकाय तथा सबको वर देने वाले हैं। उनका नाम विनायक है।
त्रेता युग में इनका वाहन मयूर है, वे षडभुजवाले हैं। श्वेत वर्ण हैं। तीनों लोकों में मयूरेश्वर नाम से प्रसिद्ध हैं।
द्वापर में इनका वर्ण लाल है आखु-मूषक वाहन है। उनको चार भुजाएँ हैं। वे देवता और मनुष्यों के द्वारा पूजित हैं। इनका नाम गजानन है।
कलियुग में उनका धूम्रवर्ण है, वे घोड़े पर आरूढ़ रहते हैं, उनके दो हाथ हैं, उनका नाम ध्रूमकेतु है, वे म्लेच्छवाहिनी का विनाश करते हैं। लेकिन लोक में श्री गणेशजी का सर्वप्रसिद्ध वाहन मूषक है। ऋग्वेद के भाष्यकार स्कन्द स्वामी ने लिखा है कि वैदिक देवता वृहस्पति ही विघ्नेश गणपति हैं। लौकिक साहित्य में गणेश के दो मुख्य गुणों का वर्णन है-
एक विद्या, बुद्धि एवं धन प्रदान करना और दूसरा विघ्न या दुष्टों का दमन करना। समकालीन भारत में तिलक महाराज ने गणपति महोत्सव का प्रारंभ करके गणपति पूजा को महत्ता दिलवाई। शिव पुराण में वे भगवान शिव और भगवती पार्वती के दत्तक पुत्र माने गए हैं। कार्तिकेय के वे भाई माने गए हैं। कार्तिकेय भगवान शिव और भगवती पार्वती के औरस पुत्र हैं।
