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योग एवं भोग

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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2006

योग एवं भोग

सनातन धर्म एवं संस्कृति के दायरे में युग-निरपेक्ष लेखन ही टिकता है। युग-सापेक्ष लेखन को युग खा जाता है। कालजयी रचना युग-निरपेक्ष ही होती है।
सनातन वैदिक ज्ञान किसी भी युग को समझने की दृष्टि तथा चेतना देता है। यह कभी भी अप्रासंगिक नहीं होता। इसको प्रासंगिक बनाने की जरूरत ही नहीं है। यदि ऋचाएँ आपको सुपात्र समझकर खुलती हैं, तब आपके पास अपने आप शक्ति आएगी । आप अपने आप शक्तिमान बन जाएँगे। भोगने के लिए शूद्र होना जरूरी है। योगने के लिए तपस-ब्राह्मणत्व जरूरी है। यह नैसर्गिक (biological) आरोहण अवरोहण (evolution-devolution) का मामला है। जिसका नैसर्गिक झुकाव मोक्ष-कैवल्य-निर्वाण के प्रति है, वह अपने आप धीरे-धीरे नपुंसक (सृजन की नवीन प्रक्रिया से दूर) होते चला जाएगा। जिसका नैसर्गिक झुकाव-सृजन-शक्ति-समृद्धि-भोग के प्रति है, वह अपने आप सतोगुण से विरत और तमोगुण में रत हो जाएगा। जिसमें गति नहीं है, वह स्थिति हो जाएगा। जिसमें स्थिति है, उसमें गति नहीं होगी। नदी एकमात्र अपवाद है, जिसमें गति और स्थिति एक साथ है।

कुछ भी बनने या करने के लिए अपनी हद में, अपनी सीमा में, अपने स्वभाव में, अपने स्वभाव स्वधर्म में स्थित होना जरूरी है। आपको जो भी मिलता है, वह आपके कर्म का ही फल होता है। इसका क्रियामान या क्रियाशील कर्म होना जरूरी नहीं है। संचित कर्मफल ही प्रारब्ध है।

कोई भी युग हो, कोई भी देश-काल-परिस्थिति-भाषा-विमर्श हो, समग्रतः (as a whole) यह एक अद्वितीय दैवीय लीला (sui-generis divine play) की ही अभिव्यक्ति (manifestation) है और इस लीला के अनुरूप ही अपनी स्वभाव की भूमि को तलाशनी पड़ती है। इसमें नैतिक एवं आचारिक धर्मसंकटों (moral-ethical dilemmas) का भी सामना करना पड़ता है। इसमें आप अपनी सीमा में जितना सार्वभौमिक (universalistic) सोच सकते हैं, अवश्य सोचिए। लेकिन भूमिका आपकी स्थानीय (local) ही हो सकती है। इसमें आपका वास्तव में कोई प्रतियोगी (competitor) नहीं होता है।

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