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बॉलीवुड आजकल

by amitjnusociology@gmail.com
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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2015

बॉलीवुड आजकल

लेखकों और निर्देशकों की एक नई पीढ़ी तैयार हो रही है, जो पहले की तुलना में ज्यादा प्रोफेशनल है। आज विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप, अनुराग बसु, फरहान अख्तर, अभिषेक कपूर, इम्तियाज अली, शिमित अमीन, राजकुमार हिरानी, आशुतोष गोवारीकर जैसे कई नाम हैं, जो ज्यादा अनुशासन के साथ काम कर रहे हैं। फिल्म से पहले सालों स्क्रिप्ट पर काम होता है। कहानी की हर एक डिटेल पटकथा के रूप में सामने होती है। यहाँ तक कि शूटिंग की योजना भी महीनों पहले से बनाई जाती है। आज भारतीय सिनेमा का दर्शक भी पहले की तुलना में ज्यादा समझदार और संवेदनशील है। लोकप्रिय सिनेमा की परिभाषाएँ बदली हैं। नई तरह की फिल्में आ रही हैं, जिनके सवाल और उन सवालों को देखने का अंदाज भी नया है। यह सिनेमा नई भाषा में नए समय की कहानी रच रहा है। भारत के बाहर हिन्दी सिनेमा का दर्शक वर्ग वही है, जहाँ हिन्दी भाषी लोग रहते हैं। यह सिर्फ एन.आर.आई. बाजार है, जिसने भारत के बाहर हिन्दी सिनेमा को इतना लोकप्रिय बनाया है। फ्रेंच, जर्मन, इतालवी और ईरानी सिनेमा की तरह पूरी दुनिया में हिन्दी सिनेमा का एक खास दर्शक वर्ग नहीं है। सिनेमा में फीलगुड और सुखद अंत की थीम भी खास भारतीय सिनेमाई अंदाज ही है। लेकिन खुशी की बात है कि अब हमारे यहाँ भी ये सीमाएँ टूट रही हैं। ‘रॉकेट सिंह’, ‘वेक अप सिड’, ‘लक बाई चांस’, ‘रॉक ऑन’, ‘ए वेडनेश डे’, ‘थ्री इडियट्स’ जैसी फिल्में न सिर्फ बन रही हैं, बल्कि इनमें मुख्यधारा के स्टार काम कर रहे हैं। पहले भी अच्छी फिल्में बनती थी। 1950 से 1970 के दशक तक तीन तरह की फिल्में बनती थी। उनके अभिनेता भी तीन तरह के होते थे। अब मिक्सिंग हो रहा है। सफल सितारे भी प्रयोगधर्मी फिल्मों या मध्यमार्गी सिनेमा में काम कर रहे हैं।
80 का दशक भारतीय सिनेमा के लिए संक्रमण काल था। यह भारतीय समाज के लिए भी संक्रमण काल था। यह रंगीन टेलीविजन सीरियलों का युग था। यह अमिताभ बच्चन के बिग बी बनने का युग था (1978-1988)। इस युग में वे बिना उत्कृष्ट काम किये मेगा स्टार मान लिए गये थे। 1989 से धीरे-धीरे भारतीय सिनेमा बदलने लगा। सूरज बड़जात्या, आदित्य चोपड़ा, मणिरत्नम, राकेश रोशन, रामगोपाल वर्मा, नागेश कुक्कुनूर, करण जौहर, संजय लीला भंसाली, जॉन मैथ्यू माथन, प्रियदर्शन, विधु विनोद चोपड़ा, प्रकाश झा, विपुल शाह, राकेश रोशन, ओमप्रकाश मेहरा, फराह खान आदि ने अपनी-अपनी फिल्मों से दर्शकों को भरपूर आनंद दिया। 
हम ईरानी सिनेमा की तरह एक बंद समाज के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे हैं। यूरोपीय सिनेमा जैसी अकादमिक गंभीरता से भी अभिभूत नहीं हैं। भारतीय संस्कृति की तरह भारतीय सिनेमा की भी अपनी खास विशेषता है। इस पर बहुआयामी समीक्षा या संशोधन का कार्य अब तक नहीं हुआ है। सिनेमा में नई टेक्नोलॉजी के समावेश के लिए जमीन तैयार की जा रही है। जेम्स कैमरॉन की ‘अवतार’ टेक्नोलॉजी की शिखर रचना है। आज के कालखंड में, कल्पना और यथार्थ इस कदर मिल गए हैं कि बताना कठिन होता है कि कहाँ से अफसाना शुरू हो रहा है और कहाँ से यथार्थ विलोप हो रहा है। आज के इस दौर की इस आपाधापी में संतुलन बनाए रखना कठिन हो रहा है। कमसिन उम्र के लोगों के लिए तो यह और भी कठिन है। बच्चे वीडियो गेम्स खेलने के आदी हो जाते हैं। दरअसल हमारे तमाम जुनूनी शौक हकीकत से दूर ले जाते हैं। अनेक मनुष्य जन्मजात पलायनवादी होते हैं। कल्पना जगत में खोने और यथार्थ को नकार कर उससे दूर भागने में अंतर है। पलायन के मूल में डर होता है। डर के यथार्थ से, डर का हौवा बड़ा होता है। सपनों की तरह यह अनियंत्रित भी होता है। टेक्नोलॉजी केन्द्रित अवतार के विपरीत ‘वेक अप सिड’, ‘लंदन ड्रीम्स’ और ‘प्यार इंपॉसिबुल’ की चर्चा की जा सकती है। तीनों फिल्मों को औसत सफलता मिली है। ‘वेक अप सिड’ करण जौहर की फिल्म है, ‘लंदन ड्रीम्स’ विपुल शाह की फिल्म है और ‘प्यार इंपॉसिबुल’ उदय चोपड़ा द्वारा लिखित और अभिनित यशराज की फिल्म है।
सूरत बनाम सीरत हमारे सिनेमा का बहुत पुराना विषय है। तीनों फिल्मों में इस थीम को ताजगी से प्रस्तुत किया गया है। ‘लक बाई चांस’ भी इसी तरह की फिल्म थी। प्रतिभाशाली लोगों के बीच स्वंय को सहज रख पाना कठिन काम है। कोई भी व्यक्ति स्वंय के साधारण होने को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता। इसके लिए संतोष चाहिए। असाधारण बनने के लिए हम वह सब दिखाना चाहते हैं, जो हम नहीं हैं। यह अत्यंत थका देने वाली कसरत है। स्वयं को जस का तस उजागर करना बहुत ही कठिन है। टेक्नोलॉजी केन्द्रित फिल्मों के द्वारा असाधारण को ही महिमामंडित किया जाता है।
शाहरूख खान की घरेलू फिल्म ‘रा-1’ की कहानी टेक्नोलॉजी केन्द्रित है। इसकी पटकथा हॉलीवुड के डेविड बेनुलो लिख रहे हैं और स्टीगर इसके कैमरामैन होंगे। बेनुलो ने ‘शैडो मैन’ जैसी फिल्म लिखी थी। स्टीगर ‘मेडन हीस्ट’ फिल्म के कैमरामैन रहे हैं। ‘रा-1’ ‘अवतार’ का विलोम है। “अवतार’ की कथा भारतीय मिथक एवं आख्यान की शैली में कही गई है। ‘रा-1’ हॉलीवुड के साइंस फिक्शन की शैली की हिन्दी फिल्म होगी। ‘रा-1’ शाहरूख खान की अब तक बनाई फिल्मों में सबसे अधिक महत्वाकांक्षी और महँगी फिल्म होगी। देशी-विदेशी तकनीशियनों के सहयोग से वह एक सुपरमैन-नुमा कहानी प्रस्तुत करने जा रहे हैं। यह सुपरमैन आम आदमी द्वारा गढ़ा हुआ दिखाया जाएगा। मुझे संदेह है कि यह फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ या ‘गजनी’ से ज्यादा सफल होगी।
कोई समाज समृद्धि विहीन होकर रह सकता है, लेकिन संस्कृति-विहीन होकर खुद को ज्यादा दिनों तक बचाए नहीं रह सकता है। अमेरिका या यूरोप बन जाना आसान है, लेकिन अपने मूलभूत रूप में संपूर्ण भारत बने रहना मुश्किल है। मध्यवर्ग पैसा कमाने में जुटा है। हर बात नफा-नुकसान के तराजू पर तौली जा रहा है। रिश्ते-नाते सब दरक रहे हैं। मनी-माइंडेड मध्यवर्ग का उभरना कई खामियों को भी जन्म दे रहा है। आधुनिकता के नाम पर हर दिन कुछ नया गढ़ा जा रहा है और कुछ पुराना गिराया-मिटाया या तोड़ा जा रहा है। देश की कम से कम 40 करोड़ आबादी को दो जून की रोटी नसीब नहीं हो रही है।
हरित क्रांति की तरह ही विकास के इस दौर में देश को सामाजिक क्रांति की जरूरत है। जैसा विदेशों में आधुनिकीकरण और औद्योगीकरण के दौर में हुआ था (18-20 वीं सदी)। उस दौर में वहाँ कई दार्शनिक, अर्थशास्त्री, साहित्यकार और सामाजिक चिंतक पैदा हुए। लेकिन भारतीय समाज एवं सिनेमा में ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है।
भारत में मध्यवर्ग का दायरा चौड़ा हुआ है, लेकिन सामाजीकरण अधूरा ही है। नतीजतन पुराने मध्यवर्ग के मानक (घरों में शास्त्रीय गायन के कैसेट, बुक-शेल्फ में स्तरीय सामाजिक चिंतन की किताबें आदि) अब नहीं दिखते हैं। अब उनमें उपभोक्तावादी प्रवृत्ति आ गई है। अब परिवार का मुखिया हाड़-मांस से जोर लगाकर, भ्रष्ट से भ्रष्ट तरीके अपना कर भी 24 घंटे मेहनत करता है, वहीं परिवार के दूसरे सदस्यों में मनोरंजन और ऐश की प्रवृत्ति जाग उठी है। राजश्री की फिल्म तपस्या में यह दिखलाया गया था। नया मध्यवर्ग अपनी आर्थिक कमाई की वजह से मध्यवर्ग बना है, लेकिन उसके सांस्कृतिक मूल्य उस वर्ग के नहीं हैं। खादी का जाना और जिंस का आना, इस दौर की सबसे बड़ी खासियत है। पहले समाज का पढ़ा-लिखा आदमी समाज के बारे में सोचता था, सामाजिक कार्यों में शिरकत करता था, लेकिन अब वे उपभोक्तावादी जिंदगी में मशगूल हैं। उन्हें ना तो किसी चीज में दखल देने की आदत है और ना ही लेने की। उनके बच्चे कामयाबी के लिए पढ़ते हैं, ना कि काबिल बनने के लिए। हमें संस्कृति को बचाए रखने के लिए प्रयासरत रहना होगा। इसमें मध्यमवर्ग की भूमिका सबसे अहम होगी। हर काल, हर देश में मध्यमवर्ग से कुछ ऐसी प्रतिभाएँ आती हैं, जो विषम परिस्थिति में विकल्प और संभावनाओं को तलाशती हैं। ऐसी तलाश के लिए आज सिनेमा और टेलीविजन, वेबसाइट और ब्लॉग महत्वपूर्ण माध्यम बन रहे हैं।

दक्षिण की चार भाषाओं में कुल जमा 600 फिल्में प्रतिवर्ष बनती हैं। भोजपुरी में प्रतिवर्ष बनने वाली फिल्मों की संख्या लगभग 100 है। हिन्दी में 150 से 200 फिल्में प्रतिवर्ष बनती हैं। आजकल केरल में कम बजट की फिल्में डी.वी.डी. पर घर-घर देखी जाती हैं। अत: कॉटेज फिल्म उद्योग भी कुछ क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। एक जमाने में कोलकाता में मौलिक फिल्में बनती थीं; परंतु विगत दशकों में अनेक क्षेत्रीय फिल्मों की कहानी मुंबई के व्यावसायिक सिनेमा से प्रेरित होती हैं। शुरू में यह उम्मीद की जाती थी कि क्षेत्रीय भाषाओें में बनी फिल्मों में उस जगह की लोक कलाओें के माध्यम से मौलिक कथाएँ सामने आएँगी या क्षेत्र के साहित्य पर सिनेमा आधारित होगा। मुंबईया मसाला सिनेमा की पहुँच बहुत व्यापक है और हमारी सोच पर भी उसका बहुत गहरा असर है। भारत के तमाम छोटे शहरों और कस्बों से जो कहानियाँ मुंबई भेजी जाती हैं, उनमें से अधिकांश मसाला मुंबईया फिल्मों के प्रभाव में रची जाती हैं। मुंबईया मसाला फिल्मों के समुद्र में बहुत कचरा है, परंतु क्षेत्रीय भाषाओं में बनी फिल्मों की नदियाँ भी प्रदूषित हैं।

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