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दहशत के साये में जीवन का उत्सव

by amitjnusociology@gmail.com
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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2009

दहशत के साये में जीवन का उत्सव

समाज/संसार में दहशत आज भी है। 2008 में भारत ने आतंकवाद के कई धमाकों को देखा था। कोसी का प्रलय भी मानवीय व्यवस्था के दंभ के अंधेरे में आया था। प्रकृति के संकेतों की आप कब तक अनदेखी करेंगे। 26/11 के शोर के बावजूद पाकिस्तान नहीं चेता। और कल उसकी जमीन पर श्रीलंका की क्रिकेट टीम आतंकवाद की शिकार हो गई। अब लंबे समय तक पाकिस्तान में अंतरराष्ट्रीय टीमें नहीं जाएँगी। इसका असर 2009 के IPL पर भी पड़ेगा। लोकसभा चुनाव के दौरान IPL को सुरक्षा नहीं दे पाएगी सरकार। चिदंबरम की इस घोषणा के बाद ललित मोदी का प्रबंधन साँसत में है। पाकिस्तान अपने ही जाल में फँस गया है। अब उसको भी अफगानिस्तान बना दिया जाएगा। इसमें सबकी भूमिका होगी- सेना, आई.एस.आई., तालिबान, राज्य सरकार, कठमुल्ले और अमेरिकी एजेंसी।

पाकिस्तान उसी तरह फँसा है जिस तरह कांग्रेस और भाजपा लोकसभा चुनाव में फँस गई हैं । लालू और रामविलास, करुणानिधि और सी.पी.एम सबकी पारी पूरी हो गई है। Leo saturn के नए चक्र में नई राजनीति जन्म लेगी। दहशत के प्रति नया दृष्टिकोण जन्म लेगा। नए जीवन-दर्शन फलेंगे-फूलेंगे।

श्रीनिवास का संस्कृतिकरण और पश्चिमीकरण पिछले 60 वर्षों में भारतीय समाज का कायाकल्प कर चुका है। लेकिन इसका पुनर्मूल्यांकण नहीं हो पाया है। मायावती, रामदेव महाराज, नीतीश कुमार, शिवराज सिंह चौहान, नरेन्द्र मोदी, येदियुरप्पा, ऋतंभरा संस्कृतिकरण के वाहक हैं। ये लोग कांशीराम, लालू यादव, उमा भारती, साक्षी जी महाराज की तरह प्रतिरोध और विध्वंस की भाषा नहीं बोलते। ये लोग नए निर्माण में लगे भारतीय संस्कृति के नए खेवनहार हैं।

इसके ठीक उलट तमिलनाडु की द्रविड आंदोलन और भारत के वामपंथी आंदोलन में ठहराव आ गया है। अब द्रविड आंदोलन की नायिका ब्राह्मण जयललिता है।
करुणानिधि मुख्यमंत्री पद पर होने के बावजूद अभी पीछे हो गए हैं।
जयेन्द्र सरस्वती का कद जयललिता ने घटा दिया था लेकिन इनकी जगह दयानंद सरस्वती और श्री श्री रविशंकर जैसे ब्राह्मण संपूर्णतया भर चुके हैं।

तेलुगु सम्मान के प्रतीक चन्द्रबाबू नायडू का प्रभाव घट रहा है। वे विकल्प के अभाव में नवीन पटनायक की तरह चमक रहे थे। नीतीश कुमार ने अति पिछड़ा, महादलित और महिलाओं को स्थानीय चुनाव में आगे करके (आरक्षण देकर) लालू-रामविलास की स्थिति कमजोर कर दी है। फिर वे नरेन्द्र मोदी की तरह विकास का काम भी कर रहे हैं। अभी जब देश में नैतिक सत्ता और प्रेरक संस्थाओं का अभाव है। सौभाग्य से रामदेव महाराज और साध्वी ऋतंभरा के रुप में तुलनात्मक रुप से बेहतर प्रेरक व्यक्तित्व का उभार हुआ है। ये लोग उसी तरह बाजार की उपज हैं, जिस तरह दक्षिण भारत में श्री श्री रविशंकर और दयानंद सरस्वती हैं। माता अमृतानंदमयी जैसी खाँटी देशज प्रतिभा का भी उभार हुआ है। यह संस्कृतिकरण है।

दूसरी ओर क्रिकेट और सिनेमा में पश्चिमीकरण जारी है। लेकिन यह उस तरह का पश्चिमीकरण नहीं है, जिसकी चर्चा एम. एन. श्रीनिवास ने की थी। यह वैश्वीकरण या खगोलीकरण के फैलाव की प्रक्रिया है। देश-काल की परिभाषा बदल रही है। जीवन की प्रेरणाएँ और आदर्श बदल रहे हैं।

संसार में दहशत आज भी है, लेकिन इस दहशत के साये में फूलों की महक आज भी है। चिड़ियों की चहचहाहट आज भी है। आज भी यह संसार एक दैवीय लीला ही है। आधुनिक लोगों ने भले ही मानना शुरु कर दिया कि संसार ईश्वर-विहीन है। जिंदगी का कोई स्वाभाविक गूढ अर्थ नहीं है। परंतु ये आधुनिक लोग भी उसी ईश्वर की रचना हैं। आधुनिक व्यक्तियों की महात्वाकांक्षा से संसार में अति अवश्य है, लेकिन अपने अंतिम अर्थों में यह अति भी दैवीय लीला का नया रूप है।
आधुनिक मनुष्य का लक्ष्य मशीन की तरह काम करना और पशु की तरह भोगना है और पशु की तरह भोगने में जब जब प्रकृति या परंपरा की बाधा आए तो उसको अपनी बुद्धि और मशीनी बल से तोड़ देना है।

दूसरी ओर पारंपरिक मनुष्य का लक्ष्य मनुष्य जीवन को दैवीय स्वरूप प्रदान करना है। मनुष्य के शरीर को योग, नृत्य, संगीत से पूर्णता प्रदान करना है। अपनी नैसर्गिक प्रतिभा से लोक की सेवा करना है। अपने सामाजिक या आत्मीय संबंधों से पूरकता प्राप्त करनी है।

पत्नी केवल भोगने के लिए नहीं, अपितु यज्ञ में सहधर्मिणी बनने के लिए है। विवाह का उद्देश्य गृहस्थ-आश्रम में विहित यज्ञ करना है। जिस तरह यज्ञ में अग्नि का चुनाव किया जाता है, ठीक उसी प्रकार गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने के लिए वर और कन्या का मेलापक के आधार पर चुनाव किया जाता है। उसी तरह गृहस्थ आश्रम में एक पेशा का चुनाव किया जाता है। गृहस्थ आश्रम में प्रवेश की तैयारी ब्रह्मचर्याश्रम में की जाती है। ब्रह्मचर्याश्रम में विद्या और अविद्या दोनों सिखलाई जाती हैं।

हर गाँव एक यज्ञस्थली रहा है। यजमानी व्यवस्था यज्ञोपासना की व्यवस्था थी। कृषि भोजन और औषधि का याज्ञिक प्रक्रिया से उत्पादन था। वैदिक शिक्षा पूरे समाज को दी जाती थी। हर प्रकार के शिल्प एवं कला का उद्गम वेद है। समाज में मान्यता प्राप्त हर पेशा का उद्गम वेद है। हर पारंपरिक पेशे का संबंध यज्ञ से रहा है।

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