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गायत्री तत्व, हनुमान देवता

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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2007

गायत्री तत्व, हनुमान देवता

गायत्री तत्व

लोकात्मा, वेदात्मा एवं प्राणात्मा ये तीनों ही गायत्री के तीन पाद हैं। परब्रह्म परमात्मा ही चतुर्थ पाद हैं।
सम्पूर्ण छन्दों में गायत्री छन्द प्रधान है, क्योंकि वही छन्दों के प्रयोक्ता गयारण्य प्राणों का रक्षक है। सम्पूर्ण छन्दों का आत्मा प्राण है, प्राण की आत्मा गायत्री है।
गायत्री सम्पूर्ण वेदों की जननी है। जो गायत्री का अभिप्राय है, वही सम्पूर्ण वेदों का अर्थ है। विश्व-तैजस-प्राज्ञ, विराट्-हिरण्यगर्भ अव्याकृत व्यष्टि-समष्टि जगत् तथा उसकी जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति-ये तीनों अवस्थाएँ प्रणव की अ, उ, म इन तीनों मात्राओं के अर्थ हैं।
सर्वपालक परब्रह्म प्रणव का वाच्यार्थ सर्वाधिष्ठान, सर्वप्रकाशक, सगुण, सर्वशक्ति, सर्वरहित ब्रह्म प्रणव का लक्ष्यार्थ है। उत्पादक, पालक, संहारक त्रिविध लोकात्मा भगवान तीनों व्याहृतियों के अर्थ हैं। जगदुत्पत्ति-स्थिति-संहार-कारण परब्रह्म ही ‘सवितृ’ शब्द का अर्थ है।
गायत्री के द्वारा विश्वोत्पादक, स्वप्रकाश परमात्मा के उस रमणीय चिन्मय तेज का ध्यान किया जाता है, जो समस्त बुद्धियों का प्रेरक एवं साक्षी है। अनंत कल्याणगुणगण सम्पन्न, सगुण, निराकार परमेश्वर की उपासना गायत्री के द्वारा हो सकती है। सगुण, साकार, सच्चिदानन्द परब्रह्म का ध्यान गायत्री के द्वारा किया जा सकता है। प्राणिप्रसवार्थक सू धातु से सवितृ शब्द की निष्पत्ति होती है। उत्पत्ति, स्थिति, एवं लय का कारण पर-ब्रह्म ही ‘सवितृ’ शब्द का अर्थ है।
इस दृष्टि से उत्पादक, पालक, संहारक-ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा उनकी स्वरूपभूत तीनों शक्तियों का ध्यान गायत्री मंत्र से किया जाता है।
त्रिपदा गायत्री आदित्य में प्रतिष्ठित हैं। गायत्री अध्यात्म प्राण में प्रतिष्ठित हैं। जिस प्राण में सम्पूर्ण देव, वेद, कर्मफल एक हो जाते हैं, वही प्राणरूपा गायत्री सबकी आत्मा है। उपस्थान मंत्र में कहा गया है कि ‘हे गायत्री! आप त्रैलोक्यरूप पाद से एकपदी हो, त्रयीं विद्या रूप पाद से द्विपदी हो, प्राणादि तृतीय पाद से चतुष्पदि हो। अत: प्रत्यक्ष परोरजा (परोरजा का अर्थ है, सृष्टि को उत्पन्न करने वाली परा रज: शक्ति। भगवती परम रज हैं। उन्हीं से संसार, जगत और सृष्टि की उत्पत्ति होती है) आपके तुरीय पाद को हम प्रणाम करते हैं।’

यह सम्पूर्ण चराचर भूत-प्रपंच गायत्री ही हैं। वाक् ही गायत्री हैं। वाक् ही समस्त भूतों का गान एवं रक्षण करती है। गायत्री पृथ्वी रूप है। पृथ्वी में सम्पूर्ण प्राणों की स्थिति है। अपने इष्टदेवता का ध्यान गायत्री मंत्र द्वारा सर्वथा उपयुक्त है। सविता शब्द सूर्य का द्योतक है। उसी की सारशक्ति सावित्री हैं। गायत्री मंत्र का जप चाहे किसी भी स्थान, समय एवं स्थिति में नहीं किया जा सकता। इसके लिए पवित्र देश-काल तथा पात्र की अपेक्षा है, तभी वह त्राण कर सकती हैं।

हनुमान देवता

हनुमान देवता

कलि काल के प्रमुख देवता के रूप में हनुमान जी को स्थापित करने में समर्थ रामदास और तुलसीदास की प्रमुख भूमिका रही है। तुलसीदास के अनुसार इनकी माता का नाम अंजना और पिता का नाम केसरी था। ये भगवान् शंकर के रुद्र रूप के अवतार माने जाते हैं। इनको सीता माता ने वरदान के रूप में अष्ट सिद्धि और नव-निधि का स्वामित्व प्रदान किया था। हनुमान जी की कृपा प्राप्त करने पर आठ प्रकार की सिद्धियाँ मिलती हैं और नौ प्रकार की संपत्तियाँ मिलती हैं। ये रोगों के नाश करते हैं तथा दर्द एवं भय भगाने वाले देवता हैं। इनकी कृपा मिलने पर सुख, शांति, संतोष एवं ऐश्वर्य मिलता है। हनुमान चालीसा के सात बार प्रतिदिन पाठ करने पर दुनिया के हर संकट से छुटकारा मिलती है। समर्थ रामदास ने हनुमान मंदिरों को गर्भ-गृह से बाहर किसी भी सड़क, चौराहा, अखाड़ा या खाट पर स्थापित करने की परंपरा डाली और उनकी पूजा विधि को सरल बनाया ताकि विधर्मी लोग उनके मंदिरों को तोड़ने की कोशिश न करे, इसलिए असंख्य हनुमान मंदिरों की स्थापना करवायी और घर-घर में राम नवमी के दिन महावीर पताका की स्थापना करवाया। सर्वप्रिय, सर्वमान्य और सर्वहितकारी लोकदेवता हैं- हनुमान। हमारा तन उतना नहीं थकता, जितना मन थकता है। मन का नियंत्रन करने के लिए प्राणायाम एक वैज्ञानिक क्रिया है। प्राण वायु (साँस) का नियंत्रण करने में हनुमान जी मददगार हैं। हनुमान जी प्राण यानी वायु के देवता हैं। श्री हनुमान चालीसा के साथ प्राणायाम करने का विधान है। साँस के नियंत्रण से मन विश्राम की मुद्रा में आ जाता है और मन में शांति बनी रहती है। हनुमान जी पंच तत्वों (पृथ्वी, अग्नि, जल, आकाश और वायु) में वायु के देवता हैं। वायु तत्व का तन और मन पर सबसे ज्यादा प्रभाव रहता है।

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