लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2009
उभरती हुई विश्वव्यवस्था एवं भारतीय राजनीति
1960 के दशक से अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी यूरोप और नाटो गठबंधन के देशों में काफी तीव्र गति से ग्लोबलाइजेशन या वैश्वीकरण की प्रक्रिया चल रही है। 1989 में पूर्वी जर्मनी का पश्चिमी जर्मनी में विलय हो गया। 1991 तक आते-आते सोवियत संघ का विघटन हो गया और पूर्वी यूरोप तथा सोवियत संघ समर्थक द्वितीय विश्व में भी ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया तेज हो गई। देंग शियाओ पिंग के नेतृत्व में चीन ने 1978 के आसपास बाजारी समाजवाद को स्वीकार करके चीन को ग्लोबलाइजेशन से जोड़ दिया। 1970 के दशक में तीसरी दुनिया में गुट-निरपेक्ष आंदोलन दम तोड़ चुका था और पूरी दुनिया दो गुटों के बीच बँट चुकी थी। सोवियत संघ के पतन होते ही तीसरी दुनिया में अमेरिकी प्रभाव बढ़ना शुरू हुआ और इनकी अर्थव्यवस्थाओं में भी ग्लोबलाइजेशन का प्रभाव बढ़ने लगा। 1991 तक आते-आते भारत में भी उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू करके भारतीय अर्थव्यवस्था को अमेरिकी ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव में विकसित होने के लिए बाध्य होना पड़ा। 1971 तक आते-आते भारत सोवियत गुट में शामिल हो चुका था। नेहरू ने 1947-48 में अमेरिकी प्रस्ताव को खारिज करके गुटनिरपेक्ष रहने का निर्णय किया, फलस्वरूप मजबूरन अमेरिका को पाकिस्तान को अपना मित्र एवं मोहरा बनाना पड़ा। यदि नेहरू अमेरिकी प्रस्ताव स्वीकार कर नाटो गठबंधन में शामिल हो गए होते, तो दक्षिण एशिया का इतिहास कुछ और होता। नाटो देशों में प्रजातांत्रिक पूँजीवादी की नीति मानी जाती है। भारत में नेहरू ने प्रजातांत्रिक समाजवाद की नीति अपनाई। चीन में समाजवादी तानाशाही रहते हुए भी चीन सोवियत गुट से 1960 के दशक में ही अलग हो चुका था। स्टालिन और माओत्से तुंग की मार्क्सवादी समाजवाद की व्याख्या अलग विन्यास में विकसित हुई। माओ के मरते ही देंग ने चीन को बाजारवादी समाजवाद के रास्ते पर चलाना शुरू किया। स्टालिन के उत्तराधिकारियों ने 1970 के दशक में सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था को सोवियत विदेश नीति के दबाव में चरमराने दिया, लेकिन जरूरी परिवर्तन नहीं किया। फलस्वरूप 1990 तक आते-आते स्थिति विस्फोटक हो गई और चीन की तरह सोवियत संघ का समाजवादी राजनीतिक व्यवस्था कायम नहीं रह पाया। गोर्बाचोव एवं येल्तसिन देंग की तरह विजनरी नहीं थे। मंदी के इस दौर में करीब 30 लाख लोग चीन में बेरोजगार हुए हैं। चीन में करीब 40 लाख लोग सेना में हैं। चीन की सेना दुनिया की सबसे बड़ी सेना है। अमेरिका केन्द्रित विश्वव्यापी मंदी ने चीन में बेरोजगारों की इतनी बड़ी फौज खड़ी की है। फिर भी चीन की मार्क्सवादी सरकार अपनी नीतियों में बदलाव नहीं लाने वाली है। एक पार्टी की तानाशाही में इस असंतोष को कुचलना कोई मुश्किल काम नहीं है। चीन के पास खेतीहर जमीन भारत से कम है। उसकी जनसंख्या 135 करोड़ है। भारत की जनसंख्या 120 करोड है। चीन के लैंड मास में पहाड़ी जमीन ज्यादा है और खेतीहर जमीन कम है। लेकिन उपज दर भारत से ज्यादा है। 20 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था पहले नंबर की हो सकती है, यदि विजनरी लीडरशिप आम आदमी का प्रशिक्षण करके उनकी क्षमता का तकनीकी विकास कर सके।
सौभाग्य से 1991 से 1996 के बीच नेहरूवादी कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व पी. वी. नरसिम्हा राव जैसे विजनरी नेता के पास था। भारत उस दम-घोंटू माहौल से बाहर निकल आया। 1996 से 1998 के बीच राजनीतिक अस्थिरता रही, लेकिन नरसिंह राव की सही समय की गई सही नीतियों के हस्तक्षेप के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था सरपट दौड़ने लगी। फिर 1998 से 2004 तक अटल बिहारी बाजपेयी के कुशल नेतृत्व में नरसिंह राव की नीतियों को तार्किक परिणति दी गई। 2004 से अब तक मनमोहन सिंह उन्हीं नीतियों को कुल मिलाकर आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन दुर्भाग्य से विश्व अर्थव्यवस्था सितम्बर 2008 से स्टैगफलेशन यानि मंदी के भयानक दौर से गुजर रही है। करीब हर तीस साल बाद अर्थव्यवस्था में मंदी का ऐसा दौर आया करता है। भारतीय ज्योतिषी इसे सिंह राशि के शनि का प्रभाव कहते हैं। इस मंदी के दौर में भारत की अर्थव्यवस्था तुलनात्मक रूप से कम प्रभावित रही है, लेकिन कमरतोड़ महँगाई से आम आदमी का जीवन बेहाल हो गया है। इस महँगाई से राहत दिलाने के लिए मनमोहन सिंह की सरकार के पास न तो कोई योजना है और न इच्छा शक्ति। विदेश नीति के मोर्चों पर भी मनमोहन सिंह की सरकार के पास कोई दीर्घकालिक नीति में दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव दिखता है। विश्व में अमेरिकी वर्चस्व को जेहादी इस्लाम और माओवादी आतंकवाद का रणनीतिक गठजोड़ कम से कम एशिया में लगातार चुनौती दे रहा है। अमेरिका बार-बार नीतिगत भूल कर रहा है। माओवादियों के पीछे चीन है। जेहादी इस्लाम के केन्द्र में पाकिस्तान एवं ईरान। 1978 से जनरल जियाउल हक ने पाकिस्तान को जेहादी इस्लाम का प्रयोगशाला बना दिया है। इसी बीच 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हो गई। तब से पाकिस्तान और ईरान जेहादी इस्लाम को अमेरिकी वर्चस्व के खिलाफ वैचारिक एवं रणनीतिक नेतृत्व दे रहे हैं। संयोग से 1979 में सोवियत संघ ने अफगानिस्तान में घुसपैठ कर अपने समर्थकों की सरकार बनाने की भूल कर दी। अमेरिकी नेतृत्व ने रूसी हस्तक्षेप के खिलाफ अफगानिस्तान में मुजाहिदीन एवं तालिबान को खड़ा किया और पाकिस्तान की लगातार आर्थिक एवं सैनिक मदद करता रहा। 1979 से 2009 तक पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को अमेरिकी मदद लगातार मिलती रही। पाकिस्तानी सेना को अमेरिका के साथ-साथ चीन की मदद भी मिलती रही। अमेरिका की चीन-नीति भी खामियों से भरपूर है। एक तरफ अमेरिका चीन के आर्थिक विकास में 1979 से लगातार आर्थिक मदद करता रहा है, दूसरी ओर चीन अपने समाजवादी तानाशाही के चलते अपने गरीब मजदूरों और स्थानीय पर्यावरण का असीम शोषण करके लगातार अमेरिका अर्थव्यवस्था एवं अमेरिकी विदेश नीति के एशियाई लक्ष्यों को खोखला करता रहा है। खासकर बाजारवादी प्रजातंत्र के विस्तार की घोषित नीति के खिलाफ चीनी और पाकिस्तानी गठजोड़ काफी खतरनाक साबित हो रहा है। ऐसी परिस्थिति में भारत और अमेरिका के बीच बहुआयामी विमर्श की आवश्यकता है। लेकिन इस विमर्श को चलाने की पात्रता, अनुभव, कल्पनाशीलता एवं दृढ़ता मनमोहन सिंह सरकार में नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम एक अप्रत्याशित रूप से मुश्किल समय में जी रहे हैं।
इकीसवीं शताब्दी के पहले दशक में आतंकवादी घटनाओं के साथ-साथ इंग्लैंड, स्पेन, फ्रांस जैसे विकसित देशों में भी अलगाववादी आंदोलन चल रहे हैं। इनमें अधिकांश सशस्त्र आंदोलन हैं। 2001 से 2004 के बीच विश्व के 31 संप्रभु राष्ट्रों में अलगाववादी घटनाएँ चल रही हैं। 1989 के बाद यूरोप समेत पूरी दुनिया में पूरे कोल्डवार (1945 से 1989) से ज्यादा युद्ध हुए है। 1989 के बाद असफल राष्ट्र-राज्यों की संख्या बढ़ी है। इसी तरह पूरी दुनिया में महामारी का सामान्य भय बढ़ा है। जिस तरह मध्यकाल में ब्लैक डेथ (काली मृत्यु) का भय फैला रहता था, उसी तरह अब एड्स एवं किस्म-किस्म के फ्लू (जैसे स्वाइन फ्लू, एवियन फ्लू) जैसी महामारियों का भय फैला रहता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम का प्राकृतिक असंतुलन बढ़ा है। कहीं सूखा, कहीं बाढ़, कहीं अल नीनो, कहीं सुनामी, कहीं कैटरीना (समुद्री ज्वार) और कहीं भूकंप का डर बैठा है, तो कहीं चोरी, डकैती, बलात्कार या बम विस्फोट का डर बैठा है।
इस बीच गैर-बराबरी बढ़ी है। शोषण, भुखमरी, कुपोषण और वेश्यावृत्ति बढ़ी है। सरकारी लेन-देन में भ्रष्टाचार और दलाली बढ़ी है। प्रजातांत्रिक पूँजीवादी व्यवस्था का वैश्विक स्तर पर भले कोई विकल्प न हो, लेकिन स्थानीय स्तर पर सशस्त्र विद्रोह के द्वारा विकल्प खड़ा करने की लगातार कोशिश हो रही है। इनमें से अधिकांश विद्रोह आतंकवाद का सहारा लेकर अपने लक्ष्य की पूर्ति करना चाहते हैं। भारत में भी कश्मीर, असम, नागालैंड, झारखंड, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार में आतंकवादी समूह स्थानीय स्तर पर सक्रिय हैं। ऐसे समूहों की प्रकृति भिन्न-भिन्न प्रकार की है। अधिकांश समूहों का गठन निराश युवकों ने किया है। एक बार संगठित हो जाने पर ये स्थानीय लोगों से जबरन वसूली कर समानांतर सरकार चलाना चाहते हैं।
इसी तरह 2004 के अंत तक दुनिया के विभिन्न हिस्सों में 40 मिलियन रिफ्यूजी हैं। जो बदहाली की जिन्दगी जी रहे हैं। धीरे-धीरे यह दुनिया ऐसी स्थिति में प्रवेश कर रही है, जिसमें किसी भी देश की अंदरूनी समस्या का अंतरराष्ट्रीय आयाम बनता जा रहा है। जिसकी समस्या का समाधान कोई वैश्विक संस्था ही कर सकती है। चूँकि नीति बनाने के स्तर पर यह किसी एक राष्ट्र से संबंधित न होकर बहुराष्ट्रीय समस्या बन चुकी है। परंतु आज ऐसी निष्पक्ष वैश्विक संस्था का अभाव है, जो सारी दुनिया के स्तर पर नीतियाँ बना सके। संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष आदि नाम के लिए स्वतंत्र संस्थाएँ हैं, वरना ये सब 1945 के बाद वाशिंगटन कंसेन्सस के तहत अमेरिकी राष्ट्रपतियों द्वारा शुरू की गई एवं नियंत्रित संस्थाएँ हैं। इनकी नीतियों को बनवाने और लागू करने में अमेरिकी राष्ट्रपतियों की अहम भूमिका रही है।
जहाँ तक आधुनिक राष्ट्र-राज्यों की बात है, तो थाइलैंड और अफगानिस्तान तथा कुछ हद तक चीन, जापान, ईरान और इथोपिया के अलावा दुनिया के सभी राष्ट्र यूरोपीय साम्राज्यों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उपनिवेश रहे हैं। ट्रस्टीशिप उपनिवेशवाद का एक अप्रत्यक्ष रूप माना जाता था। जैसे भारत के बहुत सारे प्रिंसली स्टेट्स या मध्य एशिया के राज्य ट्रस्टीशिप के तहत अप्रत्यक्ष उपनिवेश थे। लेकिन जहाँ तक शोषण की बात है, तो वस्तुओं के विनियम की शर्तों के तहत चीन, जापान, ईरान और इथोपिया का भी शोषण हुआ था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यूरोपीय साम्राज्यों के उपनिवेश समाप्त हो गए और अमेरिका तथा सोवियत संघ के उपनिवेश शुरू हुए। इन्हें उपनिवेश के बदले मित्र देश कहा जाता था। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया में केवल एक ही विश्व साम्राज्य बचा है, अमेरिकी साम्राज्य जो ग्लोबलाइजेशन के तहत अपना उपनिवेश चला रहा है। अमेरिकी साम्राज्य की ताकत इसकी सेना एवं सैनिक उद्योग, डॉलर के रूप में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, संयुक्त राष्ट्रसंघ जैसी अमेरिका नियंत्रित संस्थाएँ, अमेरिकी पेटेंट कानून तथा हॉलीवुड की फिल्में हैं। हर साम्राज्य का उद्देश्य अमन-चैन कायम करना होता है। अमेरिकी ग्लोबलाइजेशन मूलत: आर्थिक साम्राज्य है, जिसे राष्ट्र-राज्य नामक संस्था, समकालीन तकनीक एवं सूचना क्रांति के कारण अवरोधों का सामना करना पड़ रहा है। यूरोपीय यूनियन बनने के बाद माना जा रहा था कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में भी राष्ट्र-राज्य कमजोर हो जाएँगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। आर्थिक ग्लोबलाइजेशन के दौर में 2007-2009 के बीच जो मंदी आई है और बाजार तथा बैंकों के दिवालिया होने की श्रृंखला चली है, उसमें राष्ट्र-राज्य की भूमिका पूरी दुनिया में एक बार फिर बढ़ी है। भारत भी इसका अपवाद नहीं है। लेकिन इस जटिल विश्व व्यवस्था में दिशा एवं दृष्टि के स्तर पर मनमोहन सिंह की सरकार भ्रमित एवं विचलित है। महँगाई एवं भुखमरी से आम जनता को बचाने के लिए यह नरेगा जैसी कागजी कार्यक्रम चला रही है, जिससे भ्रष्टाचार की एक नया गंगोत्री बही है। आर्थिक, तकनीकी, सांस्कृतिक, कूटनीतिक एवं राजनीतिक स्तर पर तदर्थवादी नीतियों से काम लिया जा रहा है। देश में कानून-व्यवस्था-विकास के बारे में ठोस चिन्तन का अभाव है।
अभी सारी दुनिया मंदी से और भारत की आम जनता महँगाई से त्रस्त है। 1930 की महामंदी के समय बेरोजगारी में 25 फीसदी से भी ज्यादा उछाल आया था, शेयरों के दाम अस्सी फीसदी से भी ज्यादा गिर गए थे। हजारों बैंकों में ताले लगा दिए गए थे और गृहविहीन हो चुके लोगों को न्यूयॉर्क और देश के दूसरे हिस्सों में उग आए टेंट-शहरों में लंबे अरसे तक गुजर-बसर करनी पड़ी थी। 1973-1974 की आर्थिक गिरावट का नतीजा यह निकला था कि कई साल तक दो अंकों की मुद्रास्फीति ने व्यवस्था को अपनी गिरफ्त में ले लिया था और न्यूयॉर्क शहर तकरीबन दिवालिया होने के कगार पर था। दुनिया में दूसरी जगहों पर 1930 की मंदी के कारण सरकारों का पतन हो गया था और गुस्साई भीड़ द्वारा सत्ता के केंद्रों पर हमले करने की खबरें आ रही थीं।
आज के अमेरिका में सवा करोड़ से कुछ ज्यादा कारखाना कर्मचारी जितना माल पैदा करते हैं, पचास साल पहले उतना उत्पादन पाँच से छह करोड़ लोग कर पाते थे। इसी तरह आज अमेरिका के तीस लाख किसान जितनी पैदावार निकालते हैं, उतनी पैदावार तीस के दशक में दस करोड़ किसानों की मेहनत से होती थी। ये तथ्य कुछ-कुछ बता सकते हैं कि इक्कीसवीं सदी की पहली मंदी का सामाजिक असर उतना खराब क्यों नहीं पड़ा।
विशेषज्ञों की एक दिलचस्प मान्यता यह बन रही है कि ग्लोबल पैमाने पर लगातार चलते रहने वाले पूँजी प्रवाह के इस अनूठे युग में ऐसी मंदियाँ बार-बार आएँगी और उन देशों को ज्यादा सताएँगी जो समझदारी का दामन छोड़ कर ज्यादा बड़ा आर्थिक एडवेंचर करने के फेर में रहेंगे। भूमंडलीकरण के कारण दुनिया आपस में पहले से कहीं ज्यादा जुड़ चुकी है, इसके बावजूद अमेरिका और यूरोप पर आए संकट का असर बाकी दुनिया पर खास नहीं पड़ा। भारतीय अर्थव्यवस्था को आज भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपेक्षाकृत बंद प्रणाली के तौर पर देखा जाता है, जिसका लाभ उसे मिलना लाजमी था। दूसरे, भारत के बैंक आज भी कर्ज देने और वसूली आदि के उन कड़े नियमों का पालन करते हैं, जिनका नब्बे के दशक में पश्चिमी लोग मजाक बनाते थे। यह दूसरी बात है कि वही लोग आज उन नियमों को भारत की खूबी मान रहे हैं। आज भारतीय अर्थव्यवस्था विश्वव्यापी मंदी से तो बची हुई है, लेकिन बेहिसाब महँगाई से परेशान है। खासकर आम आदमी इस खुदरा महँगाई से बहुत परेशान है।
भारत में समकालीन महँगाई का असली कारण बेहिसाब मुनाफाखोरी है। मुनाफाखोरी अब व्यावसायिक सफलता और चतुराई का दूसरा नाम है। आज बाजार पर आधारित प्रतियोगिता, प्रतियोगिता से अलग हो चुका है। कंपनियों की ताकत व उनके संसाधन काफी बढ़ते जा रहे हैं। जिसकी जितनी ताकत या हैसियत है, उसी अनुपात में उसे सरकार का समर्थन हासिल हो रहा है। राजनीति का व्यावसायीकरण और व्यवसायों का राजनीतिकरण हो चुका है। राजनीति और व्यवसाय के इस गठजोड़ का महँगाई से सीधा संबंध है। बाजार की ताकतें सरकार की मौन स्वीकृति या प्रत्यक्ष समर्थन पाकर निरंकुश तरीके से दाम बढ़ाती हैं। इसके साथ ही जमाखोरी करके, मिलावट करके, लागत में वृद्धि दिखाकर और हिसाब में गड़बड़ियाँ करके भी व्यापारीवर्ग भारी मुनाफाखोरी करते हैं। राजनीतिक चंदों आदि देकर सरकार पर दबाव बनाने में तो वे सफल हो ही जाते हैं, साथ ही उनकी किसी नियामक संस्था के प्रति जवाबदेही नहीं होती। फिर भी महँगाई के विरुद्ध कोई आंदोलन नहीं हो पा रहा है।
मई 2009 के संसदीय चुनाव में 542 स्थानों में से 360 पर करोड़पतियों ने कब्जा जमा लिया। पी सईनाथ के अनुसार 2008-2009 और 2009-2010 के वार्षिक बजटों में सीमा शुल्क और आबकारी कर को हटाने के साथ-साथ प्रत्यक्ष करों की कटौती से केन्द्र सरकार ने पांच लाख करोड़ रूपयों की छूट या सौगात धनीवर्ग को दे दी है। प्रतिदिन का हिसाब लगाने पर वह 700 करोड़ रूपए होता है। इस समय महँगाई चरम पर है। उसे रोकने में सरकार की असफलता को पूँजीपतियों को लाभ पहुँचाने की रणनीति माना जा सकता है।
लोकतंत्र जिस तरह पूँजीपति वर्ग के हाथों का खिलौना बनता जा रहा है, उससे आम जनता में असंतोष का उभरना स्वाभाविक ही है। सार्वजनिक क्षेत्र के कारखानों के निजीकरण, सरकार के अपने विभागों में ठेकेदारी को बढ़ाने और श्रम कानूनों में शिथिलता आने से दुखी होकर 14 सितम्बर 2009 को नई दिल्ली में देश के सभी केन्द्रीय मजदूर संगठनों ने एकजुट होकर सरकार को चेतावनी दी। ऐसा पहली बार हुआ कि कांग्रेस, भाजपा, माकपा, भाकपा और निर्दल मजदूर संघ एक ही मंच पर आने को बाध्य हुए। सभी मेहनतकश किसान, मजदूर, जनजाति वगैरह मिलकर लोकतंत्र पर धनिक वर्ग के इस घेरे को तोड़ सकें, वह तभी मुमकिन हो, जब वे न केवल एकजुट हों, बल्कि शांतिपूर्ण आंदोलनों को सभी स्तरों पर चलाएँ। जनता में तीव्र असंतोष है। उसे संगठित करके सही दिशा देना जरूरी है। वह दिशा लोकतंत्र को उसकी संपूर्णता में सुरक्षित करने की ही हो सकती है। लोकतंत्र को धनतंत्र, परिवारतंत्र और जातितंत्र ने बुरी तरह घेर लिया है। अक्सर ये तीनों साझीदार बन जाते हैं।
भारत की नई पीढ़ी में वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं है। उसे उपभोक्तावादी जीवन शैली पाने की जल्दी है। उसे त्याग की भाषा समझ में नहीं आती। पहचान के सवाल पर वह कभी-कभी संस्कृति के सवाल से प्रभावित हो जाता है, परन्तु राजनीति उसके लिए मूलत: उपभोक्तावादी अवसरवाद का मामला बनता जा रहा है। खासकर हिन्दू मध्यवर्ग के बच्चों के लिए सांस्कृतिक मुद्दों की तुलना में योग एवं अध्यात्म की उपभोक्तावादी पैकेज ज्यादा महत्वपूर्ण है।
आस्था चैनल पर अब अंग्रेजी राज की आलोचना के बहाने संदर्भहीन, प्रसंगहीन प्रलाप चल रहा है। इसे भारत स्वाभिमान जगाने का प्रयास माना जा रहा है। आस्था चैनल की या स्वामी रामदेव की टी आर पी रेटींग घटी है। स्वामी रामदेव का बाजार बढ़ा है। उनका बैंक बैलेंस बढ़ा है लेकिन उनके चमत्कार में कमी आई है। दूसरी तरफ इस्लाम और माओवाद का आकर्षण बढ़ा है। लियो-सैटर्न (सिंह राशि का शनि) 2007-09 फेज़ में निश्चित रूप से हिन्दू पुनरुत्थान की तुलना में इस्लामिक पुनरुत्थान और माओवादी पुनरुत्थान बढ़ा है। सी.पी.एम की जगह बंगाली राजनीति में ममता एवं माओवादी बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय राजनीति में मुसलमान कांग्रेस के साथ फिर जुड़ गए हैं। मध्यवर्ग कांग्रेस के साथ फिर जुड़ गया है। गरीबों के प्रति प्रतीकात्मक राजनीति बढ़ी है। आम आदमी के मुद्दे कांग्रेस नहीं उठा रही है, परंतु राहुल की ब्रांडिंग प्रो-पुअर, प्रो दलित चमत्कारी युवा आदर्श नेता के रूप में की जा रही है। इससे वोट नहीं मिलेगा लेकिन मोरल औरा बनेगा। कमसे कम मीडिया के उपभोग के लिए कच्चा माल बनेंगी। अभी भारत में ऐसा नेतृत्व चाहिए जो भारत को विकासशील देश से विकसित देश बना सके। इसके लिए शिक्षा एवं विकास का मॉडल बनाना पड़ेगा।
