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माइकल जैक्सन और अमेरिकी समाज

by Professor Amit Kumar Sharma
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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2009

माइकल जैक्सन और अमेरिकी समाज

एक महाबली देश के रूप में संयुक्त राज्य अमेरिका का जन्म प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फिल्म निर्माण करने के साथ शुरू हुआ। जब यूरोप के अधिकांश देश युद्ध लड़ने में व्यस्त थे, तो अमेरिका फिल्में बना रहा था। जब प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ तो अमेरिका ने यूरोप के खाली सिनेमा घरों में अपनी फिल्मों का प्रदर्शन शुरू किया। युद्ध के दौरान यूरोप में फिल्में नहीं बन रही थी। फलस्वरूप अमेरिकी फिल्मों को प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ा। अमेरिका में फिल्मों का निर्माण मुख्यतः यहूदी समुदाय के लोगों के द्वारा किया गया। अमेरिकी संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सिनेमा एवं संस्कृति उद्योग की भूमिका आज तक बनी रही है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के आस-पास अमेरिका हथियारों के सबसे बड़े सौदागर के रूप में उभरा। द्वितीय विश्व युद्ध के समाप्त होने के बाद अमेरिका ने जापान के नगरों हिरोशिमा एवं नागासाकी पर परमाणु बम फोड़ कर अपनी सैन्य शक्ति का डंका पीट दिया और ब्रेटन-वुड्स अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था संसार पर थोप दी। इस व्यवस्था के तहत डॉलर को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में मान्यता मिली। दुनिया के पचासी प्रतिशत से अधिक कारोबार डॉलर के माध्यम से होने लगे। अमेरिका को इसका आर्थिक लाभ मिलने लगा। हथियारों की बिक्री एवं डॉलर इस्तेमाल करने का किराया तथा हॉलीवुड की फिल्मों ने अमेरिका को सबसे धनी एवं सबसे शक्तिशाली देश के रूप में स्थापित किया। मर्लिन मुनरो, एल्विस प्रेसली, माइकल जैक्सन, मैडोना तथा ब्रिटनी स्पियर्स ने अमेरिकी साम्राज्य का सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व किया। इनमें मर्लिन मुनरो और माइकल जैक्सन की ख्याति सारी सीमाएँ पार कर गई। 

माइकल जैक्सन

माइकल जैक्सन का जन्म 29 अगस्त 1958 में एक अमेरिकी निग्रो परिवार में हुआ था। 1971 में माइकल जैक्सन `जैक्सन-5′ नामक म्यूज़िक एल्बम के लीड सिंगर बने। 1983 में उन्होंने चेहरे पर सर्जरी करवाई और हेयर स्टाइल बदला। 1985 में सर्जरी से नाक तथा भौहें पतली करवाई और त्वचा गोरी बनवाई। 1992 में ठुड्डी पर गड्ढ़ा नजर आया तथा रंग कुछ और गोरा हुआ। 2001-2002 में यौन शोषण विवाद में फँसे। 2002 में विग पहनना शुरू किया। कॉस्मेटिक सर्जरी के बिगड़ जाने के कारण नाक का आकार बिगड़ गया। वह एक तरफ से कुछ और दूसरी तरफ से कुछ और नजर आता था। उनके नाखूनों का रंग भी बदल गया था। 1983 से उनकी लोकप्रियता आसमान छूने लगी थी और वे अपने जीवन में ही किंवदंती बन गए थे। परंतु इसी के साथ उनकी समस्याएँ भी शुरू हुई । 1983 में वे पच्चीस वर्ष के थे। तब से लेकर 26 जून 2009 को अपनी मृत्यु तक वे कॉस्मेटिक सर्जरी के लंबे दौर से गुजरे। चेहरा, नाक और त्वचा तेजी से बदला, कई स्कैंडल आए और करियर भी लड़खड़ाया। उन्हें चमड़ी की ऐसी बीमारी थी कि इलाज की प्रक्रिया में वह गोरे हो गए, परन्तु आत्मा से श्याम होने का दर्द कभी मिटा नहीं। उन्होंने अपने दर्द को माधुर्य में ढ़ाल दिया और दुनिया जीतने के बाद वह खुद से ही हार गया। बेहिसाब प्रसिद्धि रोड़ा बन जाती है। ग्यारह वर्ष की कमसिन उम्र में दुनिया आपके कदमों में बिछ जाए तो अपने को संभालना कठिन हो जाता है।
माइकल जैक्सन और अमेरिकी समाज के रिश्ते को समझना आवश्यक है। सफलता के शिखर पर भी एम. जे. (माइकल जैक्सन) को अमेरिकी समाज में चिंता सताती थी, नैराश्य घेरे रहता था। अनाम अपरिभाषित दर्द की सेज पर पड़े-पड़े ही उन्होंने प्यार के नगमे गुनगुनाए। अमेरिकी समाज में अमीर और प्रसिद्ध लोगों को अजीबोगरीब रोग होते हैं। मजदूर और मेहनतकश को दर्द नहीं होता, अनिद्रा नहीं होती, अनावश्यक डर नहीं लगता। सफलता और प्रसिद्धि मजबूत आदमी को भी विचलित कर देती हैं। सफल व्यक्ति को असफलता से बड़ा भय लगता है। चकाचौंध भरे जीवन में दृष्टि-दोष विकसित हो जाते हैं। प्रसिद्ध व्यक्ति का जीवन प्रत्यंचा पर थरथराते हुए तीर की तरह होता है। लगातार मनोरंजन करने का तनाव कलाकार झेल नहीं पाता और सफलता के सर्कस में शरीर व मन के साथ खिलवाड़ होता है। पूँजी-निवेशकों का दबाव जानलेवा होता है। जीवन की माया या विष्णु का स्वप्न एम. जे. के लिए यथार्थ था और दुनियादारी कल्पना थी। एम. जे. अनाम व्यथा और आध्यात्मिक दर्द से पीड़ित व्यक्ति थे। वह मनोरंजन जगत के हँसते-गाते, रोते-विलखते जोकर थे। निरंतर सनसनी की खोज को पैदा करने वाली व्यवस्था में एम. जे. की जिंदगी की तरह हादसे होते रहते हैं।
अपनी सफलता के बोझ तले अमेरिका ने एक अत्यंत विचलित और डरे हुए देश की तरह अपने समाज में यातना शिविर गढ़ा है और आतंकवाद से लड़ने की प्रक्रिया में सूक्ष्म रूप से स्वयं आतंकवादी समाज हो गया है। पूँजीवादी होड़ से उपजे नफरत के खेल का यही अंजाम होता है। गुनाह के खिलाफ चलाई गई मुहिम आपकी आत्मा में भी फौलाद भर देती है। 11 सितंबर 2001 और इसके बाद की घटनाएँ अमेरिका के तालिबानीकरण की प्रक्रिया का दर्शन निहायत ही संजीदगी से कराती है। एफ. बी. आई. और संगठित अपराध के अमानवीय तौर-तरीकों में कोई अंतर नहीं है। अन्याय से हमेशा अन्याय ही पैदा होता है।

अमेरिकी वर्चस्व के दिन अब लद रहे हैं। जून 2009 में डॉलर का महत्व घटा है तथा माइकल जैक्सन की मृत्यु हो गयी है। चीन, रूस, भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, यूरोपियन यूनियन तथा ईरान अमेरिका के खिलाफ संगठित हो रहे हैं। जून 2009 के तीसरे सप्ताह में रूस के शहर येकातेरिनबर्ग में कम से कम आर्थिक मामलों में अमेरिकी दबदबे के खत्म होने की शुरुआत हो चुकी है। येकातेरिनबर्ग में डॉलर की हैसियत को जितनी चुनौती मिली, उतना पहले शायद कभी नहीं हुआ था। एक समय दुनिया का 85 प्रतिशत कारोबार डॉलर में होता था। अब 65 फीसदी कारोबार ही डॉलर में होता है। 1990 के दशक में यूरो के एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में उभरने के साथ डॉलर की हैसियत कम होने लगी। सितंबर 2008 में अमेरिकी मंदी से इसमें गति आई। जी-20 की बैठक (जून 2009) में रूस और चीन ने एक नई मुद्रा बनाने की वकालत की। रूस-चीन अब तेल का आपसी कारोबार रूबल और युआन में करेंगे। यह 100 अरब डॉलर का कारोबार है।

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