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भारतीय समाज की अंतर्धारा: समाज, खेल एवं सिनेमा

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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2016

भारतीय समाज की अंतर्धारा: समाज, खेल एवं सिनेमा

भारत देश के समाज की अंतर्धारा का उत्स कला और धर्म है। खेल और सिनेमा इसी अंतर्धारा की अभिव्यक्तियाँ हैं। इस देश की राजनीति और अकादमिक बौद्धिकता पर अंग्रेजी राज का प्रभाव अब भी है, लेकिन इसके समाज, खेल, सिनेमा एवं उद्यमशीलता पर उपनिवेशवादी प्रभाव का क्षरण हो चुका है। इसमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम (1857 से 1947) की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 1913 से ही भारतीय सिनेमा इस आंदोलन का सांस्कृतिक आयाम रहा है। फिर हॉकी और क्रिकेट में भी राष्ट्रवादी रुझान सामने आया। गाँवों और छोटे शहरों की अंतर्धारा अंग्रेजी राज में भी अक्षुण्ण बनी हुई थी। अंग्रेजों का सबसे ज्यादा प्रभाव अंग्रेजी पढ़े मध्यमवर्ग और महानगरों के निवासियों पर रहा है। इन महानगरों का विकास भी अंग्रेजी राज में ही हुआ था। कुल मिलाकर उपनिवेशवादी विरासत का अंतिम खंडहर इस देश की राज्य व्यवस्था और राजनीति द्वारा पोषित संस्थाओं में अब भी कायम है। यह तो इस देश का सौभाग्य है कि यह अपने अंतर्विरोधों के बावजूद सत्ता और सरकार से निरपेक्ष होकर आनंद में रहता है। प्रकृति ने भारत को अपने में आनंद से रत स्वायत्त इकाई बनाया था, जिसमें तीन तरफ से समुद्र और एक तरफ से पहाड़ था। यह तो हमने देश का बँटवारा हो जाने दिया। साथ ही तिब्बत चीन को दे दिया। वर्ना न हम किसी से लड़ते हैं, न कोई हमसे लड़ता। देश का बँटवारा नहीं होता तो 1962 का भारत-चीन युद्ध भी शायद ही होता। चीन भी मूलत: पाकिस्तान का ही इस्तेमाल करता है। बँटवारा नहीं होता तो दंगे ज्यादा होते। लड़ाई-झगड़ा होते रहता लेकिन कुछ मिलाकर उसका कुफल कम होता। सेना का बजट कम होता। युद्ध कम होते। चीन की भी आक्रमण करने की हिम्मत नहीं होती। यह गांधी की दृष्टि थी। गांधीवादी लोग अब भी ऐसा मानते हैं। कुछ हिंदूवादी ऐसा मानते हैं कि बँटवारा हिंदुओं के लिए अच्छा हुआ, नहीं तो भारत का भी वही हाल होता, जो पाकिस्तान और बांग्लादेश का है। मुसलमान लोग स्व-शासन एवं स्वराज के लिए समर्थ नहीं है। वे लोग स्व-शासन के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं। (Muslims are not good for self rule. They are not competent for self rule). इनकी नजर में सरदार पटेल इस देश के स्वाभाविक नेता थे और नरेन्द्र मोदी हैं। मुसलमान केवल भयभीत होकर शांत रह सकते हैं। इस्लाम एक राजनीतिक विचारधारा है। इसमें धर्म का element या तत्व बहुत कम है। पिछले 100 वर्षों में उनके पास लड़ाके हुए हैं। उनके बीच धर्म प्रचारक या उपदेशक कितने हुए हैं। ओसामा बिन लादेन, दाऊद इब्राहिम, मुख्तार अंसारी, सिवान का शहाबुद्दीन, परवेज मुशर्रफ, जियाउल हक, गुलबुद्दीन हिकमतयार, सद्दाम हुसैन, महमूद अहमदीनेजाद, मुल्ला उमर, अब्दुल्ला बुखारी आदि। उनके बीच बाबा रामदेव, श्री श्री रविशंकर, महेश योगी, ओशो रजनीश, अवधेशानंद गिरी जैसे लोकप्रिय प्रचारक क्यों नहीं हैं?

जिस तरह की समालोचना (critique), जिस तरह का सवाल अमेरिकी विश्वविद्यालयों एवं प्रतिष्ठान ने कम्युनिस्टों की विचारधारा के खिलाफ खड़ा किया था; उस तरह का मारक अकादमिक समालोचना पश्चिम ने इस्लाम के खिलाफ अब भी नहीं चलाया है। वे केवल बुरे तालिबान या जेहादी इस्लाम को निशाना बनाते रहे हैं। वे केवल इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ हैं, वे अभी भी इस्लाम की गंभीर समालोचना से बचते रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण दोनों की साझी विरासत है। दोनों सेमेटिक धर्म हैं। जो आलोचना क़ुरआन और इस्लाम पर लागू होगी, वह बाइबिल और ईसाइयत पर भी लागू हो सकती है। ज्ञानोदय के (enlightenment) के जिस जोश में पश्चिमी राजनीतिक अर्थशास्त्र का सेक्युलराइजेशन और समाज का रेशनलाइजेशन हुआ था, वह अब पश्चिम में कमजोर पड़ चुका है। अब पश्चिम रक्षात्मक हो चुका है। पश्चिम की मूल प्रतियोगिता अब चीन एवं भारत से है। ऐसे भी अमेरिकी शासको को गैर-प्रजातांत्रिक एवं गैर-संप्रदाय निरपेक्ष मुस्लिम देश एवं शासक ज्यादा रास आते हैं। अत: वे बुरे तालिबान के खिलाफ ‘अच्छे तालिबान’ को लड़ाने का नीति पर काम कर रहे हैं। मुस्लिम इतिहास की यह अजीब विडंबना है कि मुसलमानों ने मुसलमानों को हीं ज्यादा मारा है, काफिरों को बहुत कम मारा है। यह तो हमारे नेतृत्व की कमजोरी है कि हमारे यहां आतंकवादी हमले लगातार होते रहते हैं और हम पकड़े गए आतंकवादियों को सजा देने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं, वर्ना वे हमें नहीं मार सकते थे।

न्यूज़ीलैंड में भारत ने 33 साल से भी अधिक समय बाद वन डे सीरीज जीती है। 1968 में मंसूर अली ख़ाँ पटौदी की अगुआई में भारत ने 3-1 से टेस्ट सीरीज जीती थी। भारत ने लगातार चौथी सीरीज अपने नाम की। भारत ने इंग्लैंड से सीरीज जीतने के बाद न्यूजीलैंड दौर से पहले श्रीलंका और ऑस्ट्रेलिया को उसी की सरजमीं पर हराया था। वीरेन्द्र सहवाग ने 60 गेंदों पर शतक बनाकर अजहरुद्दीन के 62 गेंद पर शतक के भारतीय रेकार्ड को तोड़ा। वे पहले तिहरा शतक लगा चुके हैं। कुछ लोग सहवाग के फुटवर्क के बारे में अंगुली उठाते हैं, लेकिन गावस्कर के अनुसार तकनीकी खामी से खेल प्रभावित नहीं होता। धोनी ब्रिगेड ने भारत को क्रिकेट की बादशाहत दिला दी है।

क्रिकेट की तरह ही मनोरंजन की दुनिया में भी नई पीढ़ी कमाल कर रही है। टेलीविज़न सीरियल की दुनिया में स्टार प्लस चैनल पर प्रसारित होने वाली एकता कपूर की सीरियलों का युग समाप्त हो गया है। नया टी.वी चैनल कलर्स की ‘बालिका वधु’ नामक सीरियल ने स्टार प्लस का सीरियल ‘बिदाई’ से लगभग दोगुना (ग्यारह) टी.आर.पी. लेकर सीरियल निर्माताओं की नींद हराम कर दी है। यह बेहतर ढंग से लिखित और निर्देशित सीरियल है तथा तकनीकी गुणवत्ता और अभिनय इत्यादि में यह अपनी समकालीन कृतियों से बहुत आगे है।
हिंदी सिनेमा के क्षेत्र में भी प्रयोगों की भरमार हो रही है। संजय लीला भंसाली, विशाल भारद्वाज, अनुराग कश्यप, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, अब्बास टायरवाला, नीरज पांडेय, इम्तियाज अली, निशिकांत कामक, जोया अखतर जैसे नए निर्देशकों ने प्रयोगधर्मी फिल्में बनायी है। इनमें से कुछ सफल रहीं और कुछ असफल। ‘रंग दें बसंती’ की सफलता के बाद राकेश ओमप्रकाश मेहरा का आत्मविश्वास काफी बढ़ गया था। लेकिन अपनी 2009 के पूर्वाध में रिलीज हुई फिल्म ‘दिल्ली 6’ को मिली दर्शकों की ठंडी प्रतिक्रिया से राकेश ओमप्रकाश मेहरा का आत्मविश्वास डगमगा गया है। शुरुआत में उन्हें काफी गुस्सा आया, फिर लगा कि कहानी कहने का यह एक नया अंदाज है और हिन्दी दर्शक धीरे-धीरे ही इसके आदी हो सकेंगे। राकेश ओमप्रकाश मेहरा, संजय लीला भंसाली, विशाल भारद्वाज और अनुराग कश्यप आदि लोग प्रतिभाशाली तो हैं, लेकिन ये लोग इस देश के दर्शकों का मिजाज और भारतीय सिनेमा के समकालीन बाजार को उसी तरह नहीं समझते; जिस तरह धोनी ब्रिगेड या कपिल देव से पहले महानगरों में स्थित अभिजात पृष्ठभूमि के क्रिकेट खिलाड़ी क्रिकेट के भीतर भारतीय संभावनाओं को नहीं समझते थे। भारतीय क्रिकेट का यह स्वर्णयुग है। भारतीय सिनेमा का स्वर्णयुग 1949 से 1979 के बीच का कालखंड माना जाता है। कुछ लोग 1943 से 1982 तक का कालखंड कहेंगे। 1982 से सिनेमा का पराभव और टी.वी. का उत्थान शुरू हुआ। भारतीय क्रिकेट का उभार 1983 में विश्वकप जीतने के बाद से शुरू हुआ। विश्वकप जीतने के बाद भारतीय क्रिकेट बदलने लगा। भारतीय क्रिकेट में अजहरूद्दीन की कप्तानी का युग काले अध्याय के तरह आया। फिर विदेशी कोच ग्रेग चैपल युग भी गतिरोध की तरह आया। 2007 से भारतीय क्रिकेट का स्वर्णयुग शुरू हुआ। इसे धोनी युग भी कहेंगे। यह टेलीविजन और क्रिकेट का सम्मिलित युग है। इसमें IPL का भी जन्म हुआ। अब टीम कुछ खिलाडियों पर निर्भर नहीं है। अब भारतीय टीम में 11 खिलाड़ी दमखम से खेलते हैं। अनुभव और तरूणाई का मिश्रण इस टीम की ताकत है। सचिन, सहवाग, धोनी, युवराज और हरभजन जैसे खिलाडियों का अनुभव टीम को सहारा देता है तथा गौतम गंभीर, सुरेश रैना, युसुफ पठान और ईशांत जैसे युवाओं की जीवटता मारकता प्रदान करती है। धोनी टीम के प्रेरक होने के साथ-साथ योजनाकार भी हैं। जीत ही उनका मूलमंत्र है और पूरी टीम इस मंत्र को साधने में जुटी रहती है। वे हर स्थिति में संयत बने रहते हैं। हर मैच उनके और उनकी टीम के लिए नया मैच होता है, जिसमें पुरानी सफलता या विफलता को भुलाकार वे नए सिरे से प्रदर्शन करते हैं। शायद यही वजह है कि न्यूज़ीलैंड के खिलाफ ट्वेंटी-20 सीरीज के दोनों मैच गंवाने के बाद भी भारतीय टीम ने एक दिवसीय मैचों में शानदार वापसी की। इससे पहले विदेशी जलवायु और अंजान पिचों का भय हर सीरीज से पहले भारतीय खिलाड़ियों पर हावी हो जाता था। आस्ट्रेलिया, श्रीलंका, इंग्लैंड और न्यूज़ीलैंड में एकदिवसीय के सीरीज जीतने से साफ हो गया है कि भारतीय टीम पर विदेशी धरती का खौफ़ कम होता जा रहा है।

1989 में भारतीय सिनेमा में सूरज बड़जात्या, आदित्य चोपड़ा जैसे फिल्मकारों का जन्म हुआ। इनके प्रभाव में करण जौहर, राम गोपाल वर्मा, फरहान अख्तर, नागेश कुक्कुनूर जैसे फिल्मकारों ने लोकप्रिय सिनेमा का नया व्याकरण एवं नया छंदशास्त्र विकसित किया। क्रिकेट एवं सिनेमा के क्षेत्र में नई उद्यमशीलता की पूरकता आर्थिक व्यावसाय के क्षेत्र में भारतीय उद्यम की सफलता के रूप में सामने आई। नारायण मूर्ति, लक्ष्मी मित्तल, मुकेश अंबानी, के पी सिंह जैसे उद्यमियों की विश्वग्राम में तूती बोलने लगी। विश्वनाथन आनंद शतरंज के नए बादशाह बने। भारतीय समाज की अंतर्धारा में स्वभाविकता एवं सनातनता की जीत अब होने लगी है। यदि राजनीतिक नेतृत्व परिपक्व हो जाए, तब हम नई महाशक्ति बन कर एक बेहतर दुनिया के निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

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