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जीवन संगीत

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लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2009

जीवन संगीत

शिव सूत्र में नाद ब्रह्म की महत्ता स्थापित हुई है। शिव कहते हैं कि तार वाले वाद्यों की ध्वनि सुनते हुए उसकी संयुक्त केंद्रीय ध्वनि को सुनो। इसको सुनते हुए तुम सर्वव्यापकता को उपलब्ध हो जाओगे। किसी भी वाद्य में कई स्वर होते हैं। सजग रहने पर ही उसका केंद्रीय स्वर, स्वरों का मेरूदंड पकड़ में आता है। उसी केंद्रीय स्वर के चारों ओर उस वाद्य के अन्य सभी स्वर घूमते हैं। उसकी गहनतम संगीत धारा (नाद) को सुनने की कोशिश करने पर ही यह अनुभव में आता है कि वही स्वर अन्य सभी स्वरों को संभाले रहता है। संगीत की भी रीढ़ होती है, मेरूदंड होता है। उसे ही नाद ब्रह्म या केवल नाद कहते हैं। किसी भी संगीत में अन्य स्वर तो आते-जाते रहते हैं, विलीन होते रहते हैं, लेकिन नाद ब्रह्म (केंद्रीयतत्व) सतत प्रवाहमान रहता है। केवल पारखी कान उसको सुन पाते हैं। केवल अनुभवी लोग इस नाद ब्रह्म को पकड़ पाते हैं। संगीत सुनना ध्यान लगाने जैसी तकनीकी क्रिया है। सभी संस्कृति में संगीत का प्रयोग बुनियादी रूप में ध्यान को गहन बनाने के लिए किया जाता रहा है। भारतीय संगीत का विकास तो विशेष रूप से ध्यान की विधि के रूप में ही हुआ है। इसी तरह, भारतीय नृत्य का विकास भी योग (लय योग) एवं ध्यान की विधि की तरह हुआ है। संगीतज्ञ या नर्तक की साधना को देखने के लिए दर्शक एवं श्रोता के लिए भी ध्यान-मग्न होना आवश्यक है। यदि नृत्य या संगीत में ध्यान नहीं है तो वह व्यक्ति नर्तक या संगीतज्ञ न होकर मात्र तकनीशियन ही है। वह बड़ा या अनुभवी तकनीशियन हो सकता है, लेकिन तब उसके गीत-संगीत में आत्मा नहीं होती, केवल नृत्य या गीत का शरीर या रूप शैली भर होता है। आत्मा तो तब होती है- ‘‘जब नर्तक-संगीतज्ञ लय में हो। वह नर्तक न होकर नृत्य बन जाए, संगीतज्ञ न रहकर गीत में रूपांतरित हो जाए।” सितार या बांसुरी या वीणा बजाते हुए संगीतज्ञ केवल वाद्य ही नहीं बजाता, वह अपने भीतर अपने बोध को भी जगा रहा होता है। बाहर सितार बजता है और उसका सघन होश भीतर गति करता है। संगीत बाहर बहते रहता है, लेकिन वह संगीत के अंतरस्थ केंद्र के प्रति सदा सजग बना रहता है। वह समाधि लाता है। वह आनंद लाता है। वह शिखर बन जाता है। कुमार गंधर्व ऐसे ही संगीतज्ञ थे। उनका बेटा ऐसा नहीं बन पाया है। अत: वह समृद्ध हाल में नहीं रहा और कई तरह की समस्या का सामना करना पड़ा। वह मात्र संगीत का तकनीशियन निकला। उसने संगीत को शराब की तरह उपयोग किया। उसने आत्मानुभूति के लिए नहीं आत्म-विस्मरण के लिए संगीत का उपयोग किया। अत: उसे उस तरह के सुधिश्रोता नहीं मिले, जो उसके महान पिता को मिलते रहे थे। कुमार गंधर्व के गायन में आत्मा थी। वे गाते नहीं थे, गीत बन जाते थे। उनका पुत्र अच्छा गायक है। अपने जीवन को संगीतमय बनाता है। संगीत में नाद ब्रह्म की अनुभूति का अवसर होता है। वर्णाश्रम में आत्मानुभूति के लय को प्राप्त करने का अवसर होता है। आत्मानुभूति पुरुषार्थ है। ब्रह्मानुभूति परम पुरुषार्थ है। इसी अर्थ में बुद्ध एवं गांधी ने वर्णाश्रम धर्म को सनातन धर्म का आधारस्तंभ स्वीकार किया है। वर्णाश्रम की व्यवस्था सभ्यतामूलक सामाजिक व्यवस्था है। जबकि जाति की व्यवस्था स्थानीय सामुदायिक व्यवस्था है। जाति की व्यवस्था जन्मना होती है, जबकि वर्णाश्रम की व्यवस्था गुण, कर्म और दीक्षा पर आधारित होती है। एक जाति सामान्यत: एक स्थान विशेष में ही पायी जाती है। जबकि वर्णाश्रम की व्यवस्था एक संरचनात्मक व्यवस्था है, जो अखिल भारतीय स्तर पर कायम की गई थी। लंबी गुलामी के दौर में वर्णाश्रम धर्म का पतन हुआ और जाति व्यवस्था रह गई। लेकिन मुस्लिम शासकों और ब्रिटिश शासकों के बीच भी वर्ण से मिलती-जुलती वर्ग की व्यवस्था थी। वर्ग में भी कार्यात्मक विभाजन होता है। वर्गगत अधिकार होते हैं। लेकिन वर्ग व्यवस्था में वर्ग की तरह कर्तव्यों की सुपरिभाषित व्यवस्था नहीं होती है। हिन्दू व्यवस्था के केन्द्र में सतोगुण और ब्राह्मण होते हैं। मुस्लिम व्यवस्था के केन्द्र में बादशाह और सामंत होते हैं, जो क्षत्रिय वर्ण से मिलते-जुलते हैं। अंग्रेजी पूँजीवादी व्यवस्था के केन्द्र में बादशाह और पूँजीपति होते हैं, जो वैश्य वर्ण से मिलते-जुलते हैं। मुस्लिम व्यवस्था धार्मिक जोश और तलवार की नोक पर खड़ी की जाती रही है। पूँजीवादी व्यवस्था पूँजी और तोप की मदद से खड़ी की जाती रही है। जबकि सनातनी वर्ण व्यवस्था का आधार नैसर्गिक गुणों का संगीतमय समन्वय रहा है। सनातन धर्म कर्म के सिद्धांत और पुनर्जन्म की धारणा पर आधारित है। इस्लाम धर्म में कर्म के सिद्धांत तो एक स्तर पर स्वीकार किए जाते हैं, लेकिन पुनर्जन्म की धारणा नहीं स्वीकार किए जाते हैं। पूँजीवादी व्यवस्था भाग्य या ईश्वरीय कृपा से प्राप्त संयोग (चांस) और प्रशिक्षित श्रम पर आधारित होती है, इसमें कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धांत नहीं होता। पूँजीवादी व्यवस्था प्राचीन या मध्यकाल की व्यवस्था में संभव नहीं थी। इसका जन्म के कैल्विन के प्रोटेस्टेंट विचार-धारा के जन्म के साथ-साथ पश्चिमी यूरोप में विकसित होकर पूरे विश्व में लोभ, लालच और तोप के दबाव से फैलाया गया।

इसके विपरीत सनातन धर्म एक नैसर्गिक व्यवस्था है, जो प्रकृति की गोद में समन्वयवादी दृष्टिकोण के कारण काफी हद तक अपने आप विकसित हुआ और विचार, तर्क एवं आस्था के कारण फैला। यह प्रकृति, मनुष्य और नियति के परस्पर संवाद के कारण फैला। इस संवाद की अनेक विधियाँ रही हैं।
नाद ब्रह्म ध्यान एक प्राचीन तिब्बती विधि है। इसे सुबह ब्रह्म मुहूर्त में किया जाता रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार इसे दिन में किसी भी समय अकेले या अन्य लोगों के साथ किया जा सकता है, लेकिन पेट खाली होना चाहिए और इस ध्यान के बाद पंद्रह मिनट तक विश्राम करना जरूरी है। यह ध्यान एक घंटे का है और इसके तीन चरण हैं।
पहला चरण : तीन मिनट
एक विश्रामपूर्ण मुद्रा में आँख और मुँह बंद करके बैठें। फिर भौंरे की तरह (भ्रामरी योग) गुँजार की ध्वनि निकालना शुरू करें। गुँजार इतना तीव्र होना चाहिए कि आसपास बैठे लोगों को यह सुनाई पड़ सके और गुँजार की ध्वनि के कंपन आपके पूरे शरीर में फैल सके। स्वयं को एक खाली पात्र या खोखले ट्यूब की तरह अनुभव करेंगे तो आप पाएँगे कि यह पात्र गुँजार की ध्वनि से धीरे-धीरे भर गई है। आप एक श्रोता या द्रष्टा या साक्षी मात्र रह जाते हैं। आप सुविधानुसार गुँजार की लय को बदल सकते हैं या शरीर को धीरे-धीरे झुकने दे सकते हैं।
दूसरा चरण : पंद्रह मिनट
दूसरा चरण साढ़े सात-सात मिनट के दो भागों में बँटा हुआ है। पहले साढ़े सात मिनट में दोनों हथेलियों को आकाशोन्मुखी दिशा में फैलाकर नाभि के पास से आगे की ओर बढ़ाते हुए चक्राकार घुमाएँ। दायाँ हाथ दाईं ओर और बायाँ हाथ बाईं ओर चक्राकार घुमाएँ। फिर वर्तुल पूरा करते हुढ दोनों हथेलियों को पूर्ववत नाभि के सामने वापस ले आएँ। यह गति करीब साढ़े सात मिनट तक जारी रखें। गति धीमी होनी चाहिए। ऐसी भावना पैदा करें कि आप अपनी ऊर्जा बाहर ब्रह्मांड में फैलने दे रहे हैं।
साढ़े सात मिनट के बाद हथेलियों को उल्टा, भूमि-उन्मुख दिशा में कर ले और उन्हें विपरीत दिशा में वृत्ताकार घुमाना शुरू करें। फिर फैले हुए हाथ नाभि की और वापस लाएँ और पेट के किनारे से बाहर वृत बनते हुए बाजुओं में फैलकर फिर वृत को पूरा करते हुए नाभि की ओर वापस लौटें। ऐसी भावना पैदा करें कि अनुभव हो कि आप ब्रह्मांड की ऊर्जा भीतर ग्रहण कर रहे हैं। इसे भी साढ़े सात मिनट करें।
तीसरा चरण : पंद्रह मिनट
शांत और स्थिर होकर बैठें या शवासन की मुद्रा में पंद्रह मिनट तक लेट जाएँ। आँख बंद कर लें और भौंरे की तरह पंद्रह मिनट तक गुँजार करें। कुछ ही समय में मालूम होगा कि ब्रह्मांड की ऊर्जा और आपकी ऊर्जा आपस में मिल रही हैं या एक हो रही हैं। इस तरह की अनेको विधियाँ सनातन धर्म के योगी और तांत्रिक उपयोग में लाते हैं। वास्तव में इसी तरह की जीवन (संगीत) साधना को केन्द्र में रखकर यजमानी व्यवस्था की स्थानीय और वर्णाश्रम व्यवस्था की सार्वभौमिक स्वरूपों का सनातन धर्मों में विकास हुआ है। इसमें आप अपने जीवन-पद्धति या आजीविका हेतु किसी कला या शिल्प की इस तरह साधना करते हैं कि आपकी ऊर्जा और ब्रह्मांड की ऊर्जा के बीच आपसी लेन देन संगीत के आरोह-अवरोह की तरह नियमित रूप से चला करता है और जिन्दगी एक फूल की तरह रसीली और सुगंधित गंध बिखेरने लगती है। इसे गहराई देने के लिए आपके चारों ओर जो कुछ घटित हो रहा है, उसे स्वीकार करें। उन्हें एक जीवंत समग्रता बनने दें। इस ब्रह्मांड में सब कुछ अंतर्संबंधित है। ये पक्षी, ये वृक्ष, यह आकाश, यह पृथ्वी, यह सूर्य और मनुष्य सब एक दूसरे से परस्पर जुड़े हुए हैं। यह एक जीवंत एकत्व है। अद्वैत है। यह पर्यावरण विज्ञान का वैदिक मत है। हर चीज आपस में गहराई से जुड़ी हुई है। पूरे ब्रह्मांड को नाद-ब्रह्म या कॉस्मिक संगीत जोड़े हुए है। संगीत के बिना जीवन नहीं है। संग = साथ रहने से गीत बनता है। इस संगीत को सुनने के लिए साक्षी-भाव आवश्यक है। ध्यान करना आवश्यक है। योगाभ्यास करना आवश्यक है। ईश्वरीय तत्व के प्रति समर्पित होना आवश्यक है। वरना अहंकार आ जाएगा। मन विचलित होने लगेगा। आपका संतुलन बिगड़ेगा। फिर आप बेसुरे हो जाएँगे। आपके भीतर का संगीत नष्ट हो जाएगा। फिर आप कॉस्मिक संगीत नहीं सुन पाएँगे।
साक्षी भाव का आना मन की मृत्यु है। मन एक कर्ता है। वह कुछ न कुछ करते ही रहना चाहता है। साक्षी भाव न करने की अवस्था है। जैसे ही साक्षी भाव का आविर्भाव होता है, मन को विलीन हो जाना पड़ता है। मन सपनों का एक प्रवाह है और सपने नींद में ही अस्तित्ववान हो सकते हैं। साक्षी भाव के उदय होने पर हम सपना देखना बंद कर देते हैं। हम बहुत प्राणवान और सक्षम हो जाते हैं। हम प्रकाश की प्रचंड लपट बन जाते हैं। चैतन्य के प्रकाश में मन मर जाता है। मन आत्मघात कर लेता है। केवल साक्षी चेतना ही गीत गा सकती है, नृत्य कर सकती है और जीवन का स्वाद ले सकती है।

साक्षी भाव का मतलब जीवन से पलायन नहीं है। साक्षी भाव का अर्थ जीवन को कहीं अधिक समग्रता से जीना है। कमल का फूल साक्षी भाव का प्रतीक है। कमल एक ऐसा फूल है, जो पानी में रहता है, लेकिन पानी उसे स्पर्श नहीं कर सकता। संसार के बीच में रहना लेकिन संसार को अपने अंतस में प्रविष्ट न होने देना साक्षी चेतना के जाग्रत होने का प्रमाण है। साक्षी भाव से ही जीवन संगीत को देखा और सुना जा सकता है। सत्य का दर्शन किया जा सकता है। यही सनातनी दृष्टि है। यही बुद्ध का धम्म है। यही मध्यम मार्ग है।
इसे ही जेन साधक दूसरे ढ़ंग से अभिव्यक्त करते हैं। वे कहते हैं ‘बस बैठ जाओ, कुछ भी मत करो।’ संसार में सबसे कठिन काम है- ‘कुछ न करते हुए बस बैठना’। लेकिन एक बार हमें इसका गुर आ जाए तो धीरे-धीरे कई बातें होने लगती है। हमें नींद सी आने लगेगी। हम सपने देखने लगते हैं। कई विचार हमारे मन में उमड़ने लगते हैं। मन कहने लगता है कि व्यर्थ ही समय व्यतीत हो रहा है। मन हजारों तर्क देने लगता है। लेकिन यदि हम मन से बिना प्रभावित हुए मन की आवाज सुनते रहते हैं, तो धीरे-धीरे साक्षी भाव विकसित हो जाता है। यदि हम इसी तरह साक्षी भाव में खाली बैठे रहते हैं, तो एक दिन आत्म-प्रकाश का सूरज उगता है। नींद नहीं आती। मन हमसे थक जाता है। वह हमसे ऊब जाता है। वह यह विचार ही छोड़ देता है कि हमें फँसाया जा सकता है। हमसे सभी नाते तोड़ लेता है। सब कुछ स्पष्ट दिखने लगता है। परम शांति छा जाती है। आनंद ही आनंद दिखने लगता है। हम परमात्मा के शरीर (जगत्) में प्रवेश कर जाते है। संसार से मोह छूट जाता है। यदि शरीर न हिले तो मन स्वत: शांत हो जाता है। गतिमान शरीर में मन भी गति करता रहता है। शरीर और मन दो चीज नहीं हैं। दोनों में एक ही ऊर्जा है। शांत शरीर में बैठे रहने पर मन परत-दर-परत छूटते जाती है। एक क्षण आता है, जब हम बिना मन के होते हैं। जेन के स्रोत बुद्ध हैं। महाकाश्यप पहले मौलिक जेन गुरु थे। जो शब्दों से कहा जा सकता है- वह धम्मपद में संग्रहीत है। लेकिन जो शब्दों से नहीं कहा जा सकता- वह बुद्ध ने महाकाश्यप को दिया। शब्दों से कुँजी नहीं दी जा सकती। महाकाश्यप कुँजी को धारण करने वाले पहले व्यक्ति थे। उनके बाद छब्बीस धारक भारत में हुए। छब्बीसवाँ धारक बोधिधर्म थे। भारत में उन्हें अपना उत्तराधिकारी नहीं मिला तो वे चीन गए। वे एक ऐसा व्यक्ति खोज रहे थे, जिसे मौन को समझने की योग्यता हो। जिसे जेन परम्परा की कुँजी दी जा सके। जो मन से अभिभूत हुए बिना हृदय से हृदय की बात कर सके। नौ वर्षों की तलाश के बाद चीन में उन्हें अपना उत्तराधिकारी मिला। एक चीनी व्यक्ति जेन का सत्ताईसवाँ गुरु बना। और अभी तक चीन और जापान में यह क्रम चल रहा है। कुँजी अभी भी है। कोई न कोई अभी भी उसे धारण किए है। जेन की गुरु-शिष्य परम्परा चल रही है। यह एक नदी के समान है। नदी-अभी सूखी नहीं है। इसमें मौन जीवन का संगीत प्रवाहित हो रहा है। इसमें शब्दों का कोलाहल नही है। इसमें शब्दों का मौन नृत्य चल रहा है। यह शब्द ब्रह्म है। यह परा है। यह पश्यन्ती है। यह मध्यमा है। परन्तु यह वैखरी नहीं है। इसके केवल तीन स्तर हैं। शब्द ब्रह्म से नाद ब्रह्म तक तीन स्तर है। चौथा वैखरी का शब्द-संसार है। यह शब्दों का मायालोक है। वैखरी का आधार मन है। उपर्युक्त तीनों में मन नहीं है। वह मनहीन सत्य है। इसकी भाषा लाक्षणिक है। यह संकेत की भाषा है। शब्दों से बुद्ध हमारे द्वार पर दस्तक दे सकते हैं। लेकिन मौन से वे हमारे भीतर प्रवेश कर सकते हैं। और जब तक वे हमारे भीतर प्रवेश न कर जाएँ, हमारे भीतर कुछ भी नहीं घटेगा। उनका प्रवेश हमारे अस्तित्व में एक नया तत्व लाएगा। इस मौन से हँसी आती है। जेन परम्परा में मौन पर हँसने की सांकेतिक परम्परा शुरू हुई। जेन मठों में वे लोग हँसते रहते हैं। इस हँसी में भी एक संगीत है। कोई और परम्परा नहीं है, जो हँस सके। जिस दिन हम सत्य को समझ जाते हैं, हम हँसने लगते हैं, क्योंकि सत्य को समझ लेने के बाद कोई समस्या सुलझाने के लिए बचती ही नहीं है। खोजने की कोई जरूरत नहीं हैं, क्योंकि जो है, वह अभी और यहाँ हमारे भीतर है। सत्य की कुँजी है- ‘भीतर मौन, बाहर हँसी’। जब मौन से हँसी उठती है, तब दिव्य होती है। हम इस पूरे जागतिक मजाक (लीला) पर हँसते हैं। जीवन श्रीकृष्ण की बाँसुरी से सृजित लीला है और कुछ नहीं है। यह मात्र संगीत है, जो जीवन को रचता है और मृत्यु को स्वाभाविक बनाता है। इस संसार में बिना संगीत कुछ भी नहीं है, यह संसार एक संगीत भर है। हमारा बुद्धत्व तभी पूरा होता है, जब मौन एक उत्सव बन जाए। अपने भीतर जीवन संगीत सुनने की अन्य विधियाँ भी है। नाद ब्रह्म साधना या जेन साधना बौद्ध साधकों में ज्यादा लोकप्रिय है। हिन्दुओं में खासकर शैव परम्परा में गायत्री मंत्र या ओम् की साधना ज्यादा लोकप्रिय है। 
अ उ म – ये तीनों ध्वनियाँ ओम् में सम्मिलित हैं। ये तीनों बुनियादी ध्वनियाँ हैं। यह आधारभूत ध्वनियों में से एक है। अन्य सभी ध्वनियाँ इनसे ही निष्पन्न, इनसे ही बनी और इनका ही मिश्रण है। जैसे भौतिकी के लिए इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और पाजीटॅ्रान बुनियादी हैं उसी तरह अ उ म = ओम् भी बुनियादी हैं।
मंत्रशास्त्र के अनुसार ध्वनि का उच्चारण एक सूक्ष्म विज्ञान है। पहले ओम् का उच्चारण जोर से किया जाता है, ताकि दूसरे भी इसे सुन सकें। मनुष्य स्वयं को बोलते हुए तभी सुनता है, जब वह दूसरों से बात करता है। इसलिए एक स्वाभाविक आदत से आरंभ करना सुखद स्थिति है। मंत्रशास्त्री कहते हैं कि ओम् ध्वनि का उच्चारण करो, और फिर धीरे-धीरे उस ध्वनि के साथ लयबद्ध अनुभव करो। जब ओम् का उच्चारण करो, तब उससे आपूरित हो जाओ, भर जाओ। और सब कुछ भूल जाओ, ओम् ही बन जाओ, ध्वनि ही बन जाओ।

ध्वनि ही बन जाना मुश्किल नहीं है। ध्वनि हमारे शरीर में हमारे मन में, हमारे पूरे स्नायु-तंत्र में गूँजने लगती है। ओम् की अनुगूँज को अनुभव करना सीखने की जरूरत है। ओम् का ऐसा उच्चारण करना चाहिए, जिससे अनुभव हो कि हमारा पूरा शरीर ओम् से भर गया है, शरीर का प्रत्येक कोश उससे गूँज उठा है। उच्चारण करना लयबद्ध होना भी है। ध्वनि के साथ लयबद्ध होने पर ध्वनि ही बन जाना मुश्किल नहीं है।
तब हम अपने और ध्वनि के बीच गहरी लयबद्धता अनुभव करते हैं, तब हममें उसके लिए गहरा अनुराग पैदा होता है। ओम् ध्वनि इतनी सुंदर और संगीतमय है कि हम इसका जितना ही उच्चारण करते हैं, हम उसकी सूक्ष्म मिठास से भर जाते हैं। ओम् एक मीठी ध्वनि है। यह शुद्धतम ध्वनि है। जब हम ओम् ध्वनि के साथ लयबद्ध अनुभव करने लगते हैं, तब हमें इसका जोर से उच्चारण करना बंद कर देना चाहिए। तब ओंठ बंद करके ओम् का भीतर ही उच्चारण करना चाहिए। तांत्रिकों के अनुसार इस प्रक्रिया से ओम् का उच्चारण करने से हम अधिक प्राणवान्, अधिक जीवंत बन जाते हैं। हममें एक नवजीवन का संचार होने लगता है। हमारा शरीर एक वाद्य यंत्र की तरह है। इसे लयबद्धता की जरूरत है, और जब लयबद्धता खंडित होती है, तो हम अड़चन में पड़ते है। यही कारण है कि संगीत सुनना हमें अच्छा लगता है। संगीत का अर्थ है- लयबद्ध सुर-ताल। जब हमारे भीतर और बाहर संगीत की अनुभूति होती है, तब हमें सुख-चैन मिलता है। इसका यही कारण है कि हम स्वयं गहरे रूप में संगीतमय हैं। हमारा शरीर एक वाद्ययंत्र है और हमारी आत्मा सूक्ष्म रूप में नाद ब्रह्म का अंश है। जब हम अपने भीतर ओम् का धीरे-धीरे गुँजार करते हैं, तब हमारा पूरा शरीर इसके साथ नृत्य करने लगता है। तब हमारा पूरा शरीर इसमें नहाने लगता है। हमारे शरीर का पोर-पोर इस स्नान से शुद्ध होने लगता है। यह गुँजार जितना धीमा होगा, हमें उतना ही ज्यादा आनंद प्राप्त होता है। यह होम्योपैथी की खुराक जैसी है, जितनी छोटी खुराक उतनी ही गहरी उसकी पैठ होती है। गहरे जाने के लिए हमें सूक्ष्म से सूक्ष्मतर बनना पड़ता है। हृदय स्वयं इतना कोमल है कि सिर्फ बहुत धीमें लयपूर्ण और सूक्ष्म स्वर ही उसमें प्रवेश पा सकते हैं। और जब तक कोई ध्वनि हमारे हृदय में प्रवेश न करे, तब तक मंत्र पूरा नहीं होता है। कोई भी मंत्र तभी पूरा होता है, जब उसकी ध्वनि हमारे हृदय में, हमारी अंतस सत्ता के गहनतम केंद्रीय मर्म जिसे हम आत्मा कहते हैं, में प्रवेश करती है। ध्वनि जितनी सूक्ष्म होती है, उतने ही ज्यादा सघन और तीक्ष्ण बोध की हमें जरूरत होती है। यदि ध्वनि संगीतपूर्ण, लयपूर्ण और सूक्ष्म होती है तो उसे अपने भीतर सुनने के लिए हमें बहुत सचेत और सजग रहना पड़ता है। वरना नींद आ जाती है और तब मंत्र जाप का असली उद्देश्य ही अपूर्ण रह जाता है।

किसी मंत्र या जप के साथ, किसी बीज ध्वनि के प्रयोग के साथ यही कठिनाई है कि वह नींद पैदा करता है। वह एक शामक है, नींद की दवा है। अत: दो चीजें एक साथ साधनी पड़ती है – ओम् के उच्चारण को धीमा और सूक्ष्म करते जाना और उसके साथ-साथ ज्यादा सजग होते जाना। ज्यादा सजग बने रहने के लिए ओम् का उच्चारण ज्यादा सूक्ष्म करते जाना होता है। तब एक बिंदु आती है, जब ध्वनि निर्ध्वनि में या पूर्ण ध्वनि में प्रवेश करती है और हम पूर्ण होश में प्रवेश कर जाते हैं। जब तक ध्वनि निर्ध्वनि या पूर्ण ध्वनि में पहुँचे, उस समय तक हमारे होश को चरम शिखर पर होना चाहिए। जब ध्वनि अपनी घाटी में उतर जाती है, घाटी के निम्नतम, गहनतम केंद्र में उत्तार जाती है, तब हमारा होश उच्चतम शिखर पर पहुँच चुका होता है और ध्वनि निर्ध्वनि में या हम परिपूर्ण होश में विलीन हो जाते हैं। इसे सिद्धि कहते हैं। और यही ब्रह्मानुभूति से ब्रह्मानुभूति की साधना और सिद्धि है।

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