Home » एकादशी व्रत, तीर्थयात्रा तथा देसी खेती

एकादशी व्रत, तीर्थयात्रा तथा देसी खेती

by amitjnusociology@gmail.com
0 comments

लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2006

एकादशी व्रत, तीर्थयात्रा तथा देसी खेती

पर्व एवं पर्वोत्सव

पर्व प्रवाही काल का साक्षात्कार है। ऋतु को बदलते देखना, उसकी रंगत पहचानना, उस रंगत का असर अपने भीतर अनुभव करना, खुले आकाश के नीचे समय की गति को अयान्त्रिक और आनुभाविक पैमाने से नापना हिन्दू जीवन के अभ्यास में समाया है।

पूरा वर्ष चक्र जीवन चक्र है। संवत्सर का अर्थ है वत्सल, वर्ष का अर्थ है बरसने वाला, वर्ष-पर-वर्ष मंगल की पूर्ति है, वृष्टि है। पर्व का अर्थ होता है गाँठ या पोर। पर्व वृध्दि का परिमापक है, साथ ही वह सन्धि है जो एक अंश और दूसरे अंश के बीच में दोनों को जोड़ने के लिए स्थित है। पर्व का व्युत्पत्तिजन्य अर्थ भरने वाला है। हिन्दू धर्म में काल की अखण्ड धारणा है। लोक में अखण्ड काल के खण्डों को पर्व की गाँठ से बाँधा जाता है। हिन्दू लोग अपने प्रत्येक संकल्प में निरवधि काल और सावधि काल दोनों का स्मरण करता है। इसलिए पर्व का एक निश्चित समय है और साथ ही उसकी पुनरावृत्ति भी। बाँस और गन्ने के पर्व भी ऐसे ही हैं।

हिन्दू पर्व प्राय: उत्सव है। उत्सव ‘सवन’ से उत्पन्न शब्द है। सोम या रस निकालना ही सवन है। वह रस जब ऊपर छलक आये तो उत्सवन या उत्सव है। हिन्दू पर्व में रस का आपूरण और उच्छलन दोनों होते हैं। जैसे कार्तिक की पूर्णिमा के चन्द्रमा में रस भर जाता है और उसमें बँधा नहीं रह सकता। अत: कार्तिक पूर्णिमा एक महत्वपूर्ण पर्व है।

कई पर्व व्रत के पर्व हैं। व्रत का तात्पर्य यही है कि शरीर और मन को दूसरे भोगों से विरत करो, स्वयं को भोग्य बनाओ और तब अमृत के भोक्ता बनो, अमृत से उस रिक्त स्थान को भरो।

अमावस्या और पूर्णिमा की तरह शुक्ल पक्ष की एकादशी का भी अपना महत्व है। अमावस्या में चन्द्रमा सूर्य की छाया से पूर्णत: निगीर्ण हो जाता है। पुण्यजनक उपवास या व्रत के द्वारा सभी प्रकार के दूषित विचारों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है।

एकादशी व्रत

शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को चन्द्रमा की ग्यारह कलाओं का प्रभाव जीवों पर पड़ता है। फलत: शरीर की अस्वस्था और मन की चंचलता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। इसी कारण उपवास द्वारा शरीर को संभालना और इष्टपूजन द्वारा मन को नियंत्रण में रखना एकादशी व्रत विधान का मुख्य रहस्य है।

मुख्यत: अगहन मास की एकादशी से व्रत आरंभ होता है, लेकिन देवशयनी एकादशी आषाद शुक्ल से कार्तिक पर्यंत की एकादशी देव प्रबोधगी तक अर्थात चातुर्मास आरंभ एकादशी की संज्ञा से विभूषित की गई है। इस दिन से हरि शयन करते हैं। सतत कर्म में रत किसान को चार मास तक विश्राम अवकाश का लाभ ज्ञान प्राप्ति व अध्यात्म बल की प्राप्ति के लिए दिया गया है। वर्षा ऋतु में कृषकों के पास अधिक काम भी नहीं होता है तथा वर्षा एवं बाढ़ के कारण आवागमन भी अवरूद्ध को प्रेरित करने की व्यवस्था की गई।

प्रत्येक देवालय में धर्मचर्चा की जाती है। कृषक को विष्णु के समकक्ष सम्मान प्रदान किया गया है। विष्णु की तरह किसान भी पालक है। चौमासा के दिनों में परिश्रम न करने के कारण स्वास्थ्य बना रहे व शारीरिक क्रियाएँ संतुलित रहें, यह व्यवस्था उपवास के द्वारा की जाती है।
वर्षा नहीं होने पर पचास प्रकार की जड़ी-बूटियों और विशेष प्रकार की समिधा की आहुति (वर्षा-यज्ञ) से वर्षा कराने का विधान है। यज्ञों से बादल का निर्माण होता है, जिससे वर्षा होती है। यज्ञ में अग्नि एवं जल (सोम) का मेल होता है। जल तीर्थ है। जल अव्यक्त देवता है। जल सृष्टि का गर्भ है। जल वाक् (भाषा), धर्म और नदी की गतिशीलता का भी प्रतीक है।
अग्नि व्यक्त देवता है। अग्नि सृष्टि का अंकुरण है। सोमयाग में अग्नि में सोम की आहुति होती है, अग्नि की स्फीति होती है और पुन: सोम एक- एक कला बढ़ाते-बढ़ाते नवजन्म पाता है। सोम आदित्य द्वारा अमावस्या की रात्रि में निर्गुण होता है, और पूर्णिमा की रात्रि को पूर्ण हो जाता है।

तीर्थ एवं तीर्थयात्रा

तीर्थ प्रवाहमान् देश का साक्षात्कार है। तीर्थयात्रा धर्मसाधना का बड़ा ही सरल एवं सस्ता नुस्खा है। इससे पवित्र जीवन के लिए प्रेरणा मिलती है। पवित्र भावना वाले व्यक्तियों के संगम से पवित्रता की नयी अनुभूति मिलती है। तीर्थयात्रा काल का अतिक्रमण करके देश में प्रवेश करने का पुरुषार्थ है। तीर्थों को देखकर हम अपने स्वरूप को ज्यादा अच्छी तरह पहचानते हैं, इनको स्पर्श करके हम कालजयी होते हैं। तीर्थ करने का अधिकार केवल उसे है जो तीनों ऋणों से मुक्त है, अपने कर्तव्य का पालन कर चुका है। तीर्थयात्रा करने से पूर्व व्रत करने का विधान है। तीर्थ में रहते हुए तीर्थ के नियम- पालन करने का विधान है।

तीर्थभावना स्वेच्छा से विसर्जन की भावना है, लुटने की भावना है, नि:स्व होने की भावना है, विशेष के रूप में गिरने की और सामान्य के रूप में जीने की भावना है, अपने कलुष धोने की भावना है, विश्व के प्रति कृतज्ञता की भावना है, अपने पूर्वपुरूषों के तप से, त्याग से स्मरण के द्वारा जुड़ने की भावना है। तीर्थस्थान एक बड़ा संकल्प है, एक बड़ा भावैक्य है। बड़े सुख के लिए छोटे सुख के उत्सर्ग की कितनी बड़ी बुद्धिमत्ता है। यह जीवन के रस को आस्वादन की एक जगह है।
यह असंख्य मनुष्यों की पवित्र भावना की सूक्ष्म शक्ति का सघन संचयन है। तीर्थयात्रा में दुगर्म स्थानों में यात्रा का रोमांच है। परिवेश की पवित्रता में अपनी पवित्रता का स्रोत पाने की संतुष्टी है। सच्ची तीर्थयात्रा केवल यात्रा, स्नान, श्राद्ध, दान से पूरी नहीं होती, यह आत्म-विसर्जन से पूरी होती है। जो आदमी अपने को विशाल प्रवाह में बहने के लिए जितना ही ज्यादा छोड़ देता है, वह उतना ही बड़ा तीर्थयात्री है। तीर्थ में अहंकार का ध्वंस होता है, पाप का भी ध्वंस होता है। तीर्थयात्रा की कठिन प्रक्रिया में शरीर और चित्त दोंनो की शुद्धि होती है। तीर्थयात्रा का विधान प्रायश्चित एवं श्रद्धा के उद्देश्य से भी किया जाता है। तीर्थ में पूर्व पुरुषों के तप से आदमी जुड़ता है और उन्हें श्रद्धा निवेदन करके और अपने पापों का प्रायश्चित करके भी पूर्व पुरुषों के तप से स्वयं संस्पृष्ट होता है। तीर्थयात्रा एक प्रकार का आत्मयज्ञ है।
कुछ तीर्थ विद्या और कला के विशेष केन्द्र बने। कुछ तीर्थ परिव्राजकों के विशेष पर्वों पर समागम के पड़ाव बने और कुछ तीर्थ नित्य लीलाधाम के रूप में प्रतिष्ठित हुए। कुछ तीर्थ-शक्ति के पीठ के रूप में धाम के रूप में प्रसिद्ध हुए। तीर्थ यात्रा जीवन यात्रा का विराम नहीं, न धर्म की इतिश्री है, यह धर्म के संकल्प का पुनर्नवीकरण है।

 समकालीन भारत में व्रत, तीर्थ एवं कृषि

आधुनिकता के प्रभाव में व्रतों एवं तीर्थों का स्वरूप बदल रहा है। इस बदलाव का असली कारण कृषि एवं कृषक समाज की बदलती हुई स्थिति है। जब पारंपरिक खेती एवं पारंपरिक समाज ही बदल रहा है तो पारंपरिक तीर्थों एवं व्रतो में परिवर्तन अवश्यंभावी है। लेकिन यह आदर्श स्थिति नहीं है। देसी खेती एवं पारंपरिक जीवन पद्धति से ही भारतीय समाज का उत्थान हो सकता है।
वैज्ञानिक या आधुनिक खेती के नाम पर पिछले कुछ दशकों में देश के किसानों को जिस राह पर ढ़केला गया, यह वही राह है जो ऐलोपैथिक चिकित्सा, सर्जरी और कीमोथेरैपी की राह है। इस खेती में लागत इतनी ज्यादा है कि भारत के ज्यादातर छोटे और मंझोले किसानों के लिए इसका खर्च उठाना संभव नहीं है। ऐसे में स्थानीय साहूकार और बैंक ही इनका सहारा बनते हैं और कुछ दिनों बाद मौत (आत्महत्या) का कारण भी।
सच तो यह है कि बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए अनाज का उत्पादन बढ़ाने की दलील देकर आधुनिक कृषि के पैरोकारों और सरकार ने खेती की जिस पद्धति को आगे बढ़ाया, वह मूलत: बाजार और साहूकारों के लिए ही फायदेमंद साबित हुआ है। इसलिए कल तक खेती के सहारे खुशहाल जिंदगी जीने वाला परिवार आज खेती से भाग रहा है। उसके व्रत, तीर्थ, त्योहार खोखले होते जा रहे हैं।
आधुनिक खेती में लागत साल दर साल बढ़ती जाती है और उत्पादन घटता जाता है। फिर एक समय ऐसा भी आता है कि कितना भी खाद- कीटनाशक-पानी डालो, उत्पादन उतना ही रहेगा यानी उपज बढ़ेगी नहीं। मिट्टी की ऊवर्रता भी साल दर साल घटती ही जाती है और कुछ सालों बाद उस जमीन पर घास उगाना भी मुश्किल हो जाता है। कीट-पतंगों से फसलों को बचाने के नाम पर की जाने वाली कीटनाशक दवाइयाँ घोंघा और केंचुए का नामों-निशान मिटा देती हैं, जो मिट्टी को नया प्राण देते हैं। इससे होने वाला जल प्रदूषण एक अलग समस्या है।

इसका उपाय भारत में हजारों साल से प्रचलित जैविक (देसी) खेती है। देसी खेती एक ऐसी कृषि व्यवस्था है जो मोटे तौर पर आत्म-निर्भर रहा है। इसमें खाद-बीज से लेकर तमाम स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध हो जाता है। इसमें लागत भी कम आती है। और उपज भी अच्छी होती है। मिट्टी की ऊर्वरता भी बनी रहती है। लेकिन आधुनिक खेती से बर्बाद हो चुके खेत में जब पारंपरिक तरीके से खेती की जाती है, तब शुरुआत में उपज काफी कम होती है। रासायनिक खाद से उसर हो चुकी जमीन को गोबर की खाद से आबाद होने में थोड़ा समय लगता है। दो-तीन साल बाद उपज बढ़ने लगती है। पारंपरिक खेती में फसलों का चुनाव बाजार के लिए न होकर खेत और पर्यावरण को ध्यान में रखकर किया जाता है, ताकि मिट्टी के पोषक तत्वों की कमी न हो और नमी बनी रहे। पानी का इस्तेमाल भी आवश्यकतानुसार होता है।

पारंपरिक या देसी खेती का आधार यह अवधारणा है कि यह जगत भगवान विष्णु या माँ काली के शरीर का विस्तार है और यह संसार भगवान श्री कृष्ण या माँ भगवती की लीला स्थली है। ग्रामीण समुदाय एक साधना स्थली है और कृषि व्यवसाय या व्यापार न होकर उपासना की एक पद्धति है। इस परिवेश में हिन्दु-पर्व सनातन जीवन-भाव के बार-बार उमड़ने के पर्व हैं। तीर्थ और पर्व दोनों ही मिलकर देश और काल को जगाने और भुलाने के लिए हैं। तीर्थ यात्रा में आदमी एक ओर देश को पहचानता है, दूसरी ओर वह देश से एक होता रहता है। देश की विविधता और देश के विस्तार, देश की संभावना और देश के इतिहास का स्मरण करते-करते वह देशमय हो जाता है। इसी प्रकार पर्व मनाते-मनाते, ऋतुओं के मोड़ देखते-देखते, उत्सवों में अपने को रीता करते वह काल की अनन्ता में रमने लगता है। हिन्दू जीवन अनुभव की विविधता को सार्थकता देता है, बहुविध प्रकारों को एकोन्मुख करके हिन्दू धर्म इसीलिए स्वयं सनातन तीर्थ है, सनातन पर्व है।

समकालीन परिवेश में देसी खेती का महत्व कम हो गया है। रासायनिक खेती काफी महँगी एवं किसानों के लिए जानलेवा हो गई है। देसी खेती को मजबूत बनाए बिना इस देश का काम नहीं चलने वाला है। इसलिए आवश्यक है कि खेती की तकनीक सस्ता किया जाए। जो तकनीक गाँव में व गाँव के आसपास उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करे, किसानों को आत्म निर्भर बनाये, मिट्टी के प्राकृतिक उपजाऊपन की रक्षा करे व जल का अधिक दोहन न करे, वे ही किसानो के लिए सबसे उपयुक्त है। सरकार व गाँव वासियों के सहयोग से जल-संरक्षण व हरियाली बढ़ाने का कार्य बड़े पैमाने पर करने से कृषि व पशुपालन को बहुत लाभ मिलेगा। छोटे किसानों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
गाँवों व कस्बों में खेती के विकास के अतिरिक्त अनेक लघु व कुटीर उद्योगों, उद्यमों व दस्तकारियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जिन औद्योगिक वस्तुओं का उत्पादन अपेक्षाकृत श्रम-सघन तकनीकों से गाँव, कस्बों या छोटे शहर के स्तर पर हो सकता है, उसे इस स्तर पर ही प्रोत्साहित करना चाहिए। विशेष कर युवा किसानों के लिए यह महत्वपूर्ण है। हाल के समय में किसानों की आत्महत्या एक हकीकत है और इसके समाधान को उच्चतम प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इसके बिना सनातन जीवन के पर्व, त्योहर या तीर्थ अर्थहीन हो रहे हैं।
जीवन के आनंद के लिए स्वस्थ एवं समृद्ध होना आवश्यक है। देसी खेती के द्वारा भोजन एवं औषधि दोनों का उत्पादन होता है। देसी खेती स्वस्थ एवं समृद्ध समाज का आधार है। जिस व्यक्ति के शरीर में तीनों तत्व- वात, पित, कफ साम्य अवस्था में हों, पंच महाभूतों- अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी और आकाश की पाँच, सातों धातुओं- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र की सात और तेरहवीं जठर की अग्नि- सभी तेरहो तत्व समान पुष्ट हों, मलमूत्र विसर्जन क्रिया ठीक हो, आत्मा, इन्द्रियाँ व मन प्रसन्न अवस्था में हों, उसी व्यक्ति को स्वस्थ कहा जा सकता है।

शरीर को धारण करने वाले तत्व को धातु कहा जाता है और रोग पैदा करने वाले तत्व को दोष कहा जाता है। शरीर में जब वात, पित, कफ तीनों समान और शांत अवस्था में रहते हैं, तो इन्हें धातु कहा जाता है। जब ये विषम और कुपित स्थिति में होते हैं, तब इन्हें दोष कहा जाता है। शरीर में सारे रोग इन्हीं त्रिदोषों- वात, पित, कफ के बढ़ने या घटने से होता है। धातुओं की विषम स्थिति ही विकार या दोष है। धातुओं की साम्य अवस्था का नाम प्रकृति यानि स्वस्थ अवस्था है। आरोग्य का नाम सुख है। संतृप्त संवत्सर एवं जीवन का आनंद हिन्दू समाज में व्रतों त्यौहारों, तीर्थयात्र एवं देसी खेती का लक्ष्य है।

You may also like

Leave a Comment

error: Content is protected !!