लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2017
‘आनंद’ (1970) हृशिकेष मुंखर्जी की फिल्म
यह हिन्दी सिनेमा का सबसे उत्तम रचनाओं में से एक है। यह मुंबई शहर और राजकपूर को समर्पित है। मुंबई शहर भारत का सर्वोत्तम महानगर है जिसमें पूरे भारत के लोग रहते हैं, वह भी शांतिपूर्वक। यह 1966 में शुरू हुए शिवसेना की राजनीति का प्रतिलोम है। आनंद सहगल पंजाबी है, भाष्करबनर्जी बंगाली है, प्रताप कुलकर्णी मराठी है, मुरारीलाल और उसकी नाटक मंडली की नायिका गुजराती है, पहलवान दारा सिंह और नौकर रामु काका उत्तर भारतीय हैं। मैट्रन डीसा गोवा की हैं। हृशिकेष मुखर्जी की फिल्मों में खलनायक या खलनायिका नहीं होते। यह फिल्म एक ठेंठ भारतीय फिल्म है, जिसमें आनंद सहगल का जिंदादिल चरित्र राजकपूर के व्यक्तित्व से प्रभावित है। राजकपूर वास्तविक जीवन में हृशिकेष मुखर्जी को बाबू मोशाय ही कहा करते थे। दोनो 1959 से घनिष्ठ मित्र थे। हिन्दी की अधिकांश फिल्मों में ऐलोपैथिक डाक्टर को नायकत्व दिया गया है। मुखर्जी की फिल्म ‘अनुराधा’ का नायक एक ऐलोपैथिक डाक्टर है। इस फिल्म में एक रोगी नायक है, और होमियोपैथी, मौनी बाबा, सिध्द पीठ आदि की भी सकारात्मक प्रस्तुति है। फिल्म ‘आंधी’ की तरह इस फिल्म के संवाद भी काव्यात्मक हैं। ‘आंधी’ की तुलना में इसमें कम गीत हैं – 3 गीत + एक कविता। फिल्म का हर दृष्य और हर संवाद अर्थपूर्ण है। यह भारतीय संस्कृति के बहुआयामी स्वरूप को सम्पूर्णता में प्रस्तुत करता है। यह ट्रेजडी होते हुए भी ट्रेजडी नहीं है। यह कॉमेडी भी नहीं है। इसमें हर तरह के रस मिले हुए हैं। इसमें बौद्ध दर्शन और वैष्णव भक्ति का मिल-जुला रूप है। इसमें हर क्षण को आनंदमय बनाने का बौद्ध दर्शन है। इसमें संसार एक दिव्य लीला है। इसमें ईसाई (मैट्रन डीसा) और मुस्लिम (ईसाभाई सूरत वाला) पात्र भी हैं। प्रारंभ में भाष्कर बनर्जी नास्तिक है लेकिन आनंद सहगल के सोहबत में वह आस्तिक हो जाता है। मौनी बाबा और आनंद सहगल पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। आनंद के प्यार में मैट्रन डीसा भी पुनर्जन्म के विश्वास का अनादर नहीं करती। ईसाभाई भी स्वर्ग में मिलने की बात करता है।
इसमें दोस्ती की गरिमा है। मौत पर जिंदगी की जीत है। इसमें पारंपरिक अखाड़ा है। अखाडों की स्थापना 8 वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने की थी। इसका लक्ष्य हिन्दू समाज की रक्षा के लिए क्षात्र तेज से दीप्त सन्यासियों को संगठित करना था। ये दसनामी सम्प्रदाय कहलाते हैं। दसनामी सम्प्रदाय के इन अखाडों के प्रभाव में भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में 8वीं शताब्दी से ही अखाड़े बने हैं। ये लोग सामान्यतया बजरंगबली की पूजा करते हैं और कुश्ती लड़ते हैं, व्यायाम करते हैं, प्राकृतिक चिकित्सा से कई तरह के रोगों का उपचार करते हैं और समाज में सुरक्षा और व्यवस्था कायम रखने में अपनी भूमिका निभाते हैं। जब आनंद को पता चलता है कि डाक्टर भाष्कर बनर्जी की प्रेमिका रेणु को मुहल्ले के शोहदे तंग करते हैं, तो वह पास के अखाड़े के गुरू के पास फरियाद लेकर जाता है और गुरू शोहदों को डांट-डपट कर भगा देता है। इसके बाद शोहदे डर कर तंग करना छोड़ देते हैं।
इस फिल्म में मुंबई (बम्बई) केवल मराठियों का शहर न होकर सम्पूर्ण भारत का महानगर है, जिसमें भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों के लोग शांतिपूर्वक एक-दूसरे के साथ मिल-जुल कर रहते हैं। 1966 में शुरू हुए शिवसेना की संकुचित राजनीति का यह फिल्म बड़ी शालीनता से जवाब देती है। फिल्म 1970 के अंत में रिलीज हुई थी। यह मुंबई शहर को एक नये रूप में प्रस्तुत करती है। 1950 के दशक की शुरूआत में ‘नव केतन’ बैनर के तले देव आनंद अभिनित ‘टैक्सी ड्राइवर’ फिल्म में अलग तरह का बम्बई शहर दिखता है। 20 वर्षों में बम्बई काफी बदल चुका है। गगन-चुंबी इमारतों के साथ झुग्गी-झोपड़ी और चॉलों की समानांतर दुनिया भी ‘आनंद’ फिल्म में दिखती है। जिसमें डाक्टर भाष्कर बनर्जी रोग और गरीबी के बीच अपना डाक्टरी जंग जारी रखता है।
1970 में बम्बई एक हरा-भरा खूबसूरत शहर था। समुद्र का पानी गंदा नहीं हुआ था। समुद्र का किनारा पानी और बालू पर पसरा एक खूबसूरत नजारा पेश करता है। उस पर मन्नाडे का गाया गाना ‘जिंदगी कैसी है पहेली हाय, कभी तो हँसाए, कभी ये रूलाये’ गाते हुए राजेश खन्ना का मस्त अभिनय। 1969 में राजेश खन्ना को सुपर सितारा का हैसियत प्राप्त हुआ था और हृशिकेष मुखर्जी के निर्देशन में ‘आनंद’ उनके अभिनय का उँचाई प्रस्तुत करता है। अमिताभ बच्चन ने 1969 में जब अभिनय शुरू किया था तो राजेश खन्ना सुपर सितारा बन चुके थे। रमेश देव और सीमा देव, सुमिता सान्याल और ललिता पवार, जॉनी वाकर, दुर्गा खोटे और दारा सिंह सभी ने अच्छा अभिनय किया है, परन्तु ‘आनंद’ मूलत: राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन की फिल्म है। दोनों ने बहुत अच्छा अभिनय किया है। जयवंत पाठारे की फोटोग्राफी कमाल की है। उनका कैमरा उतना ही काव्यात्मक दृष्य रचता है, जितना हृशिकेष मुखर्जी, गुलजार, बिमल दत्ता और डी. एन. मुखर्जी की पटकथा। हमेशा की तरह हृशिकेष मुखर्जी के निर्देशन एवं संपादन में दोष निकालना मुश्किल है। आनंद हृशिकेष मुखर्जी की नि:संदेह सर्वश्रेष्ठ कृति है, जिसकी कहानी उन्होंने खुद लिखी थी। इस कहानी की प्रेरणा हृशिकेष मुखर्जी और राजकपूर की मित्रता पर आधारित है। राजकपूर और आनंद सहगल के चरित्र में कई समानता है। केवल एक प्रमुख अन्तर है। आनंद सहगल कैंसर रोग का मरीज है और वह जानता है कि उसे जीने के लिए मात्र 6 माह मिला है। जबकि स्वभाव से भोले और मस्त राजकपूर को बचपन से प्रेम का रोग था। उन्होंने अपने बचपन से बुढ़ापा तक कई महिलाओं से पवित्र प्रेम किया और अंत तक भोले बने रहे। जिस तरह आनंद पूरी जिंदगी अपने अनदेखे सोलमेट मुरारीलाल को खोजता रहा उसी तरह राजकपूर विवाहित होते हुए भी हर सुन्दर स्त्री में अपना सोलमेट खोजते रहे। प्रेम का रोग था।
दूसरी संस्कृतियों में यदि दो मर्दों के बीच बहुत गहरी दोस्ती हो तो उन्हें होमोसेक्सुल समझा जाता है, जबकि भारत में दो युवकों या दो मर्दों के बीच दोस्ती को पवित्रतम संबंधों में से एक माना जाता है। 1973 में निर्मित प्रकाश मेहरा निर्देशित ‘जंजीर’ में एक गाना है जो प्राण और अमिताभ बच्चन की दोस्ती के बारे में है – ‘यारी है ईमान मेरा, यार मेरी जिंदगी’। उसी तरह 1975 में निर्मित रमेश सिप्पी की फिल्म ‘शोले’ में धर्मेन्द्र और अमिताभ बच्चन की दोस्ती के बारे में एक गाना है- ‘ये दोस्ती हम नहीं तोडेंगे, तोडेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोडेंगे’। आनंद सहगल और भाष्कर बनर्जी की दोस्ती मात्र 6 माह पुरानी दोस्ती है। जबकि भाष्कर बनर्जी और प्रताप कुलकर्णी की पुरानी दोस्ती है। ईसाभाई सूरतवाला और आंनद सहगल की दोस्ती तो मात्र कुछ सप्ताह पुरानी है। वास्तव में भारत के बंटवारे का मारा रिफ्यूजी आनंद सहगल एक अनाथ है जिसे परायों और अपरिचितों से दोस्ती और संबंध बनाना खूब आता है। उसके व्यवहार की मस्ती के पीछे न सिर्फ कैंसर के रोग के कारण अपनी छोटी जिंदगी का अहसास है, बल्कि अपनी प्रेमिका से बिछुड़ने की उदासी भी है। परन्तु वह मानता है कि जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लम्बी नहीं। वह मानता है कि उदासी भी खूबसूरत हो सकती है।
‘आनंद’ फिल्म का एक प्रमुख थीम विवाह है। डा. कुलकर्णी की शादी का सालगिरह, डा. बनर्जी और रेणु का विवाह, आनंद की प्रेमिका का दूसरे व्यक्ति से विवाह और ईसाभाई सूरतवाला की विवाह की समस्या। इन विवाहों की कथा को बहुत मनोरंजक ढंग से प्रेम विवाह बनाम माता-पिता द्वारा ठीक किये गए अरेन्जड मैरिज का मनोरंजक कॉन्ट्रास्ट प्रस्तुत किया गया है। रेणु की मां कहती भी है कि अब मातापिता से कौन पूछता है, अब तो प्रेम विवाह का जमाना है। पूरा भारत 1970 में भले ही मूलत: पारंपरिक रहा हो, बम्बई महानगर में 1970 तक आते-आते प्रेम विवाह का चलन काफी बढ़ गया था। अत: 1960 के दशक से हिन्दी सिनेमा में टेक्नीकलर प्रेम और रोमांस की कहानियां 1950 के दशक के सामाजिक सन्दर्भों वाले कथानकों की तुलना में काफी बढ़ गए थे। 1957 में बने ‘मुसाफिर’ से हृशिकेष मुखर्जी ने हल्की फुल्की मनोरंजन की भाषा में मध्यवर्गीय भारतीय समाज के सामाजिक पहलुओं को अपनी फिल्मों में जगह देना जारी रखा था। वे एक तरफ विशुद्ध कॉमेडी (‘चुपके-चुपके’, ‘बाबर्ची’, ‘गोलमाल’ बनाया) तो दूसरी तरफ ‘अनाड़ी’, ‘सत्यकाम’, ‘आशीर्वाद’, ‘आनंद’, ‘अभिमान’ और ‘बेमिशाल’ जैसी सोद्देश्य सामाजिक फिल्में भी बनायी। ‘आनंद’ उनकी फिल्मों का सरताज है, जिसमें उनकी रचनात्मक ऊर्जा का विष्फोट हुआ है। लाइलाज बीमारी पर ‘आनंद’ उनकी एकमात्र फिल्म नहीं है। इसी थीम पर 1975 में उन्होंने ‘मिली’ नामक फिल्म बनायी थी, जिसमें जया भादुड़ी और अमिताभ बच्चन की मुख्य भूमिका थी। यह फिल्म ‘आनंद’ की तरह सफलता नहीं पा सकी, तो उसका प्रमुख कारण यही था कि मिली की बीमारी फिल्म की केन्द्रीय वस्तु है, जबकि आनंद की बीमारी उसके जीवन और संबंधों की मात्र पृष्ठभूमि है। ‘आनंद’ एक बहुआयामी फिल्म है और ‘मिली’ मूलत: कारूणिक फिल्म है। एक कारण और भी है ‘आनंद’ राजेश खन्ना के सुपर स्टारडम के समय बनी थी, जबकि ‘मिली’ की नायिका जया भादुड़ी सुपर सितारा नहीं थी और न 1975 तक अमिताभ बच्चन सुपर सितारा के रूप में स्थापित हुए थे। 1973 में ‘जंजीर’ आ चुकी थी। ‘अभिमान’ आ चुकी थी। 1975 में ‘मिली’ और ‘दीवार’ आ चुकी थी। परन्तु ‘शोले’ साल के अंत में आयी थी। अमिताभ बच्चन की सितारा हैसियत बनने लगी थी, लेकिन 1975 के अंत तक धर्मेन्द्र, संजीव कुमार, मनोज कुमार, शशि कपूर और विनोद खन्ना उनसे उन्नीस नहीं थे। केवल राजेश खन्ना का पराभव होना शुरू हुआ था। 1973 में ‘बॉबी’ के रिलीज से ऋषि कपूर का उदय हुआ था। अमिताभ सुपर सितारा 1977 में आयी ‘मुकद्दर का सिकंदर’ तथा ‘डॉन’ से बने। उससे पहले उनके नाम से फिल्में नहीं बिकती थी। निर्देशक, कहानी, पटकथा, गीत-संगीत की भूमिका तब तक सुपर सितारे से कम नहीं होती थी। 1969 से 1973 के बीच राजेश खन्ना अकेले सुपर सितारा थे। 1973 से 1977 तक कई सितारों के बीच प्रतिस्पर्धा थी, जिसमें अमिताभ बच्चन अंतत: विजयी हुए। अमिताभ बच्चन को सुपर सितारा बनाने में जितना योगदान सलीम-जावेद द्वारा गढ़ा एंग्री यंगमैन की इमेज का है, उससे कम योगदान मनमोहन देसाई और हृशिकेष मुखर्जी की फिल्मों का नहीं है। अमिताभ बच्चन यदि अंतत: अपने समकालीनों पर भारी पड़े तो उसका कारण ही यही था कि वे एक ही काल खंड में गंभीर, हसोड़ और एंग्री यंग मैन तीन तरह की भूमिका एक समान दक्षता से कर सकते थे। और नि:संदेह यह कहा जा सकता है कि इस दक्षता के बीज फिल्म ‘आनंद’ में नजर आये थे। इसीलिए उन्हें इस फिल्म के लिए बेस्ट सहायक अभिनेता का पुरस्कार भी मिला था।
‘आनंद’ की पटकथा और कास्टिंग दोनों में एक संतुलित सम्पूर्णता थी, जिसकी तुलना में मिली की पटकथा और कास्टिंग उन्नीस पड़ती है। ‘आनंद’ का किरदार राजेश खन्ना के अलावे अगर किसी और ने किया होता, तो यह फिल्म संभवत: इतनी स्वाभाविक नहीं बन पाती। कास्टिंग के मामले में इसकी तुलना 1970 के दशक की फिल्मों में संभवत: केवल ‘शोले’ से की जा सकती है, जिसका निर्माण 1975 में हुआ था। रमेश सिप्पी के ‘शोले’ में हर चरित्र की कास्टिंग और पटकथा में स्थान भी एक संतुलित सम्पूर्णता में है। ‘शोले’ एक भव्य फिल्म है, जिसमें स्पेकटेकल नैरेटिव पर भारी पड़ जाता है। ‘आनंद’ में नैरेटिव और स्पेकटेकल का संतुलन है। ‘आनंद’ एक मध्यम बजट की कारपोरेट फिल्म है। इसे एन. सी. सिप्पी ने निर्माण करवाया था। जी. पी. सिप्पी व्यावसायिक सिनेमा के एक बड़े निर्माता थे। ‘शोले’ उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति है, जो उनके बेटे रमेश सिप्पी ने निर्देशित किया था। एन. सी. सिप्पी मध्यम बजट की सोदेश्य फिल्मों के निर्माता थे। उन्होंने हृशिकेष मुखर्जी और गुलजार जैसे संवेदनशील तथा कलात्मक निर्देशकों के प्रोजेक्ट को फाइनेंस किया। इस मामले में एन. सी. सिप्पी की तुलना भारत सरकार की संस्था नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन (एन. एफ. डी. सी.) और राजश्री प्रोडक्संन से की जा सकती है। 1970 के दशक में एन. सी. सिप्पी, ताराचंद बड़जात्या (राजश्री प्रोडक्संन के मालिक) और एन. एफ. डी. सी. के प्रयास से छोटे और मध्यम बजट की स्वस्थ मनोरंजन देने वाली कलात्मक फिल्मों की बहार आ गई थी, जिसके प्रभाव में हिन्दी भाषी समाज के भीतर एक रचनात्मक विष्फोट हुआ था। हृशिकेष मुखर्जी निर्देशित आनंद इस रचनात्मक विष्फोट का स्वर्णकलश है।
आनंद एक ठेंठ हिन्दू फिल्म है। हृशिकेष मुखर्जी बिमल रॉय के साथ न्यू थियेटर्स कोलकाता से मुंबई आये थे। न्यू-थियेटर्स में तीन तरह की फिल्में बनती थी। एक देबकी कुमार बोस की ठेंठ हिन्दू फिल्में थीं, जिस पर चण्डीदास, विद्यापति, रामकृष्ण परमहंस और भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव था। दूसरी, पी. सी. बरूआ की रोमांटिक त्रासदी वाली फिल्में थी। तीसरी, नितिन बोस की राममोहन राय और रबीन्द्रनाथ टैगोर जैसे ब्रहम समाजी समाज सुधारकों से प्रभावित फिल्में थीं। बिमल रॉय और हृशिकेष मुखर्जी ने तीनों प्रकार की फिल्मों के बीच एक संतुलन स्थापित किया जबकि केदार शर्मा, राजकपूर और लेख टंडन देबकी कुमार बोस की परंपरा के विस्तार थे। राजकपूर के पटकथा लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास मार्क्सवादी परंपरा के सुधारवादी थे, अत: नितिन बोस के सुधारवाद और राजकपूर की प्रारंभिक फिल्मों के सुधारवाद में महीन अंतर है। राजकपूर के दूसरे पटकथा लेखक वी. पी. साठे मार्क्सवादी नहीं थे। इन्दरराज आनंद और रामानंद सागर ने भी राजकपूर के लिए लेखन किया था। परंतु राजकपूर अपने लेखकों से अपनी तरह का काम लेते थे। एक निर्देशक के रूप में ख्वाजा अहमद अब्बास राजकपूर की तुलना में व्यावसायिक रूप से असफल थे। ‘मेरा नाम जोकर’ और ‘बॉबी’ का लेखन अब्बास ने राजकपूर की मांग को पूरा करने के लिए किया था। राजकपूर पर अपने गुरू केदार शर्मा और दादागुरू देबकी बोस का गुणात्मक प्रभाव अंत तक बना रहा। उन पर एक प्रभाव अमिय चक्रवर्ती का भी था, जो मूलत: हिमांशु रॉय के बाम्बे टॉकिज के एक निर्देशक थे।
राजकपूर की तुलना में हृशिकेष मुखर्जी न्यू थियेटर्स के ज्यादा प्रतिनिधि फिल्मकार थे। वे बिमल रॉय के साथ-साथ देबकी बोस और पी.सी.बरूआ से भी प्रभावित थे। बिमल रॉय ने अपने कैरियर का प्रारंभ एक कैमरामैन के रूप में किया था। सिनेमैटोग्राफी उनके निर्देशन को प्रारंभ से ही नियंत्रित करती थी। जबकि हृशिकेष मुखर्जी ने अपनी शुरूआत एक संपादक के रूप में की थी। अत: एक निर्देशक के रूप में या पटकथा लेखक के रूप में उनका दृष्टिकोण संपादक की तरह किफायती बना रहता है। गुलजार के निर्देशन एवं लेखन पर उनका गीतकार वाला रूप हावी रहता है। ‘आनंद’ केदार शर्मा के ‘जोगन’ या ‘चित्रलेखा’ की तरह नैरेटिव प्रधान फिल्म नहीं है। इसमें नैरेटिव और स्पेकटेकल का संपादकीय कौशल से किया गया किफायती संतुलन है। यह मूलत: प्रतीकात्मक एवं लाक्षणिक रूप से हिन्दू दृष्टि में जीवन एवं मृत्यु तथा भाग्य एवं पुनर्जन्म की आनंद-दायक कहानी कहती है। इसमें हिन्दू संस्कृति का उदात्त रूप पेश किया गया है, जिसमें मुसलमान और ईसाई पात्रों को भी सहजता से जीवन जीने और संबंध बनाने में दिक्कत नहीं होती। ‘आनंद’ फिल्म का हिन्दू-धर्म भारतीय संस्कृति की तरह बहुआयामी, सहनशील एवं लचीला है।
‘आनंद’ फिल्म 1970 में बनी। इसकी कहानी हृशिकेष मुखर्जी ने खुद लिखी थी। अमेरिका में 1969 में ‘द गॉड फादर’ उपन्यास का प्रकाशन हुआ था इसके लेखक मारियो पूजो थे। 1969 में शक्ति सामंत ने ‘आराधना’ फिल्म बनायी थी, जिससे राजेश खन्ना सुपर सितारा बने। इतालवी मूल के फ्रांसिस फोर्ड कपोला ने 1972 में ‘द गॉड फादर’ फिल्म का पहला भाग बनाया था। 1975 में इससे प्रेरित दो फिल्में बनीं फिरोज खान की ‘धर्मात्मा’ और रमेश सिप्पी की ‘शोले’। भारत में अपराध का महिमामंडन 1975 से ही हुआ। लेकिन ‘द गॉड फादर’ में केवल अपराध का महिमामंडन नहीं था, फ्रांसिस फोर्ड कपोला ने माफिया को अमेरिकी पूँजीवाद के रूपक में बदल दिया था। ‘गॉडफादर’ में अमेरिका में रहते आए एक इतालवी माफिया परिवार के 1945 से 1955 तक के दस सालों का वृतांत उकेरा गया है। यह दरअसल द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उभरी विश्व व्यवस्था में अमेरिकी पूँजीवाद का उत्कर्ष काल है। ‘द गॉडफादर’ का नायक एक बूढ़ा डॉन विटो कॉरलेऑन है, जो अमेरिकी पूँजीवाद के प्रतीक माफिया परिवार का मुखिया है। बूढ़ा होता डॉन विटो हिंसा के आदेश देता है, जो दरअसल पूँजी और ताकत को हासिल करने की युक्तियाँ भी हैं। लेकिन फिल्म में माफियाओं के बीच खूनी खेल ही नहीं चलता, वहां अपराध के बीच परिवारों में मानवीय संबंधों के वृतांत भी दिखते हैं। यह फिल्म अपराध करने वालों के परिवारों में फैले प्रेम संबंधों, तनावों, ईर्ष्या, वात्सल्य और रहस्यों की भूल भुलैया में भी उसी खूबी के साथ जाती है, जिस तरह वह हिंसा के नरक में उतरती है। एक बड़े माफिया परिवार के शीर्ष पर बैठे डॉन विटो का अपने परिवार से गजब का जुड़ाव है। विटो का अभिनय मार्लन ब्रैंडो ने निभाया था। इसके लिए उन्हें सबसे अच्छे अभिनेता का ऑस्कर भी मिला था। ‘आनंद’ और ‘गॉडफादर’ की तुलना करके भारतीय और अमेरिकी संस्कृति के अंतर को समझ सकते हैं। आनंद की मृत्यु के बाद पूरी फिल्म में करूणा की लहर फैल जाती है, जबकि माफिया के दो गुटों के बीच लड़ाई में जब विटो के बेटे सनी की हत्या होती है, तो बेटे का शव विराग नहीं और गहरी हिंसा का उत्प्रेरक बन जाता है। यह अधिकार क्षेत्र और शक्ति बनाए रखने का दुष्चक्र और विवशता है। भारत की पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ थी जबकि अमेरिका की पहली फिल्म ‘द ग्रेट ट्रेन रॉबरी’ थी। तब से भारतीय सिनेमा और अमेरिकी सिनेमा का मूल स्वर नहीं बदला है। 1970 के दशक में‘ ‘आनंद’ और ‘द गॉडफादर’ इसका उदाहरण है।
