लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2008
हिन्दी सिनेमा की प्रमुख प्रवृत्तियाँ
2001 में प्रदर्शित फिल्म ‘लगान’ समकालीन हिन्दी सिनेमा का मूल पाठ है। इसके निर्देशक आशुतोष गोवरिकर हैं। यह कहानी और पटकथा की दृष्टि से 1957 की फिल्म ‘नया दौर’ (बी. आर. चोपड़ा) से बेहतर फिल्म है। ताँगा और मोटर (मैन बनाम मशीन) की रेस में ताँगा की जीत 1957 में लोग देख-समझ कुछ हद तक विश्वास कर सकते थे, चूँकि नेहरू युग में महात्मा गांधी की विचारधारा एक वैकल्पिक स्वप्न के रूप में जिन्दा थी। आज की नई पीढ़ी ‘नया दौर’ को भूतकाल की स्मृति में एक यात्रा मानकर उसी तरह देखती है, जैसे पुरातात्विक संग्रहालय देखा जाता है। उसमें ‘नया दौर’ 1957 की प्रतिनिधि फिल्म न होकर 18 वीं शताब्दी की फिल्म लगती है। 18वीं-19वीं शताब्दी के बीच की ही कहानी ‘लगान’ में भी है। ”गोश्त खाओ तो मंदिर में पूजा की व्यवस्था की जा सकती है” या ”क्रिकेट के खेल में जीत से लगान में माफी” जैसी नैतिक दुविधा से भारतीय लोग 1757 और 1857 के बीच जूझ रहे थे। बाद में भारतीय मध्यवर्ग का उसी तरह विकास हुआ, जिस तरह क्रिकेट, चाय, अंग्रेजी शिक्षा, अफीम, कुत्ता पालना, कोट पतलून और सरकारी नौकरी का महिमामंडन हुआ। 1983 का एकदिवसीय विश्व कप (कपिल देव) संभवत: आशुतोष गोवरिकर के लिए स्थूल मेटाफर रहा हो (लॉर्ड्स के मैदान पर 1983 में वेस्टइंडिज को हराकर विश्वकप जीतना)। भुवन में कपिल देव की छाया है या धोनी का भविष्य, लेकिन 2001 में बनी ‘लगान’ देवकी बोस से मनोज कुमार (‘चंडीदास’ से ‘क्रांति’ तथा ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ तक) तक की धारा का पुनरोदय है।
कलात्मक रूप से ‘स्वदेश’ और ‘जोधा अकबर’ में आशुतोष उत्तरोत्तर निखरते चले गए। वे देवकी बोस, लेख टंडन परंपरा के फिल्मकार हैं। उनका संबंध थियेटर से रहा है। मराठी थियेटर या हिन्दी थियेटर का उनका एक ग्रुप था, जिसमें आमिरखान भी शामिल थे। कई फ्लॉप के बाद ‘लगान’ बनी। ‘लगान’ एक डिफेंसिव फिल्म है। ‘स्वदेश’ में एक एजेंडा या मेनिफेस्टो है। लेकिन ‘जोधा अकबर’ में एक ऐतिहासिक दृष्टि है। यह सनातन धर्म की स्वाभाविक कथा है, जिसमें ऐतिहासिक जबड़े में मनुष्य की स्वतंत्र चेतना अपनी आत्माभिव्यक्ति करती है। यह राज्य बनाम लोक समाज, राजा बनाम सामान्य नारी के सत्ता विमर्श की अनहोनी अनगढ़ कथा, जिसे संरचनात्मक विन्यास के संभावना-शून्य रेगिस्तान में एक दूब की तरह उगते दिखलाया गया है। 2008 भारतीय सिनेमा के लिए अद्भुत वर्ष है। 2007 में ‘भूल भूलैया’, ‘गुरु’ और ‘नमस्ते लंदन’ महत्वपूर्ण फिल्में थीं। 2008 में ‘रेस’, ‘जाने तू या जाने ना’, ‘किस्मत कनेक्शन’, ‘सिंह इज किंग’, पिछले वर्ष(2007) की ‘चक दे इंडिया’, ‘तारे जमीन पर’ और ‘खुदा के लिए’ की शृंखला है। ‘आ जा नचले’, ‘भूतनाथ’ या ‘थोड़ा प्यार, थोड़ा मैजिक’ की नीयत अच्छी थी। ‘सांवरिया’ में महान बनने की जिद आड़े आ गई।
महान बनने कहलाने की सनक संजीदा इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी (रोग) साबित होती है। कलाकार या साधक को महानता की प्राप्ति के लिए सनक या जुनून न हो तो उसमें जोश या उत्साह नहीं होता। लेकिन महानता के पीछे भागने वाले लोग आत्ममुग्धता के रोग से ऐसे ग्रसित होते हैं कि हम ‘दिल दे चुके सनम’ की ऊंचाई से ‘देवदास’, ‘ब्लैक’, ‘सांवरिया’ की यात्रा कर बैठते है या ‘सरफरोश’ से ‘शिखर’ पर पहुँच जाते हैं या ‘आग’ से ‘सत्यम शिवम सुन्दरम’ और ‘राम तेरी गंगा मैली’ तक पहुँच जाते हैं। या देवर्षि नारद से बंदर बन जाते हैं। इसी लिए कला की फिसलन पर भक्तिमार्ग के साधकों ने सबसे ज्यादा उपलब्धि प्राप्त की है। कर्ममार्ग या ज्ञान मार्ग में महानता का रोग महामारी की तरह फैलता रहा है। विश्वविद्यालय एवं कला के क्षेत्रों में सामान्य साधकों का हमेशा अभाव रहा है, ‘महान साधक’ ही ज्यादा रहते हैं। व्यक्तिगत पतन और कलात्मक उत्पाद कलियुग में अलग- अलग चीजें हैं। मनोज कुमार, राजकपूर, मनमोहन देसाई या यश चोपड़ा से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। ‘उपकार’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘पूरब और पश्चिम’ तथा ‘शहीद’ की तुलना मेहबूब, शांताराम, बिमल रॉय या केदार शर्मा की फिल्मों से की जानी चाहिए।
मनोज कुमार और ताराचंद बड़जात्या, शक्ति सामंत और ऋषिकेश में से थे। अभी आशुतोष गोवरिकर, विपुल शाह और राजकुमार हीरानी सबसे महत्वपूर्ण है। 1990 के दशक में सूरज बड़जात्या, आदित्य चोपड़ा और मंसूर खान सबसे महत्वपूर्ण थे। मणिरत्नम, राकेश रोशन, रामगोपाल वर्मा, भंसाली और प्रियदर्शन भी महत्वपूर्ण फिल्मकार हैं।
समकालीन हिन्दी सिनेमा की एक अन्य प्रवृत्ति पंजाबी संस्कृति का प्रचार-प्रसार है। फिल्मों में पंजाब की फार्मूला छवि के कारण ही पूरे भारत में पंजाबी भाषा के कुछ शब्द अखिल भारतीय लोकप्रियता प्राप्त कर चुके हैं। परंतु फिल्म में पंजाब की पूरी हकीकत प्रस्तुत नहीं की जाती है। दरअसल हिंदुस्तानी सिनेमा में आँचलिकता उतनी ही स्वीकार की जाती है, जितनी उसकी सार्वभौमिक अपील होती है। मसलन शैलेन्द्र और बासु भट्टाचार्य ने रेणु की कहानी के हर शब्द का प्रयोग ‘तीसरी कसम’ फिल्म में किया है। यहाँ तक कि फिल्म के सारे गीतों के मुखड़े रेणु की कथा में मौजूद हैं।
हिन्दी सिनेमा की मुख्य धारा को पंजाब के फिल्मकारों ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। पंजाब के लोकगीत अखिल-भारतीय स्तर पर स्वीकार किए गए हैं, इसलिए इनके बॉक्स ऑफिस मूल्य के कारण इनका अक्सर इस्तेमाल होता है। लाहौर में बनी फिल्मों में भरपूर पंजाबियत थी। विभाजन के बाद पंजाब की अमर प्रेम कहानियाँ भी मुंबई आ गई। चोपड़ा परिवार ने पंजाबियत को मुंबई में स्थापित करने में सबसे ज्यादा भूमिका निभाई। खासकर पंजाबी गीत-संगीत-कहानी को। ओ. पी. नैय्यर, साहिर, रवि, आनंद बक्सी आदि को चोपड़ा परिवार ने खूब मौका दिया। राजकपूर की फिल्मों में पंजाबियत स्थूल रूप में नहीं रहा है। इसका बड़ा कारण शायद यह था कि उनके कोर-ग्रुप के लोग खासकर उनके संगीतकार, लेखक और कैमरामैन पंजाबी नहीं थे।
इसी तरह बंगाल के फिल्मकार हिन्दी सिनेमा की वैकल्पिक धारा के प्रतिनिधि रहे हैं। उदाहरण के लिए देवकी बोस ने अपने संगीतकार आर. सी. बोराल को साफ-साफ कहा कि वे हिन्दी फिल्मों में रबीन्द्र संगीत का प्रयोग भी करें। इसी परंपरा में पनपे हेमंत कुमार और सलिल चौधरी ने रबीन्द्र संगीत को मुंबई फिल्म उद्योग में पहुँचा दिया। लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा में लगभग सारे अंचलों के प्रभाव को स्वीकार किया गया है और इसकी हमेशा से शर्त रही है- ‘बॉक्स ऑफिस पर सफलता’। खुशहाल भारत की तस्वीर में पंजाब, पंजाबी और पंजाबियत की छवि प्रस्तुत करना सविधाजनक भी है और यह बॉक्स ऑफिस पर भी खरा है। फिल्मों में यथार्थ के बदले हमेशा लोकप्रिय अवधारणाएँ ही प्रस्तुत की जाती रही हैं। हॉलीवुड भी अमेरिका को प्रस्तुत नहीं करता बल्कि अमेरिका की लोकप्रिय छवि को प्रस्तुत करता है। और यह ‘लोकप्रिय छवि’ एक सामाजिक या फेनोमेनल निर्माण है, जिसे कलाकार और लेखक एक कैनन के आधार पर स्टीरियोटाइप के रूप में गढ़ते हैं। बी. आर. चोपड़ा के विपरीत यश चोपड़ा ने ज्यादा स्विटजरलैंड को प्रस्तुत किया है। बी. आर. चोपड़ा और लेखक निर्देशक के रूप में आदित्य चोपड़ा मध्यमार्ग वाले बाउंड स्क्रिप्ट वाले, आर्यसमाजी स्क्रिप्ट के सामाजिक आदर्श को महत्व देने वाले उपर्युक्त तीसरे वर्ग में आते हैं। दूसरी ओर निर्देशक यश चोपड़ा और निर्माता आदित्य चोपड़ा प्रथम वर्ग के माइंडलेस सिनेमा के लोकप्रिय फिल्मकार हैं। ‘‘नया दौर’, ‘धर्मपुत्र’, ‘वक्त’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ और ‘वीर-ज़ारा’ में पंजाबियत है। बी. आर. चोपड़ा एवं आदित्य चोपड़ा से अलग यश चोपड़ा की जो फिल्में हैं, वे माइंडलेस सिनेमा की फार्मूला फिल्में हैं। इनमें ज्यादातर असफल रही हैं। यश चोपड़ा की अधिकांश सफल फिल्मों की सफलता के अन्य दावेदारों का महत्व सर्वविदित है। उसमें यश चोपड़ा की रचनात्मक भूमिका गौण मानी जाती रही है। माना जाता है कि वे व्यावसायिक समझौतों को आसानी से स्वीकार कर सफलता का सेहरा पाते रहे हैं। वे भाग्यशाली तो हैं, लेकिन उन्हें भारतीय सिनेमा के श्लाघापुरुषों में अपने बड़े भाई एवं बेटे के साथ अक्सर शामिल नहीं किया जाता। इसके बावजूद यश चोपड़ा और देवआनंद या प्राण के लंबे अनुभव को दरकिनार करके लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा की बात नहीं की जा सकती।
भारतीय सिनेमा में पंजाबियों और बंगालियों के बाद पारसी समुदाय के लोगों की भूमिका संभवत: सबसे अधिक रही है। भारतीय सिनेमा को कलकत्ता से छोटे शहरों और कस्बों तक ले जाने में कलकत्ता के मदान थियेटर के मदान साहब और बाद में सोहराब मोदी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। मदान ने प्रदर्शन श्रृंखला का निर्माण किया था। सोहराब मोदी ने भी चलते फिरते सिनेमा को लेकर अनेक नगरों और कस्बों की यात्राएँ की तथा प्रदर्शन क्षेत्र में सफलता अर्जित करके फिल्म निर्माण में प्रवेश किया। सोहराब मोदी ने ठेठ पारसी थियेटर की परंपरा में इतिहास आधारित सिनेमा का विकास किया। ‘सिकंदर’ और ‘पुकार’ ने भारी सफलता अर्जित की, लेकिन ‘रानी लक्ष्मीबाई’ की व्यावसायिक असफलता ने मिनर्वा मूवीटोन की कमर तोड़ दी।
आजाद भारत के दर्शक की बदलती हुई रूचियों की अवहेलना के कारण सोहराब मोदी समेत कई महारथियों के सिनेमा का दुखांत हुआ और दशकों से संचित जायदाद और गुडविल का क्षरण शुरू हुआ। भारत के सबसे पुराने और सर्वाधिक गौरवशाली घराने टाटा ने भी किसी जमाने में पहल की थी। जे. बीज वाडिया और मेहबूब खान की कुछ फिल्मों में उन लोगों ने पैसा लगाया था। अभी कुछ वर्ष पूर्व टाटा की एक शाखा ने फिल्म निर्माण में पूँजी लगाई थी, परन्तु निर्माता के गैर-व्यवसायी तौर-तरीकों से तंग आकर उस शाखा को ही किसी अन्य कॉरपोरेट को बेच दिया। अनुशासन को धर्म मानने वाले पारसी लोग सितारा मूड से शासित उद्योग के साथ सहकार करने में असहजता पाते रहे हैं। वाडिया भाइयों ने सितारों को लेकर फिल्में बनाने की बजाय अपनी शर्तों पर अपनी शैली की फिल्में बनायी। जैसे राजश्री प्रोडक्शंस वाले बनाते रहे हैं। या महेश भट्ट बनाने की कोशिश करते हैं।
‘ऐतबार’ (अमिताभ, जॉन अब्राहम) में टाटा का पैसा लगा था और इसे सुजीत कुमार के बेटे ने बनाया था। टाटा ने मुंबई में एक सिनेमा घर का भी निर्माण किया है जो आज भी चल रहा है। वाडिया ब्रदर्श की स्टंट फिल्मों में ट्रिक फोटोग्राफी का विकास हुआ था। वाडिया के स्टूडियो में तकनीकी प्रयोग लगातार होते रहे। बाबू भाई मिस्री और पीटर परेरा जैसे ट्रिक फोटोग्राफी के महारथी वाडिया ब्रदर्श के ही शागिर्द थे। पीटर परेरा ने ‘मि. इंडिया’ की लोकप्रियता में भूमिका निभायी थी।
जाल मिस्री और उनके भाई फाली मिस्री भी पारसी थे। जाल मिस्री ने राजकपूर और चेतन आनंद की फिल्मों में अद्भुत फोटोग्राफी की थी- उदाहरण के फिल्म बरसात एवं कुदरत में। मेहबूब खान को अर्देशिर ईरानी, टाटा परिवार और फरदून ईरानी का सहयोग मिलता रहा था। फरदून ईरानी ‘डॉन’ 1978 के निर्माता थे। मीनू कात्रक और सरोश मोदी मेकअप के क्षेत्र में तकनीकी दक्षता के प्रतिमान हैं। फारूख रत्नोशी ने ‘खुद्दार’, ‘काश’ और ‘जुबैदा’ का निर्माण किया। भारतीय सिनेमा के तकनीकी पक्ष को विकसित करने में पारसी समुदाय के लोगों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। अभिनय में भी तकनीकी दक्षता की दृष्टि से अरूणा ईरानी या बोमन ईरानी की तुलना किसी भी दक्ष कलाकार से की जा सकती है। भारतीय सिनेमा के वर्तमान फिल्म उद्योग में कॉरपोरेट शैली के उदय के साथ पारसी प्रतिभा और अनुशासन का मॉडल उपयोग में आ सकता है।
हिन्दी सिनेमा के दर्शकों की मानसिकता समझने की भी आवश्यकता है। हिन्दी सिनेमा के समकालीन दर्शकों की पसंद में विविधता है। उदाहरण के लिए 2008 में प्रदर्शित फिल्म ‘बचना ऐ हसीनों’ में कुछ युवा दर्शकों को प्रायश्चित करता हुआ नायक हज़म नहीं हो रहा है। हमने समाज में आनंद और उत्सव का विराट भ्रम खड़ा किया है और इसमें प्रायश्चित करता हुआ नायक इन्हें यथार्थ का स्मरण कराता है, जिसके कारण इनका यूफोरिया (स्वस्थ होने का भ्रम) टूटता है। ‘वीर-ज़ारा’ में युवा वर्ग को नायक के 20 वर्ष की सजा हजम नहीं हुई, गोयाकि उनकी इच्छा थी कि नायक और नायिका जवानी या अधेड़ अवस्था में ही मिल जाते तो बेहतर था। दरअसल पश्चिम परस्थ युवा-पीढ़ी का देहेतर प्रेम में विश्वास नहीं है। प्रेम और यौन-संबंध की भारतीय परिभाषा से इनका लगाव कम ही है। परंतु ‘विवाह’ और ‘मुन्नाभाई’ शृंखला की फिल्मों की सफलता चौंकाती है। ‘तीसरी कसम’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’, ‘ओमकारा’ की तुलना में ‘विवाह’ ज्यादा सफल थी। ‘हम आपके हैं कौन’ ज्यादा सफल थी। ‘एक दूजे के लिए’, ‘हीरो’, ‘लवस्टोरी’, ‘बेताब’, ‘पहेली’, ‘विवाह’, ‘कयामत से कयामत तक’, ‘जब वी मेट’, ‘ओमशांति ओम’ (कर्ज), ‘सिंह इज किंग’, ‘रेस’ की तुलना करने पर अंतर्विरोधी निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। वास्तव में एक सफल या अच्छी फिल्म से भारतीय दर्शक क्या चाहता है? एक भारतीय दर्शक क्या एक खास तरह की अपेक्षा लेकर फिल्म देखने जाता है?
‘बचना ऐ हसीनों’ एक सार्थक प्रेम कथा है। यह औसत से सफल फिल्म है। लेकिन इसे बॉक्स ऑफिस हिट तो नहीं कहा जा सकता। प्रेम, वासना और प्रायश्चित को रेखांकित करने वाली फिल्म का नाम ‘बचना ऐ हसीनों’ उपयुक्त है क्या? इसमें बिपाशा को प्रेम में धोखा खाने के बाद एक विकल्प के रूप में सफलता अर्जित करने का जुनून सवार हो गया था। आज की युवा पीढ़ी सफलता अर्जित करना चाहती है और उनके इसी जुनून का एक हिस्सा प्रेम भी हो गया है।”
