Home » डा. बी. आर. अम्बेडकर, बौद्ध धर्म एवं विश्व ग्राम

डा. बी. आर. अम्बेडकर, बौद्ध धर्म एवं विश्व ग्राम

by amitjnusociology@gmail.com
0 comments

लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2011

डा. बी. आर. अम्बेडकर, बौद्ध धर्म एवं विश्व ग्राम

ज्यादातर समीक्षक डा. बी. आर. अम्बेडकर की दलित मसीहा के रूप में एकांगी व्याख्या करते हैं। परंतु उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि डा. अम्बेडकर अपने युग के महान चिंतक थे, जिसे नेहरू और इंदिरा युग में मार्क्सवादी विद्वानों ने जातिवादी और संकीर्ण सोच वाले दलित हित चिंतक मानकर उपेक्षा किया। लेकिन जैसे-जैसे भारत में उदारवादी अर्थनीति और राजनीति का भारतीय प्रजातांत्रिक व्यवस्था में महत्त्व बढ़ता गया, ऐतिहासिक संयोग से भारतीय राजनीति में दलित आंदोलन और बहुजन समाज पार्टी का भी विकास होता गया। उदारवादी विश्व व्यवस्था में बहुसांस्कृतिक चेतना के प्रति आग्रह और सभ्यताओं के संघर्ष की आशंका 1993 में सैम्यूल हटिंगटन के फार्रेन अफेयर्स नामक प्रतिष्ठित पत्रिका में व्यक्त की गई। बढ़ती उम्र और चीन के भीतर तिब्बत मसले के लगातार उलझते जाने के कारण दलाई लामा की छवि बौद्ध समाज में अधिकाधिक आध्यात्मिक धर्म गुरू की बनने लगी, जबकि वास्तव में वे तिब्बत राष्ट्र के पारंपरिक राष्ट्राध्यक्ष हैं और आज भी भारत में रह रहे तिब्बती लोगों के संसदीय दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त कर तिब्बती लोगों के राजनैतिक एवं धार्मिक मुखिया का धर्म निभाते हैं। 1990 के दशक में अमेरिकी दबाव में जापानी अर्थव्यवस्था को अपने अत्यधिक तेज रफ्तार से लाभ मिलने के कारण हानि उठाना पड़ा। रोनाल्ड रीगन के उत्तराधिकारी जॉर्ज बुश सीनियर ने सैनिक हस्तक्षेप की धमकी देकर 1990 से 1992 के बीच जापानी सरकार को डालर के मुकाबले जापानी मुद्रा येन का अवमूल्यन करने के लिए विवश किया। तब से जापानी समाज में अमेरिकी प्रभाव से मुक्त होने, अपनी सेना खड़ी करने की आवाज उठने लगी। अमेरिका ने जापान के द्वितीय विश्वयुद्ध में हारने के बाद भले हीं दो एटम बम गिराया (हिरोशिमा और नागासाकी पर), पर उसके बाद भी जापानी व्यवस्था में भी बौद्ध और तुकोगावा धर्म मानने वाले जापानियों ने अभूतपूर्व आर्थिक विकास किया। 1980 के दशक में वह अमेरिका से आगे निकल गया था, लेकिन 1990 के दशक में अमेरिकी दादागिरी में उसकी अर्थव्यवस्था कृत्रिम मंदी की शिकार हो गई और चीन की अर्थव्यवस्था जापानी अर्थव्यवस्था की तुलना में अमेरिका केन्द्रित विश्वग्राम में फलने-फूलने लगी ।

उपर्युक्त संदर्भ में इस्लामिक आतंकवाद और अमेरिकी दादागिरी के बीच सभ्यतामूलक संधर्ष लगातार बढ़ने लगा। अमेरिका-इराक संघर्ष से भी पहले अमेरिका-ईरान संघर्ष शुरू हुआ था। लेकिन जब सद्दाम हुसैन ने तेल नीति और मुद्रा नीति के मामले में अमेरिकी दादागिरी के आगे झुकने से इंकार कर दिया तो अमेरिका ने ईरान के ज्यादा बढ़े सभ्यतामूलक खतरे को नजरअंदाज करके पहले इराक को सबक सिखाना चाहा। लेकिन सद्दाम हुसैन जापानी राष्ट्राध्यक्षों की तरह मोम के पुतले नहीं थे। अत: अमेरिका-इराक संधर्ष डेढ़ दशक तक चलता रहा और सद्दाम हुसैन के पतन के बाद भी यह संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है। इसी बीच 11 सितम्बर 2001 को बिन लादेन के अलकायदा ने अमेरिकी सभ्यता एवं अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था के महाबली वाली इमेज को चकनाचूर कर दिया। अलकायदा का हेडक्वार्टर अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच वाले कबाईली इलाके में रहा है। जब अमेरिका ने अलकायदा के खिलाफ अफगानिस्तान में अभियान किया तो अलकायदा के लोग पाकिस्तानी इलाके में छुप गए। पाकिस्तानी सैनिक तानाशाह मुशर्रफ ऊपर से तो अमेरिका के आतंकवाद के खिलाफ अभियान में साथ हैं, लेकिन भीतर से पाकिस्तानी सेना, पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी और धर्मांध मुसलमानों के संगठनों के दबाव में अलकायदा के संरक्षक भी हैं। चीन रणनीतिक कारणों से पाकिस्तान और अन्य अमेरिका विरोधी मुस्लिम राष्ट्रों को आवश्यक संरक्षण एवं सहयोग देते रहता है।

उपर्युक्त सभ्यतामूलक प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष के जमाने में बौद्ध धर्म एवं बौद्ध सभ्यता की समन्वयकारी भूमिका के प्रति विश्वग्राम के संवेदनशील लोगों का लगाव स्वाभाविक रूप से बढ़ा है। भारत में बौद्ध धर्म के समकालीन सिद्धांतकार के रूप में बाबा साहब अम्बेडकर की प्रतिष्ठा हो चुकी है। वे न सिर्फ भारत के भीतर, बल्कि विश्वग्राम के भीतर भी वंचित समूहों के दृष्टिकोण के सबसे प्रमुख सिद्धांतकार के रूप में स्थापित हो चुके हैं। ईसाई, मुस्लिम, कन्फ्युशियसवादी और हिन्दू जनसंख्या की तुलना में बौद्ध मतावलंबी अल्पसंख्यक हैं और बौद्ध धर्म शांति, करूणा और समन्वयवादी धर्म है। यह आधुनिक युग की प्रवृतियों के भी अनुकूल है। कई लोग जापान केन्द्रित आर्थिक बौद्ध सम्प्रदाय, दलाईलामा के आध्यात्मिक बौद्ध सम्प्रदाय और डा. अम्बेडकर के राजनैतिक बौद्ध सम्प्रदाय के बीच समन्वय के प्रति आशान्वित हैं, जिससे विश्वग्राम में शांति एवं सद्भाव की प्रक्रिया को संबल मिलेगा।

You may also like

Leave a Comment

error: Content is protected !!