लेखक- प्रो. अमित कुमार शर्मा, समाजशास्त्र विभाग, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, रचनाकाल- 2017
अमेरिका नियंत्रित विश्व ग्राम का भविष्य
1) हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने यह बयान दिया है कि अमेरिका तालिबान के उदारवादी तत्वों के साथ बातचीत कर सकता है। इसे अमेरिका की अफगान नीति में पहले बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। इसी के साथ ओबामा ने यह भी स्वीकारा है कि अफगानिस्तान में अमेरिका को अपेक्षित विजय नहीं मिल पायी है।
संगठन से ज्यादा एक अतिवादी विचारधारा में तब्दील हो चुके तालिबान में उदारवाद की कोई गुंजायश नजर नहीं आती। ओबामा इराक में उदारवादी नेताओं के साथ हुई वार्ताओं के तर्ज पर शायद वैसी ही उम्मीद अफगानिस्तान से भी लगाए बैठे हैं। परंतु इराक में अलकायदा की दमदार उपस्थिति के बावजूद वहाँ ऐसी व्यवस्था कायम रही जिसमें उदारवादी तत्वों की पहचान कर बातचीत की संभावना तलाशी जा सकी, लेकिन अफगानिस्तान में अतिवादी ऐसी तमाम व्यवस्थाओं को पहले ही नेस्तनाबूद कर चुके हैं। अत: ओबामा की मंशा से अमेरिका पर से दुनिया का भरोसा कम होगा। इसका फायदा अंतत: अतिवादियों को ही होगा। इससे पाकिस्तान को अफगानिस्तान में रणनीतिक रूप से दखल देने का मौका मिलेगा। ऐसे भी पाकिस्तान में जरदारी की स्थिति दिनों-दिन खराब हो रही है। नवाज शरीफ, मुशर्रफ़ और कियानी के विरोध का लाभ अंत में फौजी शासन में ही होगी। और सैनिक तानाशाहों के मॉडेल जियाउल हक ही रहे हैं।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ओबामा यह सब नहीं समझ रहे है? उनके सलाहकार और सी.आई.ए. वाले यह सब नहीं समझ रहे हैं? या समझने के बावजूद लाचार हैं। मंदी और महँगाई के मार झेल रहे अमेरिका की भीतरी हालत सोवियत यूनियन की तरह हो गई है और जिस तरह अफगानिस्तान में हस्तक्षेप सोवियत साम्राज्यवाद का अंतिम अभियान था और उसके बाद वह टुकड़ों में बिखर गया ठीक उसी तरह अमेरिका की भीतरी हालत काफी खराब है और अफगानिस्तान तथा इराक एवं पाकिस्तान के बीच फँसा अमेरिका हर हालत में इससे बाहर आना चाहता है। पिछले तीस वर्षों से अमेरिका अपनी ”नवाबी” बचाने के लिए ‘बहु बेगम’/ ‘मेरे हुजूर’ जैसे दिवालिया हो चुके नवाबों जैसा व्यवाहार करते करते थक और टूट चुका है। आम अमेरिकी ऐसे अभियानों को फालतू, खर्चीला और अनावश्यक मानता है। उसकी आर्थिक हालत वैसी हो गई है, जैसी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इंग्लैंड या फ्रांस की थी और कोल्डवार के बाद सोवियत यूनियन की थी। अमेरिका वियतनाम में हार चुका है और उसे वापिस लौटना पड़ा था। ईराक और अफगानिस्तान से भी वह ऊब चुका है। उसे देर-सबेर वापिस लौटना पड़ेगा। और यह अमेरिकी साम्राज्यवाद का अंत होगा। तब अमेरिका आस्ट्रेलिया, कनाडा या यूरोपीय यूनियन तथा जापान की तरह एक उत्तरआधुनिक राष्ट्र-राज्य होगा। अपने में मगन तथा मदहोश।
2) 1972 में अमेरिका और सोवियत यूनियन के बीच कोल्ड-वार समाप्त हुआ था। 1973 में पेट्रोलियम पदार्थो की कीमत में वृद्धि हुई। इससे जो पैसा जमा हुआ वह सेंटकीट्स जैसे नए बैंको में जमा हुआ। इन बैंको पर प्रत्यक्ष अमेरिकी नियंत्रण नहीं है। इन पैसों को सोवियत संघ में इन्वेस्ट करवाया गया। खैरात में मिला पैसा आने से आर्थिक सुधार की प्रक्रिया रूक गई। 1948 से 1972 तक कोल्डवार का चरमोत्कर्ष था। 1972 से सोवियत संघ और अमेरिका के बीच दो संधि हुई थी। इसी के बाद अमेरिका ने सोवियत संघ में पैसा का ठेलम-ठेल किया। सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था में बाहरी पैसा आने से दूरगामी नुकसान हुआ। 1979 में सोवियत संघ के अफगानिस्तान में घुसपैठ के बाद फिर शीत युद्ध शुरू हुआ। 1979 से अमेरिका पाकिस्तान में लगातार पैसा ठेल रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका ने इंग्लैंड को आर्थिक मदद किया था। अमेरिका पैसा दे कर के ही दूसरे देशों को बर्बाद करता है।
ओबामा ने गुड यानी अच्छे तालिबान की बात करके अमेरिका वर्चस्व के पतन को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया है। अमेरिका भयानक मंदी से त्रस्त है। अमेरिका के पास स्थल सेना की ताकत नहीं है। पहाड़ी गुफा श्रृंखलाओं वाले अफगानिस्तान में तालिबान को समाप्त करने वाला वायु सेना के आक्रमण नहीं है। पाकिस्तान ने तालिबान से लड़ने के लिए पैसा लिया लेकिन तालिबान को समाप्त करने की दृढ़ता नहीं दिखलायी। आज यही तालिबान पाकिस्तान में फैल चुका है। पाकिस्तान को अब गृहयुद्ध से कोई नहीं बचा सकता।
भारत की हालत भी खराब है। परन्तु प्रजातंत्र की जड़ें जम चुकी हैं। विकास प्रक्रिया अब काफी हद तक संस्थाबद्ध हो चुका है। पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था का मानकीकरण हो चुका है। गठबंधन की राजनीति भी काफी हद तक परिपक्व हो चुकी है। अब गैर-कांग्रेसी और गैर-भाजपायी सामाजिक आधार की तरफ झुक रही है। इसमें कोई दूरगामी या रणनीतिक परिवर्तन नहीं हो सकता। कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं हो सकता। अभी यही सब चलेगा। धीमी गति से आर्थिक सुधार होता जाएगा। चीन में भी सोवियत संघ की तुलना में सुधार की प्रक्रिया क्रमिक एवं सतत् रूप से होती रही है। गैर-प्रजातांत्रिक व्यवस्था का अब लंबा भविष्य नहीं है। प्रजातांत्रिक पूँजीवादी व्यवस्था के दायरे को सीमा मानने पड़ेगा। आर्थिक शक्ति का महत्व स्वीकारना पड़ेगा। संस्थानीकरण का कोई विकल्प नहीं है। व्यवसायीकरण और बाजारी-व्यवस्था का भी कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं है। परन्तु धर्म संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में गुणात्मक परिवर्तन की अपार संभावना है। इसके लिए अभी संस्थात्मक फ़्रेमवर्क विकसित होना है।
3) विवेकानंद योगी हैं, गांधी संत। संत सर्वसमावेशी होता है। योगी आम आदमी की चीज नहीं। परन्तु विवेकानंद को मध्यवर्गीय हिन्दू समाज का मसीहा बनाकर प्रस्तुत किया जाता है। इस संदर्भ में पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान-तकनीक और भारतीय वेदांत के संश्लेषण की बात की जा सकती है। विज्ञान साधना है, वेदांत साध्य।
गांधी का कहना था कि आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक शैतानी साधन है। गलत साधन के इस्तेमाल से आप सही साध्य की पूर्ति नहीं कर सकते।
लेकिन विवेकानंदवादियों का कहना है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान-तकनीक सार्वभौमिक सनातनी तकनीक के ही रूपातंरण हैं। दयानंदवादियों ने भी यही कहा कि आधुनिक विज्ञान एवं तकनीक का उद्गम वेद है। विवेकानंद ने भारतीय मध्यवर्ग के लिए पैरेटो की भाषा में तर्क प्रस्तुत कर रहे थे। भारतीय मध्यवर्ग का काफी हद तक पश्चिमीकरण हो चुका है। यह सनातन जीवन मूल्य एवं जीवन पद्धति को कालबाह्य मान चुका है। लेकिन यह सांस्कृतिक पहचान की जद्दोजहद से गुजर रहा है। विवेकानंद ने उन्हें आधुनिक वेदांत के रूप में एक विचारधारा, एक तर्कप्रणाली प्रस्तुत किया। वे हिन्दू दक्षिणापंथ के काल्विन जैसे भाष्यकार बनने की कोशिश नहीं कर पाए। वे हिन्दू दक्षिणापंथ के मैक्स वेबर हैं। श्री अरविंदो, दयानंद, रामस्वरूप की विचार धारा भी कुल मिलाकर विवेकानंद जैसी है। जबकि महात्मा गांधी हिन्दू वामपंथ या पांरपरिक भारतीयों के दुर्खीम हैं।
अभी स्वामी विवेकानंद का हिन्दू दक्षिणपंथ विजेता लग रहा है। अभी लंबे समय तक पूँजीवाद का कोई विकल्प नहीं है। एक योगी के रूप में उन्होंने पूँजीवाद के वर्चस्व को देख लिया था। राममोहन राय के प्रभाव में वे पूर्व एवं पश्चिम के हिमायती थे ही। खुद बंगाल में ब्रिटिश राज की बरकत का गीत गाने वाले बंगाली भ्रदलोक की पृष्ठभूमि से आए थे। राममनोहर राय, तिलक महाराज और श्री अरविंदो को बहुत बड़ा विद्वान माना जाता है। स्वामी विवेकानंद योगी थे। टैगोर कलाकार थे। कवि, साहित्यकार, संगीतकार एवं पेंटर थे।
4) इसमें कोई शक नहीं कि आधुनिक तकनीक शैतानी प्रवृत्ति का है। एक समस्या सुलझाकर दस नई समस्या पैदा करना और फिर इन दस समस्याओं को सुलझाने के लिए शोध करना एक चक्रीय, झंझावात है। अभी लंबे समय तक इससे दुनिया को निजात नहीं मिलने वाली है। यह ईशवरीय लीला का ही नया रूप है। जो तकनीक के इस खेल में सहभागी हैं, वे अचेतन रूप से शैतानी प्रवृत्ति के लोग हैं। ये लोग दिक एवं काल की हद को पार करके कृत्रिम रूप से सुख सुविधा पाना चाहते हैं और हर कीमत पर नश्वर शरीर की जिन्दगी लंबी करना चाहते हैं। इन्हें मानव देह की सुविधाओं, विलासिता एवं लंबे भोग काल की चाहत का हबस है। इसी को ध्यान में रखकर गांधी ने कहा था कि वे अच्छी सुविधाजनक भोगवादी जिन्दगी के प्रति आसक्त हैं जबकि हमलोग गरिमामय मृत्यु और मृत्यु के बाद के पवित्र जीवन की ज्यादा कामना करते हैं। वे लोग बाबा आदम के द्वारा किए गए पाप और ईश्वर द्वारा आदम को दिए गए दंड की छाया में अपवित्र एवं आतंकित जीवन जीने को अभिशप्त हैं, जबकि हमलोग कर्म के सिद्वांत को मानते हुए दहशत के साये में भी जिन्दगी का उत्सव और मौत का जश्न मनाते हैं। पश्चिम के लोग मानते हैं कि जो सभ्यता आधुनिक तकनीक के इस शैतानी खेल में सहभागी नहीं होगा वह वंचित तथा सीमित हो जाएगा, पिछड़ जाएगा। आधुनिक सभ्यता और आधुनिक विज्ञान-तकनीक का कोई विकल्प नहीं है। समकालीन विश्व, आधुनिक युग में यह अंतिम चीज है। अब विचारधारा और इतिहास का अंत हो गया है। अब सोशल साइन्सेज, साहित्य, दर्शन में नया खोज नहीं है। सब कुछ खोजा जा चुका है। अब केवल विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में ही नयापन संभव है।
दरअसल यह सेमेटिक घोषणा पत्र है। ईसाई और मुसलमान भी इसी तरह की भाषा बोलते रहे हैं। ईसाईयों एवं मुसलमानों का पारंपरिक झगड़ा ही इसी बात पर आधारित है कि ईसाई तत्व दर्शन या थियोलॉजी अब्राहम की परंपरा का सही प्रतिनिधित्व करता है अथवा इस्लामिक थियोलॉजी । मुहम्मद को अंतिम पैगम्बर साबित करके इस्लाम भी यही दावा करता है कि एक सभ्य, न्यायोचित एवं आनंदमय समाज या सभ्यता के लिए जरूरी फ्रेमवर्क खोजा जा चुका है, अब नया खोजने की आवश्यकता नहीं है। अब ईमानदारी से इस पर चलने की जरूरत है। इसको अपनाने की जरूरत है। इसको प्रचारित करने की जरूरत है। इसी क्रम में मुसलमानों ने दुनिया के भिन्न-भिन्न कोने से उपलब्ध आवश्यक एवं मंगलकारी ज्ञान-विज्ञान का चुन-बिन कर जमा किया। इसको अरबी-फारसी भाषा में अनुवादित किया। और इसे पश्चिमी देशों में पहुंचाया।
5) इस्लामी शासन में लगातार युद्ध चलता रहा। अत: विधवाओं को ध्यान में रखकर 4 विवाह की अवधारणा सामने आयी। लेकिन बहु विवाह तो भारत में भी एक हद तक प्रचलित रहा है। केवल मुगल बादशाहों ने हरम नहीं बसाया है। अन्य देश के राजाओं और पूँजीपतियों ने भी हरम जैसी व्यवस्था बनाये रखी है।
धीरे-धीरे मुस्लिम देशों में भी पश्चिमी करण हो रहा है। इसको आधुनिकीकरण भी कहते हैं। उनके यहाँ भी धर्म सुधार या समाज सुधार के प्रयास होते रहे हैं। सूफी आंदोलन एक प्रकार का सुधार आंदोलन ही रहा है। पेट्रो डॉलर और अमरीकी डॉलर का घालमेल कम से कम 1973 से तो चल ही रहा है। इस्लामिक क्रांति (1979) से पहले 1919 में खलीफा के पद समाप्त होने के बाद से मुस्लिम देशों में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया चलती रही है। सर सैय्यद अहमद खान से शाह रजा शाह पहलवी तक आधुनिकता की वकालत इस्लाम में होती रही है। लेकिन 1979 से आधुनिकता और इस्लाम का संघर्ष लगातार बढ़ता रहा है।
सोवियत संघ में 1972 से 79 तक अमरीकी प्रभाव बढ़ा। 1985 से पेरोस्त्रोइका शुरू हुआ। 1991 में सोवियत संघ बिखर गया। मुसलमान मार्क्सवादियों ने इस बीच इस्लाम का झंडा थाम लिया।
6) गांधी ने 1920-21 में खिलाफत आंदोलन क्यों चलाया? हिन्द स्वराज में पैगम्बर मोहम्मद की शैतानी सभ्यता की चर्चा क्यों है ? गांधी हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर क्यों देते हैं ?
इस पर दो दृष्टिकोण है। एक वर्ग का कहना था कि गांधी की उपर्युक्त रणनीति व्यवहारिक अवसरवादी गठबंधन का उदाहरण था। गांधी एक अवसरवादी जननेता थे।
वे अंग्रजी राज के खिलाफ एक सफल व्यावहारिक गठबंधन तैयार कर रहे थे।
उनके पास दिव्य चेतन शक्ति थी। वे समझ चुके थे कि अब भारत में शासन करना अंग्रेजों के लिए आर्थिक रूप से महंगा पड़ रहा है। अब उन्हें हमारे कच्चे माल की उतनी आवश्यकता नहीं है। अब सिन्थेटिक उत्पादन बनाने लगे हैं। अंग्रेजों को भारत से जो लेना था वे ले चुके हैं। अब वे जायेंगे। अत: अगर शांति पूर्वक असहयोग आंदोलन चलाया जाए, सत्याग्रह आंदोलन चलाया जाए तो वे जल्दी चले जाएंगे। इसके लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता आवश्यक है। दूसरी और अंग्रेजों ने इस राजनीतिक गठबंधन को तोड़ने की चाल चली। जिन्ना, अंबेदकर, सावरकर तीनों अंग्रेजों की चाल में आ गए। अंग्रेज गए लेकिन देश को बांट कर गए। भारत पाकिस्तान के बीच सेना खड़ी कर गए। सेना को अत्याधुनिक हथियार चाहिए। हथियार पश्चिम से ही मिलेगा। युद्ध की स्थयी आशंका के दबाव में काले अंग्रेजों का राज भारत-पाकिस्तान में चलता रहेगा।
एक दूसरा दृष्टिकोण भी है। वह मानता है कि गांधी ने इस्लाम के पारम्परिक स्वरूप को पहचाना था। धर्म के ऊपरी आवरण को दरकिनार करके उन्होंने हिन्दु-मुस्लिम एकता के स्वभाविक आधार को देख लिया था। 12वीं शताब्दी से साथ रहते-रहते हिन्दु-मुसलमान सह-अस्तित्व सीख चुके थे। दबंग लोग दोनों समुदायों में थे। लेकिन फिर भी आम हिन्दु-मुसलमान पारम्परिक जीवन दर्शन मानते थे, उनके बीच एक साझी विराजत भी थी। उनके बीच आपसी झगड़ा था लेकिन सभ्यतामूलक एकता भी थी। दूसरी ओर आधुनिक पश्चिम से सभ्यतामूलक संघर्ष है। गांधी यह भी जानते थे कि जो इस शैतानी सभ्यता में समझ-बूझकर भागीदारी नहीं करेगा वह आधुनिक दृष्टि से भले ही पिछड़ जाएगा लेकिन पारम्परिक दृष्टि से स्थित-प्रज्ञ कहलायेगा। उसे आर्थिक रूप से कुछ कष्ट भले होगा, लेकिन वह मोक्ष का अधिकारी होगा।
7. भारत में जाति व्यवस्था का आधार ही विविधता में एकता (unity in diversity) रहा है। जाति वर्ण के टूटे रूप हैं। पूरे भारत में एक विचारधारा, एक जीवन-दर्शन, एक सम्प्रदाय नहीं चल सकता। कभी नहीं चला। वैदिक और तांत्रिक, वैष्णव और स्मार्त, वैदिक और श्रमण जैसी अनेकों धाराओं का इस देश में हमेशा सह-अस्तिव रहा है। गांधी स्वतंत्रता संगाम के केवल नायक भर नहीं थे। गांधी इस देश के लोगों को कुछ नया करनेके लिए नहीं कह रहे थे, देश के भीतर की एक जीवंत व्यवस्था को ही सभ्यतामूलक विमर्श के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे। इस देश के पढ़े-लिखे दिग्भ्रमित लोगों को ही इस देश की सांस्कृतिक विरासत के बारे में बतला रहे थे। बिल गेट्स ने धार्मिक दान (फिलैंथ्रॉपी) का जो मानक स्थापित किया है, वह गांधी के ट्रस्टीशिप से मिलता-जुलता है। वैष्णवों और ईसाईयों में कई समानता रही है। शैवों, शाक्तों, तांत्रिकों और मुसलमानों में भी काफी कुछ समान रहा है। कुछ लोग भारत के प्रजापात्य (विवाह) धर्म का ही बिगड़ा/ रूपांतरित रूप इस्लाम धर्म में देखते हैं।
वैदिक धर्म निगमन तर्कशास्त्र पर आधारित है। तंत्र आगमन तर्कशास्त्र पर आधारित है। तंत्र में साधना आवश्यक है। वैदिक धर्म में जानना और मानना पर्याप्त है।
आधुनिक संस्कृति वणिक धर्म या वैश्य संस्कृति का सार्वभौमीकरण है। आधुनिक संस्कृति से पहले वैश्यों को संप्रभुता प्राप्त नहीं थी। धर्म और राज्य के दायरे में उनको कार्य करना पड़ता था। आजकल वैश्य बनने के लिए होड़ मची हुई है। वैश्य धर्म अब बाजारवाद के रूप में सम्प्रदायनिरपेक्ष (secular) हो गया है। सम्प्रदायनिरपेक्ष एवं सम्प्रभु (Secular and sovereign) वैश्य रतन टाटा की तरह योगी और अनिल अंबानी, सुब्रत राय सहारा की तरह सर्व भोगी दोनों हो सकता है। वह नारायणमूर्ति भी हो सकता है और विजय माल्या भी। वह मनमोहन सिंह भी हो सकता है और चिदंबरम/ यशवंत सिन्हा भी। तकनीक की तरह बाजार का भी शैतानी खेल चल रहा है।
8. एक सूचना है कि पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में 200% की दर से इस्लाम धर्मावलंबियों में वृध्दि हो रहा है। इन्टरनेट एवं वेबसाइट का इस्तेमाल मुसलमान बहुत ज्यादा कर रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता एवं नास्तिकता से उकताये पश्चिमी लोगों को धार्मिक विकल्प महसूस होता है। खासकर 20 वर्ष के आसपास के युवाओं में इस्लाम के प्रति तीव्र आकर्षण है। जो पश्चिमी लोग भारतीयमूल के धार्मिक सम्प्रदायों में शामिल हो रहे हैं, उनको हिप्पी कहा जाता है। 40 वर्ष के अमेरिकी बुश के समर्थक थे। 20 वर्ष के अमेरिकी इस्लाम को कमजोर (अंडर डॉग) मानकर इसके प्रति आकर्षित हैं। कुछ लोगों का कहना है कि शुरू में ये अनुभवकी विविधता के लिए अपनाते हैं। लेकिन इस्लाम में आना आसान है, निकलना बड़ा मुश्किल है। आप खुद तो अपने जीवन में निकल भी सकते हैं लेकिन आपकी संतति के लिए तो निकलना बड़ा मुश्किल है। आधुनिक मुसलमान तो और भी ज्यादा कट्टर होते हैं। खासकर आधुनिक पश्चिमी मुसलमानों के बीच और वहाबी मुसलमानों के बीच आजकल नवजागरण बहुत ज्यादा है। ऐसा लगता है कि 30 वर्षों के भीतर पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में मुसलमान का वर्चस्व कायम हो जाएगा। आधुनिक पूँजीवाद ने कैथोलिक ईसाइयत को तो पराजित कर दिया लेकिन वह जेहादी इस्लाम के दो तरफा (Bad Taliban and Wahabi Islam ) हमले को झेल नहीं पाएगा। प्रकृति और नियति का खेल निराला है । विवेकानंद, दयानंद और मालवीय का प्रोजेक्ट तो आंशिक रूप से ही सफल हुआ- आत्मविश्वास से भरे मध्यवर्ग का जन्म हुआ लेकिन यह आधुनिकता के दबाव से संपूर्ण रूप से हिन्दू नहीं रह पाया। दूसरी ओर वहाबियों ने इस्लामिक विश्वास एवं मूल्यों के साथ आधुनिक तकनीक का सफल मिश्रण तैयार कर लिया है। इससे लड़ना अमेरिका के लिए आसान नहीं होने वाला है। दूसरी ओर उसकी अर्थ व्यवस्था का भी हाल-बेहाल है। ऐसे में अमेरिका नियंत्रित विश्व ग्राम का भविष्य अनिश्चित है। इसी अनिश्चितता में से भारतीय एवं चीनी समाज के लोग एक नया विश्व ग्राम बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें अंतिम सफलता भारत को मिल सकती है, अगर यहां एक नया सांस्कृतिक नवजागरण शुरू करने में समय बध्द सफलता मिल सके। इसके लिए अनुभवी नेतृत्व चाहिए जो नई पीढ़ी में अंगड़ाई ले रहा है।
9. इन्टरनेशनल मोनेटरी फंड (IMF) ने एक रिपोर्ट जारी किया है जिसके अनुसार विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी का दौर 2011 से पहले समाप्त नहीं होने वाला है। अभी विश्व अर्थ व्यवसथा की विकास की दर 1.3 प्रतिशत है और 2010 में यह दर 1.9 प्रतिशत तक हो सकती है। 2 प्रतिशत से कम विकास दर मंदी का संकेत है। जबकि भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास दर 6.5% है। विश्व के अन्य देशों की तुलना में हमारी अर्थव्यवस्था में कोई वित्तीय संकर भी नहीं है, जबकि पश्चिम के विकसित देशों में मंदी के साथ-साथ घोर वित्तीय संकर भी है। इसे अंग्रेजी में स्टैगफ्लेशन कहते हैं। आर्थिक इतिहास में ऐसी स्थिति से उबरने में लंबा समय लगता है। एक गतिशील जीवंत राष्ट्र के पास एक विश्व दृष्टि एवं वैश्विक नीति होनी चाहिए। एक वैश्विक एजेंडा होना चाहिए लेकिन उसे अपने देश की संस्कृति, संस्कार एवं समाजिक परिवेश से जुड़ा भी होना चाहिए। इस दृष्टि से अमेरिका, रूस, चीन एवं अन्य विकसित देशों को गतिशील जीवंत राष्ट्र नहीं कहा जा सकता ।
10. चीन की हालत बहुत खराब हो गई है। 10 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हो गए हैं। चीनी सामान यूरोप-अमेरिका की मंदी के कारण बिक नहीं रहा हैं। वहाँ बड़ी मात्रा में सामानों का उत्पादन होने लगा था, इकोनॉमी ऑफ स्केल के कारण बहुत सस्ता में सामान बिकता था। संभवत: सरकार भी सब्सिडी देती थी। रणनीति मार्केट पर कब्जा करने का था। उपभोक्ता बाजार में चीनी सामान पिछले 10 वर्षों में खूब बिका। अब चीनी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है।
रूस की अर्थव्यवस्था पुतिन ने ठीक किया था। परन्तु इसमें असली कारण तेल भंडार का पता लगना था। 2001 से रूस ने खूब तेल बेचकर डॉलर जमा किया था। अपार डॉलर रिजर्व के कारण रूसी अर्थव्यवस्था और पुतिन अजेय लग रहे थे। अति आत्मविश्वास में रूस ने तेल के क्षेत्र से विदेशी कंपनियों को अपने देश से निकाल दिया। उस वक्त तेल की कीमत 147 डॉलर प्रति बैरल था। रूस ने सोचा कि विदेशी कंपनियों को क्यों मुनाफा कमाने दिया जाए। परन्तु रूस और पुतिन का दुर्भाग्य तेल की कीमत 147 डालॅर से 40 डालॅर हो गई। अब रूसी अर्थव्यवस्था अपने डालॅर रिर्जव पर चल रही है। दिसंबर तक अगर यही हाल रहा तो रूसी अर्थव्यवस्था एक बार फिर 2001 से पहले की तरह खराब हो जाएगी।
इसकी तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत काफी ठीक है। पब्लिक सेक्टर यूनिट एवं बैंको की हालत काफी अच्छी है। चिदंबरम के कहने के बावजूद रिजर्व बैंक के भूतपूर्व गर्वनर जेनरल रेड्डी ने भारतीय बैंकों को अमेरिकी प्रभाव में नहीं आने दिया। नकेल कसे रखा। फलत: हमारे बैंक और हमारी अर्थव्यवस्था पर मंदी का तुलनात्मक रूप से बहुत कम असर हुआ है। NDA की सरकार होती और उसी तरह डिसइनवेस्टमेंट चलते रहता तो हम भी बर्बाद हो जाते। इसमें लेफ्ट फ्रंट की भी जाने-अनजाने बड़ी सकारात्मक भूमिका रही। इन लोगों ने UPA सरकार की नकेल कसे रखा।
तीसरा कारण हमारी अर्थव्यवस्था का स्वरूप है। हम लोग छोटे स्केल पर चीजों का उत्पादन करते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था मूलत: आंतरिक मांग के लिए उत्पादन करती है।
अब उच्चवर्ग और उच्च-मध्यवर्ग के घरों में और फार्म हाउसों में गोरी लड़कियाँ वेटर, मेड, कुक और आया का काम करने के लिए आने लगी हैं। पूर्वी यूरोप की लड़कियां शरीर व्यापार के व्यवसाय में करीब 10 वर्षों से आने लगी थी। अब पश्चिम यूरोप से भी नौकरी की तलाश में आने लगी हैं। यह ट्रेंड 5-10 वर्षों में और बढ़ेगा। यूरोप के ज्यादातर देशों में गरीबों की संख्या बढ़ रही है और जीविका का साधन घट रहा है । उपनिवेशवाद के दौर में गोरे लोगों के लिए नौकरियाँ और जीविका के लिए प्रचुर मात्रा में अवसर उपलब्ध हो गए थे। मध्यकाल में अवसर की कमी थी तो जनसंख्या भी कम था । जब यूरोप की हालत खराब होने लगी तो यूरोप ने अपनी लड़कियों को चड्डी पहनाकर पूरी दुनिया में दौड़ा दिया। यूरोप की लड़कियाँ साफ-सुथरी रहती हैं। फिर धनी वर्ग के भारतीयों के अहम् की भी तुष्टी होती है कि अपने भूतपूर्व शासकवर्ग की बेटियों से काम करवा रहे हैं।
21वीं शदी में भारत का लगातार उत्थान हो रहा है। खासकर आर्थिक एवं तकनीकी दृष्टि से लगातार उत्थान हो रहा है। लेकिन नैतिक रूप से पुराने स्थापित मूल्य टूट रहे हैं और नए मूल्यों का जन्म अभी तरल स्थिति में है। संक्रमण काल में भ्रष्टाचार बढ़ रहे हैं। दलाल, ऊँचें दर्जे की कॉल-गर्ल्स और धंधेबाज लोगों का सार्वजनिक जीवन में व्यावहारिक रूप से काफी महत्वपूर्ण भूमिका हो गई है। पश्चिमी समाज विज्ञान एवं अमेरिकी प्रबंधन तंत्र बदली हुई परिस्थिति में पश्चिमी सभ्यता के पतन के कारण बन रहे हैं। इसकी जड़ यूरोपीय आधुनिकता में शुरू से हीं छुपे थे, लेकिन उपनिवेशवाद की प्रक्रिया में उनके झूठ और ठगी पर आधारित, अन्याय पर आधारित व्यवस्था को उपनिवेशों के लूट की प्राण वायु का सहारा मिला हुआ था। जैसे हीं लूट का माल आना बंद हुआ यूरोप की हालत खराब होते चली गई। फिर अमेरिका का भी वही हश्र हुआ।
11. भगवान ने ये दुनिया किसी खास व्यक्ति को ध्यान में रखकर तो बनायी नहीं है। यह तो उनकी लीला का विस्तार है। फलस्वरूप ज्यादातर लोग, जिनको दुनिया समझ में आती है, वे इसको बदलने में या अपने अनुकूल बनाने में लग जाते हैं। जिनको बदलने की कूबत नहीं होती वे नशा का या धर्म के द्वारा अपने मन को दुनिया से मोड़ लेते हैं। अन्य लोग जो न नशा या धर्म का सहारा लेते हैं और न दुनिया बदलने का कूबत रखते हैं, वे मानसिक एवं भावनात्मक रोगों के शिकार हो जाते हैं। यह ब्राहमण एवं क्षत्रिय वर्ण का हाल है। जिनको दुनिया समझ में नहीं आती वे काम या अर्थ के पीछे भागते रहते हैं। ये शूद्र एवं वैश्य वर्ण के लोग हैं।
हर युग की एक ऐतिहासिक आत्मा (spirit) होती है। यह ऐतिहासिक आत्मा ईश्वर का ऐतिहासिक इच्छा (will) होती है। इसकी अभिव्यक्ति युग के महान व्यक्तियों एवं बड़ी घटनाओं में होती है। स्वार्थ के आधार पर आप ज्यादा लोगों को आंदोलित नहीं कर सकते। विचार या अवधारणा के आधार पर ही बड़े आंदोलन होते हैं। विश्व व्यापी मंदी ऐसी हीं एक बड़ी घटना है जो पूँजीवादी समाज की अंतर्धारा में एक प्रकार के ऐतिहासिक भूल-सुधार के रूप में आई है। इसने विकसित समाज में लोकप्रियता के मानदंड को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हर दौर में लोकप्रियता के मानदंड बदलते रहते हैं और आवाम की चाहत का केन्द्र भी बदलते रहता है। क्या खरीदने मात्र से किसी चीज का मालिकाना अधिकार मिल जाता है? बेचने वाला मात्र अपनी मजबूरी बेचता है। आत्मा और स्वतंत्र विचार बिकाऊ नहीं होते । अपार लोकप्रियता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती। कम प्रतिभा भी सामाजिक हालात के कारण भारी लोकप्रियता दिला सकती है। दूसरी ओर कुछ प्रतिभाशाली लोगों को दुनियादारी के अभाव में लगभग अनदेखा ही रहना पड़ता है। वर्तमान सामाजिक हालात में एक देश के रूप में भारत की प्रतिभा को विश्व व्यापी मंदी के बीच रचनात्मक बने रहने के लिए विश्व व्यापी लोकप्रियता दिलायी है ।
12. 15वीं शताब्दी में ऑक्सफोर्ड एवं कैंबिज बन गए थे। परन्तु उस वक्त वे ईसाई सेमिनरी थीं। कोपरनिकस, गैलेलियो और न्यूटन के बाद ही पश्चिम में विज्ञान का विकास हुआ। लियोनार्डो दा विंची ने एक बड़ा प्रस्ताव दिया था, जिस पर वैज्ञानिक सफलता 20वीं शताब्दी में मिला। केवल विचार से कुछ नहीं होता। एटम यानि अणु एवं परमाणु के बारे में बुद्ध और यूनान दोनों को जानकारी थी, लेकिन एटम को तोड़ने का तकनीक नहीं था। आधुनिक विश्व का पहला विश्वविद्यालय पोलैंड में 13वीं शताब्दी में बना था। स्पेन को छोड़कर सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी यूरोप के लिए पुनर्जागरण का काल है। लैटिन अमेरिकी धन के कारण स्पेन में आलस्य एवं शिथिलता आ गया था। विश्वात्मा, ऐतिहासिक मोड़ और विचारों के मेल से ही युगान्तकारी परिवर्तन होता है। भारत में औद्योगिक क्रांति और बाजारी कारोबार पक चुका है, पर भारत के लिए युगानुकुल गुरूकुल का विकास होना अभी बाकी है। भारत में धर्मसुधार आंदोलन चलाने के लिए माहौल बनने लगा है। इसमे पुरोहितों का प्रशिक्षण एवं मंदिर केन्द्रित सहकारी आंदोलन की भूमिका सर्वोच्च होगी। भारत विश्व ग्राम का नया सरताज बनने की दहलीज पर है।
