Home » भारतीय सिनेमा का लोकशास्त्र

भारतीय सिनेमा का लोकशास्त्र

by amitjnusociology@gmail.com
0 comments

(1) प्रस्तावना

भारतीय हिन्दी सिनेमा को समझने से पहले भारत को एक देश और काल के रूप में समझना आवश्यक है। लोक, शास्त्र, नृत्य, गीत, संगीत की परंपरा को समझना आवश्यक है। भारत एक अनूठा देश है, जहाँ पारंपरिक सभ्यता के उपकरण म्यूजियम में प्रदर्शन के लिए न होकर, सामान्य लोगों की आस्थाओं, मर्यादाओं और दैनिक आचार-व्यवहार में देखे जा सकते हैं। आज भी धार्मिक त्योहारों, पर्वों और अनुष्ठानों का ‘मिथकीय काल’ ऐतिहासिक समय द्वारा ग्रस नहीं लिया गया है। मनुष्य अपनी लौकिक व्यस्तताओं से उठकर कभी भी उसमें प्रवेश कर सकता है या जीवनपर्यन्त रह सकता है। इतिहास की समस्त उथल-पुथल के बावजूद भारत में एक निरंतरता है। भारत की तथाकथित विवेकहीन लेकिन लोकप्रिय फिल्में इसकी गवाह हैं। भारतीय फिल्मों की विशिष्टता को समझने के लिए हॉलीवुड के सिनेमा से इसकी तुलना करना आवश्यक है।

हॉलीवुड की फिल्मों ने अमेरिका को महाशक्ति बनाया। अमेरिकी सेना इस उपलब्धि को कायम रखे हुए है। अमेरिकी संस्थाएँ हॉलीवुड और पेंटागन नियंत्रित ”विश्व ग्राम” में स्वाभाविक मानवीय व्यवहार को अमेरिकी साँचे और ढाँचे में खपाने में लगी हुई हैं। केवल चीन, जापान और भारत ही इससे स्वतंत्र होने में लगे हुए हैं। सरकारों के स्तर पर तो अमेरिकी वर्चस्व के सामने प्रभावी प्रतिरोध की स्थिति नहीं है, लेकिन लोकचेतना के स्तर पर प्रतिरोध कायम है। इस प्रतिरोध को इन देशों के सिनेमा में देखा जा सकता है। खासकर भारत और चीन के सिनेमा में। ईरान के सिनेमा का 1980 के बाद से जो तेवर है, वह भी इसी सांस्कृतिक पहचान को कायम रखने का प्रयास है। हिन्दी सिनेमा में भारतीयता की पहचान या पड़ताल करते वक्त उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है। भारत के हजारों वर्षों से आज तक कायम वाचिक परंपरा को भारत के लोकप्रिय सिनेमा से और भारत के लोकप्रिय सिनेमा को इस देश की लोक परंपरा एवं लोक संस्कृति से 1913 से ही ताकत मिलती रही है। समकालीन तकनीक के रचनात्मक सदुपयोग से भारत में सिनेमा कुटीर उद्योग बन सकता है। इसके लिए आम युवक-युवती के मन से तकनीक एवं पूँजी का डर हटाना आवश्यक है। ‘चक दे इंडिया’, ‘भूल भुलैया’, ‘गुरू’, ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ या ‘लगान’ जैसी फिल्में कम बजट में कॉरपोरेट फंडिंग से, प्रशिक्षित टीम द्वारा कस्बों में बनानी होगी। फिल्म क्राफ्ट सिखाना होगा। भारतीय फिल्मकार और भारतीय दर्शक की क्षमता में अंतर हो सकता है। दर्शक और फिल्मकार दोनों दी हुई वस्तुओं में जो छिपा है, जो अन्तर्निहित है, उसे देखने की क्षमता रख सकता है परन्तु एक फिल्मकार उस ‘छिपे’ हुए को उजागर करने की दक्षता भी रखता है। दर्शक और फिल्मकार में मूलत: यही अंतर है। दर्शक में ईश्वर-तत्व अविकसित अवस्था में होता है। जबकि एक कलाकार के रूप में फिल्मकार में ईश्वर-तत्व विकसित अवस्था में होता है। सृजन करने की क्षमता को सनातन जीवन दर्शन में ‘ईश्वर-तत्व’ कहते हैं। एक कलाकार कवि, मूर्तिकार, पेंटर, संगीतकार, फिल्मकार के रूप में सृजन या पुनर्सृजन करता है। वह कवि के रूप में शब्दों को इस तरह पुनर्नियोजित करता है कि भाषा के भीतर से रस का सोता निकाल सके जैसे एक मूर्तिकार पत्थर के भीतर छिपी मूर्ति को उत्कीर्णित कर लेता है या जैसे एक संगीतज्ञ आवाजों के बवण्डर के बीच ‘सुरों की संगति’ निकाल लेता है। वह यथार्थ के भीतर ‘पूर्ण’ होने के लिए तड़पन की ‘पुकार’ सुन लेता है। यथार्थ जिस तरह मनुष्य द्वारा रूपान्तरित होकर अपना ‘सत्य’ उपलब्ध कर लेता है, उसी तरह वह मनुष्य को ‘कलाकार’ में रूपान्तरित करके उसे अपने जीव का ‘सम्पूर्णत्व’ पाने में योगदान करता है।

कला के इन वृत्तांतों को समझने के लिए भारत और पश्चिम में काल एवं इतिवृत्त के बारे में जो गुणात्मक अंतर है उसको समझना आवश्यक है। भारत में तकरीबन सभी ऐतिहासिक उपन्यास एवं फिल्में पश्चिमी इतिहास लेखन के मानदंडों पर खरा नहीं उतरतीं। सबमें मिथकीय तत्व एवं पुरा आख्यान की परंपरा शुष्क इतिहास पर हावी रहती हैं। वास्तव में पश्चिमी इतिहास लेखन में भी इतिहासकारों के पूर्वाग्रह, व्यक्तिगत निष्ठाएँ एवं वैचारिक रुझान सच को जस का तस प्रस्तुत नहीं करते। इमैनुएल कांट के बाद तो यह बात स्वीकारी भी जाने लगी कि उनका इतिहास, दर्शन एवं समाज विज्ञान सत्य या ‘यथार्थ जैसा वास्तव में है’ को न अभिव्यक्त कर सकता है, न इसका अध्ययन कर सकता है (परन्तु फिर भी, पश्चिमी और गैर पश्चिमी इतिहास आधारित विमर्श के कलारूप में मूल अंतर है) पश्चिमी इतिहास केन्द्रित विमर्श या कला रूप के केन्द्र में काल बोध का एक-रेखीय, सीमित, यांत्रिक अवधारणा है जिसे पश्चिमी ईसाइयत द्वारा कृत्रिम मानदंडों पर स्थापित लेकिन आधुनिक व्यवस्थाओं के लिए सुविधाजनक माने जाने वाले ग्रेगोरियन कैलेंडर और स्वचालित यांत्रिक घड़ियों द्वारा नियंत्रित एवं संचालित किया जाता है। इसके विपरीत, गैर पश्चिमी विमर्श या कला रूप के केन्द्र में कालबोध का चक्रीय स्वरूप है। यह सनातन, स्वयंभू महाकाल का अंश है जिसमें संसार चक्र चलता है, कर्म का सिद्धांत सर्वोपरि बन जाता है और चौरासी लाख योनियों के बीच जन्म-मृत्यु-पुनर्जन्म का चक्र अनवरत चलता रहता है। जब तक जीव मोक्ष, कैवल्य या निर्वाण प्राप्त कर महाकाल में लीन नहीं हो जाता यह चक्र चलता रहता है। कला का संबंध एक ओर उपर्युक्त काल से है, दूसरी ओर इसका संबंध पंचांगों में वर्णित चंद्रमा की कलाओं तथा ऋतु चक्र परिवर्तन की चक्रीय गति से भी है।

भारतीय दृष्टि में फिल्म भी एक कला है। हर कला पारंपरिक ही होती है। आधुनिक कला की भी परंपरा है। आधुनिकता की भी परंपरा है। ठीक उसी तरह भारत में फिल्म निर्माण की भी एक परंपरा है। भारतीय सिनेमा में मनुष्य के दायित्वों के निर्वाह में ही उसकी स्वतंत्र चेतना का आविर्भाव होता है। सृष्टि के प्रति दायित्व, प्रकृति के प्रति दायित्व, चर-अचर के प्रति दायित्व, दायित्वों की देशभूमि में कला की सृजन शक्ति वास करती है। इसके विपरीत ‘आधुनिक पश्चिमी सिनेमा’ में मनुष्य के अधिकारों पर जोर दिया जाता है। परन्तु इन अधिकारों का उपयोग वह कैसे करे इसकी नैतिक चेतना का स्वाभाविक विकास आधुनिक मनुष्य के लिए एक प्रश्न और समस्या बना रहता है। भाषाओं का विकास आधुनिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में अक्षम हो जाता हैं। इसी त्रासदी में कांट का दर्शन, ‘फेनोमेनोलॉजी,’ जन्म लेता है। आधुनिक मनुष्य के पास कहने के लिए अद्भुत बातें हैं; कष्ट, वंचना, खुशी के अनुभवों का कोष है, परंतु आधुनिक दर्शन एवं संस्कृतियों के पास समर्थ भाषा, तकनीक एवं व्याकरण नहीं है कि वे इन गहरी भावनाओं, अनुभूतियों एवं सत्यांशो को अभिव्यक्त कर सकें।

(2) भारतीय फिल्मों की पारिभाषिक विशेषता एवं आधारभूत श्रेणियाँ :

भारतीय फिल्मों में चार तरह के फिल्मकार हैं। भारत के अधिकांश फिल्मकारों की विभिन्न फिल्मों में शिल्प, प्रस्तुति, जेनर एवं कथांकन के स्तर पर बहुत विभिन्नता रही है। फिल्मों के बारे में उनके दर्शन, दृष्टिकोण एवं मानदंड (कैनन) उनके व्यक्तिगत अनुभव एवं अनुभूतियों के कारण बनते-बिगड़ते रहे हैं। फलस्वरूप एक ही फिल्मकार को एक श्रेणी में रूढ़ करना अन्याय होगा। फिर भी अध्ययन की सुविधा के लिए हम एक काम चलाऊ वर्गीकरण कर सकते हैं –

(क) इस श्रेणी में वे फिल्मकार आएँगे जिनके लिए फिल्म निर्माण एक प्रकार का व्यवसाय है और फिल्में मनोरंजन के साधन के रूप में टिकट खिड़की पर उपलब्ध उत्पाद हैं। इस श्रेणी को स्थापित करने में बांबे टॉकिज की देविका रानी और शशधर मुखर्जी का नाम अग्रणी है। हिमांशु राय और फ्रेंज ऑस्टेन के सिनेमा में एक मिशन था। देविका रानी और शशधर मुखर्जी ने चंदुलाल शाह (रणजीत मार्का) और जे.बी.वाडिया, होमी वाडिया के ”विवेकहीन मनोरंजन” के सफल व्यावसायिक चकाचौंध से प्रभावित होकर बॉम्बे टॉकिज का रूपांतरण कर दिया। इसके उस्तादों में ज्ञान मुखर्जी, सुबोध मुखर्जी, नासिर हुसैन तो आयेंगे ही, वे लोग भी आयेंगे जिनके लिए सिनेमा मूलत: मनोरंजन का साधन या ”शो बिजनेस” है और कहीं न कहीं वे खुद को ”शो मैन” या ”शो वुमन” मानते हैं। अकादमिक समीक्षा में इस तरह की फिल्मों को ‘माइंडलेस (विवेकहीन) सिनेमा’ कहा जाता है। इस तरह के फिल्मकार अपने अपने स्तर पर सिनेमा को एक तरह के ‘स्पेकटकल’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं। फिल्म के अनाड़ी समीक्षकों ने मनमानी करके इस श्रेणी के एकाध लोगों को महान ‘शो मैन’ कह दिया (जैसे राजकपूर, सुभाष घई एवं संजय लीला भंसाली को ‘शो मैन’ कहने का मूर्खतापूर्ण चलन करीब-करीब एक खास वर्ग में रूढ़ हो चला है) या कुछ फिल्मों को महान स्पेक्टकल कह दिया (जैसे ‘मुगले आजम’, ‘संगम’, ‘शोले’, ‘मिस्टर इंडिया’, ‘रामलखन’, ‘कृष’ या ‘ओम शांति ओम’ को) लेकिन इस श्रेणी के अधिकांश फिल्मकारों को हिकारत के भाव से ‘माइंडलेस सिनेमा’ कह कर उपेक्षित किया गया। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि इनकी फिल्में फिल्म समीक्षा के पश्चिमी मानदंड पर खरा नहीं उतरतीं और समीक्षकों की नजर में इनकी फिल्में देखने और इनसे आनंद उठाने वाले दर्शक अंग्रेजी राज और भारतीय मध्यवर्ग के अंग्रेजीदां वर्ग के अथक प्रयास के बाद भी ”सभ्य” ”विवेक-संपन्न” एवं परिष्कृत पश्चिमी कला मानदंडों के कायल नहीं हो पाये। परंतु सच तो यही है कि भारत का यह तथाकथित माइंडलेस (विवेकहीन) परंतु अपार लोकप्रिय सिनेमा निर्माता की दृष्टि से व्यवसाय होने के बावजूद-व्यावसायिक समझौतों के बावजूद-व्यवसायियों द्वारा नहीं बनाया जाता बल्कि कलाकारों और साधकों द्वारा ही लिखा, निर्देशित, संगीतबद्ध एवं अभिनीत होता है। सामान्यत: यह पश्चिमी नाटय परंपरा के मानदंडों पर आधारित नहीं होता, बल्कि सचेत या अचेत रूप से पश्चिमी नाटय परंपरा के मानदंड और पश्चिमी सिनेमा आंदोलनों की उपेक्षा करता है या हँसी उड़ाता है। इसका बहुत ठोस समाजशास्त्रीय कारण है- ‘भारत का लोकप्रिय सिनेमा अंग्रेजी राज के विरूध्द जारी स्वाधीनता आंदोलन के वैकल्पिक संस्कृति विमर्श का अंग रहा है।’ भारतीय सिनेमा के इस पक्ष को अज्ञानी समीक्षक अपनी ‘सांस्कृतिक निरक्षरता’ के कारण समझ नहीं पाते। फलस्वरूप वे जे.बी.वाडिया, होमी वाडिया, चंदुलाल शाह, शशधर मुखर्जी, बाबू भाई मिस्त्री, नंदलाल जसवंतलाल, विजय भट्ट, एम. सादिक, एस. यू. सन्नी, मनमोहन देसाई, शक्ति सामंत, राज खोसला, मनोज कुमार, प्रकाश मेहरा, यश चोपड़ा, राकेश रोशन, डेविड धवन, महेश भट्ट, प्रियदर्शन, रामगोपाल वर्मा, आदित्य चोपड़ा, सूरज बड़जात्या, राजकुमार संतोषी, अब्बास मस्तान, विपुल शाह, मिलन लुथरिया, और राजकुमार हिरानी को के. आसिफ, राजकपूर, रमेश सिप्पी और सुभाष घई की तरह शो मैन नहीं कह पाते। सत्य यही है कि राजकपूर की केवल बाद की फिल्में (बॉबी के समय से निर्देशित फिल्में, संगम के अपवाद को छोड़कर) ही उन्हें शो मैन की श्रेणी में लाती हैं। वर्ना वे तीसरी श्रेणी के मध्यमार्गी फिल्मकार हैं। यही बात के. आसिफ, रमेश सिप्पी और सुभाष घई पर भी लागू होती है। के. आसिफ ने केवल मुगले आजम नहीं बनायी थी। रमेश सिप्पी ने केवल शोले नहीं बनायी है। सुभाष घई ने केवल रामलखन नहीं बनायी है। इनकी सभी फिल्मों को ध्यान में रखकर बात करने पर पश्चिमी फिल्म समीक्षा का फ्रेमवर्क गड़बड़ाने लगता है।

(ख) दूसरी श्रेणी में वे भारतीय फिल्मकार आते हैं, जिन्होंने सचेत रूप से भारतीय सिनेमा के कैनन (मानदंड) बनाये हैं या तोड़े हैं। इन्होंने भारतीय सिनेमा को सामाजिक परिवर्तन, समाज सुधार या आंदोलन का प्रभावी एवं सचेत माध्यम बनाया है। लेकिन इन लोगों ने अपने दर्शकों से तथा इस देश की परंपरा एवं स्थिति से भी संवाद बनाये रखा है। स्वामी विवेकानंद, बालगंगाधर तिलक, महर्षि दयानंद, सर सैयद अहमद खाँ, महात्मा गांधी, रबीन्द्र नाथ टैगोर से लेकर मध्यकालीन-समकालीन कवि, शायर, साधक, साहित्यकार आदि से किसी-न-किसी रूप में प्रेरित रहे हैं। स्वाधीनता संग्राम से प्रभावित रहे हैं एवं इन लोगों ने ‘इस देश की परंपरा’ और ‘सिनेमा के विदेशी तकनीक’ के बीच एक प्रकार का समन्वय बनाने की कोशिश किया है। और इस कोशिश में उन्हें सफलता भी मिली है। लोक में वे प्रिय एवं स्थापित भी हुए हैं। इनमें बाबू राव पेंटर, भालजी पेंढारकर, पी. सी. बरुआ, आगा हस्र काश्मीरी, देवकी बोस, ए. आर. कारदार, सोहराब मोदी, जयंत देसाई, केदार शर्मा, अमिय चक्रवर्ती, फणी मजूमदार, चेतन आनंद, एस. एस. वासन, के. ए. अब्बास, नितिन बोस, भगवान, एस. एस. रवैल, रमेश सैगल, जिया सरहदी, मुखराम शर्मा, महेश कौल, कमाल अमरोही, नवेन्द्र घोष, ऋत्विक घटक, राजेन्द्र सिंह बेदी, किशोर साहु, राही मासूम रजा, इन्दर राज आनंद, कुमार शाहनी, मणि कौल, सलीम जावेद, एस रामानाथन, मणिरत्नम, केतन मेहता, संजय लीला भंसाली, आशुतोष गोवरिकर, चंद्र प्रकाश द्विवेदी, विनय शुक्ला, अनुराग कश्यप, जैसे फिल्मकार-लेखक आएँगे। इस श्रेणी में वह हर महत्वपूर्ण फिल्मकार आएगा जो सिनेमा को अवधारणात्मक स्तर पर प्रतीकात्मक शक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम मानता है और सिनेमा के माध्यम से सामाजिक हस्तक्षेप करना चाहता है।
(ग) तीसरी श्रेणी में वे भारतीय फिल्मकार आते हैं जिन्हें मध्यमार्गी या ‘मिडल ऑफ द रोड’ सिनेमा का प्रवक्ता कह सकते हैं। इसमें शांताराम, मेहबूब खान, राजकपूर, बिमल रॉय, सत्यजित रे, बी. आर. चोपड़ा, गुरुदत्त, विजय आनंद, ऋषिकेश मुखर्जी, लेख टंडन, एल. वी. प्रसाद, सत्येन बोस, गुलजार, तपन सिन्हा, श्याम बेनेगल, बासु चटर्जी, अरूण कौल, सई परांजपे, राजश्री प्रोडक्शंस, प्रसाद प्रोडक्शंस, जेमिनी, ए. वी. एम की ज्यादातर फिल्में आयेंगी। इसमें मनोज कुमार, दुलाल गुहा, एम. एस. सथ्यु, के. विश्वनाथ, मुजफ्फरअली, सागर सरहदी, शेखर कपूर, सूरज बड़जात्या, प्रकाश झा, राजकुमार हीरानी, आदि की भी चर्चा की जा सकती है। इनकी फिल्मों में लोक और शास्त्र का फैशनेबुल कॉकटेल होता है। उपर्युक्त तीनों तरह के फिल्मकार भारतीय हैं लेकिन इनकी फिल्मों में भारत की अलग-अगर तस्वीर है। इनमें अलग-अलग तरह की ”भारतीयता” है। भारतीयता कोई ठोस, एकहरी विचारधारा न होकर एक दृष्टि कोण है जो विविध रूप-रंग एवं मिजाज में व्यक्त होती रही है। अपनी इसी जीवन्त भारतीयता के कारण ये फिल्मकार लोक में प्रिय एवं स्थापित होते रहे हैं।

(घ) एक चौथा वर्ग उन फिल्मकारों का है जिनको समानांतर सिनेमा या नया सिनेमा आंदोलन से जोड़ा जाता है। जन्म से तो ये लोग भी भारतीय फिल्मकार हैं लेकिन इनमें से अधिकांश लोग पश्चिम के सिनेमावादी आंदोलन से प्रेरित रहे हैं और भारतीय कहलाने में सामान्यत: शर्म महसूस करते हैं। ये अपने को पारंपरिक फिल्मकार नहीं मानते। इनकी नजर में ये मौलिक फिल्मकार हैं। सामान्यत: इनकी फिल्में जनता की समझ में नहीं आतीं टीमवर्क के कारण अपवाद स्वरूप इनकी एकाध फिल्में लोकप्रिय भी हो जाती हैं लेकिन अपने साक्षात्कारों में ये लोग अपनी इन लोकप्रिय फिल्मों पर गर्व नहीं करते बल्कि अपनी असफल फिल्मों पर गर्व करके दर्शकों को कोसते रहते हैं। जनता इनकी फिल्मों में अपनापन नहीं पाती। लेकिन मीडिया के एक खास वर्ग में इनको बहुत तरजीह दी जाती है। इनको महान फिल्मकार माना जाता है। पश्चिम में भी इनको अपना आदमी माना जाता है। दूसरी ओर भारतीयता में रसी-पगी फिल्मों को मीडिया का उतना सहयोग नहीं मिलता।

(3) भारतीय सिनेमा एवं मीडिया समीक्षा-कुल मिलाकर भारतीय सिनेमा और प्रिंट मीडिया का प्रारंभ से ही असहज संबंध रहा है। प्रिंट टेक्नोलॉजी को भारत के मूलत: वाचिक समाज में वह महत्व कभी नहीं मिला जो सिनेमा, टेलीफोन या टेडियो, टी.वी. आदि को मिला। फलस्वरूप अंग्रेजी भाषी मीडिया समीक्षकों ने भारतीय सिनेमा के साथ हमेशा असंतुलित व्यवहार किया है। उदाहरण के लिए राजश्री वालों की ‘विवाह’ (2006) को मीडिया का सहयोग नही मिला। इस फिल्म को धूमधाम से प्रचारित करके रिलीज भी नहीं किया गया। फिल्म की शुरूआत बहुत अच्छी नहीं रही। परंतु धीरे-धीरे यह फिल्म लोक में प्रिय एवं स्थापित होती गई। इस फिल्म की सफलता ने साबित किया कि मीडिया की चुप्पी और असहयोग के बावजूद घटनायें घटती हैं और लोक जीवन में उन घटनाओं का महत्व स्वीकारा जाता है। मध्यवर्ग की यह मान्यता पूरी तरह सही नही है कि आजकल अधिकतर महत्त्वपूर्ण घटनायें मीडिया के लिए घटती हैं और मीडिया में घटती हैं। सच तो यही है कि मीडिया के बाहर बहुत बड़ी दुनिया है जहाँ अपनी अक्षमता के कारण मीडिया अब तक नहीं पहुँच पायी है। यदि ओम शांति ओम (2007) जैसी मीडिया हाइप भारतीय सिनेमा की एक प्रवृति है तो विवाह (2006) एवं चक दे इंडिया (2007) दूसरी ज्यादा स्वभाविक प्रवृति है।

भारतीय मान्यता है कि असली घटनायें ब्रह्मांड में घटती हैं। ब्रह्मांड में घटने वाली घटना गुमनाम मनुष्य के संकल्प से भी घट सकती है। वह एक साधारण बिना मां-बाप की लड़की और उसके सामान्य चाचा के बीच पाये जाने वाले सामान्य पारिवारिक संबंध की पवित्रता की असाधारण शक्ति के कारण सगाई जैसे साधारण रस्म एवं विवाह जैसे सामान्य संस्कार या गृहपूजा जैसे साधारण अनुष्ठान के माध्यम से भी घट सकती है और दादा साहब फालके जैसे साधारण आदमी की सामान्य इच्छा-शक्ति के कारण भी घट सकती है। औसत दर्जे की फिल्मों को मीडिया अपनी खबर में मार या जिला सकती है लेकिन मीडिया के बावजूद उत्कृष्ट फिल्मों, रचनाओं को अंतत: अपना उचित स्थान मिल ही जाता है। हर रचनाकार को, हर साधक को साधना, रियाज या रिहर्सल या जप-तप की एक सीमा पार करनी पड़ती है। एक अनुकूलतम सीमा (ऑपटिमम लेवेल) या एक दहलीज (थ्रेसहोल्ड लेवेल) तक जनसंचार के साधन (मीडिया), पूँजी एवं तकनीक (टेकनोलॉजी) के सहयोग और असहयोग से फर्क पड़ता है। लेकिन सीमा पार कर लेने के बाद चेतना (आइडिया) का लोक एवं प्रकृति से अपरोक्ष संबंध (तादात्म्य) स्थापित होने लगता है। फैन क्लब, सम्प्रदाय, आंदोलन बनने की प्रक्रिया शुरू होती है। मीडिया ‘आइडिया’ (चेतना) के पीछे नहीं इवेन्ट (घटना) के पीछे भागती है। भारत के लोग इस सामाजिक यथार्थ को तत्व समझते हैं। त्योहार भी एक इवेन्ट (घटना) ही है। यह मत भूलें कि त्योहार में बड़ी मेहनत, उत्साह और खर्च करके मूर्ति बनायी जाती है। फिर उस मूर्ति की पूजा कर त्योहार मनाया जाता है। लेकिन त्योहार मनाने के अंतिम क्रम में भारतीय संस्कृति की पारिभाषित विशेषता प्रस्तुत् होती है। जितने उत्साह से मूर्ति बनाकर पूजी जाती है उतने ही उत्साह से विसर्जित (नदी में डुबाना) कर दी जाती है। इसका निहितार्थ यही है कि त्योहार केवल घटना भर नहीं है मूलत: चेतना ही है। भारतीय दर्शक इसे समझता है। अंग्रेजीदां समीक्षक नही समझता।

फिल्म विवाह के समकालीन टेक्स्ट (पाठ) से आप पीछे जाएँ तो ‘नया दौर’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘मदर इंडिया’, ‘सीमा’, ‘झनक झनक पायल बाजे’, ‘तीसरी कसम’, ‘जागते रहो’, ‘गाइड’, ‘उपकार’, ‘परख’, ‘दीक्षा’, ‘अनोखी रात’, ‘आराधना’, ‘आनंद’, ‘सुर संगम’, ‘अभिमान’, ‘गोदान’, ‘शोले’, ‘आंधी’, ‘मिर्च मसाला’, ‘मैंने प्यार किया’, ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘गॉड मदर’, ‘ताल’, ‘देवदास’ जैसी फिल्मों पर ध्यान जाता है। इन फिल्मों के खलपात्र के चरित्र या चरित्र-चित्रण में सेमेटिक या मार्क्सवादी कैनन (मूल स्थापनाओं) की स्थापना हो सकती है लेकिन इनके सामान्य पात्र या इनमें वर्णित सामान्य घटनाओं में सनातनी सत्य की स्थापना देखी जा सकती है। मार्क्सवादियों ने गोदान और दीक्षा या निशांत या मदर इंडिया जैसी फिल्मों से यश चोपड़ा की दीवार की तुलना की है। इनमें कुछ समानतायें तलाशी जा सकती हैं। इसके बावजूद इन फिल्मों के लेखन या निर्माण का उद्देश्य अलग-अलग है। दीवार एक व्यावसायिक-फार्मूला फिल्म है, जिसके कुछ तत्व मदर इंडिया और कुछ तत्व गंगा जमुना से लिए गए हैं लेकिन असली कहानी मुंबई के स्मगलर हाजीमस्तान के जीवन से प्रेरित है। कहानी में स्मगलरों की दृष्टि का सहानुभूति पूर्वक चित्रण है। पटकथा की चुस्ती और निर्देशकीय कौशल से इस फीचर फिल्म में विज्ञापन फिल्मों की गुणवत्ता शामिल कर ली गई है। स्मगलरों की गौरवगाथा का विज्ञापन करती यह फिल्म शिल्प के आधार पर और दक्षता के पैमाने पर कुछ सिरफिरे समीक्षकों को कालजयी फिल्म भी दिखती है। लेकिन यह मत भूलिए कि इसको स्थापित करने में बहुत पैसा लगा है। बहुत मेहनत की गई है। बहुत मस्तिष्क लगा है। इसके बावजूद यह उसी वर्ष प्रदर्शित शोले का दर्जा हासिल नहीं कर पाई और न ही ‘जय संतोषी माँ’ का। ‘दीवार’ के हाइप की तुलना (2007) की फिल्म ‘ओम शांति ओम’ के हाइप से की जा सकती है जबकि ‘जय संतोषी माँ’ की सफलता की तुलना ‘चक दे इंडिया’ (2007) या ‘विवाह’ (2006) से की जा सकती है। 110 करोड़ के देश में इतनी विविधता है कि देवआनंद के कलात्मक जुनून देखने के लिए छोटे शहरों के सिनेमा घरों में आज भी कुछ लोग पहुँच जाते हैं और रामसे ब्रदर्स की डरावनी हास्य फिल्मों को भी कुछ दर्शक मिल जाते हैं। महेश भट्ट और आदित्य चोपड़ा की फिल्में जिस तरह थोक के भाव से एक खास वर्ग के दर्शकों में लगातार सराही जाती हैं उसी तरह 1970 के दशक में अमिताभ बच्चन की फिल्में सराही जाती थीं। इनकी लोकप्रियता नापने का कोई वस्तु-निष्ठ पैमाना तो अब तक विकसित नहीं हुआ है। जिस तरह ‘निशांत’ में जमींदार है और ‘मदर इंडिया’ में साहुकार उसी तरह भारतीय सिनेमा में समीक्षक-आलोचक हैं। सभी मनमानी करते हैं। भारत में आलोचकीय धर्म, अकादमिक न्याय और संस्थाबद्ध समीक्षा का अभाव है। अपनी सुविधा से समीक्षक मिथक गढ़ देते हैं। समीक्षकों या मीडिया की संरचना में पारदर्शिता, जनतंत्र और बहुसांस्कृतिक रुझान का अभाव है। अंग्रेजीराज ने राजनीतिक अर्थशास्त्र के क्षेत्र में जितना अहित किया उससे कहीं ज्यादा साहित्य, सिनेमा, कला, संस्कृति और धर्म के क्षेत्र में अहित किया है। अंग्रेजीराज ने भारतीयों के बीच साहुकारों, जमींदारों, मठाधीशों, समीक्षकों, विद्वानों की एक नई जमात पैदा कर दी जो भारतीय होते हुए भी भारतीय लोगों से नफरत करते थे, भारतीय संस्कृति धर्म, कला, नीति, नैतिकता के विरूध्द काम करते थे लेकिन अंग्रेजीराज के हिमायती होने के कारण समाज पर गुंडागर्दी करके आम जनता को रौंदते रहते थे। 1947 के बाद भी राज्य और विश्वविद्यालय द्वारा पोषित संस्थाएँ आम जनता को ही दोषी मानती रही हैं, लेकिन भारतीय सिनेमा ने जनता को नायकत्व दिया और शासन तथा समाज पर काबिज अंग्रेजीराज के हित-चिंतन से उपजे काले अंग्रेजों की जमात को खलनायक बनाया। इसकी शुरुआत कम से कम हिन्दी में प्रेमचंद, प्रसाद और निराला की रचनाओं में हुआ। 1936 के बाद हिन्दी साहित्य का यह मूल स्वर हिन्दी सिनेमा में अभिव्यक्त हुआ। 1936 तक हिन्दी मूलत: स्थानीय लोकभाषा थी। हिन्दी को राष्ट्रभाषा हिन्दी सिनेमा ने बनाया जब गुजराती-भाषी मेहबूब, मराठी-भाषी शांताराम, बंगाली-भाषी बिमल रॉय, पंजाबी-भाषी चेतन आनंद, राजकपूर और बलदेवराज चोपड़ा जैसे लोगों ने एक सचेत निर्णय किया कि वे अपनी मातृभाषाओं में नहीं हिन्दी में अपनी फिल्म बनायेंगे, वह भी मुंबई जैसे मराठी क्षेत्र से, तो हिन्दी को व्यापक- राष्ट्रीय-फलक मिला। 

भारत में सिनेमा हॉल की स्थिति धीरे धीरे (1913 से लेकर आजतक) हिन्दू मंदिरों के समतुल्य हो गई है। मंदिर और सिनेमाघर ठेठ भारतीय ”पब्लिक स्फियर” या सार्वजनिक स्थान हैं जहाँ लोगों की भीड़ लगी रहती है। मंदिर या सिनेमा हॉल के प्रवेश और निकास द्वार सामान्यत: एक ही होते हैं, खासकर एकल ठठिया सिनेमा गृहों के। मंदिर और सिनेमागृह के प्रवेश एवं निकास द्वार पर भीड़ देखी जा सकती है। अंदर पहुँचने की आपाधापी, टिकट खिड़की की लंबी कतार के साथ-साथ मार-पीट या ब्लैक टिकट की खरीद-फरोख्त देखी जा सकती है। कुछ मंदिरों में सिनेमा हॉल की तरह भगवान के दर्शन के लिए श्रेणीबद्ध टिकट रेट (दर) है। अत: सिनेमा का समाजशास्त्र धर्म के समाजशास्त्र से काफी कुछ सीख सकता है। भारतीय तत्वविज्ञान के अनुसार मंदिर (सिनेमागृह) विशेष परिस्थिति एवं प्रभाव उत्पन्न करता है जिसमें भगवान की लीला (संसार) का प्रतीकात्मक या लाक्षणिक वर्णन या चित्रण सुनने या देखने का अवसर मिलता है। परिस्थितियाँ नियति एवं नियंता (निर्देशक-लेखक) के हाथ में होती हैं लेकिन उन परिस्थितियों में हर व्यक्ति एक समान व्यवहार नहीं करता। उन परिस्थितियों का हर व्यक्ति एक समान अर्थ नहीं लगाता। हर व्यक्ति अपने स्वभाव, स्वधर्म, पृष्ठभूमि, प्रशिक्षण और इच्छा-आकांक्षा के आधार पर अर्थ लगाता है। भीड़ में भी वस्तुत: हर व्यक्ति अकेला होता है, खासकर मंदिर के अंदर या सिनेमागृह के अंदर की भीड़ में।

सिनेमागृह में फिल्म शुरू होने से पहले अंधेरा कर दिया जाता है। पश्चिम के धर्म स्थानों एवं पूर्व के भी अभारतीय धर्म स्थानों में पूजा-पाठ, प्रार्थना या अन्य कर्मकांड प्रकाश में किए जाते हैं। अत: सिनेमागृह का अंधेरा और पूजा स्थल के उजाले में एक प्रकार का प्रतिकूल संबंध माना जाता रहा है। फिल्मों के विमर्श और संस्कृति एवं धार्मिक विमर्श एवं कर्मकांड के बीच भारत के बाहर एक प्रकार का असहज संबंध रहा है। दूसरी ओर पश्चिम में विकसित सिनेमा का तकनीक एवं अंधेरे में फिल्म देखने की संस्कृति का भारतीय धर्मोपासना से 1913 से ही सहज संबंध विकसित हो गया। यह अप्रासंगिक नहीं है कि भारत की प्रथम फीचर फिल्म राजा हरिश्चन्द्र है और हॉलीवुड की प्रथम फिल्म दि ग्रेट ऐन रॉबरी। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि भारत के पारंपरिक हिन्दू मंदिरों के गर्भगृह में अंधेरा होता है। हिन्दू शास्त्रकारों के अनुसार गर्भगृह में इसीलिए अंधेरा होता है ताकि श्रद्धालु के भीतर आत्मप्रकाश जल सके। माँ के गर्भ की तरह या कब्र या चिता के समान गर्भगृह में जाने (बीज रूप या पिता रूप में जाने) और आने (संतान के रूप में आने) का रास्ता एक ही होता है। संसार की पहली फीचर फिल्म को फ्रांस के लोगों ने ”इंडिया सैलून” नामक पेरिस के एक होटल के हॉल में देखा था। जिस तरह कृष्ण का जन्म कृष्ण जन्माष्टमी की कालीरात में कारागृह के अंधेरे में हुआ था, देवकी की कोख से हुआ था लेकिन वे पले- बढ़े- खेले जसोदा की गोद में ठीक उसी तरह सिनेमा जन्मा तो फ्रांस जैसे पश्चिमी यूरोपीय देशों में हुआ, लेकिन पला बढ़ा अमेरिका (हॉलीवुड), चीन, जापान और भारत में।
धीरे-धीरे हॉलीवुड की फिल्मों ने यूरोपीय फिल्म निर्माण को बेहतर तकनीक, बेहतर शिल्प एवं मिशनरी भावना से यूरोपीय दर्शकों एवं यूरोपीय सिनेमाघरों के लिए अप्रासंगिक एवं अनाकर्षक बना दिया। कुछ यूरोपीय समीक्षकों के अनुसार हॉलीवुड की फिल्में अमेरिका में बसे यहुदियों का यूरोपीय ईसाइयत के खिलाफ शुरू किया गया सांस्कृतिक जेहाद है। दूसरी ओर भारत के आम दर्शकों को सिनेमा हॉल का अंधेरा मंदिरों के गर्भगृह की स्मृति देता है। फिल्म की कथानक (नैरेटिव) में रामायण, महाभारत, श्रीमद् भागवत या जातक कथाओं के तत्व होते हैं। भारतीय पूजा पध्दति की तरह हमारी फिल्मों में भी अक्सर गीत-संगीत का तत्व होता है। हर नायक में कृष्ण् और हर नायिका राधा या गोपी होती है। हर विरहिनी मीरा या गोपियों के गीत गाती है। भारतीय सिनेमा पारंपरिक लोकजीवन का ही विस्तार है। यह जानबूझ कर व्यवस्थित तरीके से या योजनाबध्द तरीके से नहीं किया गया। यह अपने आप हुआ है, अवचेतन के स्तर पर हुआ है। इसके विपरीत देश के विश्वविद्यालयों या अंग्रेजी मीडिया को सत्ता-प्रतिष्ठान से, अंग्रेजी- राज के दौरान से ही, व्यवस्थित साधन, साधक, निर्देश, मार्गदर्शन एवं संपोषण मिलता रहा है। अंग्रेजीराज के समय से लोक जीवन और लोकशास्त्रों को हिकारत के भाव से देखा जाता रहा है। लेकिन भारतीय सिनेमा ने लोकजीवन और लोकशास्त्रों से तादात्म्य स्थापित किया। भारतीय संस्कृति के लोकपक्ष के संरक्षण-संवर्धन में तथा लोक रीति के असंतुलित पक्षों की समीक्षा में भारतीय सिनेमा की भूमिका भारतीय राज्य और भारतीय विश्वविद्यालयों से ज्यादा रही है। भारतीय राज्य और भारतीय विश्वविद्यालय पश्चिमी शास्त्रों की ओर उन्मुख होकर अपना विमर्श और व्यापार चलाते रहे हैं जबकि भारतीय सिनेमा कुछेक अपवादों एवं अतिरेकों के बावजूद इस देश के लोक और शास्त्र से संवाद बनाकर अपना विमर्श एवं व्यापार चलाता रहा है। यही कारण है कि भारत में सिनेमा इतना लोकप्रिय और इतना सशक्त माध्यम है। लेकिन आज तक भारतीय विश्वविद्यालयों में सिनेमा को एक विषय एवं प्रभावी जनसंचार माध्यम के रूप में महत्व नहीं मिला। हमेशा इसे ”हेय मनोरंजन” का साधन मानकर, विश्वविद्यालय के बाहर की चीज मानकर अपने भरोसे जीने मरने के लिए छोड़ दिया गया। यह तो भारतीय सिनेमा की जीवंतता और आंतरिक ऊर्जा है जिसने खुद अपने अस्तित्व की रक्षा की है, अपना पालन-पोषण किया है। अपनी वैश्विक पहचान बनायी और उभरते हुए भारत की सबसे प्रमुख सांस्कृतिक पहचान बन गई है।

अत: भारतीय सिनेमा के स्वरूप और भारतीय दर्शकों से इसके रागात्मक संबंधों को समझना आवश्यक है। इस रागात्मक संबंध का एक इतिहास और समाजशास्त्र है। इसका एक सौन्दर्यशास्त्र और तत्व मीमांसा है। ”अंधेरे से प्रकाश” (तमसो मा ज्योर्तिगमय) वह सूत्र है जो इसको समझने में सहायक है। अधिकांश भारतीय दर्शकों को सिनेमा हॉल का अंधेरा और अंधेरे में प्रकाशित लीलात्मक कथानक का पारंपरिक मंदिर के गर्भगृह में देवमूर्ति और श्रद्धालु भक्त के रागात्मक – आध्यात्मिक संबंध से अवचेतन स्तर पर संबंध दिखता है। फिल्मी कथानक आध्यात्मिक लीला प्रसंग की अनुकृति है। उसकी स्मृति एवं अनुगूँज है। सिनेमागृह के अंधेरे में दर्शकों की भीड़ में भी हर दर्शक ‘फिल्म के पाठ’ से, फिल्म के कथानक से, कथानक के यथार्थ और संभावना यानि सत्य से एक अपरोक्ष संवाद बनाता है। हर अच्छी या कुमारस्वामी के शब्दों में कहें तो हर ”नार्मल” (सामान्य) फिल्म अंधेरे में एक परिस्थिति पैदा करती है कि व्यक्ति अपने ”प्रिय ब्रह्म” (आत्म ब्रह्म) का साक्षात्कार कर सके। सामान्यत: वह फिल्म लोकप्रिय (हिट) हो जाती है जिसमें आत्मसाक्षात्कार या आत्मानुभूति से उपजा एक सहज संवाद (वन लाइनर) भी होता है। इसे सूत्र वाक्य भी कह सकते हैं। यह ‘सूत्र वाक्य’ चिंगारी का काम करता है। मंत्र की तरह काम करता है। टी. वी. ऐंटिना की तरह काम करता है। वह हर दर्शक के भीतर सैंकड़ों ”चेन रियेक्सन” पैदा करता है। वह दर्शक (दर्शकों) को अपने युग से, युग-सत्य से, अपनी सुप्त संभावनाओं से, असीम संभावनाओं से साक्षात्कार कराता है। इसी अर्थ में भरतमुनि, अभिनवगुप्त, कुमारस्वामी जैसे लोग कला को ब्रह्म से आत्मा का संवाद मानते हैं। इसी अर्थ में कला ब्रह्म-सहोदर है। भारत में फिल्म भी सामान्यत: एक कला ही है। हिमांशुराय, शशधर मुखर्जी से लेकर आदित्य चोपडा, रामगोपाल वर्मा, महेशभट्ट आदि की कोशिशों के बाद भी भारत में फिल्म हॉलीवुड की तरह एक सांस्कृतिक उत्पाद भर नहीं बन पाया है। कम से कम दर्शकों ने इसे सांस्कृतिक उत्पाद के रूप में अभी तक नहीं स्वीकारा है। भारतीय दर्शक और अधिकांश स्वतंत्र फिल्मकार फिल्म को भारत में आज भी कला रूप ही मानते हैं और हर सफल फिल्म में आधुनिक तकनीक और पारंपरिक कला मूल्यों का समन्वय एवं तादात्म्य किसी न किसी रूप में स्थापित ‘किया जाता है’ या ‘हो जाता है’।

भारतीय दृष्टि में अंतत: अधिकांश फिल्मकार एक समकालीन ऋषि की तरह व्यवहार करता है। हर फिल्म एक प्रकार से उसकी साधना और सिद्धावस्था का प्रकटीकरण (मैनिफेस्टेशन) है। कोई भी ऋषि अपना सत्य दूसरों पर आरोपित नहीं करना चाहता। दूसरों के सत्य को स्वीकारने में उसे कोई दिक्कत नहीं होती। चूंकि सत्य तो अद्वैत होता है चाहे उस सत्य को कोई अपना बोल रहा हो या पराया। सत्यानुभूति में अद्वैत है। केवल असत्य में द्वैत है। द्वैत में विरह और वियोग है। इसलिए सत्यानुभूति के आग्रही दर्शक फिल्म के अंत में मिलन, अद्वैत, सत्यम् शिवम् सुन्दरम् देखना चाहते हैं। सत्य, न्याय, दैवीय शक्तियों की जीत देखना चाहते हैं। ट्रेजडी नहीं देखना चाहते। दुखांत फिल्में, त्रासदीदायक फिल्में, असत्य, अन्याय, असंतुलित फिल्में सामान्यत: इस देश में सफल नहीं होतीं। विदेश में बसे भारतीयों या पश्चिमपरस्त दर्शकों में लोकप्रिय हो सकती हैं लेकिन आम भारतीय ऐसी फिल्मों को नकार देते हैं।

पश्चिम में ट्रेजडी काफी लोकप्रिय रहा है। प्राचीन यूनान की परंपरा में, रोम की परंपरा में, शेक्सपियर के नाटकों में ट्रेजडी कला का श्रेष्ठरूप है। चाहे आप अरस्तु के सौन्दर्यशास्त्र को देखें या हीगेल का या फिर नीत्शे के सौन्दर्यशास्त्र को ही देख लें पश्चिमी मानस ट्रेजडी की उत्कृष्टता से अभिभूत है। इसी तरह फ्रांसीसी और इटालवी सिनेमा में यथार्थवाद या नवयथार्थवाद सिनेमा का सबसे प्रतिष्ठित रूप रहा है। लेकिन भारत में ऐसी फिल्मों को सामान्यत: बहुत उत्कृष्ट और सफल फिल्मों की श्रेणी में नहीं रखा जाता। पश्चिमी फैशन से प्रेरित ऐसी फिल्में समानांतर सिनेमा (1969 के आसपास शुरू हुए तथाकथित नया अथवा ”बौद्धिक एवं कलात्मक” सिनेमा) की श्रेणी में आती हैं। इन्हें भारत में सीमित दर्शक ही मिल पाया। ऐसे फिल्मकार दर्शकों की समझ को दोष देते हैं। दरअसल भारतीय परिवेश में ऐसी फिल्मों को दर्शक नही मिलने के पीछे ठोस समाजशास्त्रीय कारण रहे हैं। दरअसल फ्रांस और इटली में सिनेमा का संबंध आधुनिकता से है। यह परंपरा के साथ उस रूप में नहीं जुड़ा है, जिस रूप में भारत में जुड़ा है। यूरोप में पारंपरिक संस्थाएँ एवं पारंपरिक लोग अब बचे ही नहीं हैं। वहाँ परंपरा एक ‘नोस्टालजिया’ के रूप में या म्यूजियम में प्रदर्शन के लिए रखी गई वस्तु के रूप में ही जिंदा है। यूनानी परंपरा में ट्रेजडी पैगन विश्वदृष्टि में एक अलग अर्थ रखता था। फ्रांसीसी या इटालियन यथार्थवादी-नवयथार्थवादी सिनेमा में इसका एक अलग अर्थ है। यूनानी परंपरा में ट्रेजडी का एक अतिमानवीय अर्थ था। मध्यकालीन ईसाइयत ने ट्रेजडी (त्रासदी) को एक अन्य अर्थ दिया था। आधुनिकता की विचारधारा और औद्योगिक पूँजीवादी प्रजातंत्र में त्रासदी का अर्थ गुणात्मक रूप से बदल जाता है। ओपेरा की फ्रांसीसी परंपरा और पेंटिग की इटालवी परंपरा से पश्चिमी यथार्थवादी परंपरा का जो संबंध है वह फ्रांसीसी या इटालवी सिनेमा मे देखा जा सकता है। लेकिन भारतीय सिनेमा का पारसी थियेटर से या भारतीय चित्रकला से वैसा संबंध नहीं है। भारतीय सिनेमा का संबंध लोक संस्कृति, लोक संगीत और कथाकीर्तन- भजन और मंदिरों में प्रवेश कर आत्मानुभूति प्राप्त करने की परंपरा से ज्यादा है। इसलिए आत्मविभोर दर्शक कभी सीटी बजाने लगता है और कभी ताली, कभी पैसा फेंकने लगता है और कभी हो-हो करने लगता है। कभी नायक-नायिका की पूजा करने के लिए मंदिर बनाने लगता है और कभी फैन क्लब बनाकर समाज सेवा और राजनीति करने लग जाता है। 

भारतीय सौन्दर्यशास्त्र केन्द्रित सिनेमा-अध्ययन का अभी व्यवस्थित विकास नहीं हुआ है। लेकिन 1913 से लेकर 2006 तक की सफल-असफल (दर्शक संख्या के आधार पर) फिल्मों के तुलनात्मक समाजशास्त्रीय उपकल्पना के आधार पर एक कामचलाऊ-(जुगाड़ु) सामान्यीकरण किया जा सकता है। पश्चिमी ढंग के यथार्थवादी एवं नवयथार्थवादी फिल्मों को भारतीय दर्शको का वैसा समर्थन नहीं मिल पाता, जैसा आधुनिक पश्चिम के सिने दर्शकों के द्वारा उन्हें मिलता है। इसका कारण यह नहीं है कि भारत के दर्शक अनाड़ी हैं और एक अच्छी फिल्म को प्रोत्साहन नहीं देते। बल्कि इसका कारण यह है कि भारतीय दर्शकों के लिए नई तकनीक में प्रस्तुत होने के बावजूद सिनेमा उसकी जानी-पहचानी अपनी चीज है जिसकी इस देश के हजारों वर्षों के वाचिक परंपरा और कथा वाचन एवं कथा श्रवण की लोक परंपरा एवं लोक संस्कृति से गहरा संबंध है। जबकि पश्चिम में परंपरा और पारंपरिक संस्कृति का आधुनिक दर्शकों एवं आधुनिक सिनेमा से कोई जीवंत रिश्ता ही नहीं हैं। अंग्रेजी राज में विकसित भारतीय साहित्य का भारतीय समाज से वैसा जीवंत संबंध आज तक विकसित नहीं हो पाया जितना भारतीय सिनेमा का 1913 से स्थापित हो गया था। भारतीय दर्शकों ने सिनेमा को पहली नजर में ही दिल दे दिया। ऐसा प्यार केवल भक्त कवियों एवं सूफी गायकों को ही मिला है। अत: भारतीय दर्शकों को दोष देने की बजाय यथार्थवादी या नवयथार्थवादी सिनमा की अभारतीयता को ठीक से समझने की आवश्यकता है। भारतीय समाज में ”यथार्थ” सत्य का एक अंश या रूप मात्र है। यथार्थ को या यथार्थ के अध्यन को आधुनिक यूरोपीय मानववाद एवं मानववादी इतिहास, दर्शन एवं समाज विज्ञानों ने एक खास स्वरूप प्रदान किया है। यूरोप के आधुनिक विमर्श में सत्य या न्यूमेना को कोई स्थान प्राप्त नहीं है। वहां यथार्थ या फेनोमेना का ही महत्व है। यहाँ ध्यान रखना आवश्यक है कि भारत में यथार्थ न्यूमेना का ही अंश या रूप है। जबकि पश्चिम में यथार्थ फेनोमेना का रूप है। पश्चिम में यथार्थ वह है जिसे इतिहासकार की अध्यन प्रणाली एवं अवधारणायें यथार्थ मानती हैं। जो इतिहासकार छोड़ देता है या जो उसकी अवधारणाओं से संगति नहीं रखती उसे वह मिथक, कल्पना या असत्य कहकर खारिज कर देता है। भारत में जब सिनेमा का जन्म एवं विकास हुआ (1913 से 1947) उस वक्त भारत में अंग्रजी राज था। देश में स्वाधीनता आंदोलन चल रहा था। 1913 से 1920 तक के स्वाधीनता आंदोलन पर कांग्रेस के गरम दल का सबसे ज्यादा प्रभाव था। बालगंगाधर तिलक उस युग के सबसे बड़े नेता एवं प्रेरणा पुरूष थे। दादा साहब फाल्के और प्रभात फिल्म कंपनी पर तो स्वतंत्रता आंदोलन का प्रभाव था ही, रणजीत मूवीटोन, न्यू थियेटर्स और मिनर्वा मूवीटोन पर भी स्वतंत्रता आंदोलन का कम प्रभाव नहीं था। अत: जिसे अंग्रेजीदां लोग भारतीय दर्शकों एवं फिल्मकारों की नासमझी मानते हैं वह एक प्रकार के सांस्कृतिक विमर्श के वैकल्पिक व्याकरण एवं वैकल्पिक सौंदर्यशास्त्र से निकला प्रतिरोधी आख्यान है जिसे स्वदेशी आंदोलन और स्वाभिमानी साधना ने सींचा था। इस दृष्टि से देखने पर यथार्थवादी सिनेमा और इसको बनाने वाला फिल्मकार निम्न श्रेणी में आता है। यह कला और कलाकार की प्रारंभिक अवस्था का द्योतक है। जब एक कला और सांस्कृतिक साधन के रूप में सिनेमा किसी देश में जन्म लेता है तो यथार्थवादी सिनेमा की बाढ़ आती है। एक नया-नया फिल्मकार जब फिल्म बनाना सीख रहा होता है, जब फिल्म की तकनीक और शिल्प से उसे नया-नया रोमांस होता है तो वह यथार्थवादी या नवयथार्थवादी सिनेमा बनाता है। वह रियलिटी को डाक्युमेंट करता है। रियलिटी पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करता है। भारतीय दृष्टि से यह सागर को गागर में भरने की हिमाकत है जो उस्ताद-शागिर्द परंपरा के कमजोर पड़ने या लुप्त होने की स्थिति का द्योतक है। यह ”नीम हकीम खतरे जान” की कहावत की प्रासंगिकता की स्थिति है। यह कुएँ के मेढ़क का आत्मालाप है कि उसने ‘पुन: सृजन’ नहीं ‘सृजन’ किया है, ‘अनुकृति’ नहीं, ‘कृति’ बनायी है। भारत में ऐसी फिल्मों को लोक स्वीकार नहीं करता है। लोक में वही सिनेमा स्वीकृत होता है जो सत्य (मिथक+यथार्थ+संभावित यथार्थ) से संवादित होता है। जो सत्य को निवेदित होता है।
भारत में फिल्में लोक के स्तर पर दो अलग तरह से प्रिय एवं स्थापित होती है। इस दृष्टि से लोकप्रिय (ब्लॉक बस्टर्स) फिल्मों का दो वर्गीकरण किया जा सकता है। एक को ”लोकप्रिय” फिल्म कह सकते हैं और दूसरे को ”कालजयी” फिल्म कह सकते हैं। लोकप्रिय फिल्म में ‘क्षण की प्रियता’ होती है। सत्य का आभास होता है। दूसरी ओर ‘कालजयी’ फिल्म में सत्य का अंश संकेतित या निवेदित होता है। कालजयी फिल्में लोक में क्षणिक रूप से प्रिय होने के बाद लोक में स्थापित भी हो जाती हैं। लोकप्रिय फिल्में पश्चिमी अर्थो में ‘मेटाफोरिक’ होती हैं जबकि कालजयी फिल्में ‘मेटानोमिक’ होती है। पश्चिम में ‘मेटाफोरिक’ को ‘फेनोमेना’ कहते हैं। वहाँ मेटाफोरिक को उत्कृष्ट कला माना जाता है। हमारे यहाँ मेटानोमिक या मेटानोइक (कालजयी, लाक्षणिक) कला न्यूमेना (सत्य) का लक्षण या अंश है। यह सर्वोत्ताम कला का रूप है जबकि ‘मेटाफोरिक कला’ कला का अविकसित या अल्पविकसित रूप है। कालजयी फिल्में गुरू-शिष्य या उस्ताद-शागिर्द परंपरा से निकला हुआ या ऋषि परंपरा की तरह आत्मनुभूति से गुजरा हुआ फिल्मकार ही बना पाता है। कभी-कभी कोई निर्दोष-सुधी फिल्मकार किसी ज्ञात-अज्ञात प्रेरणा से जाने-अनजाने भी बना लेता है। या कहें, कभी-कभी ऐसी फिल्में अपने आप भी बन जाती हैं। सामान्यत: कालजयी फिल्मों का अवतरण ब्रह्मांडीय घटना के रूप में होती है। इन फिल्मों का सेल्फ वैल्यु होता है। 

भारत में सिनेमा के प्रारंभ में विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं के लोग उसी तरह जुड़े जैसे हॉलीवुड के सिनेमा में यूरोपीय देशों के विभिन्न भाषा-भाषी लोग जुडे थे। लेकिन हॉलीवुड की फिल्मों और अमेरिका की भाषा अंग्रेजी है। भारतीय सिनेमा के प्रारंभ में पांच प्रमुख केन्द्र थे – कलकत्ता, बम्बई, लाहौर, मद्रास और कोल्हापुर-पुणे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कलकता, लाहौर और पुणे के कलाकार-तकनीकी विशेषज्ञ भी बम्बई चले आए। कुछ बम्बई से पाकिस्तान भी गए। विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों ने व्यावहारिक कारणों से अपनी मातृभाषा के स्थान पर हिन्दी में फिल्म बनाना शुरू किया। शांताराम मराठी भाषी थे, मेहबूब खान गुजराती बोलने वाले, बिमल रॉय, अमिय चक्रवर्ती, फनी मजूमदार आदि बंगाली भाषी थे तो चेतन आनंद-देव आनंद-विजय आनंद, बलदेवराज चोपड़ा-यशराज चोपड़ा, पृथ्वीराज-राजकपूर, केदार शर्मा और दिलीप कुमार पंजाबी भाषी। एस. एस. वासन मद्रासी थे। सोहराब मोदी पारसी मिश्रित मराठी हिन्दी बोलते थे। अधिकांश तकनीकी विशेषज्ञ अंग्रेजी में सोचते-बोलते-काम करते थे। अत: हिन्दी सिनेमा को धीरे-धीरे राष्ट्रीय सिनेमा का दर्जा तो प्राप्त हो गया लेकिन हिन्दी फिल्म उद्योग के कामकाज की भाषा (भारत सरकार और विश्वविद्यालयों के कामकाज की भाषा की तरह) अंग्रेजी हो गई। सिनेमा के बारे में अधिकांश किताबें भी अंग्रेजी भाषा में हीं लिखी गई। ज्यादातर पटकथा अंग्रेजी भाषा में अंग्रेजीदां लोगों ने लिखे। संवाद भी अंग्रेजी भाषा में ही होते थे। एक मुंशीनुमा अनुवादक को संवाद लेखक का दर्जा दिया गया। विश्व सिनेमा में कथा-पटकथा ही एकमात्र श्रेणी है। कभी-कभी ‘एडाप्टेड फ्रॉम ओरिजनल’ (मूल से रूपांतरित) वाली श्रेणी भी दिखती है। लेकिन कथा-पटकथा से अलग संवाद लेखक की श्रेणी भारतीय सिनेमा की मौलिक विशेषता बन कर उभरी है। जिस तरह औद्योगिक क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के पार्ट-पूर्जों को जोड़कर (एसेंबलिंग करके) ‘मेड इन इंडिया’ लिखने का चलन भारतीय मध्यवर्ग के व्यावसायिक अवसरवाद की मौलिक विशेषता बन कर उभरी है और आउटसोर्सिंग के जमाने में भारतीय पेशेवर वर्ग के सोशल कैपिटल (उपनिवेशी संस्कार) के रूप में प्रशंसित हो रही है इसका बीज रूप भारतीय सिनेमा में अनुवादक मुंशी की रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने के लिए संवाद-लेखक के रूप में उसकी कथा- पटकथा लेखक से स्वतंत्र पहचान देने के रूप में छिपा हुआ है। इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों परिणाम हुए। इसका सबसे सकारात्मक पक्ष तो यही है कि विदेशी पटकथा पर ”देसी ब्लॉक बस्टर्स” का निर्माण होने लगा। इन ब्लॉक बस्टर्स में गीत-संगीत के भारतीय छौंक के साथ-साथ इन मुंशीनुमा अनुवादकों के ”वन लाइनर्स” का कमाल भी होता था। इसका दूसरा पक्ष यह था कि अपने महत्व को स्थापित करने के लिए कई बार ये मुंशीनुमा अनुवादक मूलकथा भावना और संदर्भ को जाने-अनजाने बदल देते थे और ताली पड़ने वाले अजीबो-गरीब लेकिन मौलिक-दिल को छू लेने वाले वाक्य-लिख मारते थे। इससे ऊपरी तौर पर फिल्म की सम्पूर्णता-अद्वैत खंडित होती थी और कथानक के अर्थ में असंबद्ध संवादों के कारण असंगति साफ दिखती थी। लेकिन कई बार फिल्म इन्हीं बेतुके लेकिन संवेदनशील संवादों के कारण हिट हो जाती थी और वर्षों बाद भी यही संवाद याद रह जाते थे और फिल्म की पटकथा विस्मृति की शिकार हो जाती थी। इसकी समाजशास्त्रीय व्याख्या यह है कि इन संवादों के माध्यम से दर्शक अपने दैनिक जीवन तथा समकालीन समय एवं चल रही फिल्मी कथानक का अतिक्रमण करते हुए सनातन सत्य एवं सनातन लीला का साक्षात्कार करने लगता है। इन अर्थों में ये संवाद भारतीय महाकाव्यों में वर्णित गरूड़ महाराज या मानस के हंस, या कबूतर, तोता या मैना की वाणी का स्मरण कराते हैं और संसार से जगत की यात्रा कराते हैं, पिण्ड से ब्रह्माण्ड की यात्रा कराते है। अंधकार से प्रकाश की ओर प्रेरित करते हैं। 

आज भारतीय सिनेमा को, खासकर लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा को पश्चिम में बहुत लोकप्रियता मिल रही है। इसका दो अंतर्संबंधित कारण है। एक, पश्चिमी देशों में औद्योगिक क्रांति का उन्माद थमने लगा है। मैनु फैक्चरिंग (औद्योगिक उत्पादन) और सर्बिस सेक्टर (सेवा क्षेत्र) में पश्चिम के लोग गैर पश्चिमी उद्यम के मुकाबले लगातार पिछड़ रहे हैं। उनके लोग मैनेजमेंट (प्रबंधन) और शेयर ब्रोकर (दलाल) बनने और पिछले 200-300 वर्षों के सोशल कैपिटल (उपनिवेशवादी विरासत) को भोगने में लगे हैं। उनके यहाँ थियोलॉजी, विज्ञान, दर्शन और कला जैसे चित्त को परिष्कृत करने वाले अध्यन-चिंतन-मनन-साधना में ठहराव और पतन की चर्चा 1968 के आसपास से उत्तर-आधुनिक समीक्षकों ने शुरू कर दी थी। इसकी पहचान नीत्शे (1844 & 1900) और हैनिमन के समय से ही होने लगी थी। 1989 & 1990 के बाद तथाकथित एक ध्रुवीय विश्वग्राम में उपरि तौर पर तो अमेरिकी दादागिरी है लेकिन उनकी दादागिरी उनके समाज की आंतरिक सृजनशीलता एवं अंदरूनी स्वास्थ्य पर आधारित नहीं होकर कृत्रिम टॉनिक (वियाग्रा, अमेरिकी सेना और हॉलीवुड फिल्मों के राजनीतिक अर्थशास्त्र) पर आधारित है। उनकी फिल्मों के दर्शक लगातार घट रहे हैं। इस बात को तुलनात्मक रूप से ही समझा जा सकता है। हॉलीवुड सिनेमा की 1989 से वही स्थिति हो गई है जो भारत में अंग्रेजी राज की 1913 से 1947 तक थी। हॉलीवुड की देसी भाषाओं में डब फिल्मों के प्रचलन से अंतत: हॉलीवुड की फिल्मों को दूरगामी नुकसान होगा और देसी भाषा के दर्शकों को अपनी भाषा में अपने दर्शकों के लिए जुगाड़ करके उत्कृष्ट फिल्म बनाने की प्रेरणा मिलेगी। विवेकानंद ने काफी पहले यही तो कहा था कि पश्चिमी तकनीक और भारतीय संस्कृति का समन्वय भारत को एक बार फिर विश्व- गुरू बनायेगा। इसमें विवेकानंद जी एक जगह समय की गति को पढ़ने में चूक गए थे। उन्होंने कहा था कि भारत के दबे – कुचले वर्गों को यदि सांस्कृतिक रूप से आगे बढ़ना है तो उन्हें संस्कृत सीखनी होगी। गांधी और टैगोर ने बाद में कहा कि भारत को अपना स्वाभाविक विकास चाहिए तो भारतीयों को लोकभाषा या मातृभाषा सीखनी होगी। शिक्षा शास्त्रीय भाषा में नहीं मातृभाषा या लोकभाषा में होनी चाहिए। आज व्यावहारिक स्तर पर शास्त्रीय चर्चा की भाषा अंग्रेजी हो गई है और लोकविमर्श देसी भाषाओं या हाइब्रिड (बोलचाल की मिश्रित भाषा जिसमें अंग्रेजी समेत कई भाषाओं के शब्द होते हैं) भाषा हो गई है। हिन्दी एक लोक भाषा है। यह वाचिक परंपरा, बोलचाल की राष्ट्रीय भाषा बनने की प्रक्रिया में है। दुनिया में बसने वाले भारतीय मूल के अधिकांश लोग किसी-न-किसी रूप में हिन्दी फिल्में अवश्य देखते हैं। भले ही वे हिन्दी पढ़-लिख नहीं पाते, लेकिन हिन्दी फिल्में फिर भी देखते हैं चाहे सब टाइटिल के सहारे ही क्यों नहीं देखते। तमिल, मलयालम, कन्नड, तेलगु, बांग्ला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, उड़िया, असमिया, भोजपुरी आदि भारतीय भाषाओं में भी शुरू से उत्कृष्ट फिल्में बनती रही हैं। इनमें से कुछ फिल्मों, खासकर भोजपुरी फिल्मों का प्रसार इधर भारतीय मूल के लोगों में बढ़ा है, इसके बावजूद इन देसी भाषाओं के फिल्मकारों की महत्वाकांक्षा हिन्दी फिल्म बनाने की अक्सर रहती है। जिस तरह अधिकांश भारतीय विद्वान प्रस्थानत्रयी (ब्रह्म-सूत्र, उपनिषद, भगवद गीता) पर अपना भाष्य अवश्य लिखना चाहते हैं, उसी तरह भारत के अधिकांश फिल्मकार हिन्दी में अपनी फिल्म अवश्य बनाना चाहते हैं। हॉलीवुड की फिल्मों को असली चुनौती भारत से ही मिलने वाली हैं चूँकि चीन, जापान और अन्य गैर-पश्चिमी देशों में पश्चिमी सिने सिध्दांत, कथा कहने के पश्चिमी स्टीरियोटाइप एवं कैनन हावी हो चुके हैं। ईरान के लोग इस्लामी संस्कृति को अपने सिनेमा में स्थापित करने की भरसक कोशिश कर रहे हैं लेकिन कम से कम अठारहवीं शताब्दी से इस्लामी कला चिन्तन और तत्व मीमांसा में निरंतरता एवं सृजनात्मकता का अभाव रहा है। मूर्ति चित्रण, नाटक एवं संगीत के बारे में ऐसे भी इस्लामी सिनेमा एवं मूर्तिकला तथा इस्लाम में संगीत की भूमिका के बारे में गैर सूफी चिन्तकों में काफी विवाद रहा है। अत: ईरानी सिनेमा ईरान के बाहर हॉलीवुड की फिल्मों का विकल्प बन सकता है ऐसा तो फिलहाल ईरान के लोग भी बहुत आशान्वित नहीं हैं। अत: केवल भारतीय मूलत: हिन्दी सिनेमा ही गैर पश्चिमी मुल्कों और पश्चिम में रहने वाले गैर-पश्चिमी मूल के दर्शकों के बीच लोकप्रिय हो सकता है। धीरे-धीरे पश्चिम के उत्तर-आधुनिक दर्शकों का ध्यान भी भारतीय सिनेमा के वैकल्पिक विमर्श पर जा सकता है। इसकी दिशा में धीरे-धीरे भारतीय सिनेमा बढ़ रहा है। परन्तु अभी काफी तैयारी करनी होगी। सिद्धि अभी नहीं मिली है। अभी भारतीय सिनेमा की साधनावस्था चल रही है। हिन्दी सिनेमा का स्वर्णकाल आना अभी बाकी है। थीम एवं प्रस्तुति की दृष्टि से चालीस एवं पचास (1940 एवं 50) के दशक को स्वर्णकाल मानने का चलन है। इस दौरान कुछ अच्छी फिल्में बनी थी लेकिन ज्यादातर फिल्मों पर धर्म एवं समाज सुधार के उन्नीसवें सदी के फार्मूले हावी थे। इन फार्मूलों का जन्म अंग्रेजी राज की भारतीय दृष्टि से घोर निराशा जनक परिस्थिति में पश्चिमी मानदंडों पर हुआ था। पारंपरिक तकनीक, पद्धति, दर्शन एवं संस्थाओं को कालबाह्य मान लिया गया था और हर पश्चिमी चीज को अच्छी और बेहतर मानकर इनको भारतीय समाज में प्रचलित बनाने के लिए, समाज एवं धर्मसुधार करने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा था। भारत का तथाकथित बुद्धिजीवी या यथार्थवादी सिनेमा पश्चिमी वस्तुओं, विचारों एवं संस्थाओं के प्रसार के लिए विज्ञापन करती नजर आती हैं। उस वक्त की कई महान सामाजिक फिल्मों को समकालीन विज्ञापन फिल्मों की श्रेणी में डाला जा सकता है। अत: तकनीक की दृष्टि से, कथानक के सर्वकालिक मानदंडों की दृष्टि से 1940 या 50 के दशक को स्वर्णयुग मानने में कई समस्यायें हैं। इस दृष्टि से 1960 या 1970 का दशक को पतन का युग कहना गलत है। संक्रमण काल है। भारत के लिए भी और भारतीय सिनेमा के लिए भी। 1960 के दशक में भारतीय समाज में समृद्धि दिखने लगती है। रंगीन सिनेमा में इस समृद्धि को प्रस्तुत करने का चलन बढ़ता है। 1964 में नेहरू युग का अंत हो जाता है। 1962 में चीन से हुई शर्मनाक हार पर ‘हकीकत’ (1964) जैसी फिल्म बनती है। 1965 में ‘वक्त’ जैसी फिल्म बनती है। 1966 में ‘तीसरी कसम’ जैसी फिल्म बनती है। ‘उपकार’ (1967), आराधना (1969), आनंद (1970), आंधी (1975), और शोले (1975) बनती हैं।
1980 और 1990 के दशक के फिल्मकारों पर न देश की गुलामी की छाया है और न देश के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रभाव है। 1990 के बाद का दशक भारतीय समाज एवं भारतीय सिनेमा के लिए देश और विदेश में एक अद्भुत समय है। अवसर और चुनौतियों की दृष्टि से, प्रतिभा और पलायन की दृष्टि से यह भारतीय समाज की आंतरिक ऊर्जा का प्रस्फुटन है। यह उन युवाओं का समय है, जिनके सपने गुलामी, संरक्षण या आश्रय (पैट्रोनेज) से रौंदे नहीं गए है। उनको आप अभिमन्यु, घटोत्कच और बर्बरिक की तरह अनाड़ी भले कह दें लेकिन इनकी प्रतिभा, समर्पण, निर्दोष आत्मा और निर्भीक सृजनशीलता की तारीफ किए बिना नहीं रह सकते। इनकी दर्शन, इतिहास, साहित्य या मिथक की समझ में खोट निकाला जा सकता है, लेकिन इन्हे कैमरे से खेलना आता है। इनको तकनीक का भय नहीं है। इनको मौलिकता की सनक नहीं है। इनको कृत्रिम विचारधारा की रूढ़ियों ने नहीं बाँध रखा है। ये समकालीन महाभारत का युद्ध भले न जीत पायें लेकिन समकालीन महारथियों का गर्व तोड़ने के लिए ये काफी हैं। ये सीधे-सीधे कह या दिखला सकते हैं कि शाहंशाह के कपड़े नहीं हैं। शाहंशाह अपने दुष्ट दरबारियों की गलत मंत्रणा से नंगे घूम रहा है। उस पीढी को अपने अपरोक्ष अनुभूति पर विश्वास हैं। यह भारतीय समाज एवं भारतीय सिनेमा के मठाधीशों और समीक्षकों को यदि पतनकारी नजर आता है तो मतलब साफ है ये लोग अपने समय और समाज से कटे हुए हैं। ये लोग भारत की लोकप्रिय फिल्में नहीं देखते। यदि पुरानी पीढ़ी के लोग इसमें अपनी भूमिका तलाशना चाहते हैं तो वाणप्रस्थ एवं संन्यास धर्म निभायें। नई पीढ़ी को वहाँ संबल एवं प्रशिक्षण दें जहाँ इनको संबल, सहयोग एवं मार्गदर्शन की जरूरत है। भारत में पश्चिम की तरह अपने इतिहास को प्रस्तुत् करने का व्यवस्थित प्रयास अब तक नहीं हुआ है। ऐतिहासिक फिल्मों को ‘पीरियड’ फिल्में कहने वाले लोगों को इतिहास दर्शन बताया जाना चाहिए। उन्हें हॉलीवुड की ‘द पैशन ऑफ द क्राइस्ट’, ‘ट्रॉय’, ‘एलेक्जांडर’ एवं ‘दा विंची कोड’ जैसी फिल्मों को बिना मानक या मानदंड बनाये ऐतिहासिक फिल्मों की समकालीनता समझनी चाहिए। तमिल सिनेमा में सी. एन. अन्नादुराई और एम. करूणानिधि ने तमिल परंपरा की समकालीन प्रस्तुति करके द्रविड आंदोलन और तमिल राजनीति को सिनेमा से आंदोलित किया था। कामराज नाडार और सी. राजगोपालचारी जैसे नेता देखते ही रह गए थे। उसी तरह 1950 के दशक से बांग्ला और मलयालम सिनेमा ने वहाँ की राजनीति और समाज को बहुत गहराई से प्रभावित किया। हिन्दी सिनेमा ने भी भारतीय समाज और राजनीति के साथ बहुत आत्मीय संबंध बनाया है लेकिन इसको ठीक से समझने का ईमानदार प्रयास अब तक नहीं हुआ है। ठीक उसी तरह समकालीन विश्व में भारतीय सिनेमा के प्रसार और लोकप्रियता को लोग अब भी केवल मनोरंजन एवं व्यवसाय की दृष्टि से देख रहे हैं। इसके अन्य प्रभावो पर लोगों का ध्यान अभी ठीक से नहीं जा रहा है। इसका सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों प्रभाव है। सकारात्मक इसलिए चूँकि भारतीय सिनेमा के विरोधी अभी व्यवस्थित प्रतिवाद नहीं कर रहे हैं। नकारात्मक इसलिए कि भारतीय सिनेमा के दर्शक एवं इससे लाभ प्राप्त करने वाले लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर सहकार एवं सहयोग नहीं कर रहे हैं। सिनेमा आंदोलन कमजोर पड़ने लगा है। फिल्म सोसाइटियों के विस्तार एवं सक्रियता में ठहराव और बिखराव आ रहा है। ज्यादातर फिल्मकार एवं लेखक भारतीय दर्शकों की संस्कृति एव अपेक्षाओं से अनजान हैं लेकिन उनमें तकनीक एवं पूँजी का पुरानी पीढी के फिल्मकारों एवं लेखकों की तरह भय नहीं है। वे हॉलीवुड से आतंकित नहीं हैं। लेकिन हॉलीवुड की फिल्मों के अलावे उन्हें अन्य सिनेमा की परंपराओं और संभावनाओं का भी ज्ञान नहीं है। इस रचनात्मक विस्फोट की स्थिति को निर्माता आदित्य चोपड़ा, विधु विनोद चोपड़ा, मनमोहन शेट्टी, रॉनी स्क्रूवाला, अमित खन्ना, सुभाष घई या महेश भट्ट जैसे लोग कितना लाभ उठा पायेंगे यह तो भविष्य ही बतलायेगा लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि सूरज बड़जात्या, आदित्य चोपड़ा, संजय लीला भंसाली, आशुतोष गोवरिकर, करण जौहर, राजकुमार हिरानी, शिमित अमीन, फरहा खान, इम्तियाज अली, करण जौहर, विनय शुक्ला, चंद्रप्रकाश द्विवेदी, निखिल आड़वानी, विशाल भारद्वाज, संजय गढ़वी, जॉन मैथ्यु माथन, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, मधुर भंडारकर, फरहान अख्तर, नागेश कुक्कूनूर, प्रदीप सरकार, श्रीराम राघवन, अनुराग बसु, मिलन लुथरिया, कुणाल कोहली, अनुराग कश्यप, शिरीष कुंडुर, शॉद अली, अनीस बज्मी, नीरज वोरा, सुरेश नायर, जैसे फिल्मकार भारतीय सिनेमा का नया व्याकरण एवं नया छंद गढ़ रहे हैं। ये लोग भविष्य में बहुत अच्छी और बहुत बुरी फिल्में बनाएँगे। फिल्मों की संस्कृति और फिल्मों का व्यवसाय गुणात्मक रूप से बदलेगा। जिस तरह 1913, 1931, 1947, 1957, 1967, 1975, 1989, 2004 को भारतीय समाज एवं भारतीय सिनेमा दोनों के लिए ‘माइल स्टोन’ (मील का पत्थर) माना जाता है उसी तरह 2009 भी भारतीय समाज एवं भारतीय सिनेमा के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। 

भारतीय सिनेमा में 1913 से ही कई तरह की प्रवृत्तियाँ एक साथ अस्तित्व में रही हैं। उनमें अंतर्विरोध भी रहा है। लेकिन हर तरह की प्रवृत्ति को देखने वाले और सराहने वाले दर्शक इस समाज में मौजूद रहे हैं। यह पश्चिमी देशों के सिनेमा में 1968 से पहले नहीं पाया जाता। 1968 से पश्चिमी देशों में उत्तर-आधुनिक प्रवृत्तिायाँ हावी होती गईं। पश्चिम ने चौथी और पाँचवी शताब्दी पूर्व की अपनी गैर-ईसाई, गैर यहुदी (पैगन) परंपरा से बौद्धिक एवं कलात्मक स्तर पर संवाद बनाना शुरू किया और इससे ईसाईयत और आधुनिकता के बारे में एक प्रकार के तटस्थ मूल्यांकन की शुरूआत हुई। यह एक तथ्य है कि ज्यादातर उत्तर-आधुनिक विद्वान एवं कलाकार यहुदी मूल के रहे हैं। शेष वे लोग रहे हैं जो अपने को नास्तिक, पैगन या रहस्यवादी पद्धतियों से किसी न किसी रूप में जोड़े रहे हैं। भारत की सनातन पद्धतियों ने पैगनवादी परंपराओं की तरह ही विविधता में एकता को स्वीकार किया है। विविधता में एकता की अभिव्यक्ति गद्य की अपेक्षा काव्य, गीत, संगीत एवं नृत्य में अभिव्यक्त हो पाती है। गद्य की अपनी सीमा है। वाक् के चार रूप होते हैं- परा, पश्यंति, मध्यमा और वैखरी। वैखरी बोली हुई भाषा है। मूलत: गद्य है। मध्यमा में कलात्मक भाषा, सांकेतिक भाषा आती है। पश्यंति तंत्र और मंत्र की भाषा है। परा मौन की भाषा है। बिना ध्वनि के संवादित होने वाली भाषा है। भारतीय सिनेमा की पहचान गीत-संगीत से होती है। यही भारतीय सिनेमा की पारिभाषिक भारतीयता है। यह मध्यमा वाक् की स्वाभाविक भाषा है। सिनेमा के उस्ताद-शागिर्द परंपरा में यह जानी पहचानी सांस्कृतिक पूँजी की तरह हस्तांतरित होती रही है। उसी तरह यह समझना आवश्यक है कि भारतीय समाज के अधिकांश लोगों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जो संस्कार मिलता रहा है, उसमें ”पूँजी की स्वायत्ताता” या ”पश्चिमी आधुनिकता में विकसित व्यक्ति केन्द्रित उपभोक्तावाद” आज भी एक अटपटी और अस्वाभाविक चीज है। आज भी ‘पैसा कमाना’ जिन्दगी का लक्ष्य नहीं बना है। उनके लिए भी जो ”पैसा-पैसा” कहते और करते रहते हैं। किसी व्यक्ति का धर्म और उसकी आस्था का पता अक्सर उसकी कथनी और रोजमर्रे की करनी से नहीं लग पाता। उसका धर्म और उसकी आस्था का पता तब लगता है जब उसके सामने कोई चुनौती आती है। जब उसके सामने कोई यक्ष प्रश्न आता है। जब उसके सामने शहादत का कोई मौका आता है। जब भोग और त्याग की दुविधा आती है। चाहे ‘मदर इंडिया’ की नर्गिस हो या ‘आराधना’ की शर्मिला टैगोर, चाहे ‘दीवार’ की निरूपा राय हो या ‘गॉडमदर’ की शबाना आजमी या चाहे ‘संगम’ का राजेंद्र कुमार हो या ‘अनोखी’ रात का संजीव कुमार या ‘शोले’ का संजीव कुमार या ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जाएँगे’ का शाहरूख खान – इनके फिल्मी चरित्र में एक ठेठ भारतीयता है जो ‘क्राइसिस’ (चुनौती) के समय सामने आती है। और ये फिल्में ‘सुपर हिट’ हो जाती हैं। चँकि भारत के आम दर्शक आज भी हॉलीवुड की फिल्मों के दर्शकों से गुणात्मक रूप से भिन्न हैं। इसीलिए भारत की सफल फिल्मों की विचारधारा न खूनी क्रांति से उपजे समाजवाद के पक्ष में होती है और न पूँजीवादी उपभोक्तावाद को ही स्थापित करती है। भारत की हर सफल फिल्म में एक बीच का रास्ता, एक मध्यमार्गी समाधान, एक प्रकार का गांधीवादी समाजवाद, एक प्रकार का भक्तिमार्गी समन्वय, एक प्रकार की बौद्ध नीति, एक प्रकार का तीसरा मार्ग तलाशा जाता है।

भारतीय महाकाव्यों की तरह भारत के लोकप्रिय सिनेमा में भी वाक् के चारो रूपों की अभिव्यक्ति शब्द और दृश्य दोनों माध्यमों में होती रहती है। वैखरी वाक् का गद्य रूप है। स्थूलतम रूप है। जैसे प्रेमी-प्रेमिका अपने प्यार का इजहार करने के लिए ‘आई लव यू’ बोलते हैं या ‘हाथ’ पकड़ते हैं या ‘गले’ लगते हैं या ‘चुम्बन’ लेते हैं। यह वैखरी है। प्रेमी-प्रेमिका जो गाने गाते हैं या एक दूसरे की ऑंख में दूर से देखते हैं या देखते रहते हैं यह ‘मध्यमा’ रूप है। एक-दूसरे के बारे में सोच कर खुश हो जाते हैं। एक-दूसरे के पास पार्क में बैठे हैं, न हाथ पकड़े हैं, न ऑंखों में देख रहे हैं, न गाने गा रहे हैं, बस एक दूसरे के पास बैठे हैं। लड़का पढ़ रहा है, लड़की पास में बैठी गुनगुना रही है या पक्षियों से खेल रही है या फूलों से बाते कर रही है। यह प्रेम की अभिव्यक्ति का पश्यंति रूप है। प्रेम का परा रूप वह है जो चंद्रधर शर्मा गुलेरी की अमर कहानी ‘उसने कहा था’ में वर्णित है और जिस पर विमल रॉय ने इसी नाम से एक अद्भुत फिल्म बनायी है। ये सब सामान्य उदाहरण हैं। अन्य उदाहरण भी दिए जा सकते हैं। विशेष उदाहरणों की बात करें तो परा आशीर्वाद और प्रार्थना की मौन भाषा है। पश्यंति मंत्र और तंत्र की कीलित, सांकेतिक भाषा है। मध्यमा गीत-संगीत और पेंटिंग की लयबध्द भाषा है। वैखरी साधारण बोलचाल की कामचलाऊ गद्य भाषा है। इन्सट्रूमेंटल भाषा है। भारतीय सिनेमा में वाक् के इन्हीं चार रूपों का रचनात्मक उपयोग होता है। इसीलिए फिल्म के विभिन्न दृश्यों एवं संवादों में परत दर परत, प्याज के छिलके की तरह (या गुलाब के फूलों की तरह) अर्थ छिपा रहता है। खासकर फिल्म के गीतों एवं स्वप्न दृश्यों में। फिल्म का हर पात्र एक अबूझ वाक्, एक अबूझ गीत और एक अबूझ छंद की तरह होता है। वह एक कीलित मंत्र की तरह होता है। हर पात्र के भीतर ईश्वरतत्व सुप्त होता है। उसकी कुंडलिनी जब जागती है तो उसके व्यक्तित्व की साधारणता पिघल जाती है। हर विष्णु के भीतर से एक मोहिनी और हर पार्वती के भीतर से एक काली अवतरित होती है। भगवान विष्णु के मोहिनी रूप से ज्यादा सुन्दर स्त्री की कल्पना उतनी ही मुश्किल है, जितना पार्वती के काली रूप से ज्यादा वीर मर्द की कल्पना करना। यही कारण है कि भारतीय सिनेमा के ज्यादातर नायक सुकुमार एवं कोमल होते हैं, जो परिस्थितियों से आसानी से विचलित हो जाते हैं। जबकि अधिकांश नायिकाएँ बहुत मजबूत इच्छा शक्ति वाली अविष्मरणीय त्याग और उच्चतम आदर्श स्थापित करने वाली होती हैं। आज बाजार की शक्तियाँ भारतीय वाक् और सनातन धर्म की पारंपरिक कहानियों को हॉलीवुड प्रेरित क्षणभंगुर उपभोक्तावाद की लिप्सा, वासना, घृणा और हिंसा से बेदखल करने की असफल कोशिश कर रही हैं। लेकिन उनकी अंतिम सफलता उतनी ही मुश्किल है, जितना लोकप्रिय फिल्मों के खल पात्रों की अंतिम सफलता मुश्किल होती है।

अत: भारतीय सिनेमा का समाजशास्त्री पश्चिमी सिने सिद्धांतकार का चाहकर भी उपयोग नहीं कर सकता है। सिनेमा का तकनीक तो दोनों जगह एक ही है। शिल्प में भी समानता है लेकिन कथानक अलग हैं। दर्शक अलग हैं। दर्शकों की संस्कृति अलग हैं। उनकी अपेक्षायें अलग हैं। सिनेमा चूँकि एक खर्चीला माध्यम है अत: लेखक एवं निर्देशक की तुलना में निर्माता एवं वितरक का निर्णय ज्यादा प्रभावी होता है। हॉलीवुड में भी होता है और भारत में भी होता है। और अधिकांश निर्माता-वितरक फिल्म से मुनाफा कमाना चाहता है। अत: वह दर्शकों की अभिरुचियों को चाहकर भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। फिल्म समीक्षकों द्वारा दर्शकों की अभिरुचियों को केवल वैचारिक आग्रह-दुराग्रह के आधार पर नजरअंदाज किया जाता है। जबकि निर्माता का निर्णय अंतत: दर्शकों की संस्कृति से निर्देशित-प्रेरित होता है। अत: हम कह सकते हैं कि नाटक मूलत: लेखक-निर्देशक का माध्यम होता है, जबकि सिनेमा निर्माता-दर्शक का माध्यम बन गया है। जिसमें चाहे अनचाहे भारत के लोक और शास्त्र को पुनर्नवता मिलती है।

You may also like

Leave a Comment

error: Content is protected !!