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छायावाद का वास्तविक स्वरूप

by amitjnusociology@gmail.com
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हिन्दी साहित्य में छायावाद का अंकुरण रीतिकालीन काव्य, निवृत्तिमार्गी भाव और सूफी शृंगार के साथ-साथ अंग्रेजी राज के पूँजीवादी उपभोक्तावाद के परिमार्जन की भूमिका के साथ हुआ। इस दौरान हिन्दी साहित्य का एक नया रूप बनने लगा। नए रूप, नई उपमाएँ सामने आईं। काव्य में भी रोमांटिक प्रवृत्ति का उदय हुआ। छायावाद विशेष रूप से हिन्दी साहित्य के उत्थान की वह धारा हैं, जो लगभग 1917 से 47 के बीच हिन्दी साहित्य की प्रमुख युगवाणी रही है। जयशंकर प्रसाद (1889-1937 ई.), सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ (1896-1961 ई.) सुमित्रानंदन पंत (1900-1977 ई.) महादेवी वर्मा (1907-1987 ई.) और प्रेमचंद (1880–1936 ई.) इस युग के प्रमुख साहित्यकारों के रूप में स्थापित हुए। अज्ञेय के अनुसार छायावाद भारतीय रोमांटिकवाद था। उदार, सुन्दर प्रकृति के प्रति आश्चर्य इसमें था, पर भाग्यवादी पात्र इसमें नहीं थे। रोमांटिकवाद का सबल ईश्वरवादी सारतत्व इसमें अंतर्निहित था। प्रारम्भिक रोमांटिकवाद और भारतीय दर्शन के संश्लेषण का मिश्रण था छायावाद।

छायावादी कविता और प्रेमचंद की कहानी और उपन्यासों के तुलनात्मक अध्ययन में इस युग के भारतीय समाज का कई अन्तर्विरोध सामने आता है। भारत में विकसित हो रहे पूँजीवादी विकास, राष्ट्रीय आत्मचेतना के जागरण तथा औपनिवेशिक और सामन्तवादी उत्पीड़न के विरुद्ध व्यापक संघर्ष के प्रभाव के साथ-साथ 1919-1922 के राष्ट्रव्यापी आंदोलन की पराजय का प्रतिनिधित्व भी इसमें हुआ था। 1914 से प्रथम विश्वयुद्ध शुरू हो गया था। 1917 से महात्मा गांधी का प्रभाव भारतीय राजनीति में बढ़ने लगा था। चौरीचौरा कांड के हिंसक प्रभाव को ध्यान में रखकर गांधी जी ने असहयोग आंदोलन को 1922 में स्थगित कर दिया। इससे भारत के कुछ बुद्धिजीवियों में गहरी निराशा और उदासी छा गई थी। 1920 के आसपास निराला ने ‘परिमल’ में लिखा था- ”मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है। मनुष्यों की मुक्ति कर्मों के बन्धन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग हो जाना है।”
भारतीय राजनीति में गांधी युग और हिन्दी साहित्य में छायावादी युग एक ही काल की उपज है। साहित्य रूपों के नवीकरण के मार्गों की खोज, रूढ़िगत बिम्बों को नये सिरे से समझने का प्रयास, भावावेगों की असाधारण प्रचुरता, प्राकृतिक सौन्दर्य की तीव्र अनुभूति, ओजपूर्ण, अभिव्यंजनात्मक भाषा, कलात्मक गद्य आदि इस काल के हिन्दी साहित्यकारों की स्वाभाविक विशिष्टताएँ थीं। छायावादी कवि भी सुन्दर, चिरयुवा प्रकृति को प्रस्तुत करते थे। प्रकृति के निरन्तर परिवर्तन और अभिनवीकरण को छायावाद में विश्व की चैतन्यशीलता-संबंधी विचार से, चेतनाधारा की निरन्तर गति से संबद्ध किया जाता था। यह धारणा व्याप्त हुई कि यह गति मनुष्य और प्रकृति में व्याप्त है और उन्हें अभिन्न एकत्व (अद्वैत) में जोड़ती है। पंत के अनुसार, ”सारा विश्व एक बहती हुई सजीव नदी है। प्रकृति मनोहारिणी तो सदा ही रही है। मेरे लिए वह चिरजीवन-संगिनी और अखंड प्रेरणास्रोत रही है।” छायावादी कवियों की रचनाएँ पारंपरिक भारतीय रचनाओं (कालिदास, जयदेव, विद्यापति, तुलसीदास, सूरदास) से इस बात में ऊपरी तौर पर भिन्न दिखती हैं कि उनमें प्रकृति-चित्रण अपने आप में ध्येय नहीं होता, अपितु मानवीय भावनाओं से पूर्ण होता है। छायावादी रचनाओं में प्राकृतिक चित्रों के माध्यम से मानवी भावनाओं और अनुभूतियों के जगत को समझने का प्रयास प्रमुख विशेषता बनकर उभरता है। श्री अरविन्द के अनुसार ”प्रकृति का यह रम्य अंचल कवि की कल्पना-भावना आदि का मनोहर विहार-स्थल था। इस प्रशांत हरीतिमा में उसे कभी माँ की ममता भरी मूर्ति मिलती, कभी सहचरी सखी का स्नेह भरा सौन्दर्य मिलता और कभी अनुरागमयी बहन का सौम्य रूप दिखता, कभी ऋषियों की आशीर्वाणी, कभी गुरु का गंभीर संदेश और मित्र की शुभकामना दिखती।” वास्तव में छायावाद ऊपर से जितना नया और मौलिक दिखता है, उससे कहीं अधिक इसके भीतर आधुनिकता और परंपरा के बीच के भारतीय द्वंद्व एवं संश्लेषण की युगीन अभिव्यक्ति है। इसमें परंपरा का पुनर्नवीनीकरण ही हुआ। निराला पर श्रीरामकृष्ण परमहंस एवं विवेकानंद का प्रभाव था। प्रसाद काश्मीर शैवागम और अभिनवगुप्त से प्रभावित थे। पंत पर श्री अरविन्द का प्रभाव था। महादेवी पर मीराबाई का प्रभाव था। प्रेमचंद पर महात्मा गांधी और दयानंद सरस्वती का प्रभाव था। दुर्भाग्य से अब तक छायावाद के विश्लेषण पर मार्क्सवादी आलोचकों ने ही व्यवस्थित काम किया है। इन लोगों ने छायावादी रचनाकारों की पारम्परिक चिंतनधारा को अनदेखा करने का काम किया है। वागीश शुक्ल ने निराला पर नई दृष्टि से चिन्तन किया है। रामस्वरूप चतुर्वेदी की आलोचना में भी कुछ नयापन है। लेकिन आधुनिक काल के भारतीय चिन्तकों- श्रीरामकृष्ण, विवेकानन्द, महात्मा गांधी, श्री अरविन्द या इनके पूर्व के आचार्यों- शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, वल्लभाचार्य, अभिनवगुप्त, गोरखनाथ, कबीर आदि की चिन्तन धारा के आलोक में छायावादी कवियों एवं लेखकों का व्यवस्थित मूल्यांकन होना अभी बाकी है।
बंगाली नवजागरण की तरह हिन्दी में छायावाद एक प्रकार का भारतीय नवजागरण(रेनेसाँ) का काल है और इस युग की रचनाओं में युगीन जीवन दर्शन की पुनर्रचना हुई है। इस काल के गद्य को प्रेमचंद की कहानियाँ एवं उपन्यास तथा प्रसाद के नाटकों ने जो गहराई एवं नयापन दिया है, उसमें परंपरा और आधुनिकता का संश्लेषण है। अभी जिसे इस दृष्टि से समझने का प्रयास ही नहीं हुआ है। उदाहरण के लिए गोदान की कथावस्तु को मार्क्सवादी आलोचकों ने भारतीय समाज एवं संस्कृति के यथार्थवादी चित्रण मानकर परंपरा की आलोचना की। जबकि गोदान एक महान छायावादी उपन्यास है, जिसमें अंग्रेजी राज द्वारा उत्पादित उपनिवेशवादी समाज के निर्माण की प्रक्रिया में समाज की विकलता एवं विरूपता का चित्रण है; जिसकी समस्याओं का निदान महात्मा गांधी के हिन्द स्वराज में है, न कि मार्क्सवादी क्रांति में। होरी और धनिया अंग्रेजी उपनिवेशवाद के द्वारा निर्मित सामाजिक परिस्थिति से पीड़ित हैं, वे लोग हिन्द स्वराज द्वारा अपेक्षित ग्रामीण स्वराज के वास्तविक पात्र नहीं हैं। गोदान का यथार्थ विदेशी दासता की बोझ तले विद्रूप हुए समाज का यथार्थ हैं, इसमें सामान्य भारतीय पारम्परिक गाँव के सामाजिक संबंधों के यथार्थ का चित्रण नहीं है। ठीक उसी प्रकार निराला की प्रतिनिधि रचना कुकुरमुत्ता या ‘तोड़ती पत्थर’ भी अंग्रेजी राज की पराधीन दशा की आलोचना है। निराला की विचारधारा का दस्तावेज ‘राम की शक्ति पूजा’ और ‘तुलसीदास’ के काव्य में अभिव्यक्त हुआ है। ‘तोड़ती पत्थर’ और ‘राम की शक्ति पूजा’ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। निराला तुलसीदास के ही वारिस हैं। वे तुलसीदास की विचारधारा के समकालीन प्रतिनिधि हैं। दोनों ने प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग के बीच तथा वैष्णव एवं शाक्त परंपरा के बीच समन्वय का काम किया है। मुगलकाल की दासता से तुलसीदास को भारतीय नवजागरण का संदर्भ मिलता है। अंग्रेजी राज की दासता से निराला को भारतीय नवजागरण का संदर्भ मिलता है। ‘जागो फिर एक’ बार नामक कविता में निराला का असली स्वरूप सामने आता है। तुलसी के उत्तराधिकारी रचनाकार होने और परंपरा के स्रोत से जुड़े होने के कारण ही निराला मार्क्सवादी आलोचना के चौखट में समा नहीं पाते और उनकी खंडित व्याख्या प्रस्तुत करने की विवशता प्रकट हो जाती है।

प्रेमचंद के ‘सेवासदन’ में गांधी के सेवाग्राम आश्रम की छाया है और ‘गोदान’ में हिन्द स्वराज की विचारधारा से उपनिवेशवादी समाज की ठेठ भारतीय आलोचना है। प्रेमचंद की दोनों रचनाओं को एक ही गांधीवाद की दो परिस्थितियों में अभिन्न अभिव्यक्ति मानना पड़ेगा। ‘गबन’ का नायक अंग्रेजी राज में पैदा हुआ काला अंग्रेज है। वह भारतीय मध्यवर्ग का प्रतिनिधि है। ‘गबन’ के नायक की तुलना ‘गोदान’ के मिस्टर मेहता से करना चाहिए। ‘निर्मला’ उपन्यास में गांधी और दयानंद की विचारधाराओं का संश्लेषण है। ठीक इसी प्रकार पंत की आरंभिक और बाद की रचनाओं में कृत्रिम विभाजन नहीं किया जा सकता। पंत एक वैष्णव रचनाकार हैं। वे श्री अरविन्द की तरह वासुदेव कृष्ण के उपासक हैं। प्रकृति को समर्पित पंत की रचनाएँ – ‘पल्लव’ और ‘गुंजन’ में प्रकृति वासुदेव कृष्ण के शरीर का विस्तार है। वह उस तरह की निर्जीव प्रकृति नहीं है, जो वर्डसवर्थ जैसे रोमांटिक कवियों में ‘नेचर’ की तात्विक स्थिति है। उनकी कविताओं में प्रकृति जर्मन कवि गेटे (या गोथे) की तरह एक रहस्यवादी चीज है, जो श्री अरबिन्द की ‘सावित्री’ महाकाव्य में भी है। पंत की बाद की रचनाओं पर श्री अरबिन्द का स्पष्ट प्रभाव है ही, प्रारंभिक रचनाओं में भी श्री अरबिन्द की रचनाओं से सहधर्मिता है।

महादेवी समकालीन मीराबाई हैं। वे भारतीय परंपरा में राधातत्व की अभिव्यक्ति हैं। उनकी रचनाओं में वही करुणा, वही वात्सल्य, वही शृंगार, वही शांत रस, वही अद्भुत तत्व मिलता है, जो मीराबाई की रचनाओं में या श्रीमद्भागवत की नायिका राधा में है। वे प्रकृति की स्वतंत्र स्त्री चेतना की रचनात्मक अभिव्यक्ति हैं। वे मुक्त रचनाकार हैं। वे एक साथ माँ, बहन, पत्नी, प्रेमिका और तपस्विनी की तरह प्रकृति, नियति और समाज से संबंधित होती है तथा संबोधित करती हैं। प्रसाद की कामायनी एवं प्रसाद के नाटक भारतीय परंपरा की समकालीन अभिव्यक्ति हैं। इसमें शैवागम का तांत्रिक मत अपने समकालीन विलास में अभिव्यक्ति हुआ है। ‘तंत्रालोक’ या ‘ध्वन्यालोक’, ‘शिव सूत्र’ या ‘विज्ञानभैरव’ की भाषा समकालीन पाठकों के लिए दुरूह है। प्रसाद ने इसी सिद्धांत को समकालीन भाषा एवं समकालीन मुहाबरे में प्रस्तुत किया है। उनके नाटक पश्चिमी अर्थों में ऐतिहासिक नहीं हैं, बल्कि भारतीय जीवन-आदर्शों तथा सामाजिक आदर्शों की ऐतिहासिक पात्रों के माध्यम से समकालीन अभिव्यक्ति हैं। उनके नाटक उसी प्रकार भारतीय पारम्परिक आदर्शों को अभिव्यक्त करते हैं, जिस तरह तुलसीदास वाल्मीकि के ‘रामायण’ को अभिव्यक्त करते हैं या महात्मा गांधी ‘हिन्द स्वराज’ में अंग्रेजी राज से पूर्व के भारतीय ग्रामीण समुदाय को प्रस्तुत करते हैं। यह सृजानात्मक अन्वयन है, स्वतंत्र कृति नहीं। यह मिथक रचना या पुरा-लेखन जैसी कृति है। इसमें एक पारम्परिक मानक है, परंतु साँचा नया है, समकालीन है। कथा वस्तु सनातन है, लेकिन रूपविधान नया है।
पंत, प्रसाद, निराला, महादेवी और प्रेमचंद आधुनिक काल के हिन्दी-नवजागरण के पंच महाभूत हैं। पंच महापुरुष हैं। पंच महाचेतना हैं। ये हिन्दी की समकालीन साहित्य के वृहद पंच हैं। इनकी पंचायत में ही ‘भारतीयता’ का विवाद सुलझ सकता है। इनकी स्वीकृति से ही भारतीय दृष्टिकोण को वैधता मिल सकती है; वर्ना ‘भारतीयता’ के नाम पर प्राच्यवाद (ओरिएंटलिज्म) ही परोसा जाता रहा है। खासकर मार्क्सवादी आलोचकों के द्वारा छायावाद को पश्चिमी रोमांटिसिज़्म की छाया घोषित किया जाता रहा है। सच्चाई यह है कि हिन्दी की मार्क्सवादी आलोचना एक प्रकार का प्राच्यवादी वाग्विलास ही अधिक है, रचनाओं और रचनाकारों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन कम है। ये लोग एक कृत्रिम साँचे में छायावादी प्रवृत्ति को केवल कविता में शामिल करते हैं तथा गद्य साहित्य को इसके वलय से बाहर रखते हैं। ये लोग केवल 1918 से 1936 के बीच के काव्य (‘उच्छवास’ से ‘युगांत’) को छायावादी मानते हैं, जबकि 1917 से 1947 तक के गांधीयुग में हिन्दी साहित्य के गद्य एवं काव्य की प्रमुख प्रवृत्ति छायावादी बनी रही है। अत: छायावाद के वास्तविक स्वरूप का व्यवस्थित मूल्यांकन होना अभी बाकी है। फिर भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि आधुनिक भारत में छायावादी रचनाओं ने हिन्दी नवजागरण का एक सम्मिलित स्वर प्रस्तुत किया है। इस स्वर के संभवत: सबसे सबल प्रतिनिधि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ थे।

निराला (जनवरी-1896 – 15 अक्टूबर 1961ई.) की रचनाओं में उनके युग की आत्मा प्रतिबिम्बित हुई है। उत्पीड़न और अत्याचार के सामने न झुकनेवाली अपनी विद्रोही, अदम्य और चिर अन्वेषणशील आत्मा वाले महाकवि निराला का जीवन कंटकाकीर्ण था। उनका जीवन उनकी मातृभूमि और जनता के भाग्य से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ था। वह युग अन्तर्विरोधों से पूर्ण कठिन युग था। राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन अपने चरम स्वरूप में उपनिवेशवादी शिकंजे की चूलें हिला रहा था। नए भारत के निर्माण के मार्गों की खोज हो रही थीं। शुरू में निराला सौन्दर्य, प्रेम और विषाद का गान करनेवाले रोमांटिक कवि थे। भारत की प्राचीन एवं मध्यकालीन धार्मिक और दार्शनिक शिक्षाओं में आस्था रखते थे। धीरे-धीरे उन्हें उपनिवेशवादी शिकंजे के सूक्ष्म पाश और स्वाधीनता आंदोलन के अंतर्विरोधी स्वरों की कमजोरी समझ में आने लगी और रचनात्मक स्तर पर वे अपने युगबोध को स्वतंत्र स्वर देने लगे। सौभाग्य से उस युग में जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा भी अपने युग बोध को स्वतंत्र स्वर दे रहे थे। यह कोई संगठित या समन्वित प्रयास नहीं था, परंतु इनकी रचनाओं के कथ्य-तथ्य, दृष्टिकोण, आदर्श एवं मूल्यों के स्तर पर सहधर्मिता थी। इसे छायावाद के नाम से लोकप्रियता मिली।

1918 में पत्नी और पिता की मृत्यु के बाद पुत्र-पुत्री और चार भतीजों के पालन-पोषण का सारा बोझ निराला जी पर आ गया। उस समय वे 22-23 वर्ष के थे। 1920 में उन्होंने नौकरी छोड़ दी और आकस्मिक कामों से किसी तरह गुजारा करने लगे। इस दौरान उन्होंने तुलसीदास के कृतित्व तथा बांग्ला एवं हिन्दी के व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन किया। इसी बीच उन्होंने सरस्वती पत्रिका में एक लेख लिखा। इस लेख से प्रभावित होकर महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उन्हें रामकृष्ण मिशन, कलकत्ता की पत्रिका समन्वय में काम दिलवा दिया। वे श्रीरामकृष्ण एवं स्वामी विवेकानंद की रचनाओं के प्रभाव में आए। उन्होंने श्रीरामकृष्ण वचनामृत का बांग्ला भाषा से हिन्दी में अनुवाद किया। एक बार उन्होंने कहा, ”जब मैं बोलता हूँ, तब यह न समझिए कि मैं बोल रहा हूँ। वास्तव में मेरी जबान से बोल रहे हैं स्वयं विवेकानंद।” स्वामी विवेकानंद की मृत्यु 1902 में हो चुकी थी, परन्तु 1920 के आसपास उनका प्रभाव कलकत्ता में अपने चरम पर था। कलकत्ता में बिताए कुछ वर्षों की गहरी छाप निराला जी के सभी कार्यों पर अंत तक कमोबेश बनी रही। उनके सामाजिक, राजनैतिक और सौन्दर्यबोधात्मक दृष्टिकोणों के गठन में इन वर्षों ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। विवेकानंद एवं श्रीरामकृष्ण की रचनाओं के अलावा उन्होंने बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय, शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय जैसे अन्य प्रसिद्ध लेखकों की कृतियों का बांग्ला से हिन्दी अनुवाद भी किया।

सन् 1923 में निराला ‘मतवाला’ नामक हिन्दी पत्रिका में काम करने लगे। पत्रिका के अठारहवें अंक में निराला की ‘जुही की कली’ नामक कविता छपी जो उन्होंने 1916 में लिखी थी। इस पत्रिका के लिए उन्होंने साहित्य, दर्शन, धर्म आदि विषयों पर लेख, समीक्षा और शोध-प्रबंध लिखा। ‘जुही की कली’ की रचना 1916 में हुई थी। इसी को ध्यान में रखकर छायावाद का प्रारंभ 1916-17 से मानने का तर्क सामने आया। जबकि इसका प्रकाशन 1923 के आसपास हुआ। परंतु निराला की पुस्तकाकार रचनाएँ 1928 के बाद ही प्रकाशित हो पायी, जब वे कलकत्ता से लखनऊ के एक प्रकाशनगृह में काम करने आए। ‘तोड़ती पत्थर’ नामक कविता में निराला वास्तविकता की नकल नहीं उतारते। अभागी युवती के बिम्ब में वे सारी भारतीय जनता के हताशापूर्ण अभावों और दुख को देखते हैं। कविता की सारी बिम्बात्मक-संरचना उसके मूलभाव पर जोर देती है, उसे उग्र बनाती है। सरल, कथात्मक अंदाज, छोटी-छोटी पंक्तियाँ, बातचीत के ढंग की वक्तृता, लक्षणा एवं व्यंजना का लगभग अभाव, जीवनरूप सत्यता और दैनंदिन विशिष्टता का वातावरण उत्पन्न करते हैं।
अनूठी लय, चुभते तुकान्त, पंक्तियों के अंत में ‘र’ ध्वनि का बाहुल्य पत्थर पर पड़ती हुई हथौड़े की नपी-तुली और एक ही ढंग की नीरस चोटों का प्रभाव उत्पन्न करते है। हर दिन के थका देनेवाले और विवशतापूर्ण श्रम ने मानव की आत्मा को मानों कुंठित कर दिया है। उनकी प्रसिद्ध रचना ‘कुकुरमुत्ता’ का दूसरा भाग पहले का पूरक है और उसका विस्तार करता है। इस पूरे रूपक का मुख्य भाव है, मेहनतकशों की स्तुति। कुकुरमुत्ता कविता के द्वारा निराला ने हिन्दी में एक नई विधा को जन्म दिया है। यह पंचतंत्र की नीतिकथा के समान कविता में एक दृष्टान्त कथा या आख्यायिका है। निराला के कलात्मक गद्य में प्रेमचंद की परंपरा का विकास हुआ है- इसमें रचनाकार के जीवन और समाज के जीवन में गहरी एकात्मता है। इस अद्वैत को एकात्म मानववादी यथार्थ कहना उचित होगा। वेदांत को सृजनात्मक बनाने वाले निराला के यथार्थ बोध को एकात्म मानववादी यथार्थ इसलिए भी कहा जा सकता है कि ये दर्शन और सृजन के दोनों स्तरों पर एकात्म और मानवीय दृष्टि से सम्पन्न है। उनके उपन्यास ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ में सर्वश्रेष्ठ गद्य रचना के सभी गुण हैं। किसानों में ‘कुलक’ मनोवृत्ति कैसे बनती है- इसका सजीव चित्रण ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ में हुआ है। निराला किसानों में होने वाली सामाजिक चेतना के विकास का कलात्मक चित्रण विश्वसनीयता से करते हैं।

1926-28 के दौरान निराला का स्वास्थ्य गरीबी और कड़ी मेहनत के कारण बिगड़ गया, जिसे उन्होंने व्यायाम और समुचित आहार से बना रखा था और वे अक्सर बीमार पड़ने लगे। इसी दौरान प्रेमचंद, शांतिप्रिय द्विवेदी, कृष्ण बिहारी मिश्र आदि से उनकी दोस्ती हुई और नैतिक सहारा मिलने लगा। मित्रों के कहने पर वे बाद में प्रयाग गए, जहाँ सुमित्रानंदन पंत से संपर्क हुआ। काशी में उनका आगमन होता रहता था। 1928 से 1936 के बीच प्रेमचंद, प्रसाद, पंत और निराला के बीच काफी संवाद हुआ। इसे छायावाद का उत्कर्ष काल माना जाता है। 1936 में प्रेमचंद की मृत्यु हुई। 1947 में देश के बँटवारा और 1948 में गांधी की हत्या के बाद नेहरूवाद देश पर हावी होने लगा। नेहरूवादी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव में छायावादी रूझान कम पड़ने लगा। इसीबीच प्रगतिशील लेखक संघ तथा इप्टा के प्रभाव का विस्तार होता गया। नेहरूवादी समाजवाद ने इस प्रभाव को और गहरा किया। धीरे-धीरे हिन्दी साहित्य पर मार्क्सवादी आलोचक हावी होने लगे और हिन्दी भाषी समाज साहित्य पढ़ने की जगह हिन्दी सिनेमा देखने लगा। साहित्य केवल बुद्धिजीवियों के बीच सिमट गया। छायावादी रचनाकार लोकप्रिय थे। 1947-48 के बाद सिनेमा ज्यादा लोकप्रिय होने लगा। इसी बीच महादेवी वर्मा का रचनात्मक विस्फोट हुआ। कालक्रम में पीछे होने के बावजूद महादेवी की रचनाओं में छायावादी रूझान है। उनकी रचनाएँ लोक में उस तरह तो प्रिय नहीं हुई, जिस तरह प्रसाद, प्रेमचंद, पंत या निराला की रचनाओं को लोकप्रियता मिली थी, लेकिन हिन्दी अंचल के पढ़े-लिखे वर्ग में महादेवी का अकादमिक महत्व बना रहा। हिन्दी साहित्य के छायावादी दीपक को महादेवी ने 1980 के दशक तक जलाए रखा। हिन्दी के कारुणिक साहित्य में महादेवी वर्मा का वही स्थान है, जो हिन्दी सिनेमा संगीत में लता मंगेशकर का है।

मार्क्सवादी साहित्य आलोचना के वर्चस्व के मरुस्थलीय युग में हिन्दी भाषी समाज के भीतर महादेवी और लता ने जिन्दगी का उत्सव संभव बनाया; हजारीप्रसाद द्विवेदी, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, फणीश्वर नाथ रेणु, दिनकर, विद्यानिवास मिश्र, नागार्जुन और निर्मल वर्मा आदि ने रचनात्मक हरियाली बनाए रखी। हिन्दी समाज की चेतना में आज भी छायावादी पंचमहाभूत ही प्रस्थान पंचक हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन में छायावादी साहित्य परंपरा के साथ नामवर सिंह जैसे मार्क्सवादियों ने न्याय नहीं किया है। परन्तु अन्य विद्वानों ने छायावादी रचनाकारों की जम कर प्रशंसा की है। उदाहरण के लिए श्री नारायण चतुर्वेदी के अनुसार- “तुलसीदास जी के बाद से अब तक हिन्दी काव्य-जगत् में निराला जी की काव्य-प्रतिभा का कोई कवि नहीं हुआ।” डा0 राधा कृष्णन के अनुसार “मानवीय भावना से ओत-प्रोत निराला की सारी कविता अतीत और भविष्य से वर्तमान का वार्तालाप है। मनुष्य के स्वच्छंद विकास के मार्ग पर पड़ी हुई सामाजिक, धार्मिक, राष्ट्रीय सभी बाधाओं को मिटा देने का वह प्रयत्न करते रहे।”

इसी प्रकार रूसी विद्वान चेलिशेव ने लिखा है कि “अपनी अनेक प्रारंभिक कविताओं में निराला ने रवीन्द्रनाथ ठाकुर का अनुकरण किया। बाद में भी निराला रवीन्द्रनाथ की रचनाओं का बार-बार रसास्वादन करते थे। उन्हें आंदोलित करने वाले कई प्रश्नों के उत्तर उन्हें इन कृतियों में मिलते थे। रवीन्द्रनाथ की ही भांति निराला भी मध्यकालीन भक्त कवियों के एकात्म मानववादी विचारों पर मुग्ध थे। इन कवियों में प्रथम थे तुलसीदास और दूसरे थे चण्डीदास। सृजनात्मक प्रेरणा के तीसरे महत्वपूर्ण स्रोत थे स्वामी विवेकानन्द (1863-1902)।” चेलिशेव रूसी विद्वान अवश्य थे, परन्तु मार्क्सवादी कठमुल्ला नहीं थे। सुमित्रानंद पंत और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ पर उनका शोधकार्य रामविलास शर्मा, नामवर सिंह और अन्य मार्क्सवादी आलोचकों से गुणात्मक रूप से भिन्न है। विदेशी विद्वान होने के नाते उनकी भारत के बारे में समझ गहरी नहीं थी, परन्तु वे निराला एवं पंत की रचनाओं को मार्क्सवादी साँचे में फिट करने की वैसी कोशिश नहीं करते, जैसी कोशिश भारतीय मार्क्सवादियों ने की है।
परंतु स्वामी विवेकानंद के बारे में चेलिशेव से सहमत होना कठिन है कि ”विवेकानंद प्रथमत: धार्मिक सुधारक थे। उनके सामाजिक और राजनैतिक आर्दश काल्पनिक थे।” विवेकानंद के विचार पारंपरिक एवं आधुनिक विचारों के समन्वय पर आधारित थे, इसे काल्पनिक कहना चेलिशेव की नासमझी है। विवेकानंद अद्वैतवेदांत के समकालीन प्रतिनिधि थे और उनके विचार ठोस भारतीय दर्शन पर आधारित थे।

छायावादी साहित्य की व्याख्या करते हुए सुमित्रानंदन पंत पल्लव (1926 ई.) की प्रस्तावना में सर्वव्यापी सामंजस्य का पक्ष-पोषण करते हैं। चिर-परिवर्तनशील और चिर-नवीन, चिर-युवा और सुन्दर प्रकृति में इस सामांजस्य की सर्वथा समीचीन अभिव्यक्ति पंत की रचनाओं में मिलती है। मानव-जीवन में भी ऐसा ही सामंजस्य देखने की कवि की इच्छा है। वास्तविकता और कल्पना (संभावना) की असंगति पर काबू पाकर छायावादी कवि प्राणवान यथार्थ को आदर्श मूल्यों से सहज रूप से जोड़ते हैं; महान अतीत, दुखद वर्तमान और उज्जवल भविष्य को एक सूत्र में बाँधते हैं। अनुभूतियों के गहनतम सूक्ष्म प्रकाश डालने में पंत को महारत हासिल थी। प्रभाकर माचवे कहते हैं कि “छायावाद मार्ग-सन्धि की कविता है, जिसमें दो मार्गो में से अनेक को चुना जा सकता है। महावीर प्रसाद द्विवेदी के विचार धारात्मक एवं सौन्दर्य बोधात्मक सिद्धांतों पर आधारित उपदेशवादी और बुद्धिवादी कविता से सन्तोष न पाकर निराला ने चैतन्यशील प्रकृति के आंतरिक जगत में प्रवेश किया। उनकी विद्रोही मन:स्थिति को, जीवन को नूतन बनाने और मानव-आत्मा को मुक्त करने की उनकी अभिलाषा को यह प्रकृति प्रतिबिम्बित करती थी।”

कुछ आलोचकों के अनुसार प्रसाद की कामायनी छायावाद की अंतिम श्रेष्ठ उपलब्धि है। हिन्दी कविता के नूतनीकरण की इच्छा से प्रेरित होकर प्रसाद ने कामायनी में भारत की पौराणिक कथाओं के पात्रों और विषय-वस्तुओं को नये साँचों में ढ़ाला है। ठीक इसी प्रकार महादेवी वर्मा के बारे में यह कहा जाता है कि “रहस्यवादी गूढ़ार्थ, विश्व के मर्मो में पैठने की अभिलाषा, नीरव स्वरों और अर्धस्वरों से ध्वनित लघु प्रगीतात्मकता, चिरस्थायी विषादभरी मन: स्थिति, बौध्दधर्म से प्रभावित करुणा की पुकारें आदि महादेवी वर्मा की कविता की विशिष्टताएँ हैं।”

छायावादीधारा के अधिकांश प्रतिनिधि कवि लोकवादी विचारों के भारतीय बुध्दिजीवी थे। छायावाद का रोमांटिक रूप कुल मिलाकर एकात्म मानववादी तत्व से परिपूर्ण है। छायावाद के बिम्व विधान का आधार चैतन्यशील प्राकृतिक जगत और प्राचीन भारत की पौराणिक आख्यायिकाएँ हैं। जीवंत एवं मायामय संसार की वास्तविकता और संभावना का विलक्षण पारस्परिक प्रभाव छायावादी बिम्व विधान की दूसरी आधारशिला है।

छायावादी कविता बिम्ब, प्रतीक, रूपक और उपमाओं के साथ भावावेगों से भी ओतप्रोत है। छायावादी कवि काव्य- सृजन के प्रति प्राचीन भारतीय छन्द शास्त्र के नियमों को नहीं मानते। काव्य रूपों के परिष्कार का प्रयत्न अपने आप में उनका ध्येय नहीं होता। उनका ध्येय मनुष्य के आंतरिक जगत का सर्वांगीण उद्घाटन होता है। विश्व के प्रति नये, समन्वित दृष्टिकोण को नये रूप में मूर्त करना उनका प्रमुख उद्देश्य होता है।

पल्लव की प्रस्तावना में पंत ने लिखा है कि “कविता के लिए चित्र भाषा की आवश्यकता पड़ती है, उसके शब्द सस्वर होने चाहिए, जो बोलते हों, जो अपने भावों को अपनी ही ध्वनि में आँखों के सामने चित्रित कर सकें।” भाषा में, शैली में, विषयवस्तु के चयन में, संयोजन में सबमें छायावादी कवि रीतिकालीन नियम-भंग करते हैं, नये अलंकार लागू करते हैं, मौलिक काव्य-रूपों, छंदों, नये लयविन्यास और तुकों की प्रणालियों का सृजन करते हैं। उत्तरमध्य युगीन काव्य में ऐन्द्रिक प्रेम-पात्र के ही रूप में नारी का चित्रण होता था और उसके सौन्दर्य के बाह्य लक्षणों पर ही ध्यान दिया जाता था। इसके विपरीत छायावादी कवियों के लिए स्त्री का आन्तरिक जगत ही प्रधान होता है। उसकी भावनाओं, मन: स्थितियों और अनुभूतियों की सम्पूर्ण विविधता को वे प्रकाश में लाते हैं। छायावादी कवियों की सृजन-प्रेरणा का प्रधान-स्रोत मध्यकालीन भक्ति-काव्यधारा रही है, जिसका उद्भव मध्यकालीन उत्पीड़न और अवरुद्ध जीवन-क्रम के विरुद्ध प्रतिक्रिया के रूप में हुआ था। इसका उद्देश्य एक विपरीत समय में भारतीय संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्धन था। ठीक उसी तरह छायावाद का जन्म रीति-कालीन कविता निवृत्तिमार्गी परंपरा और सूफी शृंगार के साथ-साथ अंग्रेजी राज के पूँजीवादी उपभोक्तावाद के विरुद्ध भारतीय नवजागरण के उन्मेष के रूप में हुआ। मार्क्सवादी आलोचकों ने भक्ति साहित्य और छायावाद को अपनी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए एक हथियार के रूप में उपयोग कर हिन्दी भाषी जनता के साथ छल किया है। यह ठीक है कि भक्ति साहित्य और छायावाद के स्वर में पर्याप्त जनपक्षधरता है, परन्तु यह किसी भी दृष्टिकोण से भौतिकवादी या ऐन्द्रिक सुख को चरम मानने वाली विचारधारा के साथ मेल नहीं खाती।
यह भारतीय नवजागरण को समवेत स्वर प्रदान करने वाला साहित्यिक युग है। उदाहरण के लिए, परंपरागत उपमाएँ और रूपक पंत की कविताओं में नवीनता का सृजन करते हैं। जैसे पंत की दृष्टि में पर्वतीय वायु पेड़ों को या पत्तों को नहीं हिलाती, बल्कि बांसुरी बजाने वाले गोपवेशधारी भगवान कृष्ण बन जाती हैं। नवजात शिशु की तुलना पंत उस कोमल, अर्द्धोन्मीलित वासन्तिक कलिका से करते हैं, जो अभी यह नहीं जानती कि उसमें कैसे सौन्दर्य एवं सौरभ की निधि छिपी हुई है। पंत की कविता में पवन आकाश की उत्ताल तरंग बन जाता है तथा जल-प्रपात नीरव पर्वत का गूँजता हुआ गान, जबकि आकाश का तारा अति सुन्दर दिव्य विहंग बन जाता है।

उसी तरह प्रसाद की कामायनी में काव्य का प्रधान वैचारिक सारतत्व अभिव्यक्त हुआ है, तथापि ये कवि की व्यक्तिगत मनोंदशाओं के प्रतीक नहीं हैं। काम की पुत्री श्रद्धा और मानव वंश के प्रणेता मनु भारत के पौराणिक पात्र हैं। प्रसाद उनमें आधुनिक मानवीय तत्व भरते हैं। वह यह सन्देश देना चाहते हैं कि आत्म त्यागपूर्ण हार्दिक प्रेम, नि:स्वार्थता और आन्तरिक शुद्धता मनुष्य के वे गुण हैं, जो स्वार्थपरता, हिंसा और क्रूरता पर आधारित आधुनिक समाज में स्वास्थ्यकर औषधि का काम दे सकते हैं। उसी तरह मीरा बाई के प्रगीतों में भगवान के प्रति आध्यात्मिक प्रेम प्राय: वास्तविक मानवीय भावना का रूप ले लेता है, मनुष्य को शुध्द करता है, उसे उदात्त आदर्शों की ओर प्रेरित करता है। प्रकृति-वर्णन, प्रेम और धार्मिक-दार्शनिक चिन्तन से पूर्ण भक्ति काव्य में मनुष्य की सुन्दरता समन्वित रूप से प्रकृति की सुन्दरता से एकाकार हो जाती है। बांग्ला के भक्तकवि गोविन्ददास के गीतों में कृष्ण की प्रेमिका के अंगों में आसपास का सारा जगत् दिखाई देता है। पार्थिव मानव के प्रति भक्तिकाव्य की रुचि और प्रकृति की प्रतिमाओं की सहायता से उसके आन्तरिक जगत पर प्रकाश डालने और उसके बाह्य रूप का वर्णन करने के प्रयत्न का छायावादी कवियों पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा है।

उसी तरह प्रेमचंद के कथा साहित्य में नौ रसों का वर्णन है। ‘कफन’, ‘पूस की रात’ जैसी जनपक्षधर कहानी के साथ प्रेमचंद ने ‘पंच परमेश्वर’ और ‘बड़े घर की बेटी’ जैसी आदर्शवादी कहानी भी लिखी थी। ‘गोदान’ के साथ ‘सेवासदन’ भी लिखा था। जिस तरह तुलसीदास की सम्पूर्ण रचनाओं में मध्यकालीन जीवन की सभी छटा काव्य के रूप में व्यक्त हुई है, ठीक उसी प्रकार छायावादी साहित्य के गद्य एवं काव्य सभी रूपों में अंग्रेजी राज के उत्तरार्ध के दौरान भारतीय जीवन की जड़ता और गतिशीलता, सौन्दर्य एवं विरूपता सबका समग्र एवं संतुलित वर्णन है। भक्तिकाल और छायावादी युग में समरूपता तो नहीं है, परन्तु सहधर्मिता एवं समानधर्मिता अवश्य है।

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